Fakiri Jhole Ke Item -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
· Pustak Samiksha : Atulya Khare
· समीक्षित पुस्तक : फकीरी झोले के आइटम
· विधा: व्यंग्य कथा
· द्वारा: डॉ . प्रदीप उपाध्याय
· Manda Publishers द्वारा प्रकाशित
· प्रथम संस्करण : 2026
· मूल्य : 349.00
· समीक्षा क्रमांक : 237
"फकीरी झोले के आइटम" लेखक के व्यंग्य लेखन यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव और उनके पिछले बारह संकलनों का विस्तार है। यह पुस्तक मात्र व्यंग्य नहीं है अपितु एक गंभीर साहित्यिक जिम्मेदारी का निर्वहन है, जो समाज में व्याप्त विसंगतियों और विरोधाभासों को उजागर करते हुए उनके प्रति लेखक के मनन एवं चिंता को दर्शाती है।
डॉक्टर प्रदीप उपाध्याय, साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी विशिष्ट लेखन शैली हेतु पहचाने जाने वाली
एक अहम शख्सियत हैं। शासकीय सेवा ने उन्हें समाज के हर वर्ग से जुड़े प्रत्येक पहलू
को समझने का भरपूर अवसर दिया जिसका निचोड़ तकनीकी बारीकियों एवं व्यक्ति विशेष की
मानसिकता के अवलोकन, अध्ययन एवं निष्कर्ष से जुड़े विभिन्न विषयों में उनके लेखन
में बखूबी नजर आता है एवं उनके कथनों को तार्किकता संग प्रमाणित करता है तथा लेखन
को और अधिक धारदार बनाता है।
उपाध्याय जी के निर्भीक तीक्ष्ण
व्यंग्य जहां संबंधित को कचोटते हैं वहीं पाठक को चिंतन का विषय प्रदान करते हुए
आनंदित करते हैं। उपाध्याय जी का व्यंग्य लेखन, साहित्य में व्यंग्य की कसोटी पर खरा
उतरता है। गंभीर व्यंग्य हेतु हास्य का होना अनिवार्यता नहीं किन्तु वर्तमान में
बहुतेरे व्यंग्यकारों नें सस्ती लोकप्रियता हासिल करने हेतु फूहड़ता जनित हास्य
को भी व्यंग्य विधा के अंतरत वर्गीकृत करना प्रारंभ किया है जो एक चिंता का विषय
है।
साहित्यिक
रूप में व्यंग्य विधा साहित्य की वह शैली है, जिसके अंतर्गत विषय, व्यक्ति, स्थिति
की आलोचना अथवा कटाक्ष सहज रूप में, इस प्रकार अभिव्यक्त किया जावे की संबंधित की
भावनाये आहत न हों साथ ही लेखक अपने लेखन का उद्देश्य भी प्राप्त करे। हालांकि
उपाध्याय जी स्वयं व्यंग्य को मात्र साहित्यिक विधा नहीं, अपितु
“आत्मिक पुकार” मानते हैं एवं अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के मन को झकझोरने
और उनके साथ वैचारिक तादात्म्य स्थापित करने का सफल प्रयास करते हैं। उनका लेखन
मनोरंजन मात्र नहीं अपितु पाठक के अंतर्मन को जागृत करता है।
उपाध्याय जी के द्वारा
सृजित व्यंग्य में ये समस्त बारीकियों संपूर्णता से देखने में आती हैं। बहुधा उनके
व्यंग्य व्यवस्था, राजनीति, राजनेता अथवा राजनीति से प्रभावित अन्य विषयों पर
केंद्रित होते हैं किन्तु चाटुकारिता से बहुत दूर वे अपने कथन पूर्ण निर्भीकता के
साथ रखते हैं। पर्यावरण, पशु पक्षी प्रेम एवं गंभीर सामाजिक
मुद्दे भी उनके लेखन के विषयों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
उपाध्याय
जी की शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे “सीधे-सीधे वार” करने के
बजाय व्यंग्य का ऐसा हथियार इस्तेमाल करते हैं जो “लहू-लुहान” नहीं करता, लेकिन झकझोरता जरूर है। उनकी भाषा अत्यंत सलीके से कही गई बातों का एक ऐसा
पुंज है, जो “चांदी के जूते मारने” वाली कहावत को चरितार्थ
करती है। उनके नजरिए में व्यंग्य का उद्देश्य केवल पाठक को हंसाना नहीं, बल्कि उसे उद्वेलित करना और वैचारिक स्तर पर सोचने के लिए विवश करना है।
बात
करे प्रस्तुत पुस्तक की तो पुस्तक मुख्यतः उपाध्याय जी के पसंदीदा विषय, यथा सत्ता,
राजनीति और समाज की विभिन्न परतों को टटोलती है। बहुत सी कहानियाँ आम
आदमी के रोजमर्रा के संघर्ष को लक्षित हैं। कहानियाँ लघु-कथा की श्रेणी की हैं,
अतः व्यर्थ का विस्तार एवं घुमाव नहीं है, सीधे सीधे मुद्दे
की बात हैं।
कुछेक कहानियों
पर संक्षिप्त में अपने विचार साझा कर रहा हूँ। ये वे कहानियाँ है जिन्होंने किसी न
किसी कारण से मन को छुआ है , जैसे की पहला ही व्यंग्य “चमन आ अब घर चल” जहां चमन
आम आदमी का प्रतिनिधित्व कर रहा है, तीक्षण व्यंग्य, सत्ता
पाने के लिए नेताओं के वायदों, उनमें भरमाए आम लोगों आगे सतर्क रहने की सीख देता
हुआ है। इस के माध्यम से जनप्रतिनिधियों के वायदों और उनसे भ्रमित आम जनमानस की
स्थिति को रेखांकित किया गया है वहीं अगली कहानी में इंफ्रास्ट्रक्चर और
भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हुए, लेखक वर्तमान व्यवस्था में
निर्माण कार्यों के गिरते स्तर और जवाबदेही की कमी को सामने लाते हैं। “पुस्तकों
का मीना बाजार” जैसे व्यंग्य समकालीन साहित्यिक परिवेश पर तीखी चोट करते हैं,
जहाँ लेखक और पाठक के बीच का संतुलन बिगड़ चुका है। वे समय के साथ
बदलते समाज को देखते हैं, और उन्हें अपने तीखे कटाक्षों के
द्वारा संबोधित करते हैं। वैसे कहा भी गया है की वो व्यंग्य ही क्या जो घूम कर वार
न करे क्यूंकी आमने सामने तो बस झगड़े होते हैं।
वहीं
इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास और पुल आदि के निर्माण को लेकर अंग्रेजों के जमाने में
बनाए गए पुल के मार्फत करता व्यंग्य किया हैं वर्तमान व्यवस्था में व्याप्त
भ्रष्टाचार तथा निर्माण के गिरते स्तर पर (संदर्भ: बिहार में एक सप्ताह में तीन
निर्माणाधीन पुल ढह गए थे)।
तो गुरुदेव और सीखचों में फंसे राजाजी के द्वारा केजरीवाल और उनके गुरु के बीच का वार्तालाप
है जो स्वयं सारी परतें खोलता है साथ ही भाषा प्रयोग में वरती गई सादगी एवं
कलात्मकता प्रशंसहनीय है जो किसी को भी न तो आक्षेपित करती है न ही सीधे सीधे
दोषारोपण।
चुनाव
परिणामों में पक्ष विपक्ष के हालत बयान करती है कहानी “आस निरास भई”।
“तुम्हें
हर हाल में गुजरना है अग्निपरीक्षा से”, चुनाव में EVM मशीनों पर
लगने वाले अनर्गल आरोपों पर अच्छा प्रहार है, वहीं विकास के
नाम पर चहूँ ओर मची लूट, स्तरहीन कार्य और उनसे होते जान माल
के नुकसान आदि पर संवेदनशील व्यंग्य एवं व्यंग्य की एक सबसे मशहूर चाल दिख लाता है,
जहां बात का आखिरी न दिखने वाला छोर हमारे सामने आता है और मूल बात पकड़ कर पाठक को
ही वह सिरा पकड़ कर स्वयं सार तक पहुंचना है।
कुछ वैसा ही इस रचना में भी है जहां पक्के निर्माण, अच्छे गुणवत्तापूर्ण
कार्य की निंदा दर्शायी हैं यथा अस्थाई निर्माण स्थायित्व ले आयेंगे जिस से ठहराव
होगा, काम नहीं होंगे तो बेरोजगारी होगी आदि आदि, यही है
सबका साथ सबका विकास क्योंकि ये कमजोर आए दिन टूट जाने वाली सड़कें हों पुल या फिर
अन्य कार्य जिनमें नित ही बदलाव किए जाते हैं कारण तो लेखक ने बताए ही है आखिर कर
प्रगतिशील बने रहना है।
एक तीखा
व्यंग्य है "एक साहित्यकार की व्यथा कथा", एक नवयुवक द्वारा वरिष्ठ लेखक संग
वार्तालाप के माध्यम से साहित्यकारों को दिखाए गए आइने ने वह कह दिया जो सभी जानते
पर कहता कोई नहीं, वहीं कहानी "स्याला मैं तो संपादक बन गया" जो यह दर्शाने के लिए बहुत काफी है कि
किस तरह साहित्य के क्षेत्र में गिरावट आ चुकी है विशेषकर नैतिकता में, नाम हेतु संपादक बना कर अपने खर्चे निकलवाने के उदाहरण के द्वारा लेखक ने
बहुत कुछ उजागर कर दिया है।
कहानी “फकीरी
झोले के आइटम” सत्ता की मुफ़्त रकम और विविध सुविधाएं मुफ्त बांटने की योजनाओं पर
कटाक्ष है। लेखन कि शैली की बनगी देखिये --
“अकेला
फकीर हो या दो चार लोगों के विशाल परिवार वाला फकीर, माया मोह की सीमा से परे रहकर
बीसियों कमरों के छोटे से दड़बे में रेशमी चिंदों के पर्दों से अपनी गरीबी की
चकाचौंध छुपाता अपने भक्ति के लिए दुबलाता रहता है” ।
वहीं भक्त
कौन और किस हाल में हैं यह भी जान लें, “स्लम एरिया में एक कमरे के विशालकाय महल में
अपने छोटे से परिवार जिनमें मात्र आठ दस परिजनों के साथ विलासितापूर्ण जीवन जीते
हैं “। यह लेखन शैली ही उनकी अमूमन हर कहानी में दिखलाई देती है। व्यंग्य प्रभावित
करते हैं एवं शैली पाठन का सुकून।
“आह कब आओगे अतिथि”
पुराने समय की यादें ताजा करती रचना है जिसमें गर्भित व्यंग्य कहीं भीतर चुभता है
जहां हम अपनों से दूर हो चुके हैं और आभासी दुनिया को ही जीवन का यथार्थ मन बैठे
हैं। ऐसे ही और भी विचारोत्तेजक कहानियों यथा “यही दस्तूर है”, “जहर जहर को काटता है”, “हे कवि कुछ बताओगे”,
“इमानदारी का प्रमाणपत्र” “मिल बाँटकर खाओ” आदि इस संग्रह में हैं
जिन्हें अवश्य व संपूर्ण एकाग्रता से पढ़ा जाना चाहिए ।
प्रतिवर्ष
धूम धाम से मीडिया के सामने, फोटो सेशन पर विशेष फोकस के दृष्टिगत मनाए जाने वाले पर्यावरण
पखवाड़े और वृक्षारोपण कार्यक्रमों की बखिया उधेड़ती रचना है बच्चे की जान लोगे
क्या। कह सकते है कि व्यंग्यकार की पारखी नजर वह देखती है जो आम जन सोच ही नहीं
सकता।
व्यंग्य
कथा “एक अकेला इस शहर में” के द्वारा कई निशाने साधे है लेखक ने, जहाँ एक ओर
रिटायर्ड बड़े अधिकारी के दिल का दर्द झलक रहा है जिसे अब कोई नहीं पूछता तो वहीं
आम जन के बीच लेखकों की हालत को बखूबी पूरी सच्चाई से बयान किया है ।
कहानी “करे
कोई भरे कोई” पुनः व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए बारिश में बिल्डिंग में भरे पानी
और सड़कों तथा अन्य संस्थानों में जलभराव से आई आपदाओं हेतु बारिश, देवता, पानी और उन सड़को को दोषी
बनाते है जो बिना सोचे बिचारे कितना भी बरसते हैं और फिर कही भी जलभराव होता है
किन्तु इस में उन बेचारे अफसरों का क्या दोष जिन्होंने बिल्डिंग परमीशन दी या
जिन्होंने उस का इन्स्पेक्शन किए बगैर ही प्रमाणपत्र जारी कर दिया।
वहीं वे
अपने अनुभव से समाज के बदलाव पर नजर रखते हुए मानव स्वभाव की विसंगतियां और
विडंबनाएंओं के अपरिवर्तनीय रहने पर चिंता व्यक्त करते हैं। वे सत्ता और राजनीति
के बदलते चेहरों के पीछे छिपे हुए वास्तविक चेहरों को टटोलते हैं, जो आम आदमी के संघर्ष एवं
दयनीय स्थिति हेतु सबसे अहं किरदार है।
अतुल्य खरे
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