Vidhan Samvidhan Aur Mahilayen -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
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Pustak Samiksha : Atulya Khare
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विधान,संविधान और
महिलायें
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द्वारा: डॉ.
सुनीता ठाकुर
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विचार प्रकाशन
द्वारा प्रकाशित
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प्रथम संस्करण:
2026
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मूल्य : 300.00
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समीक्षा क्रमांक: 235
भारतीय लोकतंत्र में “विधान” और ‘संविधान”
महज़ दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि ये महिलाओं के शक्तिकरण और उनकी गरिमा की सुरक्षा के सबसे मजबूत
स्तंभ हैं। भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति, सृजन और
नेतृत्व का आधार माना गया है। महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं बल्कि विकास की
अग्रणी शक्ति के रूप में देखा जाता है।
विगत वर्षों में यह स्पष्ट हुआ है कि
जब अवसर, संसाधन
और निर्णय में भागीदारी बढ़ती है, तब महिला शक्ति हर क्षेत्र
में नए प्रतिमान स्थापित करती है एवं स्पष्टतः यह उन नीतियों का परिणाम है,
जिसमें महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को केंद्र में रखा गया है।
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम” (महिला आरक्षण
विधेयक) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें
आरक्षित करता है, जो इस बात का प्रमाण है कि अब महिलाएं
नीति-निर्माण की मुख्यधारा में सम्मिलित होंगी।
विधान,संविधान और
महिलायें डॉ. सुनीता ठाकुर द्वारा रचित एक ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसे प्रत्येक
महिला को अवश्य ही पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक का प्रकाशन विचार प्रकाशन ग्वालियर द्वारा
किया गया है।
डॉ. सुनीता ठाकुर एक
प्रख्यात नारी विचारक, महिलाओं से संबंधित विषयों की काउन्सलर तथा विशेषज्ञ हैं। वहीं
स्वतंत्र लेखन करते हुए उन्होंने आलोचना एवं विमर्श पर अनेकों पुस्तकों का सृजन
किया है, उनके चार काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके है साथ ही समय समय पर विभिन्न
प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में उनके समसामयिक विषयों पर सारगर्भित लेख एवं
साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक “विधान,संविधान
और महिलायें”, उनकी नारी संबंधित विषयओं पर गहन चिंता एवं शोध को दर्शाती है। पुस्तक
में उन्होनें स्त्री विधान को प्रमुखता देते हुए उन तमाम कानूनी प्रावधानों एवं
उपचारों का विस्तार से उल्लेख किया है जो की भारतीय नारी को उपलब्ध हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका
द्वारा महिला सुरक्षा एवं महिलाओं के अधिकार, घरेलू हिंसा एवं दहेज उत्पीड़न, यौनिक
हिंसा एवं महिला अधिकार तथा लव जेहाद, बलात्कार जैसे ज्वलंत विषयों को प्रमुखता से
स्थान दिया है। जहां एक ओर उन्होंने उपलब्ध कानूनी प्रावधानों का विवरण दिया है
वहीं हालिया स्थिति एवं मुशकिलात् का भी हवाला दिया है।
सामयिक ज्वलंत विषयों पर गंभीर
विचरण के संग उन्होंने संबंधित कानूनों को एक आम महिला की नजर से देखते हुए उसकी
आवश्यकताएं, अड़चनें तथा सीमित उपचारों पर अपने विचार रखे हैं।
भारत का संविधान नारी शक्ति को
न केवल समानता का अधिकार देता है, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानताओं को मिटाने का
मार्ग भी प्रशस्त करता है। भारतीय संविधान का दर्शन महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं,
बल्कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में देखता है।
विभिन्न अनुच्छेद यथा अनुच्छेद (14) महिलाओं की कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है। तो अनुच्छेद (15) उनसे धर्म, मूलवंश,
जाति या लिंग के
आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकता है। अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान (जैसे आरक्षण या विशेष सुविधाएं) बनाने की शक्ति देता है, वहीं अनुच्छेद 21 गरिमा
के साथ जीने का अधिकार देता है, जो महिलाओं की शारीरिक और
मानसिक स्वायत्तता की रक्षा करता है।
संविधान द्वारा
प्रदत्त अधिकारों को सुदृढ़ता प्रदान करने हेतु घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण
अधिनियम (2005), कार्यस्थल पर यौन
उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम (2013), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (संशोधन 2005), तथा मातृत्व लाभ अधिनियम आदि कानूनों ने
महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है ।
भारत में वर्तमान
में विवाह, तलाक, गोद लेने, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामले किसी एक कानून से नहीं,
बल्कि नागरिक के धर्म के आधार पर तय होते हैं। देश मे हिंदू पर्सनल लॉ, मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाई और पारसी पर्सनल लॉ विद्यमान हैं कह सकते हैं की सभी का अपना कानून
है तथा विभिन्न निजी कानूनों में महिलाओं के अधिकारों, तलाक
की शर्तों और संपत्ति के बंटवारे को लेकर काफी असमानता और विसंगतियां हैं।
भारतीय समाज में घरेलू हिंसा और दहेज
उत्पीड़न ऐसी दोहरी बुराइयां हैं जो न केवल एक महिला के
आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती हैं, बल्कि समाज के नैतिक ढांचे
को भी कमजोर करती हैं। भारत का संविधान और कानून इन कुप्रथाओं के खिलाफ कड़े
प्रावधान तो देते हैं, किन्तु वास्तविक स्थिति चिंतनीय है
घरेलू हिंसा का अर्थ
केवल शारीरिक मारपीट नहीं है।,महिला संरक्षण अधिनियम (2005) के अनुसार, इसमें शारीरिक
हिंसा, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, आर्थिक
हिंसा तथा, यौन हिंसा भी शामिल है इस
दिशा में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह अक्सर अपनों के
द्वारा की जाती है।
दहेज प्रथा, जो कभी 'उपहार' के रूप में शुरू हुई थी, आज एक हिंसक सौदेबाजी का रूप ले चुकी है। दहेज
प्रतिषेध अधिनियम (1961) और भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A (अब भारतीय न्याय संहिता के
अंतर्गत) इसे अपराध मानती हैं।
एक महिला का अपने शरीर पर
कितना अधिकार है, यह आज भी एक बड़ा मुद्दा है। गर्भपात का अधिकार, सरोगेसी
और वैवाहिक बलात्कार जैसे विषयों पर कानून और नैतिकता के बीच टकराव बना रहता है। एक प्रश्न सहज ही उभरता है की जब संविधान अनुच्छेद 21 के तहत “देह की स्वतंत्रता” देता है, फिर वैवाहिक
बलात्कार को अपराध घोषित करने में हिचकिचाहट क्यों, क्या यह संवैधानिक विरोधाभास
नहीं है?
“यौनिक हिंसा”और “महिला अधिकार” के बीच का संबंध सीधे तौर पर
मानवाधिकारों, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक गारंटी से
जुड़ा है। यौनिक हिंसा केवल एक शारीरिक अपराध नहीं है, बल्कि
यह महिला की आत्मा, गरिमा और समाज में उसकी स्वतंत्र पहचान
पर किया गया सबसे गहरा प्रहार है। जब तक कोई समाज महिलाओं को यौनिक हिंसा से
मुक्त और सुरक्षित वातावरण नहीं देता, तब तक 'महिला अधिकारों' की बात अधूरी है।
भारत सरकार ने इन समस्याओं से निपटने के लिए कई वैधानिक सुरक्षा कवच प्रदान किए हैं किन्तु वास्तविकता आज भी बहुत भिन्न नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि “गरिमा
के साथ जीने के अधिकार”(अनुच्छेद 21) मे यौनिक उत्पीड़न से मुक्ति का अधिकार
भी शामिल है। भारतीय न्याय संहिता में बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले अपराधों के
लिए कठोरतम सजा का प्रावधान है। वहीं पॉक्सो अधिनियम (POCSO
Act, 2012), नाबालिगों को यौन अपराधों से
बचाने के लिए विशेष रूप से बनाया गया कानून है
आधुनिक दौर में 'डेटिंग' युवाओं के बीच एक-दूसरे को जानने, समझने और साथी चुनने की एक सहज सामाजिक प्रक्रिया बन चुकी है। यह
व्यक्तिगत स्वायत्तता का हिस्सा है। रेप (बलात्कार) किसी भी सभ्य समाज के माथे पर
सबसे बड़ा कलंक और मानवाधिकारों का सबसे वीभत्स उल्लंघन है। भारतीय न्याय संहिता
और पॉक्सो अधिनियम के तहत बलात्कार और यौन अपराधों के लिए कठोरतम सजा का प्रावधान
है। संविधान का अनुच्छेद 21 हर
नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, जिसमें
यौनिक सुरक्षा शामिल है।
लव जिहाद विषय पर पुस्तक में विस्तार
से चर्चा की गई है। यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से राजनीतिक और
सामाजिक विमर्श में तब किया जाता है, जब यह आरोप लगाया जाता है कि किसी महिला को
बहला-फुसलाकर, डरा-धमकाकर या पहचान छिपाकर शादी की गई और फिर
उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया। ।
वहीं लिव इन भी एक बढ़ती हुई सामाजिक
मुश्किल है, बिना विवाह किए दो वयस्कों का एक साथ पति-पत्नी की तरह रहना 'लिव-इन रिलेशनशिप'
कहलाता है। यह पारंपरिक विवाह संस्था के विकल्प के रूप में उभर रहा
है जो कानूनी तौर पटर मान्य है इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के
तहत जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा माना गया है किन्तु सामाजिक दृष्टिकोण इसे
स्वीकार नहीं करते। हालांकि कुछ राज्य लिव इन का पंजीकरण अनिवार्य करवा रहे हैं
सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 भारत में “व्यावसायिक
सरोगेसी’ को प्रतिबंधित करते हुए केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है। वहीं , समलैंगिकता का मुद्दा पहचान, प्रेम और नागरिक अधिकारों की समानता से जुड़ा है तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा
दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को भी कानूनी मान्यता प्राप्त
है, किन्तु समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता न मिलना अभी भी एक बड़ा कानूनी संघर्ष
है।
महिला अधिकारों की दिशा
में हमने कानूनी रूप से लंबी दूरी तय की है, लेकिन जब हम
धरातल पर उतरते हैं, तो कई ऐसे अनुत्तरित सवाल और अनसुलझे
मुद्दे सामने आते हैं जो हमारी सामाजिक प्रगति पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
डॉ. सुनीता ठाकुर ने नारी शक्ति को जागरूक करने
के उद्देश्य से यह अभिनव प्रयास किया है जो अत्यंत सरल भाषा में महिलाओं से
संबंधित तमाम कानूनों एवं संबंधित कानूनी पहलुओं पर सूक्ष्मता से विश्लेषण विस्तृत
जानकारी एवं समाधान प्रस्तुत करता है।
सम्पूर्ण पुस्तक, उसका प्रत्येक खंड नारी जागृति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है किन्तु उसमें भी समीक्षार्थ, ऐसे चंद विशेष खंड अथवा अध्याय, जो विशेष रूप से आम नारी के रोजमर्रा की ज़िंदगी में उभर कर सामने आते हैं मात्र उन्हें ही उल्लिखित किया है। विषय विस्तार के दृष्टिगत एक छोटी पुस्तक में सब कुछ समेटने का अद्भुत एवं प्रशांशनीय कार्य सुनीता जी ने किया है एवम समग्रता में यह पुस्तक अवश्य ही एक बेहतरीन संदर्भ ग्रंथ के रूप में कार्य करेगी।
अतुल्य खरे
Pustak Samiksha : Atulya Khare





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