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Immigrant -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

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Pustak Samiksha : Atulya Khare समीक्षित पुस्तक : इमिग्रेंट विधा : उपन्यास द्वारा : धर्मपाल महेन्द्र जैन प्रकाशक : आईसेक्ट पब्लिकेशन , भोपाल मूल्य : 500/- रुपये समीक्षा क्रमांक : 205 धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका, और वहाँ रहकर भी सतत् मातृभाषा साहित्य को समृद्ध बनाने हेतु प्रयत्नशील रहते हुए नियमित लेखन कर्म में व्यस्त हैं।   महेंद्र जी को यूं तो एक प्रख्यात व्यंग्यकार के रूप में अधिक पहचान जाता है किन्तु मेरी दृष्टि में उनके व्यंग्य   मात्र हास्य हेतु सृजित व्यंग्य एक रचना न होकर व्यवस्था, संरचना एवं आम जीवन में व्याप्त कुरीतियों एवं   घटते   संस्कारिक मूल्यों पर अत्यंत गंभीर व तीक्ष्ण टिप्पणी होते हैं जिन्हें नश्तर कहना अधिक उपयुक्त होगा क्यूंकि वे कहीं न कहीं अपने इन्हीं तीक्ष्ण व्यंग्य रूपी नश्तरों के द्वारा समाज एवं व्यवस्था में व्याप्त   बुराइयों का इलाज करने का एक प्रयास तो अवश्य ही करते हैं। उनके लेखन को हमने उनके प्रकाशित 8 व्यंग्य कथा संग्रहों ( साहित्य की गुमटी, सर क्यों दांत फाड़ रहा है, गण...