Yogi Kathnamrat -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
- Pustak Samiksha : Atulya Khare
- समीक्षित पुस्तक : योगी कथनामृत
- द्वारा: श्री श्री परमहंस योगानन्द
- संकलन एवं संपादन : एम. आई. राजस्वी
- VETERAN PUBLISHING HOUSE द्वारा प्रकाशित
- प्रथम संस्करण : 2025
- मूल्य : 299.00
- पुस्तक प्रस्तुति क्रमांक: 223
"संसार को यह मत बताओ कि तुम कितने अच्छे हो; बल्कि
यह कर के दिखाओ कि तुम कितने अच्छे हो।"
“शिक्षा केवल बौद्धिक नहीं होनी चाहिए बल्कि
शरीर, और मन के समग्र विकास पर केंद्रित होनी चाहिए”।
आज से शताब्दी पूर्व ऐसे प्रगतिशील विचारों के
संग 1917 में योगदा सत्संग विद्यालय की स्थापना करने वाले और “एक योगी की आत्मकथा”
जैसी महान प्रेरणादायी पुस्तक के रचयिता, महान योगी परमहंस योगानन्द के द्वारा दिए
गए महत्वपूर्ण प्रवचनों का संकलन है प्रस्तुत पुस्तक “योगी कथनामृत”, जिसे इस रूप में प्रस्तुत करने में वरिष्ठ साहित्यकार, संकलनकर्ता तथा संपादक
एम. आई. राजस्वी जी, प्रकाशक VETERAN PUBLISHING HOUSE तथा VPH
के निदेशक समीर जी के अथक प्रयास सराहनीय हैं। यह पुस्तक मात्र पवित्र
वचनों का शाब्दिक संग्रह नहीं है,अपितु यह तो एक दिव्य आमंत्रण
है उस भव्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करने हेतु जहां से हमें अपने भीतर की दिव्य शक्ति
को पहचानने और उस परम सत्य से जुड़ने के प्रयास करने का मार्ग प्राप्त होगा।
परमहंस
योगानंद, आधुनिक काल के उन महान भारतीय गुरुओं में से हैं,
जिन्होंने योग और क्रिया योग के प्राचीन विज्ञान को पश्चिमी देशों
तक पहुँचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जन्म 1893 में गोरखपुर के एक
प्रतिष्ठित, सम्पन्न बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मुकुंद लाल घोष था एवं स्वामी युक्तेश्वर गिरि उनके आध्यात्मिक गुरु थे, स्वामी युक्तेश्वर गिरि
स्वयं लाहिढ़ि महाशय के शिष्य थे एवं लाहिढ़ि महाशय महावतार बाबाजी के शिष्य थे।
महावतार बाबाजी को एक अमर गुरु माना जाता है, उन्होंने सदियों
पहले लुप्त हो चुके “क्रिया योग” को पुनर्जीवित करने का दायित्व लाहिरी महाशय को
सौंपा था। सौभाग्यवश ही मुकुंद क्रिया योग की प्राचीन परंपरा से जुड गए एवं आगे
जाकर इसके महान प्रवर्तक बने।
योगानंदजी के जीवन का सबसे दिव्य पक्ष एवं सुखद संयोग उनका महावतार बाबाजी से मेल है।
योगानंदजी की प्रतिभा एवं मुखरता के दृष्टिगत ही उन्हे विशेष रूप से चुना गया था
ताकि वे क्रिया योग की विद्या को भारत की सीमाओं से बाहर ले जाकर सम्पूर्ण विश्व
को इस विद्या से परिचित करवाएं एवं "ईश्वर के साथ सीधे संचार" की
वैज्ञानिक विधि सिखा सकें। उन्होंने इस जिम्मेवारी को बखूबी अंजाम दिया तथा देश
में वापसी पर उन्होंने महात्मा गांधी को भी “क्रिया योग” की दीक्षा दी। क्रिया योग
जो की एक उन्नत प्राणायाम तकनीक है जो व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति को तेज करती
है और मन को शांत कर ईश्वर से जोड़ती है, को पुनर्जीवित एवं प्रचारित किया।
योगानंदजी ने केवल कठिन योग नहीं सिखाया, बल्कि
आधुनिक जीवन जीने वाले लोगों के लिए योग को सरल और वैज्ञानिक बनाया। उन्होंने दो
प्रमुख तकनीकें दीं थीं पहली ऊर्जीकरण व्यायाम जिसमें
इच्छाशक्ति के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा को शरीर के विशेष केंद्रों में
प्रवाहित करना सिखाया जाता है एवं दूसरी हॉन्ग-सॉ तकनीक जो एकाग्रता
बढ़ाने की एक अद्भुत विधि है तथा श्वास के माध्यम से मन को पूरी तरह स्थिर कर देती
है।
उनका संदेश था की सभी धर्मों का मूल एक ही है, साथ ही उन्होंने स्व-बोध पर बल दिया और हिंदू धर्म व ईसाई धर्म की मूल शिक्षाओं में सामंजस्य स्थापित किया। वे योग को, आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विज्ञान मानते थे जिसका अभ्यास करके कोई भी शांति और आनंद प्राप्त कर सकता है। उनका मानना था कि सत्य किसी एक धर्म की पुश्तैनी जागीर नहीं है। उन्होंने बाइबिल और भगवद्गीता के गूढ़ अर्थों की व्याख्या की, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि कृष्ण और ईसा मसीह के संदेशों में कोई अंतर नहीं है। वे अक्सर कहते थे, "ईश्वर कोई शुष्क सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि वे प्रेम और परम आनंद का स्वरूप हैं।"
परमहंस योगानंद द्वारा लिखित “एक योगी की आत्मकथा” विश्व की सर्वाधिक प्रभावशाली
आध्यात्मिक कृतियों में से एक मानी जाती है, जिसने लाखों लोगों को योग की ओर
आकर्षित एवं प्रभावित किया क्यूंकि यह पुस्तक केवल एक संस्मरण नहीं अपितु योग और
चेतना के विस्तार की गहन व्याख्या है। यह केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि इसे दुनिया भर के लाखों लोगों के लिए आध्यात्मिक प्रवेश द्वार माना
जाता है। 1946 में पहली बार प्रकाशित हुई यह पुस्तक आज भी
उतनी ही प्रासंगिक है जितनी वह दशकों पहले थी। पुस्तक का मुख्य विषय क्रिया योग का
विज्ञान है एवं इस विषय में योगानंदजी ने विस्तार से बताया है कि योग केवल शारीरिक
व्यायाम नहीं है, बल्कि यह प्राणों को नियंत्रित करने का एक
निश्चित और वैज्ञानिक तरीका है।
आत्मकथाएं अक्सर संबंधित महापुरुष के जीवन की मुख्य घटनाओं तक ही सीमित होती
हैं किन्तु योगानंदजी ने इसमें योग के विज्ञान को इतनी तार्किकता से समझाया है कि
आधुनिक वैज्ञानिक भी उससे जुड़ाव महसूस करता है।साथ ही इस पुस्तक के दूसरे भाग में भारत
के उन महान संतों के बारे में लिखा गया है जो पर्दे के पीछे रहकर मानवता का
मार्गदर्शन कर रहे थे यथा उनके गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरी के गुरु श्री महावतार बाबाजी जिन्होंने क्रिया योग को पुनर्जीवित किया, स्वामी युक्तेश्वर गिरि एवं अन्य संत प्रमुखतः आनंदमयी माँ, “गंध बाबा”, गिरिबाला देवी (नींद न लेने वाली महिला) और रमण महर्षि आदि। हाल फिलहाल तक
यह पुस्तक दुनिया की 50 से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुकी
है।
“एक योगी की आत्मकथा” के अलावा, उनकी कुछ अन्य कालजयी रचनाएँ यथा God
Talks With Arjuna, जहां उन्होंने
भगवद्गीता के हर श्लोक की मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्याख्या की है तो The Second Coming of Christ
में वे ईसा मसीह की शिक्षाओं को योग की दृष्टि से समझाते हैं, वहीं Whispers from Eternity (चिरंतन
की पुकार) उनकी कविताओं और प्रार्थनाओं का संग्रह है।
7 मार्च 1952 को लॉस एंजिल्स में एक व्याख्यान के
दौरान उन्होंने महासमाधि ली। उनके विषय में एक आश्चर्यजनक तथ्य यह दर्ज है कि
मृत्यु के 20 दिन बाद तक भी उनके शरीर में क्षय के कोई लक्षण
नहीं देखे गए थे, जिसे चिकित्सा जगत ने एक चमत्कार की तरह
देखा। योगानंदजी केवल एक धार्मिक गुरु नहीं थे, वे एक समाज सुधारक और मानवतावादी भी थे। उन्होंने सभी
को सादा जीवन उच्च विचार की मानसिकता में ढलने की सलाह दी। वे पश्चिमी देशों की
भौतिक उन्नति और भारत की आध्यात्मिक गहराई के मिलन के समर्थक थे।
प्रस्तुत पुस्तक में उनके विभिन्न स्थानों पर समय समय पर दिए गए प्रवचनों के
उद्वरण संकलित किये गए हैं पुस्तक को कुल 10 खंडों में विभाजित किया गया है यथा
अलौकिक सत्य,आनंद ही ईश्वर, ईश्वर की खोज, प्रेम और ज्ञान, स्वर्ग लका द्वार आदि।
प्रत्येक खंड में शीर्षक के अनुरूप ही प्रवाचनों को प्रस्तुत किया गया है। प्रवचन
मात्र सार रूप में ही प्रस्तुत किया गया है जो कथ्य के मूल को समझने में सहायक है।
प्रत्येक प्रवचन कब एवं कहाँ दिया गया यह भी उद्वरित किया गया है। प्रवचन को प्रस्तुत
करते हुए भाषा अत्यंत सरल रखी गई है वाक्यांशों में भी क्लिष्टता का भाव नहीं हैं फलस्वरूप
प्रवचन के भाव सामान्य भाषा ज्ञान वाले व्यक्ति हेतु भी सुगम्य है। प्रवचन संग्रह
एक अमृत कलश रूप है उसमें से कौन सी बूंद विशिष्ठ अथवा अन्य से बेहतर है कैसे
निरूपित हो, इसी भाव के अधीन प्रवचनों को यहाँ पुनः उल्लिखित करना युक्तियुक्त एवं
तार्किक प्रतीत नहीं होता, गुणी जन स्वयं अध्ययन कर ज्ञान गंगा में डूब कर अमृत
पान करें।
अतुल्य खरे





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