paa ki Diary -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
· Pustak
Samiksha : Atulya Khare
·
समीक्षित पुस्तक :
पा की डायरी
· विधा
: कहानी
· द्वारा
: इंजी. आशा शर्मा
· समृद्द
पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित
· प्रथम
संस्करण : 2025
· मूल्य
: 260.00
· समीक्षा
क्रमांक : 232
इंजी आशा शर्मा की
पुस्तक “पा की डायरी” यूं तो उनकी चुनिंदा 15 कहानियों का संग्रह है, किन्तु कहानियों से
गुजरते हुए यह विशेष बात देखी कि उनकी अधिकांश कहानियाँ “पारिवारिक रिश्तों” एवं “नारी विमर्श” पर केंद्रित हैं। पारिवारिक रिश्तों पर
कोई टिप्पणी अनिवार्य प्रतीत नहीं होती किन्तु नारी विमर्श पर अवश्य कुछ बात कर लें, यह साहित्य की एक अत्यंत व्यापक और गतिशील
विचारधारा है, जो समाज में स्त्री की स्थिति, अधिकारों और उनकी पहचान को केंद्र में रखकर विश्लेषण करती है। नारी विमर्श
से तात्पर्य कभी भी मात्र उनके अधिकारों की बात नहीं है, बल्कि
पितृसत्तात्मक ढांचे को चुनौती देकर एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना का प्रयास है।
समीक्षित पुस्तक “पा
की डायरी” की लेखिका आशा जी स्थापित साहित्यकार एवं ख्यातिप्राप्त लेखिका है उनके
अनेकों काव्य संग्रह, कथा संग्रह आदि प्रकाशित हो चुके हैं साथ ही उनके द्वारा
रचित बाल साहित्य बाल कविता, बाल कहानी
संग्रह बहुत प्रसिद्द हुए एवं उन्हें बाल साहित्य हेतु विशेष रूप से पहचाना जाता
है।
प्रस्तुत कहानी
संग्रह के विषय में जो बात सबसे ऊपर उभर कर आती है वह यह कि आशा शर्मा की
नायिकाये संवेदनशील है, चारित्रिक सुदृढ़ता रखती हैं, सजग है एवं संघर्ष करती हैं।
सहज पराजय स्वीकार कर लेना उनकी नायिकाओं का न तो स्वभाव है न ही चरित्र।
संग्रह की कहानी “प्रतिरूप”,
एक ऐसी कहानी, जो भावुक एवं मर्मस्पर्शी होते हुए अपने में गहन जीवन दर्शन को समेटे हुए है। यह
किसी हादसे के परिणामस्वरूप उपजे दुख की नहीं, बल्कि विरासत,
परिपक्वता और प्रेम के रूपांतरण की कहानी है। बेटी का अपनी
मां की छत्रछाया में पूरी तरह निश्चिंत, उन्मुक्त जीवन जीना एवं मां की मृत्यु के पश्चात
सभी जिम्मेवारियों को ओढ़ लेना उसकी गंभीर मनोवैज्ञानिक सोच एवं उसका अपनी
जिम्मेवारियों के प्रति समर्पण दर्शाता है।
मां का पात्र
यूं तो कहानी के केंद्र में है किन्तु बेटी का रूपांतरण सभी पात्रों पर हावी होता है।
बेटी द्वारा उसी उत्सव को उत्साह से मनाना जिस से पहले वह नफरत किया करती थी, यह
दर्शाता है की बेटी ने मां के जीवनदर्शन को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। कहानी में 'होली का त्यौहार' सांकेतिक होते हुए जीवन के उमंग से परिपूर्ण दर्शन को इंगित करता है। कहानी
रिश्तों में अंतर्निहित भावना को अत्यंत सहज रूप से
परिभाषित करती है।
संग्रह की अगली
कहानी “दिमाग वाली लड़की”, हमारे समाज की हालिया मानसिकता को बखूबी बयां
करती है कहानी समाज को आईना दिखलाता हुआ कड़वा सच सम्पूर्ण वास्तविकता एवं तार्किकता के संग प्रस्तुत करती है ।
यह मात्र दंपती के
बीच आत्मसम्मान (ईगो) और वर्चस्व की लड़ाई नहीं है, अपितु पुरुष प्रधान समाज की उस गहरी
असुरक्षा को उजागर करती है,
जहाँ पुरुष अपनी जीवनसंगिनी की उन्नति को बर्दाश्त नहीं कर पाता
विशेषकर जब वह उस से भी आगे निकल रही हो।
कहानी में पति का
अपनी ही पत्नी के अधीन काम करना उसके “पुरुष-अहंकार” से बर्दाश्त नहीं होता।
पुरुष प्रधान समाज को यह बर्दाश्त नहीं कि स्त्री अपने विवेक और अधिकारों का
इस्तेमाल करने लगे। पति का उसके प्रमोशन को उसकी मेहनत के बजाय उसके चरित्र से जोड़ना
सिर्फ पति के द्वारा अपनी हीन भावना को छिपाने का अंतिम अस्त्र प्रतीत होता है।
अमूमन इस प्रकार
के कथानक में नारी पात्र को किसी न किसी कारण से समझौता करते हुए दर्शाया जाता है
किन्तु नायिका का अपने स्वाभिमान से समझौता न करते हुए घर छोड़ने का निर्णय एक आत्मनिर्भर,
स्वाभिमानी एवं जागरूक स्त्री का फैसला है।
संग्रह की अगली कहानी
“विस्थापन का दर्द,” कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के उस अनकहे, रूह कँपा
देने वाले दर्द को बयां करती है, जो सिर्फ अपनी जमीन छूटने का नहीं, बल्कि
मर्यादा, परिवार की इज्जत और भरोसे के बिखरने का दर्द भी है।
पिता के लिए अपनी
जवान बेटी को, उस खौफनाक माहौल में आत्ताइयों के कब्जे में पीछे छोड़ आना कोई
स्वार्थी फैसला नहीं, बल्कि एक बेहद लाचारी और बेबसी में परिवार की सुरक्षा को देखते हुए लिया
गया निर्णय ही हो सकता है। वहीं पिता और छोटी बेटी का वह अपराध-बोध कि हम तो बच गए,
लेकिन वह वहीं रह गई, इस कहानी की आत्मा में बसी
पीढ़ा है। छोटी बेटी के दिल में बसा विस्थापन का दर्द उसके लिए मात्र विस्थापन नहीं,
बल्कि अपनी बड़ी बहन की कुर्बानी भी है।
तो “ससुराल
गेंदा फूल” एक यथार्थवादी कथानक है जो कि हमारे समाज में बहुत गहरे व्याप्त
मापदण्ड के संवेदनशील पहलू को उजागर करती है।
कहानी केवल
सास-बहू या ननद-भाभी के पारंपरिक झगड़ों पर आधारित न होकर इस व्यवहार विशेष के
पीछे के मनोविज्ञान और दोहरे मापदंड की पड़ताल है, साथ ही यह दर्शाने का सफल प्रयास
भी कि समान परिस्थिति में जब भूमिकाएं बदलती हैं नज़रिया कैसे बदल जाता है।
कहानी “अतरंगी
पापा” में पिता को परिवार का आवरण एवं मुख्य जड़ कहकर बिल्कुल सटीक परिभाषित
किया है। पिता केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह छत होता है जिसके नीचे परिवार के सारे
मतभेद दबे रहते हैं तथा सारे ख्वाब पल्लवित होते हैं । पिता का अस्तित्व एक
सुरक्षा कवच की तरह होता है, जो हर बाहरी मुश्किल स्वयं झेलकर
परिवार के बाकी सदस्यों को महफूज़ रखता है।
पिता के रहते
भाई-बहन का जो रिश्ता निश्छल होता है, पिता के जाते ही व्यावहारिक और बाज दफ़े
व्यावसायिक हो जाता है। फिर भाई की आंखों में बहन खटकती भले न हो, लेकिन वह पहले जैसा प्यार और स्वागत नजर नहीं आता। बेटियों का अपने पिता
से जो भावनात्मक जुड़ाव, दुलार एवं भावनाएं होती है, उस रिक्तता
को जीवन में कोई दूसरा रिश्ता कभी भी नहीं भर
सकता।
कहानी “अधबुना
स्वेटर” आज के दौर में, जहाँ कहानियों में अमूमन सास-बहू के रिश्तों में कड़वाहट
तथा दूरियां दर्शायी जाती हैं वहाँ यह कहानी अपने विपरीत कथानक के कारण दिल को छू
लेने वाली तो है ही साथ ही एक सुंदर संदेश भी देती है। कथानक केवल एक अधूरे स्वेटर
के पूरे होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दो पीढ़ियों के बीच
छूटे हुए संवाद के जुड़ने, सांस्कृतिक जुड़ाव एवं पति के
परिवार को अपना समझने की भावना तथा आत्मिक प्रेम के होने की दास्तान भी है।
”रोतली“ एक बेहद भावुक एवं हृदयस्पर्शी कहानी है जहां वह लड़की, जो पिता के रहते ज़िद्दी,
गुस्सैल और अपने मन की मालिक थी, उसका पिता के
जाते ही अपनी माँ तथा परिवार के लिए त्याग एवं समर्पण उसकी चारित्रिक परिपक्वता दर्शाता
है। बेटी का यह कथन कि जरूरी तो नहीं हर लड़की डॉक्टर,
इंजीनियर या IAS बने, एक
बेटी अपनी मां की मां भी तो बन सकती है पूरी कहानी को एक
सकारात्मक दिशा देता है।
संग्रह में “इनडोर
प्लांट्स” एक ऐसी कहानी है जहां कथानक व्यावहारिक है लेकिन मानवीय मनोविज्ञान की
गहराई से पड़ताल करता है। नई बहू को इनडोर प्लांट के समान मान कर, उसे घर के महोल
को समझने, उसमें रचने बसने के लिए शुरुआती समय दिया जाना एक परिपक्व सोच दर्शाती
है। कहानी में ननंद के मन में अपने अस्तित्व के प्रति असुरक्षा की भावना है। कथानक
दर्शाता है की कैसे सही समझ रिश्तों को बिखरने से बचा सकती है।
वहीं कहानी “सिंदूर
की डिबिया” का कथानक यथार्थवादी है, आज के दौर में विवाहित महिलाओं की उस
कश्मकश को सामने रखता है जहाँ बढ़ते ईगो के प्रभाववश वे अनजाने में ही अपने घर
परिवार व पति से विमुख होती जाती है। उसकी पति से अपेक्षाएं असीम हैं किन्तु पति की माथे
पर बिंदी और मांग में सिंदूर लगाने की एक छोटी सी मांग जो सामाजिकता के उद्देश्य
से भी कही गई है, वह उसे नारी स्वातंत्र्य पर प्रहार प्रतीत होती है।
इस पुस्तक की
शीर्षक कथा “पा की डायरी” एक सरल किन्तु भावनात्मक कथानक है। यह एक ऐसे
व्यक्ति की कहानी, जो अपने भावों को सहेजने हेतु दुनिया की नज़रों से दूर अपनी डायरी को अपना
एकमात्र माध्यम बनाता है। कहानी में नायक अपने जीवन के
विशेष क्षणों को ही डायरी में लिखता है, किन्तु उसका उसे
छिपा कर रखना परिवार और विशेष तौर पर उसकी पत्नी की नज़रों में कई संदेह उत्तपन्न
कर देता है, हालांकि उसका शक अस्वाभाविक भी नहीं कहा जा सकता वह एक पत्नी की सहज मानवीय
प्रतिक्रिया है जिसे यह महसूस होता है की उसका जीवनसाथी उससे कुछ छिपा रहा है। किन्तु
अंत में डायरी का खुलना उस व्यक्ति के मौन प्रेम का बड़ा उद्घोष है। कहानी प्रेम के कई रंग में से
एक को दर्शाती है वहीं हम देखते है की कैसे संवादहीनता एक सुंदर प्रेम को गलतफहमी
की आंच में तबाह कर जाती है।
नारी के
विविध रूपों और उनके अंतर्मन के द्वंद्वों को उकेरती कहानियाँ “गोरखधंधा”
और “जी ले जरा”, समकालीन स्त्री-जीवन के उन कोनों को छूती हैं, जहाँ अक्सर समाज की दृष्टि नहीं पहुँचती। यद्यपि इन दोनों ही कहानियों के
कथानक और पात्रों की स्थितियाँ अलग-अलग धरातल पर खड़ी हैं, किंतु
दोनों के ही केंद्र में 'स्त्री का स्वयं के प्रति नजरिया'
और 'परिवार के साथ उसका भावनात्मक तालमेल ही
प्रमुख है।
कहानी ”गुलाब
महक उठे” इन दोनों कहानियों से तनिक भिन्न दिशा में चलती है। “गुलाब महक उठे” की
नायिका आधुनिक, मनमौजी, स्वार्थी एवं घमंड से भरी हुई है जो
ससुराल को अपना घर न समझ कर वहाँ सिर्फ पति से ही मतलब रखना चाहती हैं। वह परिवार
को तोड़ने का विचार रखती है जो उसके अहंकारी व्यक्तित्व को दर्शाता है। कहानी में हृदय
परिवर्तन किसी तर्क से नहीं, बल्कि 'मानवीय
संवेदना' से होना दर्शाया गया है।
कहानी “नकचढ़ी बेटी” एक बहुत ही काबिल तथा
अपने काम से काम रखने वाली और दुनिया की फिक्र न करने वाली बेटी की कहानी है जो
अपनी सम्पूर्ण पारिवारिक सामाजिक एवं कार्यालयीन जिम्मेवारियों के बीच बेहतरीन
संतुलन कायम करती है। इतनी काबिल बेटी के विषय में बात हो रही हो तो शीर्षक “नकचढ़ी
बेटी” होना तार्किक प्रतीत नहीं होता। वही
कहानी “पिघलती वर्फ़” दाम्पत्य संबंधों में आत्मसम्मान, तनाव एवं अकारण
झगड़ों अथवा छोटी छोटी बातों के बड़े झगड़ों पर केंद्रित है किन्तु अत्यंत सधे हुए
अंदाज में लेखिका यह संदेश देने में कामयाब रहीं हैं की संबंध बेहतर बनाए जा सकते
हैं , टूटे हुए संबंधों की डोर भी जोड़ी जा सकती है यदि आत्म सम्मान जैसे विषय को
एक ओर रख कर कोई भी पहल कर ले।
अतुल्य खरे
Pustak Samiksha : atulya Khare





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