Sur : Neelima_Sharma -- Pustak_Samiksha : Atulya_Khare

 

  • Pustak Samiksha : Atulya Khare

  • समीक्षित पुस्तक : सुर

  • द्वारा : नीलिमा शर्मा

  • विधा : उपन्यास

  • शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

  • प्रकाशन वर्ष : 2026

  • मूल्य : 400.00

  • समीक्षा क्रमांक : 251 

Sur : Neelima_Sharma -- Pustak_Samiksha : Atulya_Khare

भावनात्मक एवं गंभीर विषय पर केंद्रित एक अत्यंत सशक्त संवेदनशील कथानक, जहां दास्ताँ या कहें जीवन गाथा है एक ऐसी बेटी की जिसे उसकी माँ ने सारा जीवन तिरस्कृत ही रखा एवं मात्र इसी लिए ठुकराया क्यूंकि वह एक लड़की थी, साथ ही कहानी उस माँ की भी है कि उसकी क्या मज़बूरियाँ थीं, क्यूँकर वह अपनी ही बेटी के प्रति ऐसी निष्ठुर बन गई।

अत्यंत रोचक एवं वास्तविकता के बेहद करीब सृजित घटनाक्रम है जिसे लेखिका ने बहुत ही रोचक शैली में प्रस्तुत किया है, एवं उनके लेखन की यह विशिष्टता पुस्तक में अंत तक रोचकता बनाए रखती है वहीं पुस्तक का अंत भी अप्रत्याशित होते हुए अनुकरणीय, प्रगतिशील तथा विचारोत्तेजक है।

घर-घर से जुड़े या फिर समग्रता में कहें तो जाति-उपजाति के भेद से परे सम्पूर्ण समाज के इस ज्वलंत विषय पर संकीर्ण विचार, यूं तो ज़र्रे ज़र्रे में व्याप्त हैं जो की आए दिन किन्हीं न किन्हीं घटनाओं के रूप में सामने आते हैं किन्तु विषय पर स्वतंत्र विमर्श अमूमन कम ही दृष्टिगत हुआ है।

Sur : Neelima_Sharma

विदुषी लेखिका नीलिमा शर्मा जी ने अपने प्रस्तुत उपन्यास “सुर” में सम्पूर्ण समस्या को रोचकता के संग कथानक में ढाल कर बेहद विस्तृत एवं समस्त संबंधित विषयों को भी समाविष्ट किया है जो की सहज ही प्रभावी एवं गर्भित संदेश को बखूबी समाज तक पहुंचाता है वहीं एक गंभीर विमर्श का प्रारंभ भी करता है।

पूर्व में बात कन्या भ्रूण हत्या की थी जिस पर बहुत हद तक शासकीय प्रयासों द्वारा नियंत्रण पा लिया गया किन्तु यह उसके बाद की स्थिति है जिस पर या तो कभी विचार ही नहीं होता, या फिर वैसा ध्यान नहीं दिया जाता जितना अपेक्षित है। वह कन्या, जो भ्रूण हत्या से तो बच जाती है किन्तु वह मासूम बेटी ता ज़िंदगी कितने उलाहने, बंदिशें व दर्द सहती हुई बड़ी होती है और पुनः उन्हीं स्थितियों में माँ बनती है जिनमें उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था, उसकी उस पीढ़ा को कभी सुना और समझा ही नहीं जाता। अंततः वह भी अपनी बेटी को वही सब दर्द, उपेक्षा ताने और लानत मलामत विरासत में सौंप देती है जो उसे मिले थे, किन्तु पुनः कहना होगा कि नीलिमा जी ने अद्भुत कथानक बुना है।



Sur : Neelima_Sharma -- Pustak_Samiksha : Atulya_Khare

स्त्री जब स्वयं माँ बनने वाली होती है, तो उसका मन, उमंग, चिंता और भविष्य की कल्पनाओं से भरा होता है। लेकिन जब उसके अतीत में बेटियों के प्रति तिरस्कार के गहरे जख्म और कडवे अनुभव हों, तो यह अनुभव एक गहरे मनोवैज्ञानिक तनाव और भय में बदल जाता है। नीलिमा जी के इस उपन्यास सुर का कथानक कुछ ऐसे ही घटनाक्रम को लेकर आगे बढ़ता है, जहां गर्भवती कथानायिका जो इस वक्त बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया से गुजर रही है एवं उस अवचेतन अवस्था में अपनी माँ की व स्वयं अपने जीवन की कहानी एक फ्लैश्बैक जैसी अवस्था में प्रस्तुत करती है।

​ समाज में जब कहीं लोग बेटी के जन्म पर मातम मनाते हैं, वे उस बच्ची और उसकी माँ के आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खत्म कर देते है। इस संकीर्ण विचारधारा से ग्रसित व्यक्ति कभी यह नहीं समझ पाते कि इस तरह से उन्होंने अपने परिवार की नींव को ही खोखला कर लिया है। नीलिमा जी के इस उपन्यास सुर का कथानक निश्चय ही समाज के उस काले सच को उजागर कर रहा है जिसे हम वर्तमान तथाकथित आधुनिक, प्रगतिशील, विकसित दौर में ढो रहे हैं।



पुस्तक की नायिका-युवती एक ऐसी मानसिक अवस्था में है जहां वह चाह कर भी अपने बचपन की कड़वी यादों को भुला नहीं पाती। उसकी माँ, जो समाज एवं परिवार की लड़का जनने की चाहत को देखते हुए एवं बेटे को जन्म न दे पाने के कारण, स्वयं एक अपराध बोध से ग्रसित रही जिसका परिणाम उस नवजात ने झेला जो आज लेबर रूम में एक नई काया को जन्म देने की प्रक्रिया से गुजर रही है। यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है जहां जब बचपन की बातें एवं व्यवहार अवचेतन मन में अपना स्थान बना लेते हैं एवं भविष्य में वह व्यक्ति उस तरह की घटनाओं पर वैसे ही प्रतिक्रिया देता है जैसा की उसके संग हुआ था जो की उसके अवचेतन मन द्वारा सुझाया जा रहा है।

वहीं गर्भावस्था में इस युवती का डर एवं तनाव उसके पुराने घावों का फिर से हरा हो जाना है। गर्भावस्था में बच्चे के जन्म से ठीक पूर्व की अवस्था किसी भी महिला के लिए यूं भी शारीरिक एवं मानसिक रूप से कठिन होती है। वहीं यदि उस पर यह अतिरिक्त भार हो कि मेरे बच्चे के लिंग के आधार पर मेरा भविष्य, परिवार में मेरा स्तर तय होगा तथा जब पिता का प्यार शर्तों (लड़के की चाहत) पर आधारित हो, तो वह प्यार है ही नहीं। वह केवल एक सौदा है एवं स्वाभाविक ही है की महिला तनाव के हालत में ही रहेगी।



यदि एक गर्भवती महिला की माँ बनने की खुशी इस बात पर निर्धारित हो की उसके द्वारा जन्म दिए गए बच्चे का लिंग क्या है तो बहुत स्वाभाविक है की वह अपनी खुशी को पूरी तरह से अपने अंदर ही जज़्ब कर लेगी क्यूंकि उसे ज्ञात है कि उसकी खुशी का निर्णय या तो समाज या उसके पिता या फिर भा इयों द्वारा किया जाएगा।

प्रस्तुत कथानक में कथानायिका के साथ जो व्यवहार उसकी माँ ने किया वह उसकी माँ तथा उसकी नानी एवं मौसी आदि के संग उसके मायके में होने वाले व्यवहार की स्पष्ट अनुकृति है। क्यूंकि उसकी माँ अपने पिता के व्यवहार से दुखी थी अतः अपने ससुराल में बेटी होने को लेकर भी सभी का सहज व्यवहार भी उसे सकरात्मकता पर नहीं ला सका एवम वह अपनी ही बेटी अर्थात कथानायिका उस से दूर होती गई।



ससुराल का सकारात्मक रुख इस बात का प्रमाण है कि सभी लोगों की सोच अब वैसी नहीं रही तथा समाज में परिवर्तन तो हो रहा है और सोच बदल रही है। ससुराल का खुश होना यह भी दर्शाता है कि एक बिल्कुल नया परिवेश कथानायिका को उस पुराने दकियानूसी डर से मुक्त कर सकता था यदि वह पुरानी यादों से अपने अवचेतन मन के तूफान से मुक्ति पा लेती।

कथानक में उसके पिता अर्थात कथा नायिका के नाना की संकीर्ण मानसिकता युक्त सोच एवं तदनुसार उनका व्यवहार पिता की असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का प्रदर्शन है जहाँ वे इस दौर में भी वारिस वाली मानसिकता से कैद हैं। उनका प्यार शर्तों पर आधारित प्रतीत होता है जिसे प्यार कम और समाज में दिखावे तथा मान सम्मान की वस्तु अधिक समझा जाना चाहिए।



वहीं हमारी कथानायिका की माँ की मानसिकता का विश्लेषण करें तो सहज ही यह बात उभर कर सामने आती है की क्यूंकि वह स्वयं कभी भी अपने पिता द्वारा स्वीकार नहीं की गई, इसलिए उसके अवचेतन मन में यह बात गहराई तक बैठ गई कि लड़की होना समाज एवं परिवार में अस्वीकार्यता का बड़ा कारण है।

और फिर जब वह स्वयं माँ बनी, उसके खुद के घर में बेटी हुई, तो उसे अपनी वही पुरानी अस्वीकृत पहचान याद आ गई। उसने अपनी बेटी में स्वयं को देखा, उसे उसके लिए भी वही दुख, वही तिरस्कार सबकी नज़रों में दिखा और वह निष्ठुर बन गई तथा यह निष्ठुरता शनैः शनैः बढ़ती ही गई



उसने वही सब तिरस्कार, नफरत और बंदिशें अपनी बेटी पर लगा दीं जो कभी उस पर थीं उसका अपनी बेटी को दिल से न अपनाने का निर्णय कहीं न कहीं ऐसा ही प्रतीत होता है मानो वह अपने अतीत से नजरें चुरा रही हो या संभवतः वह अव्यक्त भय उसे आगे बढ़ कर बेटी को स्वीकार नहीं करने देता। मानो वह बेटी को जन्म देकर किये गए गुनाह का दंड सारे जीवन भुगतने हेतु अभिशप्त है।

किन्तु यदि इस स्थिति को खुले दिमाग से विश्लेषित करे तो सहज ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वह अपनी बेटी के रूप में उस लड़की को देखती है, जिसे उसके पिता ने कभी नहीं चाहा और जिसे आगे समाज की तमाम विपरीत परिस्थितियों से दो चार होना है। वह अपनी बेटी से नहीं बल्कि उसके लड़की होने के अहसास से नफरत कर रही है जो उसे अनचाहे ही विरासत में मिला है।



वह स्वयं एक ऐसी महिला है जो अपने पिता के बनाए हुए 'पिंजरे' से कभी बाहर निकल ही नहीं पाई। वह इतनी टूट चुकी है कि उसके भीतर अब प्यार देने की कोई क्षमता शेष नहीं बची। वह अपनी बेटी को अपनाकर शायद यह याद नहीं करना चाहती थी कि उसे खुद को कभी किसी ने नहीं अपनाया। प्रतीत होता है मानो वह एक गंभीर उदासी या फिर डिप्रेशन की स्थिति में है।

पुस्तक में एक अन्य अत्यंत प्रभावी किरदार कथानायिका युवती की बुआ का है जिसे उसके पति ने छोड़ कर दूसरी शादी कर ली क्यूंकि वह माँ नहीं बन सकती थी। बुआ जो स्वयं माँ नहीं बन पाई, उसके लिए उस बच्ची को अपनाना एक बेहद स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। बुआ ने बच्ची को वह प्रेम दिया जो उस बच्ची की माँ ने नहीं दिया वह प्रेम और सुरक्षा जो उस नौनिहाल की प्रथम आवश्यकता व अनिवार्यता थी उसे बुआ से मिले

बुआ का उस बच्ची को अपनाना दिखाता है कि निस्वार्थ प्रेम, जैविक माँ के अभाव को भर सकता है। वहीं माँ का बच्ची से न जुड़ पाना स्पष्टतः यह दर्शाता है कि वह मानसिक रूप से सदा अपने अतीत में ही जीती रही कभी भी उस घर में मौजूद ही नहीं थी। वह सदा ही अपने पिता के उत्पीड़न, डांट और तिरस्कार को जीती रही। कथानक में एक निर्दयी माँ समान प्रतीत होती यह नारी तो स्वयं ही पीड़ित है।

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इसी संदर्भ में युवती एवं उसकी माँ के बीच के नाम के इस रिश्ते के पीछे कारण मनोवैज्ञानिक अधिक प्रतीत होता है न की सामाजिक यथा एक नवजात का अपनी माँ से न जुड़ पाना दर्शाई गई स्थितियों तथा माँ के व्यवहार के परिणामस्वरूप स्वाभाविक ही है, माँ ने उसे कभी वह सुरक्षा वह अपनापन दिया ही नहीं जिसकी वह हकदार थी उसके लिए माँ केवल एक नाम एक शारीरिक उपस्थिति है, जबकि दादी और बुआ ने जिस प्रकार उसे बचपन से संभाला, वह ही जीवन हेतु उसके भावनात्मक आधार बने



वहीं कथा-नायिका के नाना का व्यक्तित्व कहें, अथवा उनकी मानसिकता या फिर उस दौर में उनको मिले हुए संस्कारों का प्रभाव की वे अपनी बेटियों द्वारा लड़की को जन्म देने हेतु भी अपनी पत्नी को ही जिम्मेवार मानते हैं जो विज्ञान की दृष्टि से निहायत ही हास्यास्पद है। यह अवश्य ही उस व्यक्ति की मानसिक दरिद्रता अथवा कहें दिवालियापन है जो यह भी नहीं समझ पा रहा कि संतान के लिंग निर्धारण में विज्ञान के अनुसार पिता की भूमिका होती है, न कि माँ की

ऐसे लोग तर्क नहीं अपितु अपने अहंकार को महत्व देते हैं, वे अपने अहम तथा समाज में अपने नाम के लिए ही जीते हैं। ​जब उसकी बेटियाँ भी लड़कियाँ ही पैदा कर रही हैं, तो वह पिता कहीं न कहीं इसे अपनी व्यक्तिगत पराजय के रूप में देख रहा है। वह अपनी बेटियों को भी उसी दृष्टि से देखता है जिससे पूर्व में उसने अपनी पत्नी को भी देखा था।

हालांकि इस पुरुषवादी मानसिकता को दो अन्य अवसरों पर भी लेखिका ने रेखांकित किया है, पहली बार तब जब घर में कथा-नायिका की माँ एक बेटे को जन्म देती तब उसके पिता की प्रतिक्रिया और वहीं अंत में कथा-नायिका के तथाकथित उच्च सोच व हर सुख दु:ख में साथी जिसे बहुत सोच समझ कर कथा-नायिका ने तमाम मुश्किलों के बाद अपना सर्वस्व समर्पित किया था, उसका पति, उसकी प्रतिक्रिया भी उसके नाना की प्रतिक्रिया से बहुत भिन्न तो नहीं कही जा सकती।

कथानक में विभिन्न रोचक मोड है यथा कथा-नायिका का प्रेम में अपने जीवन के कुछ खुशनुमा पल पाना, परिवार के अंदर ही मामा के लड़के द्वारा छेड़ना एवं प्रताड़ित किया जाना, माँ का सदा ही भाई को उसकी गलत एवं अनुचित आदतों हेतु सहयोग, समर्थन एवं अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन दिया जाना तथा नायिका के प्रेम प्रसंग।

बुआ जी एवं बहुत हद तक निष्प्रभावी से हो चुके अपने पिता के सहयोग से अंततः अपने मन की कर गुजरना कथा-नायिका की सुदृढ़ मानसिकता एवं स्पष्ट उन्मुक्त सोच को दर्शाता है। निश्चय ही पुस्तक का अंत जहां अप्रत्याशित है एवं अचानक ही सामने आते ही पाठक को अचंभित करता है पर कथानक के अंतिम बिन्दु पर यह मोड निश्चय ही लेखिका की लेखन शैली एवं स्पष्ट तथा प्रगतिशील सोच को समर्थित करता है।

बेशक यह नीलिमा जी का पहला उपन्यास है किन्तु निःसंदेह यह कहा जा सकता है की अपने लेखन कौशल, विचारों को बखूबी कलात्मकता के संग सम्प्रेषित करने की कला एवं अभिव्यक्त के हुनर के चलते उन्होंने पाठक वर्ग के दिलों में अपना विशेष स्थान सुनिश्चित कर लिया है। एक गंभीर विषय को समाज के सामने इतनी स्पष्टता एवं रोचकता से प्रस्तुत करन एवं सामाजिक जागृति हेतु उनका यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है।

          अतुल्य खरे

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