Us Din -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
- Pustak Samiksha : Atulya Khare
- समीक्षित पुस्तक : उस
दिन
- द्वारा
:
पूनम अहमद
- विधा
: आत्मकथा
- अद्विक
पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित
- संस्करण
: प्रथम 2024
- मूल्य
: 220
- समीक्षा क्रमांक : 147
पूनम
जी की कई पुस्तकें अभी तक पढ़ीं, उन पर लिखा भी, और उनकी पहली पुस्तक पढ़ने के समय
से ही उनके अंदाज़े बयां का मुरीद हूं, और अब जो उन्होंने अपनी कहानी या कहें जीवन
के संस्मरण “उस दिन” शीर्षक से पुस्तक के रूप में
सँजोये हैं उस पर तो कुछ कहने की
आवश्यकता ही नहीं। बस यही कहना काफी होगा लिखने के तरीके के लिए और लिखने की सहजता के लिए पढ़ा जाना चाहिए। भाव तो उनके कहन में सहज ही आ गए
और इस पुस्तक के प्रारंभिक संस्मरण जैसे “उस दिन” और पिता से आखरी मुलाकात में तो भावनाओं का दरिया आपको अपने
साथ सहज ही बहा ले जाता है। उस दिन, आम इंसान
की जिंदगी में जो कुछ बीतता है उसे इतने खूबसूरत तरीके से भी बतलाया जा सकता है यह
इस पुस्तक को पढ़ कर ही पता लगा। अपने विषय में लिखते हुए यह एक आदर्श नैतिक
बाध्यता अथवा अनिवार्यता होती है की व्यक्ति
अपने साथ साथ सबके प्रति भी ईमानदार बना
रहे, और सच्चाई तथा बेबाकी से अपनी और अपनों की
अच्छाई के साथ साथ उन बुरे और अप्रिय पलों तथा लोगों का भी जिक्र करे जो उसके जीवन
में घटित हुए हैं जैसे की महात्मा गांधी अथवा हरिवंश राय बच्चन जी ने किया और कह
सकते हैं (ये वे आत्मकथाएं हैं जो अत्यंत
सहज शैली में एवं संभवतः पूर्ण
ईमानदारी के साथ लिखी गई हैं तथा पढ़ी जाना
चाहिए) की पूनम जी काफी हद तक इस पैमाने
पर खरी उतरी हैं।
पढ़ते हुए बार बार ध्यान पुस्तक के प्रारंभ में लिखे डिस्क्लेमर पर गया जहां उन्होंने लिख रखा है की सब कुछ सच है तब उनके जीवट, उनकी साफगोयी और उनकी पूरी ईमानदारी से सच कहने की आदत का कायल हुए बिना नहीं रहा गया।
कुछेक
स्थानों पर मिठास कुछ ज्यादा ही लगी जो आम तौर पर वास्तविक जीवन में जीवन की कठिन
राहों के कठोर धरातल पर दिखलाई नहीं पड़ती। हो सकता है यह हमारे हाल के माहौल में
रहने के कारण हमारी कुंठित एवम दूषित हो चुकी मानसिकता के परिणाम हो
किन्तु यदि यह सब पूर्णतः ईमानदारी से लिखा गया है तो अवश्य ही वे
खुशनसीब हैं। उनके स्वस्थ एवं सुखमय भविष्य हेतु शुभकामनाएं, उनके सुखमय जीवन में खुशियां यूं
ही बनी रहे।
पिता
के अंतिम दर्शन वाले खंड में वे लिखती हैं कि "कितना भयानक होता है पिता का
हैं से थे हो जाना" वह पंक्तियां वाकई झकझोर देती है
उस दिन में एक था बचपन शीर्षक में पापा से वो
आखरी मुलाकात, तब
किसे पता होता है की यही पल अंतिम है वरना शायद कोई प्रयास भी करे उनके थम जाने का
अथवा उन्हें रोक लेने का ।शुरुआती कई खंड में हर वाकया आंखों की कोर भिगो भिगो गया
।वही कैसे छुआ एक बुरी याद तो जरूर है लेकिन
वहीं उनकी हिम्मत और आत्मबल के साथ मानसिक दृढ़ता की भी परिचायक है
।
भाई
बहनों के संबंधों को इतनी बेबाकी
से नकार देना शायद पूनम जी ही कर सकती थीं। जीवन में रिश्तों के निचोड़ को बहुत कम
शब्दों में बहुत साफ साफ लिख दिया। जैसे पिता का जिक्र
करते हुए वे दूर के रिश्ते की बुआ को पहचान गई साथ ही जमाने की हवा को भी। भाई ने
जो दर्द दिए वहीं पड़ोस के मुंह बोले भाई का सहयोग और उनका चले जाना सब कुछ बहुत
थोड़े में बहुत ज्यादा कह जाने वाला है ।
और
बात लव एट फर्स्ट साइट की बहुत नजाकत से कही, प्यार से पहली मुलाकात का जिक्र,
प्यार का परवान चढ़ना और एक
रिश्ते में बदलना, बहुत
खूबसूरती से वर्णित है लगता है मानो सामने बैठ कर उनसे उनकी बातें सुन रहा हूं। ज्यादा
क्या ही कहूं, क्योंकि
इस के बाद के छोटे छोटे किस्से खुद इश्क के अंकुरित होने के और शनैः शनैः अपनी कोपलें फैलाते दिख जायेंगे। बहुत
सहज और सरलता से अपने पहले और एकमात्र प्यार के होने के किस्से सुनाती वे और पढ़ते
हुए उनमें डूबते हुए यह खबर ही नहीं होती की इसी पुस्तक के शुरुआती कुछ खंड रुला
गए थे जो अब चेहरे पर मधुर मुस्कान ले आए हैं। ।
मां की फिक्र मां का स्नेह, और सबसे ज्यादा अन्तर्जातीय विवाह में तमाम पारिवारिक विरोध के बावजूद मां
का डट कर समर्थन में खड़े रहना पढ़ कर अच्छा महसूस
होता है ।
खास
तौर पर वे खंड जहां दो भिन्न संप्रदाय के लोगों के बीच शादी समझ वालों को बर्दाश्त
नहीं हुई किंतु आपसी प्यार, परिवार के सहयोग और विश्वास से
कैसे सब अपने हो गए पढ़ना बहुत सुखद लगा साथ ही यह भी की क्या आज भी सब कुछ वैसा
ही नही है जैसा तब था, कुछ मायनों में तो शायद तब कट्टरपन और नफरत
काफी काम एवं आपसी सौहार्द और भाई चारा ज्यादा था।
ये
तो कुछ ही बातें हुईं परंतु ऐसे ही तमाम वाकयात से लबरेज है
यह पुस्तक और इसके विषय में कुछ किहने से बेहतर है इसे पढ़ कर इसका
रस और इसके भाव को अनुभव करने का। सो ज्यादा कुछ कहना नही है वही पुरानी बात की
थोड़ा लिखा बहुत समझना पर पढ़ना जरूर आप निराश नहीं होंगे।
इस
पुस्तक के बाद पूनम जी से उम्मीदें तो बढ़ गई हैं लेकिन कह सकते हैं की सौ पर भारी
वाली इकलौती किताब है। यूं तो उनकी अपनी पहचान है किन्तु निश्चय ही पूनम जी को इस
कृति के द्वारा पहचाना जाएगा ।
अतुल्य खरे
जहां एक आम इंसान की सोच समाप्त हो जाती है वहीं से पूनम जी की सोच प्रारंभ होती है। जहां एवं जिस विषय पर कुछ भी लिखना नामुमकिन समझ आम इंसान आगे बढ़ जाता है उसी वस्तु अथवा विषय को वे अपने कथानक का अभिन्न अंग बना कर उस पर एक श्रेष्ठ कृति सृजित कर प्रस्तुत कर देती हैं यही कारण है की उनकी हर पुस्तक अपने आप में विशिष्ट है, आपके संदर्भ के लिए कुछ पिस्तकों के लिंक दिए हैं --
- कोयले की लकीर
- अपने अपने मेघदूत
- कुछ इस तरह
- मून गेट



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