Syaah Hote Rang -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

    • Pustak Samiksha : Atulya Khare

    • समीक्षित  पुस्तक : स्याह होते रंग

    • द्वारा : डॉ. प्रदीप उपाध्याय

    • विधा : लघुकथा

    • लिटरेचर लेंड द्वारा प्रकाशित  

    • प्रथम प्रकाशन वर्ष : 2026 

    • मूल्य : 461 

    • समीक्षा क्रमांक : 247 

Syaah hote Rang By Dr Pradeep Upadhyay front Cover Page

                             ​वरिष्ठ साहित्यकार एवं अपने तीक्ष्ण व्यंग्य लेखों हेतु विशेष रूप से पहचाने जाने वाले डॉ. प्रदीप उपाध्याय का लघुकथा संग्रह "स्याह होते रंग" हालिया दौर में हिंदी लघुकथा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाता है। उनका यह लघुकथा संग्रह किसी साहित्यिक प्रयोग की महत्त्वाकांक्षा से नहीं लिखा गया है अपितु इसमें उन्होंने आज के जीवन की वास्तविकता के धरातल पर असहज कर देने वाली और बाज दफा तो चुभती हुई सच्चाइयों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है। यूं भी प्रतीत होता है की यह उनके प्रत्यक्ष घटित एवं स्व-अनुभूत वाकयों और प्राप्त तजुर्बों का सहज शाब्दिक प्रस्तुतीकरण मात्र है। 

                              इस लघुकथा संग्रह में एक ओर जहां अत्याधिक विकसित आधुनिक शहरी जीवन की आपाधापी देखने में आती है वहीं सामान्य जन के सरल सहज परिवेश के संग उसका विरोधाभास भी बहुत स्पष्टता से उभर कर सामने आता है।

​                             अत्यधिक तीव्रता से शहरों का बदलता स्वरूप मात्र तकनीकी और गगनचुंबी इमारतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव कुछ ऐसा देखने में आ रहा है कि अब इस कांक्रीट के बढ़ते जंगल में मास्टर बेडरूम तो बड़े लेकिन दिल छोटे होते जा रहे हैं।

                                                      

syaah hote rang by Dr Pradeep Upadhyay

                              उपाध्याय जी ने रील्स की दुनिया, रोबोट, वॉइस असिस्टेंट और डिजिटल चकाचौंध के बीच सिकुड़ते हुये मानवीय संवेदनाओं और संबंधों के बीच बढ़ते अंतर को बहुत बारीकी से पकड़ा है। वहीं अपनी इन लघुकथाओं के द्वारा उन्होंने मन की कुंठा, श्रमिक जीवन की विवशता, आर्थिक अभाव, भूख, और मानवीय रिश्तों के बीच के खोखलेपन को प्रभावी ढंग से उकेरा है।

                              लघुकथा के विषय में स्वयं लेखक का मानना है कि लघुकथा उनके लिए समय से संवाद का सबसे सधा हुआ माध्यम है। लघुकथा में एक भी शब्द अतिरिक्त होने पर कथा का संतुलन बिगड़ सकता है, इसमें मुख्य कथानक से इतर विस्तार और अनावश्यक भावुकता की कोई छूट नहीं होती।​ लघुकथाओं की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये कहीं कोई उपदेश नहीं देतीं, अपितु पाठक को झकझोरते हुये उसे अनुत्तरित सवाल और एक गहरी चुप्पी के साथ छोड़ जाती हैं एवं संभवतः अपना संदेश प्रभावी तरीके से देने में यह विधा वर्तमान में सर्वाधिक प्रभावी हो गयी है। 

                              उपाध्याय जी की लघुकथाओं में कोई बड़े आदर्श, सीख इत्यादि न होकर आम आदमी से जुड़ी बाते है, उन्हीं के आम जीवन की बातों से ही यथा नल, काउंटर, सम्मान समारोह, ऑनलाइन सेवा और दान-पुण्य जैसे साधारण शब्द से ही कहानियों में गहरे भाव आ गए हैं।

                               लघुकथा "उनका पता' एक ऐसे वाकये को दिखलाता है जो नेताओं द्वारा आम जन को भूल जाने पर कटाक्ष भी है एवं प्रत्युत्तर भी, तो "कंठस्त पाठ" एक तीक्ष्ण तंज़ करती रचना है लोकतंत्र पर, उसकी शाब्दिक परिभाषा और वास्तविकता के अंतर पर। 

                                                           


                               उपाध्याय जी की शैली से परिचित पाठकों को तो ज्ञात ही है, किन्तु वे प्रबुद्द पाठक जो उन्हें पहली बार पढ़ रहे हैं वे भी सहज ही अनुभव करेंगे की उनकी रचनाओं की भाषा बेहद सरस सरल और स्वाभाविक है, जो पाठकों को सहज ही अपनी ओर खींचती है और अपने से प्रभावी रूप से संबद्द करते हुए कहीं न कहीं एक तंज़ और पाठक को एक बड़े प्रश्न के संग छोड़ जाती है। 

                               लघुकथा "गुड मैनर" द्वारा प्रदीप जी सिविक सेंस पर बहुत सरल सी बात बेहद प्रभावी तरीके से कह गए , तो कहानी "सीख" जहां एक ओर युवा पीढ़ी को बुजुर्गों की महत्ता सिखलाती है वहीं उनका उचित सम्मान करना भी।   

                               संक्षेप में कहा जाए तो डॉ. प्रदीप उपाध्याय की कृति "स्याह होते रंग" महज़ कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि लघुकथाएँ अपनी लघुता के बावजूद बदलते समय के साहित्य का एक प्रभावी प्रस्तुतीकरण है। यह पुस्तक प्रबुद्ध पाठकों, साहित्य प्रेमियों और समाज के बदलते रंगों को करीब से समझने के इच्छुक हर व्यक्ति के लिए पठनीय और संग्रहणीय है।

                               कहानी "अपना अपना कोटा" तीर्थाटन की एक अलग ही परिभाषा या कहें उसका सच्चा अर्थ  बतलाती है  तो कहानी "पेट की खातिर" एक ही कृति की दो परिभाषाएं बतलाती है। 

                                                                   

syaah hote rang by Dr Pradeep Upadhyay
  

                               कहानी "बुनियाद" , वास्तविक कार्य की महत्ता दर्शाती है न की उसकी जो सामने दिख रहा है। तो कहानी "प्रतिकार" शराब की आदत का घर पर बच्चों पर प्रभाव दर्शाती है वहीं  एक संदेश भी की कुछ अच्छे कदम लेने हेतु देर कभी भी नहीं है । 

                               कहानी "अनुत्तरित सवाल" और "जिल्लत" भिन्न शीर्षक के सिवाय समान ही है एवं ऐसा ही "दुविधा' और 'दर्द का रिश्ता", "आवारा पशु" और "दान पुण्य", "आनंदपूर्ण जीवन" और "चमक", "खिसियाहट" तथा "बुढ़ापे के लक्षण", में भी है । वहीं कहानी किरचें लगातार दो बार छाप दी गई है। 

                               कहानी "संकल्प' सफाई के प्रति जागरूकता को केंद्र में रखती है तो कहानी "खार" आज के इंसान में घटते मूल्यों पर तंज है तो "दूर के ढोल" से दर्शाया है आजादी का वास्तविक अर्थ और भाव तो कहानी "घोषणा" वर्तमान व्यवस्था की कार्य प्रणाली पर एक गंभीर इशारा है । 

                              संग्रह की विभिन्न कथाओं से गुजरते हुए यह बार बार आभास होता है की लघु कथाओं में भी उपाध्याय जी अपनी मूल तीक्ष्ण व्यंग्यात्मक शैली के आस पास ही रहे है एवं अधिकांश कहानियाँ या तो तंज़ करती हैं अथवा  एक प्रश्न। 


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                 अतुल्य खरे 

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