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Gajshardool By Anish Singh Kharsan

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  गजशार्दूल विधा : ऐतिहासिक गाथा, उपन्यास   द्वारा : अनीश सिंह खरसन   सम्पादन: M.I. राजस्वी VETERAN Publishing House ( VPH ) द्वारा प्रकाशित प्रकाशन वर्ष :   2025 मूल्य : 249 समीक्षा क्रमांक : 206 युवा लेखक एवं पेशी से इंजीनियर, अनीश सिंह खरसन द्वारा सृजित कृति “गजशार्दूल” वरिष्ठ साहित्यकार एम. आई. राजस्वी के सम्पादन में वेट्रन प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत की गई है,   के विषय में असमंजस में हूँ की आपसे इसका परिचय शोध ग्रंथ के रूप में करवाऊँ अथवा ऐतिहासिक पात्रों एवं भौगोलिकता को   पुनर्जीवित करते हुए एक अनूठे उपन्यास के रूप में जिसके लेखक, कठिन श्रमसाध्य शोध्यके द्वारा   तत्कालीन भारतवर्ष की शासन व्यवस्था, एवं अन्य सामाजिक पहलुओं पर अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण सहित विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।        गजशार्दूल, कल्चुरी नरेश महाराज जाजल्यदेव   एवं नागकुल के राजा   सोमेश्वरदेव की युद्ध विषयक रणनीतियों , कठोर एवं क्रूर दंड व्यवस्था, खुफिया अभियानों, सामाजिक सद्भावना , पारस्परिक विश्वास की कमी एवं ...

Immigrant By Dharmpal Mahendra jain

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  इमिग्रेंट विधा : उपन्यास द्वारा : धर्मपाल महेन्द्र जैन प्रकाशक : आईसेक्ट पब्लिकेशन , भोपाल मूल्य : 500/- रुपये समीक्षा क्रमांक : 205 धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका, और वहाँ रहकर भी सतत् मातृभाषा साहित्य को समृद्ध बनाने हेतु प्रयत्नशील रहते हुए नियमित लेखन कर्म में व्यस्त हैं।   महेंद्र जी को यूं तो एक प्रख्यात व्यंग्यकार के रूप में अधिक पहचान जाता है किन्तु मेरी दृष्टि में उनके व्यंग्य   मात्र हास्य हेतु सृजित व्यंग्य एक रचना न होकर व्यवस्था, संरचना एवं आम जीवन में व्याप्त कुरीतियों एवं   घटते   संस्कारिक मूल्यों पर अत्यंत गंभीर व तीक्ष्ण टिप्पणी होते हैं जिन्हें नश्तर कहना अधिक उपयुक्त होगा क्यूंकि वे कहीं न कहीं अपने इन्हीं तीक्ष्ण व्यंग्य रूपी नश्तरों के द्वारा समाज एवं व्यवस्था में व्याप्त   बुराइयों का इलाज करने का एक प्रयास तो अवश्य ही करते हैं। उनके लेखन को हमने उनके प्रकाशित 8 व्यंग्य कथा संग्रहों ( साहित्य की गुमटी, सर क्यों दांत फाड़ रहा है, गणतंत्र के तोते आदि ), 4 कविता सं...

InBox By Geeta Pandit

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  इन बॉक्स  विधा : उपन्यास द्वारा : गीत पण्डित श्वेतवर्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मूल्य: 299 समीक्षा क्रमांक : 204 विकलांगता विमर्श पर संभवतः पहली बार इस तरह से किसी रचना का सृजन किया गया है कृति का केंद्र ही विकलांगता है। सम्पूर्ण कृति उस पीढ़ा को बयान करती है जो एक विकलांग बच्चा और उसका परिवार विशेष तौर पर माँ,   मानसिक स्तर पर सहते हैं। यह इस उपन्यास की विशिष्टता कही जाएगी की अमूमन जिस विषय को कथानक के एक हिस्से में महज किसी पात्र विशेष के प्रति सहानुभूति एकत्र करने हेतु उपयोग किया जाता था लेखिका ने उसे ही अपने कृतित्व का केन्द्रबिन्दु बना दिया। विकलांगता जैसे विषय को इतनी प्रमुखता से प्रस्तुत करने का उनका यह प्रयास सराहनीय है।    किसी ने कहा था की your presence and absence both should be felt और संभवतः यह बात बच्चों के विषय में शतप्रतिशत सच है वे रहें तब अपनी उपस्थिति का सुखद   एहसास सभी को करवाते हैं और यदि बदकिस्मती से न रहें तो तब तो उनकी   कमी निःसंदेह चुभती है, एक पोलिओ ग्रस्त बच्चे की माँ का यही दर्द लेखिका ने पत्रों के माध्यम से सा...

Lajja By: Tasleema Nasreen

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  Lajja By: Tasleema Nasreen Book Re aders view No. E_004                        LAJJA ("Shame") is a very controversial novel, has attracted attention and anger of locals i.e. Bangladeshi Muslims who were emotionally charged against the minority community (Hindus in this case) after the Babri Masjid demolition in Ayodhya . The Novel    by Tasleema Nasrin is a story of just seven days. This novel is mainly her protest against religious extremism , frenzy of localities , madness of directionless youth and communal violence overall.                           Lajja” is all about anti Hindu riots against Babri masjid demolition, it captures the fear and "unremittingly dark" reality of communal riots. It’s about   a person who in spite of having life at threat believes that this is their country and they won’t leave whatever be the cons...

Mai Samay Hoon By Dilip Kumar Pandey

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  मैं समय हूँ विधा: काव्य द्वारा : दिलीप कुमार पाण्डेय बिंब प्रतिबिंब पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित समीक्षा क्रमांक : 203 अपनी प्रभावशाली शैली एवं सशक्त लेखनी के द्वारा साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट छवि बना चुके युवा साहित्यकार दिलीप जी का नवीन काव्य संग्रह “मैं समय हूँ” अपनी प्रभावी कविताओं के माध्यम से व्यापक   स्तर पर पढ़ा एवं सराहा जा रहा है साथ ही अपनी जबरदस्त छाप छोड़ रहा है तथा प्रकाशन के पश्चात मात्र कुछ ही समय में व्यापक पाठकों की प्रतिक्रियाएं हमें देखने को मिली हैं। काव्य विधा पर उनकी दक्षता का परिचय हमें उनके पूर्व प्रकाशित काव्य संग्रह ' उम्मीद की लौ ' और “अंधेरे में से”   के द्वारा प्राप्त हो ही चुका था वहीं उनके द्वारा लिखित समीक्षात्मक लेखों का संग्रह “रचनाशीलता का गणित” उनकी बतौर समीक्षक प्रतिभा से परिचय करवाता है। काव्य संग्रह ' मैं समय हूँ ' उनकी विशिष्ट रचनाओं का संग्रह है जिसमें आम आदमी के जीवन में   संघर्ष, प्रेम, संयम और इंसानी बेबसी जैसे भावों की अभिव्यक्ति लक्षित है। प्रस्तुत संग्रह का केंद्र बिन्दु ही समय है तथा उसके इर्द गिर्द ही आम आद...

Why I Am An Atheist By Bhagat Singh

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  Why I Am an Atheist and other works   By : BHAGAT SINGH Collection of Letters & essay Published By : Om Sai Tech Books Edition 2022 price : 199 Re aders view   : E_003 The very first thing about the book is that Bhagat Singh wrote the essay in English in October 1930 in Lahore Central jail , which was published in "The People" on 27 Sep 1931 after his death . this is not a book but an essay of 24 pages, The essay originally written in English was later translated into Tamil by P. Jeevanandham at the request of Periyar E.V. and this Tamil version was published in Kudi Arasu in 1935 . As the original manuscript of the essay was unfortunately lost during World War 2 nd ,     or during partition and thus the present edition we see is the translation of essay from its Tamil version. So , when we   read the English version of "Why I am an Atheist," we are reading     essays   by The Bhagat Singh, that was originally written in En...

Hajir Hon By Anil Maheshwari

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  .. हाजिर हों  , द्वारा :अनिल माहेश्वरी   सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मूल्य : 299.00 समीक्षा क्रमांक :   202   अनिल माहेश्वरी द्वारा रचित “.... हाजिर हों” एक पूर्णतः भिन्न एवं   अभिनव सोच को दर्शाता कथानक है। यूं तो पौराणिक ग्रंथों पर आलोचनाएं एवं उनके घटना क्रम तथा पात्रों पर क्रिटिक्स द्वारा अपने अपने नजरिए प्रस्तुत किए गए हैं किन्तु अनिल जी के कथानक में भिन्नता है। पुस्तक मूल रूप से जहां एक ओर पात्रों के तत्कालीन   कृत्य एवं आचरण के आधार पर उनको वर्तमान विधि के मुताबिक आंकलन करती है वहीं पाठक को भी एक नई सोच एवं स्वयं की नवीन विचारण शैली जागृत करने का अवसर देती है। यूं तो पौराणिक पात्रों के विषय में भिन्न भिन्न नज़रिए पूर्व में भी पढ़ने में आते रहे हैं जहां पात्रों के क्रिया कलापों को तार्किकता के मापदंडों पर परखा जाकर उन्हें उस काल के हिसाब से उचित अथवा अनुचित सिद्ध किया गया किन्तु प्रस्तुत पुस्तक पौराणिक पात्रों को,   वर्तमान विधि के अंतर्गत दोषी कौन, यह ढूंढने का सफल   प्रयास करती है। पुस्तक की विशेषता यही है कि आम वाद व...