Zinda Hoon Main By Praveen Banjara -- Pustak samiksha : Atulya Khare
Pustak
Samiksha: Atulya Khare
समीक्षित पुस्तक : जिंदा हूँ मैं
द्वारा : प्रवीण 'बनजारा'
विधा : कहानी
प्रथम संस्करण : 2026
New World Publication द्वारा प्रकाशित
मूल्य : 299.00
समीक्षा क्रमांक : 252
पूर्व बैंकर प्रवीण 'बंजारा' ने बैंकिंग सेवा से संबद्द रहते हुए भी अपने साहित्य प्रेम वशीभूत साहित्य के प्रति समर्पण एवं लगाव बरकरार रखा । लंबे अरसे से उनकी कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है एवं वर्ष 2025 में हिंदी साहित्य द्वारा उनका कहानी संग्रह 'मोरपंख' प्रकाशित किया गया जिसे पाठकों ने बेहद सराहा ।
वहीं एक तथ्य यह भी विचारणीय है की पीला रंग ऊर्जा और जीवन का प्रतीक है, उसका कम होना उस व्यक्ति के भीतर जीवन-ऊर्जा के कम होने का अहसास कराता है।
लेखक एक बुजुर्ग की मनोदशा को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सके हैं।
बंजारा जी अपनी अगली कहानी "जिंदा हूँ मैं" में एक अत्यंत व्यावहारिक किन्तु संवेदनशील प्रश्न कथानक के माध्यम से सामने रखते हैं जो आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में अनगिनत लोगों के दिल की आवाज़ है। जब इंसान सुबह से शाम तक सिर्फ आजीविका कमाने की मशीन बनकर रह जाता है, तो उसका यह सोचना स्वाभाविक है कि "क्या इसे वाकई ज़िंदा रहना कहते हैं।
"विशेष तौर पर इस अवस्था में इंसान दो हिस्सों में बंट जाता है, जीवन यापन एवं सामाजिक दायित्वों की पूर्ति हेतु वह अपने काम कर रहा होता है, लेकिन भीतर ही भीतर वह मर रहा होता है क्योंकि सिर्फ व्यक्ति का सांस लेते रहना एवं एक यांत्रिक रूप में दिनचर्या का पालन करना ही तो जीवन नहीं है।
वह जिस परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, लेकिन विडंबना देखें कि उसी परिवार के लिए उसके पास समय नहीं है। अर्थात स्पष्ट है की साधन को ही साध्य न मान लिया जावे क्योंकि तब ही जीवन मे भटकाव शुरू होता है।
पैसा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बुनियादी जरूरतें पूरी करता है, लेकिन यह खुद जीवन नहीं है अतः कथानायक समान ही कठोर निर्णय अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यह एक बहुत ही साहसिक और सही दिशा में उठाया गया कदम है। जब पानी सिर से ऊपर निकल जाए, तो कड़े और कड़वे निर्णय लेना ही एकमात्र रास्ता बचता है। यदि व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से टूट जाएं, तो न तो नौकरी बचेगी और न ही परिवार, ऐसे में खुद को बचाने के लिए स्पष्ट सीमाएं जरूरी हैं क्योंकि जब तक स्पष्ट सीमा रेखा तय नहीं की जायेगी, तब तक ऐसा ही द्वन्द इंसान को आंतरिक रूप से खोखला करता रहेगा
इसी कहानी संग्रह की कहानी "दुख के साथी" एक बेहद, कड़वा, वास्तविक और मनोवैज्ञानिक सच दर्शाती है साथ ही वर्तमान सामाजिक दृष्टिकोण का भी दृश्य प्रस्तुत करती है। कहानी इंसान के स्वभाव और रिश्तों की एक बहुत गहरी परत हमारे सामने खोलती है।
कहानी दो पड़ोसनों की है जो किराए के मकान में थीं, तब दोनों समान ही थीं , एक-दूसरे की परेशानी समान थीं और वे एक दूसरे के दु:ख की साझीदार और साथी भी थीं। तब रिश्ता बराबरी का था क्योंकि दोनों ही संघर्ष की अवस्था में थीं। लेकिन जैसे ही एक महिला अपने स्वयं के मकान में चली जाती है नजरिए में बड़ा बदलाव आ जाता है जिसे दूसरी महिला के शब्द बहुत ही सुंदर तरीके से अभिव्यक्त करते हैं की "हम लोग उनके दुख के साथी थे, अब उनका दुख का समय गुजर चुका है। अब वह समय उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। उसे वह भूल जाना चाहते हैं।"
कहा जा सकता है की लेखक ने उस महिला मात्र की व्यथा नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज के एक मध्यमवर्गीय परिवार की मनोदशा को सामने रखा है , जहां हम अक्सर देखते हैं कि लोग अक्सर अपने संघर्ष के दिनों को, अपने तथाकथित बुरे समय को याद नहीं करना चाहते उस दौर के सहयोगियों एवं परिचितों से दूरी बना लेते हैं , अपना भूतकाल पीछे छोड़कर जल्द से जल्द आगे बढ़ना चाहते हैं। और जैसे ही व्यक्ति अपनी गरीबी, लाचारी अथवा अन्य मुश्किलों से भरे उन बुरे दिनों से निकलकर सफलता पा लेता है, तो वह उन चेहरों से कतराने लगता है जो उसे उसके उस दौर की याद दिलाते हैं। कहानी में बेटे के मासूमियत से भरे सवाल वास्तव में हमारे ही अंतर्मन की आवाज सामने रखते हैं वहीं उसकी माँ का जवाब भी पूर्णतः व्यावहारिक एवं अनुभव आधारित है।
संग्रह की अगली कहानी 'ठौर' एक मजदूर की पीढ़ा एवं उसकी भावनात्मकता दर्शाती है कहानी के द्वारा लेखक ने एक प्रवासी मजदूर के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं, उसकी विवशता और उसके छोटे से आशियाने के प्रति अटूट लगाव एवं उस से भावनात्मक जुड़ाव को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
उस श्रमिक के लिए सड़क किनारे का वह स्थान जहां वह एक टाट के बोरे को बिछाकर रात गुज़ारता है वही उसका 'महल' है, जो बोरा उसे गाँव से आते वक्त बाबा ने दिया था उस से उसका भावनात्मक लगाव प्रभावित करता है। दिनभर की थकान के बाद उस बोरे पर लेटने पर उसे जो सुकून मिलता है, उससे उसे यह एहसास होता है मानो उसके बाबा उसकी पीठ पर हाथ फेर रहे हों और वह अपने परिवार के संग हो। उसकी यह मानसिकता, कि, असली संपत्ति भूमि पर नहीं बल्कि उनके मानस में होती है, और उसके लिए उसका यह 'ठौर' ही उसकी सबसे बड़ी और असली संपत्ति है, निश्चय ही एक अत्यंत सरल शब्दों में दिया गया गहन संदेश है तथा जीवन का कटु यथार्थ भी।
कहानी "लगभग प्रेम" के विषय में कहा जा सकता है की यह एक प्री-लव स्टोरी है जहां शायद प्रेम की शुरुआत हो भी सकती है और शायद नहीं भी, हो सकता है बात परिचय और दोस्ती पर ही समाप्त हो जाए। जीवन में एकाकीपन जैसे गंभीर मुद्दे को लेकर प्रारंभ हुई कहानी अत्यंत भावुक संवेदन शील मुद्दे से प्रारंभ होकर कॉर्पोरेट सेक्टर की कार्य प्रणाली और वहाँ पनपती दोस्ती की शुरुआत में खो जाती है। न तो कहानी अंत ही प्रभावशाली बना सकी न ही मध्य हाँ प्रारंभ रोचक अवश्य था किन्तु जैसा की अपेक्षित था की एक व्यक्ति जिसने एकाकी जीवन बिताया और जिसे एकाकीपन से भय है वह मित्रवत व्यवहार पाकर उस के प्रति कुछ प्रतिक्रिया तो दर्शाएगा किन्तु कथानक में यह स्पष्ट नहीं हो सका । कहानी अंतहीन है जहां न तो आगे की कोई संभवना ही लक्षित हो रही है न ही पूर्णविराम फलस्वरूप पाठक स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है ।
कहानी "राख" दो भाइयों के आपसी मन-मुटाव एवं मुख्यतः एक भाई की माँ के प्रति ऋणात्मक सोच पर केंद्रित है जहां उस भाई के मन में यह भावना घर कर चुकी है की वह परिवार का उपेक्षित बेटा था तथा माँ ने उसे सदा ही उपेक्षा दी। माँ के द्वारा एक भाई को अधिक चाहने पर केंद्रित इस कथानक में सारी कहानी माँ की मृत्यु के पश्चात उसके अस्थि विसर्जन के लिए जाते वक्त सारे रास्ते दोनों भाइयों के निरंतर विवाद पर ही केंद्रित रहती है जहां एक के बाद एक वे तमाम बिंदु एक दूसरे को गिनवाए जाते हैं जिन पर भेद भाव हुआ अंत में दोनों का ही अस्थि विसर्जन को लेकर झगड़ पड़ना तनिक हास्यास्पद सा प्रतीत होता है जो कि वयस्क पुरुषों के आचरण के विपरीत है। वहीं इतनी कड़वाहट के बावजूद दोनों भाइयों का संग संग अस्थि विसृजन हेतु जाना जहां एक सकारात्मक संदेश दे रहा था वहीं अंत में दोनों का कलश को लेकर गुत्थमगुत्था होना समझदारी का आचरण नहीं दर्शाता वहीं वह भाई जिसके दिल में माँ एवं भाई आदि के प्रति इतनी नफरत थी अचानक ही उसका अस्थि कलश विसर्जन को लेकर इस कदर भावनात्मक या धार्मिक हो जाना भी समझ से परे है।
कहानी "मायावी लोक" आज की युवा पीढ़ी की बढ़ती आय के साथ साथ उनके दिखावे में हो रही फिजूल खर्ची पर केंद्रित है जहां तीन युवा मित्रों के आय से अधिक खर्च करने के तरीके को रोचकता से उकेरा गया है एवं यह संदेश देने का भी प्रयास है की वे जिन्हें दिखाने के लिए यह दिखावा कर रहे हैं बाज दफ़े उन्हें तों इसका भान भी नहीं होता । अच्छी रोचक एवं संदेशात्मक कहानी है जिसे सरल भाषा एवं वाक्यांशों के स्तर पर भी सहज रखा गया है।
संग्रह की अगली कहानी 'पतंगबाज' संभ्रान्त एवं सुशिक्षित परिवार के एक ऐसे बालक की कहानी है, जो बचपन से ही अपने एकमात्र जुनून को जीवन का अंतिम लक्ष्य बना लेता है। कहानी का बीज-भाव अत्यंत सुंदर और अर्थ-गर्भित है, किंतु प्रस्तुति के स्तर पर कहानी कुछ कमजोर पड़ जाती है। एक सुशिक्षित परिवार में पढ़ाई में पिछड़े बच्चे की मनोदशा से शुरू हुई यह कथा, अनावश्यक विस्तार और वर्णनात्मकता के बोझ तले अपनी गति खो देती है।
मानस में सहज ही सबसे बड़ा प्रश्न इसके अंत को लेकर उठता है की उस अत्यंत प्रगतिशील पढे लिखे परिवार के जिस बालक के लिए लेखक ने इतनी बड़ी मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि तैयार की, उसका बड़ा होकर केवल पतंग की एक दुकान खोलकर बैठ जाना, पाठक को अस्वाभाविक और अधूरे समाधान जैसा लगता है। जुनून और लक्ष्य के बीच का वह महीन अंतर जो कहानी को महान बना सकता था, वह स्पष्ट नहीं हो पाता। अन्य कहानियों की ही तरह यह कहानी भी विषय की माँग से अधिक विस्तार ले गयी जो कहीं न कहीं कथा के मूल भाव एवं प्रवाह को बाधित करता है।
कुल मिलाकर एक रोचक कथानक युक्त 'पतंगबाज' एक अच्छी थीम वाली कहानी है, किंतु शिल्प के स्तर पर कुछ और कसावट निश्चय ही बेहतर होती ।
कहानी "कितनी यात्राएं" के द्वारा जीवन की उन कड़वी सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास किया गया है जिन्हें हम सभी जानते समझते हुए भी उनसे निगाहें फेरे रहते हैं यथा संतान के आगमन से ही जीवन की सार्थकता है।
सामाजिक जिम्मेवारियों एवं पद प्रतिष्ठा से जुड़े मनोभावों के नियंत्रण में रहता आम इंसान वास्तविकता के धरातल पर जब स्वयं को अकेला खड़ा पता है तब स्वयं को गंभीर अवसाद में डूबा हुआ पाता है। वही व्यक्ति जो कभी जीवन की आपाधापी में, तरक्की और तारीफ़ों के शोरगुल में आम लोगों से दूर भागता था अब उनके बीच जाना चाहता है उनसे जुड़ कर अपने मन के शून्य से बाहर आना चाहता है क्योंकि इस अवस्था तक आते आते वह समझ चुका होता है कि बच्चों की अपनी जिंदगी है।
उसके जीवन में तलाश शुरू होती है जीवन के ध्येय की । कहीं न कहीं एक प्रयास होता है स्वयं को जानने का, जिसके माध्यम से जीवन पाने का औचित्य समझ सकें , कुछ लोग इस गूढ़ भेद को जानने के लिए धर्म का सहारा लेते है तो कोई किसी ज्ञानी का किन्तु कौन जान पाता है, यह तो वही समझ सकता है जिसने यह ज्ञान पा लिया है। जो कि जीवन का सत्य है हर तरह की आसक्ति एवं प्रमाद से बहुत दूर ।
एक गंभीर विषय पर चिंतन युक्त आलेख को कथानक में ढल कर प्रस्तुत करने का सकारात्मक सफल प्रयास है।
अतुल्य खरे











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