k se kahaniyan By Abhinav Gupta
क से
कहानियाँ
विधा:
कहानी
द्वारा:
अभिनव गुप्ता
बोधरस
प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम
संस्करण: 2025
मूल्य :
200
समीक्षा क्रमांक
: 210
“क
से कहानियां,” युवा लेखक अभिनव गुप्ता का पहला कहानी संग्रह है किन्तु अभिव्यक्ति
में परिपक्वता,
सरल भाषा, प्रवाह में सरलता तथा पाठक के दिल तक पहुचने की कला,
उनमें अपार संभावनाएं दर्शाती है। पुस्तक के प्रारंभ से पूर्व ही,
पिता के लिए श्रद्धा सुमन स्वरूप लिखित चंद पंक्तियां प्रभावित करती
हैं एवं पुस्तक की सबसे सुंदर पंक्तियों में से है।
पुस्तक
में यूं तो 12
कहानियां संग्रहीत हैं किन्तु सब अपने भाव एवं कथानक में विविधता
रखते हुए हमारे इर्द गिर्द की बात ही लगती हैं। कही किसी विषय विशेष अथवा अद्भुत
पात्र का सृजन नहीं है, पात्र भी हमारे अपने ही लगते हैं, फिर
वह करीबी रिश्तेदार हो अथवा कोई मित्र या पड़ोसी, सब से पाठक को सहज ही जुड़ाव हो
जाता है एवं सब अपने लगने लगते हैं, और कहानी अपनी कहानी ।
प्रमुखता
से कहा जा सकता है कि विषय अथवा परिदृश्य सृजित कर, पात्र उसमें पिरोये गए हों ऐसे
प्रतीत नहीं होते, अपितु वे तो अपने सहज प्रवाह में कथानक से जुड़ते चले जाते हैं।
पात्र भी ऐसे जो आपके अपने लगते है जो गाहे बगाहे राह चलते मिले, कुछ अपने से लगे, और बस अपना बना कर चले गए। कहानी के
विषय में सर्वमान्य तथ्य भी तो यही है कि जब पात्र एवं पाठक एक सार हो जाए,
पाठक पात्र में स्वयं को देखने लगे, तो लेखक
का उद्देश्य पूर्ण हुआ जान लेना चाहिए, एवं युवा लेखक अपने
इस प्रयास में सफल रहे है।
“जिज्जी”, सीमित पात्र संग रचित, भावप्रधान, कथानक है। कहानी है दो ऐसी वृद्ध महिलाओं की जो घर-परिवार और तथाकथित,
अपनों से दूर, एक वृद्ध आश्रम में मिलीं, प्रारम्भिक दूरियों
के पश्चात एक दूसरे से धीरे धीरे जुड़ी किन्तु फिर दिल ऐसे मिले कि दो जिस्म एक
जान हो गई। वृद्धाश्रम की मित्रता सारे जीवन पर प्रभावी हो गई। भावना प्रधान कथानक
जो रिश्तों से अधिक अहमियत दिलों के मेल को देना दर्शाता है।
अभिनव
जी की कहानियों का आकर माध्यम है किन्तु कहानियां स्वतः इंगित करती हैं कि लेखक के
पास कहने को बहुत कुछ है। हालांकि सभी पात्र अपने दृश्यों में सटीक एवं प्रभावी
हैं किन्तु चंद स्थानों पर कहानी समाप्त होकर चकित करती है चूंकि कथानक में डूबा
हुआ पाठक उन पात्रों के संग उस कथानक में कुछ और देर के लिए डूबे रहना चाहता है और
संभवतः कथानक के बंधन के कारण हम उसे तब छोड़ना नहीं चाहते, यह कथानक एवं कथन की सरलता की विशिष्टता एवं सहज ग्राह्यता ही कही जाएगी।
पीढ़ियों
के संग बदलते दौर और परिवेश में, बीते दिनों की भव्यता, अपना घर अपनी मिट्टी की भावना
अब यथार्थ में कम ही दिखती हैं, कहानी “आखरी बल्ब टिमटिमाता रहा” का कथानक मूलतः केंद्रित
है इस ज्वलंत विषय पर। यहाँ वे दर्शाते हैं कि कैसे अब नई पीढ़ियां समय के साथ आगे
बढ़ते जाती है, एवं इस प्रवाह में पुराना घर पुराना शहर कहीं बहुत पीछे छूट जाते
है, और छूट जाती हैं अनसे जुडी बेमिसाल यादें जो उस पीढ़ी के लोगों के जाने के साथ-साथ
स्वतः ही विस्मृत होती चली जाती हैं। कथानक का मूल भाव भलीभांति पाठक तक संप्रेषित
हुआ है, जिसमें जहां अपनी मिट्टी और शहर से जुड़ी बातें हैं वहीं युवा पीढ़ी के
आगे और बहुत आगे जाने के सपनों को साकार होते देखती बुजुर्गों की टिमटिमाती आँखें, जीर्ण शीर्ण होते पुराने मकान और उनके साथ बुजुर्ग होते माता पिता। कथानक
के अंत में जीर्ण शीर्ण हवेली पर टिमटिमाते बुझते हुए बल्ब को प्रतीक रूप में
दर्शा कर लेखक ने बहुत कुछ कह दिया है।
संग्रह
की एक और कहानी बक्सा की बात करें तो कहानी सी नहीं लगती “बक्सा”, अपितु एक
सामान्य निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की रोज की कहीं बेहद करीब से देखी हुई बात ही प्रतीत
होती है। यह बात ऐसे ही एक परिवार की है जहां बेहद मामूली से आर्थिक हालत के बीच
परिवार की वयोवृद्ध सदस्या दादी का निधन किस तरह परिवार के मुखिया को तोड़ जाता है,
अत्यंत भावनात्मक संवादों के मध्यम से दर्शाया है। इन पंक्तियों ने कहीं भीतर तक
छुआ कि “पिता का पुत्र के कंधे पर सर रख कर रोना कितना भारी होता है”। वहीं एक
अवांक्षित बक्सा जिस को लेकर सदा पिता एवं दादी के बीच खींच तान रही, और जो बेजान बक्सा
अपने में माँ के बीते समय की माँ की दुर्लभ यादें जीवंत संजोए हुए था, कैसे वह पुत्र
जो कल तक उसे बाहर फेंकने हेतु तत्पर था, माँ के निधन पश्चात उसे अपने से अलग करने
की बजाय उसे सुधार कर सँजो कर रखने हेतु प्रयत्नशील हो जाता है। कहीं न कहीं यह
बेहद आम प्रतिक्रिया होती है जिसके चलते हम अपनों से जुड़ी यादों को और करीब से
महसूस करने के लिए उनसे और करीब से जुडने
के कुछ भौतिक साधन खोज ही लेते हैं शायद अंतर्मन में कहीं उन्हें भूल जाने का डर
हमें ऐसा करने को विवश करता है।
संग्रह
की अगली कहानी “रिटायरमेंट” का पूर्वार्ध अमूमन हर उस व्यक्ति की आप बीति बयां करता है जो जल्द ही परिस्थितियों से समझौता नहीं
कर पाते और विशेष तौर पर रिटायरमेंट के बाद अपने पद से जुड़े रुतबे और पूछ परख न
मिलने पर कहीं अंदर कुछ कुछ बिखरते चले जाते हैं। कहानी का उत्तरार्ध ना सिर्फ सोच
की सही दृष्टि की ओर इंगित करता है अपितु व्यक्ति को भूत से निकल कर वर्तमान और
फिर भविष्य की ओर देखने का संदेश भी देता है।
बात
को सीधे सीधे कहना, एवं जहां आवश्यक है वहां भाव को सुंदरता से बगैर किसी पात्र को
संबोधित किए,
प्रस्तुत करना, अभिनव जी की शैली की विशेषता
लगी।
बाज़
दफ़े मेहनत और मुकद्दर की जंग में पिसते हुए आम इंसान नहीं समझ पाता कि न जाने उसने
ऐसे कौन से गुनाह किए जिनका फल उसे असफलता के रूप में मिल रहा है और देखें तो शायद
प्रयासों की कमी के सिवा उसका कुछ दोष होता भी नहीं किन्तु वह असफलता को स्वीकार
नहीं कर पाता और अपनी असफलता का दोष किसी
अन्य पर डालने के क्रम में भाग्य को सबसे पहला दोषी मान लेता है वहीं दूसरे की
सफलता चुभने के पीछे हमारे अहम का चोटिल होना महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बेहद
सरल और सहज, सामान्य सी, स्कूल के बच्चों की बात के माध्यम से बहुत कुछ बड़ा कह
जाती है कहानी “सबको सब नहीं मिलता”।
“प्यार
का पहला खत” एक कच्ची उम्र के कच्चे वाले प्यार की शुरुआती भीनी भीनी सौंधी महक का
एहसास करवाती, ऐसी कहानी है जो हर पाठक को उसके पहले प्यार या उस तजुर्बे से एक
बार फिर रूबरू जरूर करवायेगी। बेहद नाजुकता से पहले मासूम से प्यार की बड़ी बड़ी
मुश्किलों को जीवंत किया है । तो वहीं कहानी “जूनियर आर्टिस्ट” उस बात को और तफ़सील
से फिर एक बार दोहराती है कि कलाकार के दिल में कलाकार सदा जिंदा रहता है, जीवन के
थपेड़े उससे चाहे जो भूमिकाएं अदा करवाते रहे किन्तु कलाकार के मन के भीतर छुपे भाव
उसके भीतर के कलाकार को सदा जिंदा रखते हैं । लेखक अपने मूल भाव को शब्द देने में
बखूबी कामयाब हुए हैं। सीमित संवाद, छोटे किन्तु सटीक
एवं भावपूर्ण वाक्यांश तथा मूल विषय पर केंद्रित रहते हुए अपनी बात रखने का हुनर
लेखक को सामान्य से ऊपर ले आता है। “कैमरे के सामने मैं थोड़ा ज्यादा जिंदा महसूस
करता था” ये शब्द एक कलाकार के दिल के भावों को पूर्णतः बयां करते हैं।
लेखक
में कहानी को विस्तार देने का हुनर है और उनसे सहज अपेक्षित है कि वे अपनी लेखन
क्षमता का शतप्रतिशत और माकूल इस्तेमाल करें।
लेखक
के मन में बचपन की गाँव से जुड़ी यादें एवं वह परिवेश आज भी अपनी सम्पूर्ण मुखरता
के साथ जीवित हैं एवं बार बार यह बात उनकी कहानियों में उभर कर आती है। संग्रह की
कहानी “झूला,” इस कथ्य को पुनः बखूबी निरूपित करती है। बचपन तो उस अवस्था में देखे गए सपनों
के पूरे होने कि उम्मीदों के सहारे बीत जाता है, लेकिन वही सपने बड़े होने पर पूरे
होते होते बिखर जाते हैं तब फिर बचपन कितना याद आता है। एक मासूम ग्राम्य बाला की,
बचपन में शहरी रहन सहन एवं परिवेश से प्रभावित होने एवं वही सपने देखते हुए बड़े
होने का सुंदर लेखाजोखा है। बड़े होने पर क्या होता है क्या सपने पूरे हुए, जानने
के लिए अंत तक कथानक से जुड़ना होगा। सम्पूर्ण कहानी ग्राम्य परिवेश के बीच है सो भाव
भी स्वतः ही गांव और बचपन की यादों से
जुड़ा है। सामान्य कथानक है जिसे सामान्य ही तरीके से कहा गया है।
“आखिरी
ट्रेन”,
एक ऐसी कहानी है जो अपने में बहुत सारे जज्बातों को समेटे हुए है, इनमें एक कठोर किन्तु सहृदय हिन्दुस्तानी पिता
है, तो बेटा जो बड़ा होकर भी अपने बचपन, अपने सपने को जी लेने को आतुर है और पिता का मान रखने के कारण अपने
ख्वाबों की बली दे चुका है। भाव हैं वात्सल्य के, आतुरता है,
और अनमने पन की स्थितियाँ भी। वहीं पिता द्वारा सुंदर मित्रवत सलाह है, जो देती है
एक ऊंची उड़ान के लिए हौसला।
कहानी
“ख्वाहिश” एक बेहद भावपूर्ण एवं सकारात्मक संदेशे वाली कहानी है जो कहीं न कहीं पुरानी फिल्म आनंद का डायलॉग याद दिला
जाती है कि “ज़िंदगी लंबी नहीं खूबसूरत होनी चाहिए”, साथ ही
कथानक में जिस तरह से यूं ही किसी बात को विश्वास मान लिया जाए वह कैसे त् जिंदगी पीछा करती है और प्रभावित करती है बखूबी
दर्शा जाती है।
संग्रह
की अंतिम कहानी,
“निशान“, थोड़ा चौंकाती है कथानक जहां एक
सुंदर दाम्पत्य की शुरुआत से थोड़ा पहले से शुरू होता है वहीं शुरू होते ही समाप्त
भी हो जाता है, आखिर ऐसा क्या घट गया युगल के बीच। नारी विमर्श केंद्रित नारी
स्वातंत्र्य को बल देता कथानक। पठनीय कथासंग्रह, लेखक में
अपार संभावनाएं लक्षित हैं, शुभकामनाएं ॥
अतुल्य
9131948450
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104-105
महेश विहार, समीपस्थ महामृत्युंजय द्वार, इंदौर रोड उज्जैन,म.प्र. 456010



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