Har Shakh Par Ullu Baitha Hai By Mukul Ranjan Pustak samiksha By Atulya Khare
PUSTAK SAMIKSHA : ATULYA KHARE
समीक्षित पुस्तक : हर शाख पर उल्लू बैठा है
द्वारा : मुकुल रंजन
विधा : उपन्यास
राज मंगल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण 2026
मूल्य : 329 .00
समीक्षा क्रमांक : 254
बतौर पटकथा लेखक, निर्देशक फिल्म जगत से विगत् 30 वर्षों से संबद्ध रहते हुए मुकुल रंजन, मनोरंजन उद्योग की पेचीदगियों का गहरा तजुर्बा रखते हैं। समय समय पर उनकी कहानियाँ, लेख इत्यादि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं वहीं उनकी निर्देशन की कला भी हमने कई फिल्मों एवं tv सीरियल्स यथा महायात्रा, रजनी,और बीपीएल सुपरस्टार्स में देखी है। यूं तो हिन्दी में मुकुल रंजन जी का यह दूसरा ही उपन्यास है किन्तु दृश्य प्रस्तुति की प्रभावी शैली एवं कथानक में सृजित प्रवाह जहां एक ओर इसे रोचक मनोरंजक एवं पठनीय बनाते है वहीं लेखक की वैचारिक परिपक्वता एवं विहंगम साहित्यिक दृष्टि का सुंदर परिचय भी देखने में आता है।
उपन्यास ‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है’ में कॉरपोरेट जगत की महत्वाकांक्षाओं, जोड़-तोड़ और अंदरूनी खींचतान को व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का सुंदर सफल प्रयास किया गया है। मॉरीशस से शुरू होकर मुंबई और पटना तक पहुँचने वाली इसकी कथा एक क्षेत्रीय भोजपुरी टी वी चैनल ‘बिरहा’ की शुरुआत के बहाने मीडिया और कॉरपोरेट दुनिया के उन पहलुओं को सामने लाती है, जहाँ पेशेवर प्रतिस्पर्धा के साथ निजी स्वार्थ, सत्ता-संघर्ष, संबंधों के बनाते बिगड़ते समीकरण तथा राजनैतिक दखल लगातार सक्रिय रहते हैं।
उपन्यास का विषय रोचक है और इसकी शुरुआत पाठक का ध्यान खींचती है। मॉरीशस की एक तूफानी रात, हथियारों से लैस लोगों की मौजूदगी और करोड़ों के सौदों के बीच आकार लेती चैनल की योजना कहानी को किसी फिल्मी थ्रिलर जैसा माहौल देती है। इसके बाद कथा मुंबई के कॉरपोरेट दफ्तरों और पटना की सामाजिक-सांस्कृतिक जमीन तक पहुँचती है। जहां एक ओर चैनल शुरू करने की समय-सीमा, बजट की परेशानियाँ, कर्मचारियों के बीच प्रतिस्पर्धा और प्रबंधन की उलझनें कथानक को गति देती हैं वहीं राजनैतिक दखल का प्रभाव भी कथानक की रोचकता एवं सस्पेंस को बढ़ाता है।
लेखन और शिल्प पर लेखक का व्यावहारिक अनुभव भी प्रभावी रूप से झलकता है जो की अत्यंत स्वाभाविक भी है। स्वयं निर्देशक होने के कारण मुकुल रंजन को दृश्य रचने, घटनाओं को गति देने और परिस्थितियों को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करने की व्यापक समझ है। यही कारण है कि उपन्यास पढ़ते हुए कई प्रसंग आँखों के सामने घटित होते दृश्यों की तरह उभरते हैं। किन्तु उनकी यही सिनेमाई दृष्टि कुछ स्थानों पर उपन्यास को फिल्म की पटकथा के करीब भी ले जाती है।
घटनाओं का नाटकीय विस्तार और कुछ प्रसंगों की प्रस्तुति साहित्यिक विश्वसनीयता की अपेक्षा दृश्यात्मक प्रभाव को अधिक महत्त्व देती प्रतीत होती है। पात्रों के अपहरण और उन्हें बंधक बनाकर विवाह करवाने जैसा प्रसंग इसका उदाहरण है। ऐसे दृश्य रोमांच तो पैदा करते हैं, लेकिन उनकी सहज स्वीकार्यता और कथा के समग्र यथार्थ से उनका मेल भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। उपन्यास में सिनेमाई तत्वों का होना अपने आप में अद्भुत बात नहीं है , किन्तु जब नाटकीयता कथानक की स्वाभाविकता पर भारी पड़ने लगे, तब पाठक का भरोसा कुछ कमजोर हो सकता है।
भाषा के मामले में लेखक ने क्षेत्रीय परिवेश को जीवंत बनाने के लिए स्थानीय बोलियों और भाषायी विविधता का भरपूर इस्तेमाल किया है। बिहारी, मगही हिन्दी, बंगाली, पंजाबी, अंग्रेज़ी और हिंदी के अलग-अलग रूप पात्रों की बातचीत में सुनाई देते हैं। इससे उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि उभारने का प्रयास स्पष्ट होता है।
कुछ स्थानों पर जब क्षेत्रीयता को प्रभावशाली बनाने का यह आग्रह कुछ अधिक ही मुखर हो जाता है वास्तविक समस्या तब पैदा होती है। लगभग हर पात्र अपनी मातृभाषा या अपने विशिष्ट भाषायी लहजे में बोलता दिखाई देता है, जिससे कई बार कथा एक साझा भाषायी संसार के बजाय अलग-अलग भाषाओं के मंच समान प्रतीत होती है। पात्रों की भाषायी विविधता निश्चय ही उपन्यास की ताकत है, किन्तु उसका संतुलित प्रयोग आवश्यक है, ताकि पात्रों की पहचान भी बनी रहे और पाठ का प्रवाह भी बाधित न हो। सरल भाषा इस उपन्यास की विशेषता है, हालाँकि कुछ स्थानों पर दी गई तकनीकी जानकारियाँ कथा की जरूरत से अधिक विस्तार लेती प्रतीत होती हैं।
कॉरपोरेट जगत को केंद्र में रखने वाले इस उपन्यास से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि बड़े मीडिया प्रोजेक्ट की तैयारी, तकनीकी ढाँचे और प्रशासनिक कार्य-प्रणाली का चित्रण भी उसी स्तर की विश्वसनीयता के साथ सामने आए। लेकिन चंद प्रसंग अपेक्षित स्तर प्राप्त करने से चीकते दिखे। जिस स्तर के बड़े चैनल की शुरुआत की बात हो रही है, उसके संदर्भ में किसी वरिष्ठ अधिकारी का डेस्कटॉप कंप्यूटरों की गिनती करवाना या कनेक्शनों की जाँच जैसे अपेक्षाकृत बुनियादी कामों में उलझा दिखाई देना कुछ असंगत और असामान्य लगता है। ऐसे कार्य अपने आप में अस्वाभाविक नहीं हैं, लेकिन जिस स्तर के प्रोजेक्ट और अधिकारियों का चित्रण किया गया है, उसके अनुपात में इन प्रसंगों का औचित्य स्पष्ट होना चाहिए। यहाँ तकनीकी विवरण और संस्थागत कार्य-प्रणाली को अधिक विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता था।
उपन्यास के पात्र भी अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ सामने आते हैं। कर्णम सरस्वती की महत्वाकांक्षा और कार्य-शैली, अदल खटिक का अलग मिजाज तथा इल्तिजा ख़ाँ की बेबाकी कथा को विविधता देते हैं। रमज़ान हलालख़ोर और बुलु मित्रा जैसे पात्रों के माध्यम से कारोबार, अपराध और प्रतिष्ठा के बीच के संबंधों को उभारने की कोशिश भी दिखाई देती है। फिर भी, पात्रों की विशिष्ट बोली, नाटकीय घटनाओं और तकनीकी विवरणों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक था, ताकि उनका व्यक्तित्व केवल उनकी भाषा या विचित्र व्यवहार तक सीमित न रह जाए और वे कथा के भीतर अधिक गहराई से विकसित हो सकें। वहीं कथानक में राजनीति से संबद्ध पात्रों का प्रवेश क्षेत्र विशेष की राजनीति पर भी तंज़ है।
कुल मिलाकर, ‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है’ एक दिलचस्प विषय को लेकर लिखा गया उपन्यास है, जिसमें लेखक का दृश्यात्मक कौशल और कॉरपोरेट परिवेश की समझ स्पष्ट दिखाई देती है। इसकी सहज भाषा और घटनाप्रधान कथानक पाठक को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। दूसरी ओर, क्षेत्रीय भाषाओं के अत्यधिक प्रयोग, कुछ प्रसंगों की फिल्मी नाटकीयता और बड़े मीडिया प्रोजेक्ट के अनुरूप तकनीकी तथा प्रशासनिक विश्वसनीयता की कमी इसके प्रभाव को कुछ हद तक सीमित करती है। उपन्यास की विशेषता उसके विषय और प्रस्तुति के प्रयास में है, जबकि उसकी सीमाएँ इस बात में दिखाई देती हैं कि कई बार दृश्यात्मक प्रभाव और क्षेत्रीय रंग को साधने का आग्रह कथा के संतुलन पर भारी पड़ जाता है।
अतुल्य खरे
PUSTAK SAMIKSHA :ATULYA KHARE




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