Stalemate -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
Pustak Samiksha : Atulya Khare
समीक्षित पुस्तक : स्टेलमेट
द्वारा : दीपक गिरकर
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित
प्रथम प्रकाशन : 2026
मूल्य : 299/-
समीक्षा क्रमांक : 245
बहुमुखी प्रतिभा के धनी, शांत एवं सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी वरिष्ठ समीक्षक एवं साहित्यकार श्री दीपक गिरकर ने अमूमन हिन्दी साहित्य की समस्त विधाओं को अपने श्रेष्ट सृजन द्वारा समृद्ध किया है। उनके लेखन हेतु विषय कभी भी बंधन नहीं रहे, ऐसा प्रत्येक विषय जो कहीं न कहीं उनके मन को विचलित कर गया उस पर उनके भाव शब्द रूप में अभिव्यक्त होकर हमारे सामने आ गए।
प्रस्तुत उपन्यास “स्टेलमेट” का शीर्षक प्रथम दृष्ट्या चौँकाता अवश्य है किन्तु मात्र समान भाव के, यह कहीं भी शतरंज के खेल से संबद्ध नहीं है। यह कहानी है जीवन की बिसात पर चलते हुए मोहरों की, जिंदगी की उस अवस्था की, जिसे शतरंज की भाषा मे स्टेलमेट कह लें या फिर रोज मर्रा की ज़िंदगी में किंकर्तव्य विमूढ़ता या फिर गतिरोध, जीवन की उसी विशेष अवस्था को वरिष्ठ लेखक द्वारा शतरंज के खेल की विशेष स्थिति से जोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। जीवन में किसी इंसान के समक्ष बाज दफ़े ऐसे हालात् बन जाते हैं, परिस्थितियाँ कुछ ऐसे विकट रूप में सामने आ खड़ी होती हैं जब वह ऐसी अवस्था में होता है जहां वह न तो हारता है न ही जीतता है बस क्या करू कहाँ जाऊ, कुछ ऐसे ही विचारों के झंझावात में झूलता रहता है।
कथानक का ताना बाना नारी विमर्श केंद्रित होते हुए मूलतः नारी शिक्षा, प्रेम विवाह, महिला सशक्तिकरण, जातिभेद , व्यक्तिगत स्टेटस, दिव्यांग बच्चों के प्रति हमारे नजरिए, राजनीति के दांव पेंच, लाचार न्याय व्यवस्था, धर्म के नाम पर पनपते अधर्म और पाखंड तथा लोग क्या कहेंगे जैसे तमाम विषयों के इर्द गिर्द बुना गया है।
कथानक यूं तो तीन भागों में सहजता से विभाजित किया जा सकता है, जो आपस में सहज संबद्द होते हुए आपस में गहनता से गूँथे हुए हैं, जिसका प्रथम भाग एक फ्लैश बैक स्टोरी भी कहा जा सकता है जहां कथा नायिका जेल की कोठरी में अपने पिछले जीवन पर दृष्टिपात करती है और उसके जीवन के कहे अनकहे किस्से हमारे सामने पन्नों के रूप में खुलते चले जाते हैं।
लेखक द्वारा सहज भाव से बिना किसी विशिष्ठ अलंकृत एवं विशेषणात्मक भाषा के प्रयोग के, जिस तरह से कथानायिका के मुख से उसकी जीवन यात्रा पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करी गई है वह पाठक को कथानक से सहज ही संबद्द कर देती है। कहानी में प्रेम, जीवन का संघर्ष, मातृत्व और राजनीति है, तो वहीं पति द्वारा विश्वासघात और फिर न्याय की तलाश है।
उसके जीवन के प्रारम्भिक कालेज के दिन, प्रेम कहानी और नए जीवन की शुरुआत को इस तरह से बयान किया गया है की पाठक सहजता से अनुभव करता है। कथा नायिका एक शिक्षित एवं आत्मनिर्भर युवती है, वहीं उसका प्रेमी विजातीय श्रीनिवासन है। वहीं दोनों के पारिवारिक स्तर में भी बहुत अंतर है। कथानयिका का दृढ़निश्चयी स्वभाव यहीं उभर आता है जहां वह रूढ़ियों से बंधे परिवारों तथा आर्थिक एवं सामाजिक स्तर में अंतर जैसे मुद्दों पर अटल रहते हुए, चुनौती स्वीकार करती है तथा परिवार के विरोध के बावजूद इस प्रेमी युगल की जीत होती है एवं विवाह कर वे एक संग जीवन के सफर पर आगे बढ़ते हैं जहां उसे अपने परिवार द्वारा तो नहीं किन्तु अपने पति के परिवार द्वारा ससम्मान स्वीकार किया जाता है।
लेखक द्वारा कथानक को अत्यंत व्यवस्थित रखते हुए आगे बढ़ाया गया है इस प्रेम विवाह के पश्चात, जब की कथानायिका पूर्णतः अपने पति के दक्षिण भारतीय पंडित परिवार में घुल मिल चुकी है उनके जीवन के खुशनुमा पल और बढ़ते हैं जब उनका पहला बेटा जन्म लेता है।
कथानक के अगले खंड में लेखक ने कथानायिका माधवी के जीवन के संघर्षों के दौर को अत्यंत संवेदनशीलता के संग भावनात्मक किन्तु तार्किक रहते हुए विस्तार से दर्शाया है, किन्तु भावनात्मक अतिरेक से पूर्णतः बचे हैं।
संघर्षों का प्रारंभ वहाँ है जहां उसका अगला बच्चा जन्म लेता है, जो की एक बेटी है, मूक बधिर है, यहाँ से हमें उसके संघर्ष, आत्मबल, और अपने हक के लिए खड़ी रहने वाली एक दृढ़ निश्चयी महिला के गुणों का परिचय मिलता है।
सामान्यतः ऐसी अवस्था में माता पिता की असहायता, करुणा से परिपूर्ण दृश्य तथा मज़बूरि याँ दर्शा कर पाठकीय सहानुभूति को पात्रों से संबद्ध करने का प्रयास देखा जाता है किन्तु प्रबुद्ध पाठकों के विचारों को समझते हुए वरिष्ट लेखक ने बच्ची को दया का पात्र न बनाकर उसे समान शिक्षा एवं श्रेष्ट संस्कार दिए। उसे शतरंज जैसे खेल में विश्वस्तर की खिलाड़ी बनाने के कथानायिका का संकल्प, प्रयास एवं पश्चातवर्ती सफलताएं निश्चय ही सकारात्मक संदेश हैं।
कथा नयिका ने तो मानो अपना सम्पूर्ण जीवन ही उस बच्ची के लिए न्योछावर कर दिया। आगे जाकर हम देखते हैं की वह अपना कैरियर, बेटी के कैरियर के लिए छोड़ देती है। लेखक द्वारा इस प्रेरणादायक प्रसंग से बेहद सरलता से यह साबित कर दिया गया है की दृढ़ निश्चय के द्वारा कठिन से कठिन मंजिल भी पाई जा सकती है।
कथानायिका के अथक प्रयासों के फलस्वरूप यह बालिका एक एक पायदान चढ़ते हुए शतरंज की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बन जाती है।
कथानायिका के जीवन का एक खंड उसके राजनैतिक जीवन से भी जुड़ा हुआ है जहां वह शिक्षा मंत्री भी बन जाती है किन्तु यह खंड राजनैतिक शुचिता, कर्तव्यपरायणता ईमानदारी एवं जनता के प्रति उत्तरदायित्व जैसे बिंदुओं पर केंद्रित रहते हुए भी पाठक से अधिक संबद्द नहीं हो सका एवं मूल खंड में अलग से जोड़ा हुआ तथा बहुत हद तक अनावश्यक एवं विषयांतर प्रतीत होता है।
सत्ता परिवर्तन के पश्चात राजनीतिक जीवन त्याग कर नायिका द्वारा पुनः अपने परिवार हेतु समर्पण दर्शाया गया है। जीवन के उन वर्षों में जब बेटे के विवाह पश्चात परिवार में नव जीवन के आगमन के संग अच्छा समय आता प्रतीत होता है वह अपने पति जिस पर उसने अपने जीवन का बहुमूल्य समय समर्पित किया था की बेबफ़ायी का शिकार होती है।
कथानक का तृतीय भाग वास्तविक घटनाओं पर आधारित समाज में नैतिक पतन की तस्वीर दर्शाता मार्मिक और हृदयविदारक प्रसंग है जिसमे उस मूक बधिर शतरंज की प्रतिभाशाली खिलाड़ी, कथा नायिका की बेटी, के संग एक प्रतिष्ठित धर्मगुरु द्वारा दुष्कर्म पश्चात हत्या को विस्तार से अंकित किया गया है।
कथानायिका के जीवन में यह क्षण निर्णायक एवं आमूलचूल परिवर्तन लाता है और उसकी खुशहाल जिंदगी की कहानी अब अपराध , कोर्ट कचहरी और पुलिस थानों के चक्कर की कहानी बन जाती है।
कथानक का अंत न्याय व्यवस्था की असफलता एवं सिस्टम में व्याप्त कमजोरियों को बखूबी दर्शाता है।
कथानक में शतरंज तथा संबंधित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विषय में बहुत ज्यादा विस्तार से दी गई जानकारी लेखक का इस क्षेत्र में महारथ दर्शाते हैं, फिर बात चाहे खेल की चालों की हो या फिर मानसिक अनुशासन और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों तथा विभिन्न स्तरीय प्रतियोगिताओं की।
कथानक
का अंत कहीं ना कहीं व्यक्ति
की हताशा एवं सिस्टम पर अविश्वास
को दर्शाता है।
जहां
उसके निर्णय दिमाग की अपेक्षा
दिल से अधिक लिए जाते हैं।
नारी विमर्श केंद्रित दीपक
जी की यह कृति नारी जीवन में
उत्पन्न विभिन्न विषम
परिस्थितियों,उसकी
व्यक्तिगत समस्याओं एवं उस
अवस्था में नारी मन की अंतर्दशा
को बखूबी चित्रित करते हुए
आज की सामाजिक,
धार्मिक,
राजनीतिक
और न्यायिक विसंगतियों पर कम
शब्दों में ही बहुत कुछ कह
जाती है।
अतुल्य खरे

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