Agnipath Nahi Janpath -- Pustak samiksha : Atulya Khare

 

                   Pustak Samiksha : Atulya Khare

·                 समीक्षित पुस्तक : अग्निपथ नहीं जनपथ

·                 द्वारा: डॉ. सतीश पूनियाँ

·                 वेरा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

·                 प्रथम संस्करण : 10/2025

·                 पंचम संस्करण : 01/2026

·                 मूल्य : 299

·                 समीक्षा क्रमांक : 234 

“जहां हो नुमाइंदगी वफ़ा और यकीन से  

यकीनन वहीं से रोशन होती हैं कौम की राहें”

पुस्तक अग्निपथ नहीं जनपथ का मुख्य कवर

                            

                         बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ सतीश पूनियाँ द्वारा अपने राजनीतिक जीवन तथा कार्य काल केअनुभवों भाषणों लेखों आदि को पुस्तक रूप में “अग्निपथ नहीं जनपथ” में संकलित किया गया है जो उनकी पारदर्शिता व सामाजिक जीवन के प्रति समर्पण का प्रतीक है। पुस्तक मात्र उनके कार्यों एवं अनुभवों का ही       दस्तावेज़ नहीं है अपितु लोकतंत्र की उस जीवंत भावना का उत्सव भी है जिसमें जनता और जनप्रतिनिधि एक स सपने के सहभागी होते हैं। डॉ. सतीश पूनीया राजस्थान की राजनीति में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं वहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान एक जिम्मेवार, विश्वसनीय मार्गदर्शक एवं ऊर्जावान सक्रिय सुलझे हुए राजनेता के रूपमें है। उन्होंने राजनीति में प्रवेश तो कालेज में रहते हुए ही कर लिया था जो आगे चलकर राज्य स्तर तक पहुँचा, पश्चात उनकी निष्ठा, कार्यप्रणाली तथा कार्यकौशल को देखते हुए उन्हें संगठन में जिम्मेवारी दी गई।

                      डॉ. सतीश पूनीयाँ द्वारा सदन के भीतर दिए गए भाषणों और संसदीय प्रक्रियाओं पर आधारित पुस्तक है अग्निपथ नहीं जनपथ, यह न सिर्फ रोचक एवं ज्ञानवर्धक है अपितु यह लोकतांत्रिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। यह पुस्तक सदन की चारदीवारी के भीतर जन-आकांक्षाओं के संघर्ष की जीवंत दास्तान है। लेखक ने जटिल विधायी प्रक्रियाओं को सरल भाषा में समझाकर इसे आम पाठक के लिए सुलभ बनाया है। पुस्तक जहां उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती है वहीं पुस्तक का लेखन उनकी साहित्यिक रुचि एवं क्षमता को प्रदर्शित करता है।

                      पुस्तक सतीश पूनियाँ जी के विधायी जीवन और राजस्थान विधानसभा के भीतर उनके सक्रिय योगदान का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह केवल भाषणों का संग्रह नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली का एक 'प्रैक्टिकल मैन्युअल' भी है। पुस्तक को सदन की कार्यप्रणाली को समझने वाली एक निर्देशिका के रूप में बिना किसी पूर्वाग्रह के देखने पर उसके उजले पहलू नजर आते हैं।

पुस्तक अग्निपथ नहीं जनपथ का पिछला कवर


                   हालांकि यह उनके विधानसभा में प्रथम कार्यकाल के ही अनुभव एवं भाषण का संग्रह है किन्तु भाषणों में उनके तर्क युक्तियुक्त है, भाषा सरल तथा विषय केंद्रित है वहीं शैली में तथ्यों का समुचित प्रयोग हुआ जो उनके विषय की जानकारी एवं तजुर्बे को दर्शाते हैं।

                     “शून्य काल”, “अनुदान मांगों” जैसे अनेकानेक विषय जिन्हें आम जन अक्सर सुनते हैं उन पर जानकारी एवं विधायक के अनुभव आम जनता के लिए शिक्षाप्रद हो सकते हैं। इसमें दी गई तकनीकी जानकारी जैसे बजट पर बहस या संसदीय नियम आदि छात्रों, शोधकर्ताओं और नए उभरते राजनीतिज्ञों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ का काम करती है।

                पुस्तक साहित्य और राजनीति के संगम पर खड़ी एक ऐसी रचना है जो यह बताती है कि एक विधायक केवल 'नेता' नहीं, बल्कि एक “विधायिका” का हिस्सा भी होता है साथ ही एक कुशल वक्ता एवं लेखक भी हो सकता है। ।

​ पुस्तक के विभिन्न अध्याय जैसे “शून्यकाल”, “नियम 295, “अनुदान मांगें” और ‘स्थगन प्रस्ताव” यह बताते हैं कि सदन की नियमावली का उपयोग जनता की आवाज उठाने के लिए कैसे किया जाता है। लेखक ने जटिल तकनीकी शब्दों को “जवाब मांगने का हथियार” और “समस्याओं की डिस्प्रिन गोली” जैसे रोचक एवं आकर्षक शीर्षकों से परिभाषित किया है, जो एक आम पाठक में इसे पढ़ने की जिज्ञासा उत्तपन्न करता है। साथ ही लगभग हर अध्याय में उन्होंने कुछेक खूबसूरत पंक्तियों से अपनी बात को विराम दिया है, जो उस अध्याय में कही गई बातों को और रोचक एवं स्पष्ट कर देती हैं। यथा सदन में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए सरकार के रवैये को उन्होंने इन पंक्तियों द्वारा दर्शाया था की, “ तुम मशरूफ़ रहते हो अपनी बातों में,  तुम्हें क्या पता कितना तनाव है हालातों में ।

 वहीं बजट पर वाद विवाद करते हुए “विकास और वायदे” शीर्षक अध्याय में वे दिशाहीन बजट के लिए कहते हैं की

”उम्र भर बस यही इक गलती करते रहे

धूल चेहरे पर थी आयना साफ करते रहे॥“

वहीं अपनी बात समाप्त करते हैं इन पंक्तियों से कि

       “ मंजिल तो मिल ही जाएगी,  भटक कर ही सही

        गुमराह वो  हैं जो घर से निकला  ही नहीं करते “।।

तो प्रश्नकाल जिसे उन्होनें “जवाब मांगने का हथियार” नाम दिया है वे कहते हैं,-

“जवाल पर,वबाल पर, मलाल पर सवाल कर

वो चुप रहेगा, तू मगर सवाल पर सवाल कर

जो तेरे पैर रोक दे, जो पंख तेरे नोच ले

तो ऐसे हर खयाल के खयाल पर सवाल कर”। ।  

एक और अध्याय “नियम 295 - विशेष उल्लेख”, जिसे उन्होंने समस्याओं की डिस्परिन गोली नाम दिया है में, अंत में कहते हैं की

“नुमाइंदगी वही है जो ज़ुबान -ए -खल्क बन जाए

जो दर्द सबका समझे और हाल भी दिखलाए। ।“

एक अन्य अध्याय में सत्तानशीं दल पर तंज़ कसते हुए उनकी ये पंक्तियाँ निश्चय ही गंभीर घाव करने वाली हैं

“मेरा रहनुमा ही बिकाऊ निकला

सच बोलना भी गुनाह ठहरा

जिसको चुना था उजाले की खातिर

वो अँधेरों का सौदागर निकला। ।“

एक अन्य अध्याय में वे कहते हैं की -

“वो नुमाइंदा है, जो अपनी पहचान छोड़ जाए

कौम के नक्शे पे,  इक नई जान छोड़ जाए”। ।  

पुस्तक में गंभीर भाषणों के साथ साथ विभिन्न रोचक वार्तालाप,  टिप्पणियों का भी समावेश किया गया है जो पुस्तक को रोचक बनाता है। एक चर्चा के दौरान वे कहते हैं कि

“जो बिखरे थे दर ब दर, अब घर का सहारा है

उस रहनुमा ने कहा, अब यह भी घर तुम्हारा है” ।।

पुस्तक में रोचकता को बरकरार रखते हुए विभिन्न गंभीर विषयों पर हुई चर्चाओं को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है यथा,  कोविड और लॉकडाउन पर चर्चा के द्वरा यह दर्शाया गया है कि महामारी के भीषण संकट के दौर में सदन के भीतर, राजनीति से ऊपर उठकर राजनेताओं ने नीतिगत सुझाव और जनता की पीड़ा को किस तरह स्वर दिया गया।



तो किसान कर्ज, संविधान और मूल कर्तव्य जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा यह रेखांकित करती है कि लेखक की संवेदनशीलता दर्शाती है तथा ज्ञात होता है की उनकी दृष्टि केवल तात्कालिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वे राष्ट्र की आत्मा और अन्नदाता के प्रति भी उतने ही चिंतित हैं। एशिया पोस्ट-50 असरदार विधायक सर्वे 2020 का जिक्र पुस्तक की विश्वसनीयता और लेखक के विधायी कौशल पर मुहर लगाता है। यह पुस्तक नए विधायकों और राजनीति के छात्रों के लिए एक उत्कृष्ट गाइड हो सकती है।

पुस्तक की विशेषता यह है कि यह संसदीय शब्दावलियों और प्रक्रियाओं को आम आदमी के लिए सरल बनाती है। पुस्तक लेखक के व्यक्तित्व, कृतित्व,  एवं समाज सेवा के प्रति लेखककी प्रतिबद्दटा को उजागर करती है जिसमें लेखक ने विभिन्न तकनीकी पहलुओं को अपनी अनुभूतियों के साथ पिरोया है। एक पाठक के तौर पर हमें यह समझने में मदद मिलती है कि किस तरह एक-एक शब्द और नियम का उपयोग जनता के हित में किया जा सकता है।

कुल मिलाकर, यह पुस्तक राजनीति के उस चेहरे को सामने लाती है जो शोर-शराबे से दूर, विधायी बारीकियों और जन-सेवा के प्रति समर्पित है। यह पुस्तक विधानसभा के उन पन्नों को हमारे सामने खोलती है, जहाँ केवल दलगत विरोध ही नहीं अपितु विकास के वायदे और नीतियों की बारीकियां भी देखी  समझी व पारखी जाती हैं।

विधान सभा में शपथ से लेकर विश्वास प्रस्ताव तक का यह सफर एक जनप्रतिनिधि के उत्तरदायित्व बोध का वह रोमांच है, जो लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता है। उनके विधायक कार्यकाल के अनुभवों तथा जनप्रतिनिधि के रूप में निभाई गई भूमिका को लिपिबद्द कर उन्होंने एक अनूठा कार्य किया है।

सतीश पूनियाँ जी की यह कृति राजनीति के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए एक हैंडबुक की तरह है। लोकतंत्र की कार्यप्रणाली और संसदीय परंपराओं को अपने अनुभवों के मध्यम से प्रस्तुत करना वर्तमान युवा राजनीति के लिए एक आदर्श मार्गदर्शन होगा। सदन की कार्यवाही में अपनी भूमिका निर्वहन करते हुए जो अनुभव साझा किये गए हैं वे लोकतान्त्रिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्द होंगे। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि सदन की मर्यादा के भीतर रहकर भी सरकार की नीतियों को आईना दिखाया जा सकता है और जनता के विश्वास पर खरा उतरा जा सकता है। पुस्तक निश्चित रूप से पाठकों को सदन की चारदीवारी के भीतर के "लोकतांत्रिक संघर्ष" से परिचित कराएगी।

    अतुल्य खरे

                                                                                                                                             

Pustak Samiksha : Atulya Khare

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Gajshardool -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

क se kahaniyan -- Pustak samiksha : Atulya Khare

Morpankh By Praveen Banzara