Gadula -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
· . Pustak Samiksha : Atulya
Khare
· . समीक्षित पुस्तक : गाडूला
· . विधा: उपन्यास
· . द्वारा: संतोषी देवी
· . बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
· . प्रथम संस्करण : 2025
· . मूल्य : 249.00
· . समीक्षा क्रमांक : 230
प्रचार प्रसार से दूर, शांत एवं सहज भाव से, साहित्य साधना में रत संतोषी देवी साहित्य जगत में तेजी से उभरता हुआ नाम हैं, हालांकि अपनी विशिष्ट लेखन शैली के चलते साहित्य जगत में वे पहले ही अपनी एक अलग पहचान बना चुकी हैं। गुणवत्ता की दृष्टि से संतोषी जी की यह पुस्तक उन्हें उन ऊंचाइयों पर ले जाती है जहां पहुंचना अनेकों का स्वप्न होता है। अल्पकाल में ही संतोषी जी के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, विभिन्न प्रतिष्ठित स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएं तथा कविताएं इत्यादि अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं। वहीं विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया जाना भी निश्चय ही साहित्य जगत में उनकी विशिष्ठ प्रतिभा को प्राप्त पहचान एवं शिखर की ओर अग्रसर उनके प्रतिभाशाली प्रयासों का सम्मान है।
संतोषी
जी द्वारा रचित यह उपन्यास “गाडुला” सर्वप्रथम तो अपने अप्रचलित नाम एवं आकर्षक
आवरण द्वारा आकर्षित करता है, जिसका आकर्षक कलेवर में त्रुटिहीन प्रकाशन बोधि
प्रकाशन द्वारा किया गया है। भाषा सरल है, जिसमें स्थानीय बोली पूरी तरह रची बसी
है। उपन्यास का कथानक राजस्थान की घुमंतू जनजाति के लोहगढ़िया समुदाय पर केंद्रित
है। चूंकि यह मेहनतकश समुदाय लोहे के छोटे मोठे घरेलू उपयोग के समान बनाने का हुनर
रखते हैं, और वही इनका पेशा भी है एवं इसी पेशे से ही वे विभिन्न समरूप नामों से
जाने जाते हैं जो प्रदेश एवं क्षेत्र के मुताबिक बदलते रहते हैं। यह घुमक्कड़ लोहार
बहुत कुछ बंजारों की सी जीवन शैली अपनाते है।
गाड़िया लोहार जिन्हें लोहगढ़िया भी कहा जाता है का इतिहास, वीरता, संघर्ष और त्याग से जुड़ा है। ये स्वयं को महाराणा प्रताप का वंशज मानते हैं। जब अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर अधिकार कर लिया तब इन्होंने कई कठोर प्रतिज्ञा करी थीं उन्हीं में से एक पक्के घरों में न रहने की भी थी, और तब से ही इन्होंने अपनी बैलगाड़ियों को ही अपना घर (गाडू ला) बना लिया और तबसे ही इस जनजाति के “खानाबदोश” जीवन की शुरुआत हुई।
“गाडूला” से तात्पर्य वह छत वाली बैलगाड़ी है
जिसे कपड़ा अथवा टाट बांधकर ऊपर से ढँक दिया जाता है यह घुमंतू जनजाति गढ़िया लोहार,
लोहगढ़िया, इसी गाडुले में अपना परिवार तथा गृहस्थी का न्यूनतम समान ले कर ता-उम्र एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते रहते हैं।
इतिहास
से संबद्द करते हुए विचार करें तो लोहगढ़िया केवल एक जनजाति नहीं है अपितु यह तो राजस्थान
की जीती-जागती विरासत हैं। जिसे
सहेजा न गया तो उसका विलोपन निश्चित है। बिना किसी छत के, कड़ी
धूप और कड़कड़ाती ठंड में लोहे से लोहा लेने वाले इन लोगों को आज समाज की सहानुभूति
से भी कहीं अधिक सम्मान और स्थायित्व की तलाश है।
यूं
तो वे स्वयं को महाराणा प्रताप का वंशज मानते हैं, परंतु माना यह जाता है की वे
महाराणा प्रताप की सेना के लिए अस्त्र शस्त्र बनाते थे। बिना किसी आधुनिक मशीनरी
के, वे आज भी केवल घन और हथौड़े की चोट से लोहे को गर्म कर
उसे पीट-पीट कर कृषि उपकरण (खुरपी, दरांती), रसोई का सामान (तवा, चिमटा) और निर्माण कार्य के
औजार बनाते हैं तथा आज भी एक बड़ी आबादी घुमंतू जीवन
जीने को मजबूर है।
इनका
पूरा जीवन खुले आसमान के नीचे किसी मैदान में अथवा सड़क किनारे एक तिरपाल या
बैलगाड़ी के नीचे बीतता है। साथ ही चिलचिलाती धूप में, लोहे
की भट्टी के पास बैठकर काम करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। कथानक के संग
संग वास्तविक दुनिया में यदि गढिया लोहारों की अहम परेशानियों पर गौर करें तो,
नियमित आय का कोई स्रोत न होना, समय समय पर विस्थापन, विस्थापन
का दुष्प्रभाव अशिक्षित बच्चे एवं निरंतर धूल और धुएं के बीच तेज तापमान में काम
करने का परिणाम गंभीर रोग इत्यादि है और इन समस्त बिंदुओं को संतोषी जी ने अपने
कथानक के माध्यम से बेहद रोचक तरीके से कलमबद्द किया है।
पुलिस
एवं प्रशासन का दुर्व्यवहार भी उनके जीवन का सबसे दुखद हिस्सा है। समाज भी उन्हें
अक्सर “शक” की नजर से देखता है। पुलिस अक्सर किसी भी छोटी चोरी या वारदात के मामले
में इन की बस्तियों पर सबसे पहले छापा मारती है। प्रशासन स्वयं उन्हें प्रमाणित
नहीं करता किन्तु समय समय पर उनसे पते का प्रमाण अवश्य मांगता है। इस समस्या को भी
कथानक के माध्यम से संतोषी जी ने बखूबी उकेरा है।
उपन्यास में संतोषी जी द्वारा लोहगढ़िया जनजाति
के उस पारंपरिक परिवेश से पूरा पूरा जुडने का सफल प्रयास किया गया है जिसमें आंचलिक
बोली का भरपूर प्रयोग, उनकी वेश भूषा व खानपान का यथार्थ वर्णन तथा वाक्यांशों में
स्थानीय राहवासियों की ही सरलता तथा भावनाओं और मज़बूरीयों का यथार्थ चित्रण कथानक
को जीवंत रखते हुए पाठक से सहज संबद्द होता है।
“गाडूला”,
कथानायिका गोरल की या फिर केदार मात्र की ही व्यथा कथा नहीं है अपितु यह दुर्दशा
गाथा तो उस सम्पूर्ण लोहार समुदाय की है जो उपेक्षित है एवं अभिशप्त है, समस्त
त्रासदियाँ एवं दुश्वारियाँ झेलने हेतु। उनका अंतहीन संघर्ष एवं विस्थापन निरंतर
जारी है। कथाकार ने लोहगढ़िया परिवारों की जीवन शैली उनके रहन सहन खानपान तथा
बोलचाल इत्यादि का सूक्ष्म गहन अध्ययन एवं विश्लेषण किया फलस्वरूप वे कथानक को इस
जीवंत रूप में प्रस्तुत कर सकीं। राजस्थान की बोलियों का यथोचित प्रयोग कथानक की
विशेषता है।
कथानक
में केंद्रित, अभावों के बीच बसर करते, अनपढ़, मेहनतकश परिवार के सदस्यों का आपसी
प्रेम एवं परस्पर सम्मान की भावना प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है, तथा पढे लिखे समाज
को जहां आज़कल के समृद्ध पढे लिखे परिवारों में आपसी मनमुटाव व रिश्तों में
दूरियाँ अत्यंत आम हैं, आईना दिखाती है।
कथानक
के माध्यम से उनकी संघर्षपूर्ण जिंदगी के कटु यथार्थ, एवं निरंतर विस्थापन की पीढ़ा
झेलते वे तथा उनके परिवारों का दर्द अत्यंत संवेदनशीलता के संग प्रस्तुत किया गया है,
कथानक में बारम्बार इस घुममकड़ लोहार समुदाय के जीवन का संघर्ष एवं दर्द छलकता है।
गौर
करें कथानक पर तो, केदार की मृत्यु के बाद गोरल के कंधों पर सिर्फ परिवार की
जिम्मेदारी ही नहीं आई, बल्कि उस विरासत को संभालने की
चुनौती भी आई जिसे समाज ने भुला दिया था। एक अकेली महिला के लिए खानाबदोश जीवन में
बच्चों को पालना, लोहे की भट्टी की आग सहना और साथ ही दुनिया
की कुत्सित नजरों से बचना, किसी युद्ध से कम नहीं था। उसने
अपनी रातों की नींद और दिन का चैन त्याग कर बच्चों को बड़ा किया उनके ब्याह किए,
इस उम्मीद में कि शायद अगली पीढ़ी का जीवन उसकी तरह नहीं होगा। गोरल
के पोती-पोतों के साथ बिताए गए मधुर पल इस कहानी का सबसे सुंदर और कोमल हिस्सा
हैं। उन बच्चों की खिलखिलाहट में गोरल अपना दुख भूल जाती थी।
गोरल
पर दुखों का पहाड़ तब टूटा, जब छोटा बेटा कुसंगत में पड़कर घर छोड़ गया। यह केवल
एक बच्चे का भटकना नहीं था, बल्कि उस असुरक्षित माहौल का
परिणाम था जहाँ शिक्षा और मार्गदर्शन की जगह सिर्फ संघर्ष, अभाव और अनिश्चितता सदा
से व्याप्त थी जिसने उस बच्चे को गलत दिशा में जाने को प्रेरित किया। वहीं,
बड़े बेटे की बीमारी गोरल की बची-कुची हिम्मत पर आखिरी चोट थी। जिस
बेटे को बुढ़ापे की लाठी बनना था, वह खुद जीवन भर के लिए खाट
पर सिमट कर रह गया। लेकिन गोरल ने हार नहीं मानी, वह टूटी नहीं, बल्कि लोहे की तरह तपकर और निखर गई।
एक
और समस्या जिसे संतोषी जी ने अपने कथानक में महत्वपूर्ण स्थान दिया है वह है, बार
बार के विस्थापन एवं फैक्ट्रियों में बने सस्ते और आधुनिक सामान की मांग के चलते इस
लोहगढ़िया समुदाय के सामने खड़ा आजीविका का संकट, और अब तो यह हस्तशिल्प अपनी अंतिम
सांसें लेता प्रतीत होता है। समय के साथ, लोग हाथ से बने सामान के बजाय चमकदार हार्डवेयर और मशीनी उत्पादों का उपयोग करने लगे
तब गोरल ने समय रहते समय की नब्ज पहचानी और अपने बेटे को कबाड़ के काम पर लगाया। कह सकते हैं कि यह एक
कलाकार की कुर्बानी थी लोहा गढ़ने वाला अब लोहा बटोरने लगा था।
कहानी में शासकीय अधिकारी द्वारा इन अनपढ़ों से से धोखा किया जाना दर्शाता है की किस तरह पढ़ा-लिखा समाज इन सरल नादान मेहनतकश लोगों
को ठग रहा है, साथ ही यह भी दर्शाता है कि शिक्षा का अभाव केवल नौकरी न मिलना नहीं
है, बल्कि अपने अधिकारों को खो देना भी है।
गोरल का अथवा इस सम्पूर्ण समुदाय का दुर्भाग्य
कहें अथवा वक्त की मार कि जब भी इनका रोजगार थोड़ा जमने लगता, विकास का बुलडोजर आकार उनकी बस्तियों को उजाड़ देता। यह विस्थापन केवल स्थान परिवर्तन नहीं था, अपितु शून्य से शुरुआत करने
का हर बार एक नया सिलसिला था। बार-बार उजड़ना शरीर के साथ साथ उनकी आत्मा को थका
देने वाला था।
अंततः
कहा जा सकता है कि की “गाडूला” उपन्यास गड़िया लोहारों की लोहगढ़िया
जनजाति की ऐसी दास्तां है जिसे लेखिका ने सम्पूर्ण विस्तार से प्रत्येक अहम मुद्दे
को समेटते हुए प्रस्तुत किया है उनका विस्थापन केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं
है, बल्कि यह
उनकी गरिमा का विस्थापन है। वे भारत के ऐसे शिल्पकार हैं जिन्होंने सदियों तक देश के लिए हथियार बनाए,
लेकिन आज वे खुद को निहत्था और असुरक्षित महसूस करते हैं। साथ ही बार
बार का विस्थापन यह भी दर्शाता है की हमारा समाज भले ही कितनी भी प्रगति कर चुका
हो, इन घुमंतू जनजातियों के लिए आज भी दो गज जमीन का मसला
गंभीर है। उनकी जिंदगी की गाड़ी आज भी उसी मोड़ पर खड़ी है जहाँ से सदियों पहले
शुरू हुई थी पूर्णतः असुरक्षित।
अतुल्य खरे
Pustak Samiksha : Atulya Khare
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