Khamosh Kadam -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

  • ·       Pustak Samiksha : Atulya Khare
  • ·       समीक्षित पुस्तक :  खामोश कदम
  • ·       विधा : उपन्यास
  • ·       द्वारा : रूपसिंह चंदेल
  • ·       अमन प्रकाशन कानपुर द्वारा प्रकाशित
  • ·       प्रथम संस्करण : 2026
  • ·       मूल्य : 275.00
  • ·       समीक्षा क्रमांक : 236


पुस्तक खामोश कदम  द्वारा : रूपसिंह चंदेल

रूपसिंह चंदेल जी का नया उपन्यास “खामोश कदम” जिसे अमन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, एक बार पुनः उनकी चिर परिचित यथार्थवादी शैली में एक ऐसा गंभीर विचारोत्तेजक लेकिन चिंतनीय कथानक प्रस्तुत करता है, जो जीवन के कटु यथार्थ पर बारम्बार सोचने हेतु विवश करता है।

यथार्थ घटनाक्रम एवं परिवेश को केंद्र में रखकर कथानक ढालने वाले चंद ही साहित्यकार हैं, उनमें भी वरिष्ठ साहित्यकार रूपसिंह जी की शैली विशिष्ट है। उनकी लेखन शैली जीवंत यथार्थवाद का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। कह सकते हैं की उनके पास माटी की गंध को, वातावरण में व्याप्त रिश्तों की गर्माहट (कभी मिठास तो कभी कड़वाहट युक्त) एवं चहल पहल को शब्दों में उतारने की जो कला है उसके द्वारा वे पाठक को सहज ही गाँव की पगडंडी या खेत की मेंड़ पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं, दृश्य के यथार्थपरक प्रस्तुतीकरण के परिणामस्वरूप पात्र तथा पाठक एकाकार हो जाते हैं।

उनकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और हृदयस्पर्शी है। ग्रामीण जीवन का वर्णन करते हुए शब्दों का चयन ऐसा है कि पाठक को मिट्टी की सोंधी महक, बुजुर्गों के जीवन का तजुर्बा और नौनिहालों की आँखों का उल्लास महसूस हो जाता है। कथानक में उतार-चढ़ाव इतने स्वाभाविक होते हैं कि पात्र की पीड़ा हो अथवा खुशी का भाव, सब पाठक को अपने से लगते है।

रूपसिंह चंदेल जी का सृजन कर्म उनके दीर्घकालीन साहित्यिक सफ़र का परिचायक है। जिनकी 85 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हों उनके विषय में कुछ भी लिखना निश्चय ही सूर्य को दीपक दिखलाने के समान ही होगा। गद्य की समस्त विधाओं में उनकी रचनाएं हैं। 20 उपन्यास, 21 कहानी संग्रह, 5 संस्मरण, 10 बाल कहानी संग्रह, 3 किशोर उपन्यास, 4 आलोचना पुस्तकें एवं 2 यात्रा संस्मरण के संग अनुवाद साक्षात्कार आदि के संग उनके प्रकाश्य कार्य का का एक लंबा अंतहीन सिलसिला है। सृजन कर्म के सापेक्ष पुरुस्कारों एवं सम्मानों की भी एक लंबी फेहरिस्त है, जिसे देख कर सहज ही कह सकते हैं की अब उनके साहित्यिक कद एवं गरिमा को देखते हुए संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर स्वयं गौरवान्वित होती हैं।

                                          

पुस्तक खामोश कदम  द्वारा : रूपसिंह चंदेल  पिछला कवर

बात करें उनकी लेखन शैली की तो, गहन सूक्ष्म अवलोकन के पश्चात किये गए लेखन के द्वारा वे मात्र गाँव अथवा उस स्थल विशेष का ही वर्णन नहीं करते, अपितु उस स्थल की आत्मा तक उतर कर विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करते हैं, फिर वह भाव, व्यक्ति अथवा स्थल वर्णन एक ग्राम चौपाल का हो अथवा गाँव के रास्ते या फिर समीपवर्ती जगहों के नाम ठिकाने तथा सड़कों मोहल्लों और चौराहों के नाम आदि का, किसी कार्यालय का हो या फिर किसी हाट बाजार का, या फिर किसी व्यक्ति विशेष का। उनके द्वारा दी गई विस्तृत प्रस्तुति, जहां उस स्थान अथवा वस्तु को एक जीवंत पात्र बना देते है वहीं पाठक को यह आभास होता है कि वह उस दृश्य का ही अभिन्न भाग है।

लेखन की विशिष्टता ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्रण है। कथा नायक के बचपन के संस्मरण केवल यादें नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे समय के दस्तावेज हैं जहाँ रिश्तों में जटिलता कम और सादगी अधिक थी, दुराव छिपाव कम तथा उन्मुक्तता एवं अपनापन अधिक था। लेखक ने ग्रामीण संस्कृति की छोटी-छोटी बारीकियों, परंपराओं और भाषा के लहजे को जिस विस्तार से पिरोया है, वह पाठक को नायक के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ देता है।

उनकी शैली की एक और खासियत यह है की वे न सिर्फ पात्र से पाठक का परिचय करवाते हैं, अपितु वे उस पात्र के इतिहास से भी परिचित करवाते है फिर वह व्यक्ति हो अथवा कोई स्थान। वे पात्र के पूर्वजों के संघर्ष से वर्तमान स्थिति तक का ऐसा तर्कसंगत और स्वाभाविक वर्णन प्रस्तुत कर देते है कि वे पात्र आपके अपने ही लगने लगते हैं एवं घटनाक्रम किसी चलचित्र समान मालूम होता है।

रूपसिंह जी की शैली की एक और विशिष्टता यह भी है की उनकी भाषा की सरलता में भी एक सघनता छिपी, होती है,​ वे अलंकारिक या क्लिष्ट भाषा के बजाय लोक-भाषा का ही उपयोग करते हैं। उनकी साधारण लगने वाली भाषा अत्यंत प्रभावी है। वे गरिष्ठ शब्दों के स्थान पर सरल वाक्यों में ही बड़े से बड़े भावों को व्यक्त कर देते हैं।

​​“खामोश कदम” में भी उन्होंने इसी शैली को अपनाया है, जो पाठक को मुख्य पात्र के संग उसकी सम्पूर्ण जीवन यात्रा का साक्षी बनाता है। उनके पात्र की हर बात में एक कहानी छिपी है, कहानी का हर पृष्ट हमारे सामने यूं खुलता है मानो किसी पुराने घर के दरवाजे दर दरवाजे और उनसे जुड़ी यादें।   

                                                       

पुस्तक खामोश कदम लेखक रूपसिंह चंदेल

​“खामोश कदम”, एक ऐसी यथार्थवादी कृति है जो भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात के उस दौर को दर्शाती है, जहाँ नैतिकता और मानवीय मूल्यों का पूरी तरह ह्रास तो नहीं हुआ था किन्तु हाँ निरंतर क्षरण लक्षित हो रहा था। एक साधारण पोस्ट ऑफिस के सरकारी बाबू के जीवन के माध्यम से लेखक ने तत्कालीन समाज का आईना पेश किया है, जहां स्वभाविकतः कुछ अछाइयाँ है कुछ बुराइयाँ भी हैं। परिवार में रिश्तों के खोखले होते ढांचे पर खड़ा स्वार्थवादी समाज और उस  के भी भीतर जातिवाद, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के ऐब तो तब भी थे और अब भी हैं ही, जो समाज को खोखला कर चुके हैं।

​उपन्यास का नायक वह आम आदमी है, जो स्वतंत्रता के बाद के दौर में दिल में बहुत सी उमंगें लिए उत्साह और उम्मीदों के साथ पोस्ट ऑफिस में बाबू बनता है। नौकरी के सिलसिले में विभिन्न गाँव शहरों में उसका जीवन गुज़रता है। कथानक का अधिकांश हमें ग्रामीण जीवन, ग्राम्य जीवन की सादगी और मेहनत भारी ज़िंदगी के बीच रखता है।

 बात कुछ पुरानी है अतः शहरी जन जीवन में भी कुछ मानवीय मूल्य जो बाकी थे वे कथानक में दिख जाते हैं हालांकि शहरों का वह क्रूर यथार्थ, जहाँ मानवीय रिश्तों की कीमत स्वार्थ और मूल्य के तराजू पर तौली जाती है अपने पैर पसारने लगा था एवं उसका प्रभाव भी नजर आने लगा था। ठीक ठाक नौकरी एवं गाँव की जमीन एक आर्थिक संतृप्तता नहीं तो संतुष्टि हेतु पर्याप्त थी। तात्पर्य यही की कथा नायक का जीवन यूं समृद्द नहीं तो कठिन संघर्ष युक्त भी नहीं था।

लेखक द्वारा रचित “खामोश कदम” एक ऐसे वृद्ध के संघर्षों और अंततः उनके द्वारा लिए गए एक साहसी निर्णय की कहानी है, जो किसी भी भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की त्रासदी हो सकती है। कथा नायक का बचपन और युवावस्था का संघर्ष उसे एक कठोर यथार्थ से जोड़ता है। स्वाधीन भारत के उस दौर में सरकारी विभाग में एक 'बाबू' की नौकरी उसके लिए केवल आजीविका नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक थी। यहाँ लेखक ने ग्रामीण परिवेश से शहरी ढांचे में ढलने की प्रक्रिया को बहुत बारीकी से उकेरा है।

तीन बच्चों की शिक्षा और विवाह के लिए अपनी पूरी ऊर्जा और संसाधन खर्च कर देने वाला पिता, जब अंत समय में उपेक्षित होता है, तो यह सीधे सीधे “भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों में पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और परस्पर संबंधों के बिखराव की ओर इशारा करता है।

​लेखक ने मूल कथानक के संग, अन्य समसामयिक विषयों को भी कथानक में स्थान दिया है एवं केवल विषयों का स्पर्श नहीं किया है, बल्कि उन्हें कथा-प्रवाह के साथ गहराई से बुना है, दहेज के लिए बहु की हत्या और नारी शिक्षा पर महत्व जैसे मुद्दे यह दिखाते हैं कि कैसे समाज की हर बुराई पर उनकी पैनी नज़र बनी हुई है। ग्रामीण परिवेश में, उस काल में जुआ और शराब जैसी बुराइयों को दर्शाया है जो न केवल आर्थिक, बल्कि पारिवारिक तबाही का कारण बनती थीं बल्कि इसके चलते ही गाँव में जमीनें बिकती जा रहीं थीं जो तब भी चिंता का विषय थीं एवं आज भी स्थिति में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ हो, प्रतीत नहीं होता।


पुस्तक खामोश कदम प्रकाशक


उस काल में भी पुलिस, चिकित्सा और पैथोलॉजी लैब में फैला भ्रष्टाचार यह इंगित करता है कि व्यक्ति के जीवन और मृत्यु का निर्णय तब भी भाग्य नहीं, वरन रिश्वत करती थी जो की हाल में भी यथावत है। कथानक में गलत पैथोलॉजी रिपोर्ट का जिक्र इस भ्रष्टाचार के उस क्रूरतम चेहरे को सामने लाता है, जहाँ इंसान की बीमारी को भी कमाई का जरिया बना लिया गया है।

​उपन्यास का सबसे प्रभावशाली और विचलित करने वाला हिस्सा वह है जहाँ उम्र दराज कथा नायक के अपने ही बच्चे उसे, उसी के बनाए हुए घर से बेदखल कर देते हैं। आमतौर पर समाज में संपत्ति के लिए बेटों के  लालच की कहानियाँ हम बहुधा सुनते हैं, किंतु “खामोश कदम” में बेटी का षड्यंत्रकारी व्यवहार कहानी को एक नया आयाम देता है। यह दर्शाता है कि आज के दौर में स्वार्थ ही सर्वोपरि है।

पिता को रहने के लिए छत की बरसाती (छत पर बनी छोटी कोठरी)  देना और उसे भोजन-पानी से वंचित करना, भारतीय संस्कृति में 'पितृ देवो भव:' के सिद्धांत की क्रूर परिणति है। वृदद पिता को असुविधाजनक एवं अल थलग छत पर रखना स्थान परिवर्तन मात्र नहीं है, बल्कि सामाजिकता के भाव से देखें तो यह उसका सामाजिक एवं पारिवारिक अलगाव जैसा है जों एक गंभीर मानसिक आघात होने के साथ कही न कहीं उसे अवांक्षित एवं अनुपयोगी होने का एहसास करवाने हेतु पर्याप्त है। छत पर दिया गया स्थान यूं तो घर की सबसे ऊंची जगह है किन्तु यह ऊँचाई उसे दुनिया से जोड़ती नहीं, बल्कि उसे एक “अनावश्यक वस्तु” की तरह किनारे कर कहीं बहुत नीचे गर्त में धकेल देती है। यह उस व्यक्ति विशेष के लिए गिरावट नहीं अपितु समाज और उस से भी पहले उसकी संतानों को आईना दिखलाती एक शर्मनाक सच्चाई है जहां रिश्तों में समाप्त होता अपनापन और संस्कारों का अवमूल्यन लक्षित होता है।  

मकान को किराये पर चढ़ाने की लालच में पिता को बोझ समझना, आधुनिक समाज के उस काले पक्ष को सम्मुख रखता है जो मात्र स्वार्थ एवं उपयोगिता पर आधारित है।

​​वहीं कथा नायक बुजुर्ग पिता का घर छोड़ देना किसी भी प्रकार से उसकी कोई हार नहीं है, बल्कि समाज के मुंह पर तमाचा तो है ही साथ ही उसका समाज के प्रति एक खामोश विद्रोह भी है। यह केवल एक व्यक्ति की घर से चले जाने की कहानी नहीं है अपितु उसके अस्तित्व पर आ पड़े संकट की दास्तान है। वह शोर नहीं मचाता, न ही वह अदालत कचहरी जाता है। उसके कदम 'खामोश' हैं।

एक थैले में बंधी उसकी सीमित दुनिया उसके साथ है, कुछ कपड़े, बैंक पासबुक और पेंशन के कागज जो दर्शाते हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर वह भौतिक संपदा एवं लालसाओं से ऊपर उठकर स्वाभिमान बरकरार रखते हुए अपनी पहचान , और सम्मान की तलाश में निकला है। उसका यह निर्णय कायरतापूर्ण  नहीं, बल्कि उसके आत्म-सम्मान की जीत है। वह अपना आत्म सम्मान बरकरार रखता है। वह शांति से रिश्तों के उस मृत ढांचे से निकल जाता है जहां अब परस्पर संबंधों की कोई अहमियत नहीं बची, पैसा ही सर्वोपरि हो गया तथा जीवन मूल्य समाप्त हो चुके है।

पुस्तक खामोश कदम

​“खामोश कदम” केवल एक व्यक्ति की दु:खद गाथा नहीं है, बल्कि कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की यह उस पूरे आजाद भारत की विफलता की दस्तावेजीकरण है। जिसे हम देख कर अनदेखा कर रहे हैं। अब तो इस तरह के किस्से बहुत आम हैं, उच्च शिक्षा एवं बच्चों के उच्च वेतन ने इसे कम करने के स्थान पर बढ़ाया ही है, क्यूंकि न्यूक्लियर परिवार, व्यक्तिगत स्वार्थ, चारित्रिक पतन, तथा भौतितवादी संस्कृति के बढ़े हुए प्रभाव ने जीवन पर पूर्णतः अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है।

लेखक की लेखनी में वह धार है जो सामाजिक पाखंड की बखिया उधेड़ देती है, और सच्चाई को उसके सम्पूर्ण यथार्थ के साथ हमारे सामने खड़ा कर देती है। हालांकि उपन्यास विभिन्न सामाजिक पहलुओं को भी कथानक के मध्यम से दर्शाता है एवम अंत पीड़ादायक होते हुए भी रोचक है, संभवतः इस लिये क्यूंकि लेखन शैली के प्रभाव में पाठक नायक के दुख को अपना दुख मानने लगता है। ​यह उपन्यास उन लोगों के लिए एक कड़वा घूंट साबित हो सकता है जो सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ते हुए अपनी जड़ों और अपने बड़ों को या तो त्याग रहे हैं या उन्हें उपेक्षित जीवन जीने हेतु विवश कर रहे हैं।

 पुस्तक यथार्थवादी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कथानक न केवल मर्मस्पर्शी है, बल्कि आज के दौर के उस कड़वे यथार्थ को भी उजागर करता है जिसे अक्सर हम आधुनिकता की चकाचौंध में अनदेखा कर रहे हैं। “खामोश कदम” का शीर्षक ही कथानक में अंतर्निहित मुख्य संदेश, संवेदना एवं मौन विद्रोह को स्पष्ट कर देता है।

“खामोश कदम” समाज के उस वर्ग हेतु एक आईना है जो बुजुर्गों को पुराना एवं अनुपयोगी वस्तु (?) समझकर दरकिनार कर देते हैं। जिस पीढ़़ी को पालने-पोसने में माता-पिता अपना सम्पूर्ण जीवन और संसाधन खपा देते हैं, उन्हीं के द्वारा वृद्धावस्था में आर्थिक और भावनात्मक उपेक्षा झेलना वृद्ध जन हेतु एक बड़ा सामाजिक अभिशाप बन गया है।

​युवा पीढ़ी के इस तरह के आचरण के पीछे सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारणों का प्रभाव है जबकि दोष आर्थिक कारण को दिया जाता है। संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवार की संस्कृति बढ़ने से बुजुर्गों के प्रति जो सम्मान और जुड़ाव था, वह कम हो गया है। आज की पीढ़ी हर चीज को व्यावसायिक दृष्टि से लागत और लाभ के नजरिए से देखने लगी है। बुजुर्गों को परिवार के लिए एक आर्थिक बोझ के रूप में देखा जाने लगा है।

कॉर्पोरेट संस्कृति और भागदौड़ भरी जिंदगी में युवाओं के पास न तो समय है और न ही धैर्य। वे अपने बच्चों की दौड़ और करियर में इतने उलझे हैं कि उन्हें बुजुर्गों की भावनात्मक जरूरतों का एहसास ही नहीं होता। जब दो पीढ़ियां एक साथ रहती हैं, तो जीवनशैली और विचारों को लेकर टकराव होता है, जिससे बचने के लिए युवा उन्हें अलग-थलग कर देते हैं।

यह पीढ़ी उपभोक्ता वादी संस्कृति पर आधारित है, उन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं अधिक महत्वपूर्ण लगती हैं, जिसके लिए वे माता-पिता की मेहनत से कमाई गई संपत्ति पर तो हक चाहते हैं, लेकिन उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व स्वीकार करने से कतराते हैं। वर्तमान काल में युवाओं को बुजुर्गों के द्वारा टोकना अथवा सलाह देना व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप लगता है।

​बुजुर्गों के प्रति यह अनादर एवं उपेक्षापूर्ण आचरण एक पीढ़ी का दोष नहीं, अपितु सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव है। ​यह देखना हृदयविदारक है कि माता, पिता के आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर न होने के बावजूद उन्हें मोहताज बना दिया जाता है। क्या यह संस्कारों का दिवालियापन नहीं है।

युवा पीढ़ी को शायद यह समझने में अभी समय लगे कि बुजुर्ग केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक “अनुभव का भंडार” है एक “इतिहास” हैं जो कुछ भी न लेते हुए अभी उन्हें बहुत कुछ दे सकते हैं।

 “खामोश कदम” जैसे उपन्यास ऐसे ही विषयों को उठाकर समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं। यह जरूरी है कि आज का युवा अपने जीवन की प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित करें और यह समझें कि अंततः उन्हें भी उम्र की उसी दहलीज पर खड़े होना होगा जहां जहाँ आज उनके माता-पिता हैं।

            अतुल्य खरे

    पुस्तक समीक्षक : अतुल्य खरे                                                                                                                        
  • रूपसिंह चंदेल जी का सृजन कर्म उनके दीर्घकालीन साहित्यिक सफ़र 
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