Stri Younikta Ke Samajik Sandarbh -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
- • Pustak Samiksha : Atulya Khare
- • समीक्षित पुस्तक : स्त्री यौनिकता के सामाजिक संदर्भ
- • विधा : Non Fiction
- • द्वारा : डॉ . सुनीता ठाकुर
- • विचार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
- • प्रथम संस्करण : 2025
- • मूल्य : 300.00
- • समीक्षा क्रमांक : 248
स्त्री यौनिकता एक अत्यंत व्यापक और बहुआयामी विषय है जिसे मात्र जैविक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसमें मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं का एक जटिल मिश्रण शामिल है। यौनिकता व्यक्ति की अपनी इक्षाओं, पसंद-नापसंद, भावनाओं और आत्म-बोध से गहराई से जुड़ी होती है।
समाज, परंपराएं, धर्म और शिक्षा यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं कि स्त्री यौनिकता को कैसे देखा जाता है। इतिहास में हम देखते हैं की समाज द्वारा विभिन्न दलीलें देकर अक्सर इसे दबाने या नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है, जिसके कारण आज भी हमारे समाज में इस पर खुलकर बात करना बहुत हद तक वर्जित ही कहा जा सकता है।
आधुनिक दृष्टिकोण में स्त्री यौनिकता से तात्पर्य है स्त्री का अपनी इच्छाओं के प्रति जागरूक होना, अपनी सीमाओं को तय करना और अपने शरीर व यौन जीवन पर अपना निर्णय लेने का अधिकार रखना, जो की उसकी स्वयं की स्वीकृति एवं आत्मसम्मान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है एवं स्त्री की, पितृसत्तात्मक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
संक्षेप में, स्त्री यौनिकता का अर्थ स्त्री का अपने शारीरिक और भावनात्मक अनुभवों के प्रति जागरूक होना उन्हें अभिव्यक्त करने में सक्षम होना और समाज की रूढ़ियों से परे अपनी पसंद और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है जो कि एक व्यक्तिगत यात्रा है तथा हर महिला के लिए भिन्न हो सकती है।
स्त्री यौनिकता के संदर्भ में, सामाजिक वर्जनाओं का संबंध एक ऐसे इतिहास से है जो सदियों पुराना है। यह विषय व्यक्तिगत कदापि नहीं है , बल्कि एक बहुत बड़ा सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न रहा है। जिसके पीछे मूल उद्देश्य स्त्री के मन के साथ साथ उसके तन पर सम्पूर्ण नियंत्रण रहा फिर वह इतिहास हो अथवा वर्तमान।
सदैव ही यह देखा गया है की सामाजिक वर्जनाएं अचानक उत्पन्न नहीं होतीं, बल्कि उन्हें एक सोची समझी रणनीति के तहत एक सामाजिक ढांचे के तहत निर्मित किया जाता है और उसका एक मजबूत आधार बनाकर संबंधित पर अधिरोपित किया जाता है।
ऐतिहासिक रूप से, हमारे पितृसत्तात्मक समाज एवं संसृतियों ने स्त्री नियंत्रण हेतु स्त्री यौनिकता को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया एवं उस की भावनाओं को नियंत्रित करना आवश्यक समझा ताकि संपत्ति के उत्तराधिकार को सुनिश्चित एवं सुरक्षित किया जा सके। उसकी पवित्रता का एक पैमाना निर्धारित कर दिया गया एवं उसे परिवार या खानदान की इज्जत से संबद्द कर समाज में परिवार की प्रतिष्ठा का पर्याय बना दिया गया।
स्त्री यौनिकता को सामाजिक संरचनाओं, पितृसत्तात्मक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में देखते हुए गहराई से पड़ताल करने की आवश्यकता है। जैसा की मैंने पहले भी कहा की भारतीय समाज में लंबे समय से स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित करके देखा गया है,जहाँ आर्थिक निर्भरता, बच्चों की चिंता और सामाजिक दबाव अक्सर उनकी इच्छाओं के दमन का कारण बनते हैं।
पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री के शरीर और उसकी यौनिकता को संपत्ति या उपभोग की वस्तु के रूप में देखा है। विवाह संस्था में स्त्री के लिए एकनिष्ठता और समर्पण के सख्त मानदंड तय किए गए हैं, जबकि पुरुषों के लिए सामाजिक दृष्टिकोण अक्सर लचीला रहा है। यह भी देखा गया है की जिस स्त्री की यौनिकता या इच्छाएं सामाजिक सांचों में फिट नहीं बैठतीं, उन्हें चरित्रहीन या कुलटा जैसे सामाजिक लांछनों का सामना करना पड़ता है। स्त्री की यौनिकता को अक्सर मात्र वंश वृद्धि के साधन के रूप में ही मान्यता दी जाती है।
हाल के वर्षों में, साहित्य और नारीवादी विमर्श ने इस चुप्पी को तोड़ा है। डॉ. सुनीता ठाकुर ने समीक्षाधीन पुस्तक "स्त्री यौनिकता के सामाजिक संदर्भ” के माध्यम से उन सामाजिक परतों को खोलने का प्रयास किया है, जिनके भीतर स्त्री की यौनिकता को कैद रखा गया है।
पितृसत्ता, यौनिकता और समलैंगिकता के बीच के संबंधों और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को विस्तार से समझने कौमार्य को एक ऐसी पूंजी बना दिया गया जिसे शादी के बाद सुरक्षित सौंपना अनिवार्य था। किसी भी अन्य प्रकार की यौन अभिव्यक्ति को अनैतिक अथवा चरित्रहीनता करार दिया गया।
डॉ . सुनीता ठाकुर ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से इस अति संवेदनशील विषय एवं इसके महत्वपूर्ण खंडों का बेहद सूक्ष्मता से अध्ययन किया है। जहां इस पुस्तक की भूमिका ही विषय पर अत्यंत सूक्ष्म एवं तार्किक टिप्पणी करती है, वहीं यौनिकता को स्त्री का एक सहज मौलिक अधिकार मान उस पर पितृसत्ता एवं यौनिकता से संबंधित कुछ कहे कुछ अनकहे सच और प्रश्न सम्मुख रखे हैं एवं मूलतः उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री चरित्र से जोड़ दिए गए कुछ साक्ष्य एवं उसके साथ साथ समय के बदलते दौर में विवाह के बदलते मायनों पर भी चर्चा करी है।
डॉ . सुनीता ठाकुर का यह एक गहन सामाजिक अध्ययन है जिसे अत्यंत व्यापक रूप से देखने एवं गहनता से समझने की आवश्यकता है।
आम तौर पर हम देखते हैं या कहें की सर्व विदित ही है की सामाजिक वर्जनाएं सबसे अधिक भाषा अर्थात संवाद के द्वारा काम करती हैं। घर हो या बाहर सामाजिक समूह अथवा अन्य कोई सार्वजनिक मंच हर कहीं यौनिकता को लेकर चुप्पी साधी जाती है, और उस पर बात करने वाले को ओछे चरित्र वाली मानने में कोई समय नहीं लगता। इस विचारधारा का जिसने एक परंपरा का ही रूप ले लिया का सामाजिक प्रभाव यह हुआ की स्त्री के मन में बचपन से ही अपनी प्राकृतिक शारीरिक जरूरतों एवं इक्षा को लेकर एक गहरा अपराधबोध पनपता गया। अपनी ही इच्छाओं को समझना या महसूस करना जहां उसे अपराध बोध देता वहीं यदि इक्षा अभिव्यक्त कर दी जाती तब तो वह अक्षम्य अपराध ही हो जाता एवं यह सामाजिक रवैया उसे मानसिक रूप से अपनी इक्षाओं को दबाने हेतु विवश करता है।
वहीं, क्यूंकी समाज पितृसत्तात्मक है तो सामाजिक वर्जनाएं स्त्री और पुरुष के लिए कभी भी एक समान नहीं होतीं, जहां पुरुषों की स्वाभाविक इक्षाओं को प्राकृतिक आवश्यकता के रूप में देखा जाता है तथा उसे व्यापक स्वीकार्यता भी मिलती है, उसके विपरीत जब यही स्वाभाविक इच्छा स्त्री की हो, तब उसे अनैतिक कहा एवं माना जाता है।
यह दोहरा मापदंड समाज की सबसे बड़ी वर्जना है, जो स्त्री को अपने ही शरीर पर अधिकार रखने से वंचित करता है एवं उस पर गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ता है। फलस्वरूप स्त्री अपनी ही शारीरिक संवेदनाओं को समझने के बजाय उन्हें दबाते हुए उनसे कटने लगती है। जो उसमें आत्म-विश्वास की कमी, परस्पर रिश्तों में जटिलता एवं गंभीर अवसाद जैसी समस्याएं उतत्पन्न करते हैं।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा, साहित्य, कला और डिजिटल पहुंच के प्रभाव से ये वर्जनाएं तेजी से टूटी हैं, आज इंटरनेट के माध्यम से स्त्रियां अपने शरीर, स्वास्थ्य और अधिकारों के बारे में जानकारी प्राप्त कर रही हैं वहीं समकालीन साहित्य और फिल्मों में स्त्री की यौनिकता को अब एक विशेष दायरे के बाहर रखकर सहज शारीरिक मानवीय अनुभव या आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है।
डॉ. सुनीता ठाकुर इस अहम विषय से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर भी गहन विचारण प्रस्तुत करती है, वे बात करती हैं वैवाहिक बलात्कार की तो वहीं विवाह की हालिया बदलते मायनों यथा लिव इन और लव जेहाद पर भी बात करती हैं ।
सम्पूर्ण पुस्तक का सार कहें तो सामाजिक वर्जनाओं को, जिन्हें समाज ने अपनी व्यवस्था बनाए रखने तथा विदेशी आक्रान्ताओं से स्त्री की सुरक्षा जैसे कारणों से स्त्री के आसपास बुना था और उसके लिए एक कवच की तरह इस्तेमाल किया गया कालांतर में यही सुरक्षा दीवार स्त्री स्वतंत्रता की राह में ही सबसे बड़े अवरोध के रूप में खड़ी हो गईं। ।
वास्तव में स्त्री यौनिकता पर बात करना एक अत्यंत स्वतंत्र व्यापक और गतिशील विचारधारा है, जो समाज में स्त्री की लिंग आधारित स्थिति, उसके अधिकारों और उनकी लैंगिक पहचान को केंद्र में रखकर विश्लेषण करती है तथा लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव को इंगित करती है। यह केवल महिलाओं के शारीरिक अधिकारों की बात नहीं करती अपितु पितृसत्तात्मक ढांचे को चुनौती देकर एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना का प्रयास है।
प्रस्तुत पुस्तक में इस प्रमुख विषय पर डॉ. सुनीता ठाकुर विस्तार से बात करती हैं , वे दर्शाती हैं की क्यों और कैसे पितृसत्ता की जड़ों को समझा जाता है कि कैसे समय के साथ महिलाओं को घरेलू दायरे तक सीमित कर दिया गया तथा उनसे मुक्ति हेतु प्रयास करे जाते हैं। यह आयाम समाज में स्त्रियों के प्रति व्याप्त रूढ़ियों विशेषकर लैंगिक आधार पर उसकी शारीरिक जरूरतों एवं स्वाभाविक इक्षाओं पर तथा परंपराओं और उन सामाजिक बंधनों पर प्रहार करता है जो स्त्री की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं। इसमें सभी प्रकार के लैंगिक भेदभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है।
आधुनिकता के इस दौर में स्त्री यौनिकता पर बात करना अथवा इन वर्जनाओं को तोड़ने का अर्थ अराजकता फैलाना अथवा बगावत नहीं है अपितु स्त्री को वस्तु से व्यक्ति के रूप में वापस लाना एवं उसे उसके मूल जैविक अधिकार पर उसके निर्णय को प्रमुखता दिलवाना है, क्यूंकी जब स्त्री अपनी यौनिकता को लेकर सहज होगी तभी वह समाज में अधिक आत्मविश्वास और गरिमा के साथ कदम रख सकेगी।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन शोषण और घरेलू हिंसा के विरुद्ध कड़े कानूनों की मांग इसी का हिस्सा है वहीं साहित्य में स्त्री का चित्रण कैसे किया जा रहा है , कैसे किया जावे अर्थात वास्तव में उसे किस स्वरूप में होना चाहिए, क्या उसे केवल एक वस्तु के रूप में दर्शाया गया अथवा वह एक स्वतंत्र इकाई है जिसे अपने बारे में विशेषकर अपने शरीर के विषय में,इक्षाओं के विषय में स्वतंत्रता पूर्वक निर्णय करने का हक मिलता है।
डॉ . सुनीता ठाकुर का यह अभिनव प्रयास स्त्री को पुरुषों के समकक्ष खड़ा करना नहीं है न ही किसी प्रतिद्वंदीत को जन्म देना ही है अपितु समाज में उसे एक स्वतंत्र, गरिमामयी और समान मनुष्य के रूप में स्थापित करना है। यह विचारण मानवता की समग्र प्रगति हेतु अत्यंत अनिवार्य है।
अतुल्य खरे



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