KAHE KE ANNDATA -- PUSTAK SAMIKSHA :ATULYA KHARE
- Pustak Samiksha : Atulya Khare
- समीक्षित पुस्तक : काहे के अन्नदाता
- विधा : उपन्यास
- द्वारा: मधुर कुलश्रेष्ठ
- विचार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
- प्रथम संस्करण: 2025
- मूल्य : 225.00
- समीक्षा क्रमांक : 242
हम और आप चाहे दिल को लाख वास्तविकताओं एवं हकीकतों से दूर देखने हेतु विवश कर दें , सब कुदरत का खेल और हमारे हाथ में क्या ही है कह कर व्यवस्था का दोष बताते हुए अपना दामन पाक साफ रखने की कितनी भी कोशिश क्यूँ न कर लें, लेकिन उस आक्रोश, दर्द, पीढ़ा और उस कड़वी सच्चाई को झुठला नहीं सकते।
ऐसे में यह सवाल उठना बिल्कुल लाजिमी है कि अरे ये कैसे अन्नदाता और “काहे के अन्नदाता”, इसी पीढ़ा को एक कथानक के माध्यम से प्रस्तुत किया है प्रख्यात साहित्यकार, समालोचक एवं पूर्व बैंकर मधुर कुलश्रेष्ठ जी ने अपने उपन्यास “काहे के अन्नदाता” में, जिसे “विचार प्रकाशन” ने प्रकाशित किया है। कुलश्रेष्ठ जी ने अपने बैंकिंग कैरियर के दौरान किसानों की मुश्किलात् को काफी नजदीक से देखा और समझा, तथा कहीं न कहीं वे सारे तजुर्बे, वह सारा दर्द इस उपन्यास में कथानक के पात्रों के माध्यम से छलक उठा है।
कथानक आंचलिक गाँव के किसानों की समस्याओं पर आधारित है अतः समस्याओं के संग ही कथानक में मोड आते हैं, या फिर कहना बेहतर होगा की उनकी सभी समस्याओं को एक स्थान पर एक ही कथानक के माध्यम से दर्शाने का अत्यंत प्रभावी एवं रोचक कदम है। जहा कथानक पात्रों के परस्पर संवाद से आगे बढ़ते है वहीं वाक्यांशों को स्थानीय बोली में लिखने से सम्पूर्ण कथानक को जीवंतता प्राप्त हुई है। पाठक का पात्र संग जुड़ाव एवं लगाव दोनों ही शीघ्र बनता है और बना रहता है।
उपन्यास में कथानक रूप में उन्होनें किसानों की अमूमन प्रत्येक समस्या को रेखांकित किया है। उन्हीं समस्याओं को कथानक से इतर, मात्र समस्या के रूप में समझने का प्रयास करते हैं क्यूंकि लेखक का मूल उद्देश्य भी उन समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ठ करना ही है, जिनसे हमारे किसान ताजिंदगी जूझते हुए थक हार कर सब नियति के हवाले कर स्वयं जिंदगी को अलविदा कह रहे हैं।
हमारे किसानों के जीवन की चंद कड़वी हकीकतों के पन्नों को परत-दर-परत खोलकर समझते हैं कि इस तथाकथित “अन्नदाता” की असल जिंदगी किन मुश्किलों के भंवर में फंसी हुई है।
किसान की प्रकृति पर निर्भरता, या कहें किसान और प्रकृति का साथ जीवन एवं प्राणवायु से भी बढ़ कर है जिसे अलग कर के नहीं देखा जा सकता। उसी प्रकृति की दोहरी मार झेलते हुए कभी बारिश का वह मौसम जो एक आम इंसान के लिए खुशनुमा हो सकता है किसान के लिए कहर बन कर टूटता है तो अतिवृष्टि और ओलावृष्टि भी उसकी फसल ही नहीं उसके सपनों को भी मिट्टी में मिला देते हैं। इसके उलट, सूखा उसकी महीनों की मेहनत और खून-पसीने की कमाई से बोई गई फसल को तबाह कर देता है, पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसकर, बेबस आंखों के सामने फसल को दम तोड़ते देखना ऐसा दर्द है जिसे मात्र भुक्तभोगी ही अनुभव कर सकता है।
वहीं कृषि कार्य से जुड़े विभिन्न खर्च, एक आम किसान को कर्ज लेने हेतु विवश कर देते हैं। खेती अब इतनी महंगी हो चुकी है कि बीज, खाद, कीटनाशक और डीजल के लिए किसान या तो स्थानीय दबंगों, साहूकारों से भारी ब्याज पर पैसा लेता है जो कर्ज पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है और अंततः किसान को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर देता है, या फिर यदि थोड़ा समझदार है और इन साहूकारों के जाल से बच जाता है तो, बैंक से कर्ज ले लेता है, परंतु कर्ज के अंतहीन दलदल और बैंक की वसूली की गिरफ्त में न चाहते हुए भी आ ही जाता है। बैंक के नोटिस, बैंक कर्मचारी और रिकवरी एजेंट का घर पहुचना बाज दफे किसान के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हुए उसकी आत्महत्या का कारण भी बनते हैं।
हमारे इन्हीं तथाकथित अन्नदाताओं के सम्मुख एक और बड़ी समस्या जो की सामाजिक है वह है जातिवाद, ग्रामीण इलाकों में आज भी जातिवाद और दबंगों का बाहुबल समीकरण हावी है। नीची जाति के छोटे और सीमांत किसानों को अक्सर स्थानीय दबंगों के गुस्से और शोषण का सामना करना पड़ता है। कई बार दबंगों द्वारा इन छोटे गरीब किसानों की जमीनों पर अवैध कब्जे कर लिए जाते हैं। और अक्सर पानी के बंटवारे या खेत की मेड़ जैसे मसलों को लेकर होने वाले छोटे-मोटे विवादों में भी दबंग अपनी ताकत के बल पर किसानों को दबा देते हैं, ये मामले या तो उस की जमीन या फिर उसकी जान लेकर ही शांत होते हैं।
कथानक में , आजकल तेजी से बढ़ रही ऑनर किलिंग की समस्या को भी रखा गया है जहां गाँव के ही बड़े सेठ का बेटा गाँव के गरीब पंडित की कन्या के इश्क में पड़ता है, इसी प्रेम को समस्या का केंद्र व लोगों की आँखों की किरकिरी बनाया गया है।
रकबे का बँटवारा भी किसान की घटती ताकत की एक बड़ी वजह है। भूमि का, विशेष तौर पर कृषि भूमि का लगातार बंटवारा हो रहा है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते-जाते जमीन के टुकड़े इतने छोटे हो जाते हैं कि उन पर आधुनिक तरीके से खेती करना या उससे पूरे परिवार का पेट पालना असंभव हो जाता है परिणामस्वरूप खेती घाटे का सौदा बन जाती है।
कथानक में भाई की जमीन मिल जावे इस भावना से भाई की मौत तक की कामना करते हुए भी दर्शाया गया है, तो भाई की मौत पर प्राप्त मुआवजा की रकम से भी बढ़कर प्रसन्नता उस की जमीन का टुकड़ा मिल जाने की है। मानव मात्र में इंसानियत मूल्यों की गिरावट पर विचरण अब बेमानी हो गया है , यह और ऐसे ही अन्य आदर्श वाक्य अब मात्र पुस्तकों की शोभा हेतु ही रह गए हैं।
कभी जमीन के बंटवारे को लेकर चलते कोर्ट कचहरी के चक्कर, तो कभी आपसी दुश्मनी के कारण छोटे मोटे विवादों हालते वकीलों के चक्कर, या फिर यूं ही किसी झूठे केस में पुलिस द्वारा उलझाए गए, अनपढ़, ये किसान, वकीलों की फीस भरते हुए, तारीखों पर कचहरी के चक्कर काटते हुए या फिर थाने के चक्कर लगाते-लगाते अपनी बची-कुची पूंजी भी लूट देते हैं तथा वह न्याय पाने की आस में पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। न्याय के नाम पर उसके साथ होता यह अन्याय किसी की नजर में ही नहीं आता।
वैसे इन तमाम मुश्किलों के पीछे एक बड़ा कारण अशिक्षा भी है जो बाकी सभी समस्याओं को और ज्यादा गंभीर बना देता है। अशिक्षा जहां एक ओर शोषण और लाचारी की सबसे बड़ी जड़ है। सरकारी योजनाओं की जानकारी न होने से उनका लाभ न ले पाना तथा आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी का खेती हेतु प्रयोग न कर पाना भी उसके ही प्रभाव हैं।
जमीन में गिरता भू जल स्तर, मौसम का बदलता मिजाज, अप्रत्याशित जलवायु परिवर्तन, तापमान में भारी उतार-चढ़ाव और सिंचाई हेतु बिजली की अनुपलब्धता ऐसे कारण हैं जो किसान को संभालने का मौका दिए वगैर वार करते हैं जबकि खराब अथवा सीमित भंडारण व्यवस्था भी किसान की मुश्किल से हुई उपज की बर्बादी करती है और परिणामस्वरूप किसान की अनथक मेहनत द्वारा उपजी फसल सुरक्षित रखने की व्यवस्था न होने के चलते बर्बाद हो जाती है और वह उसे अत्यंत काम दाम में बिचौलियों को बेचने हेतु विवश हो जाता है।
कथानक के माध्यम से एक और विषय जिसे लेखक ने प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष रखा है वह है किसानों हेतु स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव तथा आपातकालीन सेवाओं की अनुपलब्धता जो कभी परिवार के मुखिया तो कभी किसी सदस्य को मरणासन्न अवस्था में भी उपलब्ध नहीं हो पाती एवं उसके गंभीर दु:खदायी परिणाम सामने आते हैं।
एक किसान सिर्फ खेत में मौसम से नहीं लड़ता, वह अपने ही गांव की सत्ता, भ्रष्ट तंत्र और सामाजिक कुरीतियों के चौतरफा चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। देश में पंचायती राज और स्थानीय चुनाव ने गांवों को गुटबाजी और दुश्मनी का अखाड़ा बना दिया है, जिसमें सत्ताधारी व्यक्ति के समर्थकों एवं चाटुकारों को ही सुविधाओं का लाभ एवं हर किस्म के अनाचार से सुरक्षा शामिल है। चुनावी रंजिश और बदले की भावना के चलते हत्याएं भी हो जाना आम बात हो गई है।
कागजों पर सरकारें करोड़ों-अरबों की सब्सिडी का दावा करती हैं, लेकिन जब जमीन पर किसान को जरूरत होती है, तो सरकारी तंत्र पूरी तरह फेल साबित होता है। वहाँ हमें शासन की विफलता स्पष्ट दिखती है। शासन व्यवस्था न तो क भी व्यवस्थित बन पाती है न ही खाद इत्यादि की कालाबाजारी रोक पाती है। घटिया और नकली बीज-कीटनाशक बेचने वाली कंपनियों पर शासन का कोई नियंत्रण नहीं है, जिससे पूरी फसल ही बर्बाद हो जाती है तथा कई बार किसान भी अपनी जान से हाँथ धो बैठता है। इस मुद्दे को भी लेखक द्वारा कथानक में प्रमुखता से उठाया गया है। ।
आखिर में येन केन प्रकारेण किसान अपनी पूरी पूंजि, कर्ज, और खून-पसीना लगाकर किसी प्रकार फसल तैयार कर ही लेता है, तब बाजार में उसे अपनी लागत का दसवां हिस्सा भी नहीं मिलता, जो उसका पूर्णतः नाश कर देता है। उसका सब्र टूट जाता है और वह फसल को या तो आग लगा देता है अथवा सड़क पर ही फेंक देता है क्यूंकि उस कीमत पर तो उसकी मूलभूत खर्चे भी नहीं निकल पाते। फसल को मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी नहीं निकाल पाता और अंत में यही सब कारण जैसे लागत भी वसूल न हो पाना, बैंक और साहूकार का रोज दरवाजे पर खड़े होकर सारे समाज के सामने जलील करना उसे मजबूर करते हैं और वह “अन्नदाता” जहरीली दवा पीकर या फांसी के फंदे पर लटककर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। वास्तव में इसे आत्महत्या नहीं, बल्कि “संस्थागत हत्या” कहा जाना चाहिए।
एक अन्य विषय जिसे लेखक ने प्रमुखता से उठाया है वह है ग्रामीण इलाकों में कानून-व्यवस्था की स्थिति, जो की आम तौर पर अत्यंत लचर होती है और उसका सीधा असर किसान के परिवार और उसके मानसिक सुकून पर पड़ता है। गावों में हाई स्कूल या कॉलेज दूर-दराज के कस्बों में होते हैं। रास्ते में होने वाली छेड़खानी और सुरक्षा के अभाव के कारण कई किसान अपनी होनहार बेटियों की पढ़ाई बीच में ही छुड़ा देते हैं इस समस्या पर लेखक ने कथानक में अत्यंत रोचकता के संग ध्यानाकृष्ट किया है। यह लेखक की शैली की विशिष्टता ही है कि किसानों की समस्याएं इस प्रकार से कथानक में पिरो दी गई हैं की वे कहीं भी कथानक को बोझिल नहीं बनने देती।
जब किसान रात-रात भर अपने खेतों में पानी लगाने या फसल की रखवाली करने जाता है, तो घर पर उसकी पत्नी और जवान बेटियां अकेली होती हैं। गांव के, दबंग और मनचलो का खौफ हमेशा बना रहता है। बेटी की आबरू पर मंडराता खतरा किसान को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। इस विषय को लेखक ने कथानक में विशेष तौर से दर्शाया है जो इस समस्या की प्रमुखता को स्वतः ही इंगित करता है।
किसान की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि संकट के समय उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं होता। वह अपनी शिकायतें लेकर दर-दर भटकता है। फसल बीमा का पैसा पाना हो, मुआवजे की मांग करनी हो या बिजली-पानी की शिकायत करनी हो, दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते किसान के चप्पल घिस जाते हैं। बिना रिश्वत दिए पटवारी से लेकर तहसील के बड़े अधिकारियों तक उसकी कहीं सुनवाई नहीं होती।
जिस दिन इस देश का किसान मजबूरी में अपनी फसल जलाना बंद कर देगा, जिस दिन कर्ज के डर से किसी घर का चूल्हा बुझना बंद हो जाएगा, और जिस दिन एक किसान का बेटा गर्व से कहेगा कि "मैं भी अपने पिता की तरह खेती ही करना चाहता हूँ" केवल उसी दिन हम सच्चे अर्थों में उसे 'अन्नदाता' कहने के अधिकारी होंगे। तब तक, यह शब्द सिर्फ हमारी सामूहिक विफलता को छिपाने का एक आवरण मात्र बना हुआ है। काहे के अन्नदाता, सिर्फ एक आक्रोश नहीं है, बल्कि यह इस देश की अंतरात्मा पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है।
“अन्नदाता” शब्द सिर्फ एक राजनीतिक ढाल है। जब भी सरकारों को अपनी पीठ थपथपानी होती है, वे इस शब्द का इस्तेमाल करती हैं। सच तो यह है कि हमने उसे “अन्नदाता” की पदवी देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। जब तक किसान को उसकी फसल का सही दाम, कर्ज से मुक्ति, कानूनी सुरक्षा और समाज में वास्तविक सम्मान नहीं मिलता, तब तक उसे "अन्नदाता" कहना सिर्फ खोखली नारेबाजी है।
वह आज भी व्यवस्था की चक्की में पिस रहा एक लाचार मजदूर ही है। वह प्रकृति से हारता है, तो सरकार उसे अपनी फाइलों में उलझा देती है। वह बाजार से हारता है, तो समाज उसे आत्महत्या की तरफ धकेल देता है। वह व्यवस्था से न्याय मांगता है, तो स्थानीय गुंडे और भ्रष्ट तंत्र उसकी आवाज दबा देते हैं।
जब हम इन सभी कड़ियों को एक साथ जोड़कर देखते हैं, तो एक भयावह तस्वीर उभरती है। एक ऐसा इंसान जो देश की पूरी आबादी का पेट भरने के लिए खुद को झोंक देता है, उसे हम “अन्नदाता” जैसा महान शब्द तो दे देते हैं, लेकिन बदले में उसे एक सुगम सड़क, एक ईमानदार अधिकारी, एक पारदर्शी मंडी और एक अंधविश्वास-मुक्त समाज तक नहीं दे पाते। वह भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के आगे घुटने टेकता है और अंत में, मंडी के बिचौलियों और साहूकारों की भेंट चढ़ जाता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि "अन्नदाता" शब्द आज के समय में भारत के सबसे शोषित, लाचार और उपेक्षित वर्ग के ऊपर थपा हुआ एक ऐसा तमगा है, जिसका हकीकत की जमीन से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। वह अन्नदाता नहीं, बल्कि इस पूरी आधुनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बलि का बकरा है।
वास्तव में, यह समस्याओं का एक ऐसा अंतहीन और आत्मघाती चक्रव्यूह है, जहां किसान जहां से अपनी यात्रा शुरू करता है, घूम-फिरकर वहीं आकर दम तोड़ देता है। वह प्रकृति की बेरुखी से बचता है तो व्यवस्था की बलि चढ़ जाता है; व्यवस्था से किसी तरह बचता है तो सामाजिक कुप्रथाओं और अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ लिया जाता है।
वरिष्ठ तजुर्बेकार लेखक मधुर कुलश्रेष्ठ जी ने जिस विस्तार एवं सूक्ष्मता से किसानों की समस्याओं को अपने कथानक में पिरोया है, निश्चय ही सराहनीय है। जहां एक ओर पुस्तक का अधिकांश भाग क्षेत्रीय बोली में होने से पाठक पात्र के साथ जुड़कर नजदीकी महसूस कर पाते हैं वहीं उन से संबंधित समस्याओं का चित्रण भी उसके वास्तविक रूप में लक्षित हुआ है।
अतुल्य खरे
pustak Samiksha Atulya Khare




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