Anishaat -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
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Pustak Samiksha: Atulya Khare
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समीक्षित पुस्तक : अनिशात
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विधा : उपन्यास
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द्वारा : रूपसिंह चंदेल
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लिटिल बर्ड पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित
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प्रथम संस्करण : 2025
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मूल्य : 295.00
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समीक्षा क्रमांक : 240
“अनिशात”, मूलतः ग्राम्य परिवेश से उठकर आजादी बाद के उभरते हुए
भारत में, उत्तर भारत के मैनचेस्टर कानपुर शहर और कपड़ा मिल की
पृष्टभूमि में, वरिष्ट लेखक रूपसिंह चंदेल जी
द्वारा अपनी विशिष्ठ शैली में सृजित एक ऐसा रोचक उपन्यास है,
जिसमें मुख्यतः ग्राम्य जीवन और तत्कालीन शहरी जीवन की चंद झलकियों सहित, कपड़ा मिल के किस्सों के अलावा भी
भिन्न भिन्न भाव समेटे सहगामी अनेकों किस्से हैं। जहां एक ओर भ्रातृवत मित्रता,
एवं शत्रुतुल्य सगे संबंधी देखने मिलते हैं तो वहीं सामाजिकता, परस्पर सहयोग एवं
एकता आदि से जुड़े किस्से बखूबी चित्रित किए गए हैं।
कथानक तीन पीढ़ियों की
यात्रा प्रस्तुत करता है जिसमें प्रस्तुत कथानक के हमारे सूत्रधार तीसरी पीढ़ी के
कर्णधार है जिनके पिता के बचपन से प्रारंभ हो कर इन के जन्म तक का विस्तार कथानक
का प्रथम भाग है, जिसमें ग्राम्य जीवन के अनेकों लुभावन किस्से, वास्तविक से
प्रतीत होते स्थल विवरण, जमीन जायज़ाद को लेकर पारिवारिक कलह एवं मन मुटाव, अल्प
शिक्षा अथवा अशिक्षा के दुष्प्रभाव, परस्पर सम्मान एवं प्रेम भाव इत्यादि अत्यंत
विस्तार से देखने में आते हैं। पात्रों द्वारा क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग ने कथानक
को और भी अधिक रोचक बना दिया है।
ग्राम्य जीवन की
अमूमन प्रत्येक झलक कथानक के प्रथम खंड में देखने में आती है फिर वह बच्चों की
पढ़ाई के स्थान पर खेल कूद एवं अन्य मौज मस्ती के कामों में रुचि हो, कृषक
जीवन के सामान्य कार्यकलाप हों, नौकरी के लिए सिफारिश करवाने में संकोच हो, सूदखोरों की बेजा वसूली
या फिर आपसी भाईचारा जैसे और बहुत से घर बाहर के किस्से।
कथानक अशिक्षा के
दुष्प्रभाव, घूँघट प्रथा जैसे विषय पर रोचकता के साथ विस्तार से बात
रखते हुए आगे बढ़ता है। कथानक के प्रस्तुतीकरण में रवानीयत है, एक प्रवाह है
फलस्वरूप कहीं ठहराव लक्षित नहीं है।
गुनई जैसे सहृदय एवं
पथप्रदर्शक मित्र से मुलाकात कथानक का महत्वपूर्ण अंश है जो सम्पूर्ण कथानक में अपनी अहं स्थिति
बनाए रखता है। आज के समय में दुर्लभ हो, ऐसी अपने सहकर्मी गुनई संग मित्रता एवं
प्रेम भाव निश्चय ही उस दौर में आम जन की सहज सरलता एवं निश्छलता को बखूबी
परिभाषित करता है। मित्रता के भाव के संग मित्रों के परस्पर सम्मानजनक संबंध
प्रभावित करते हैं। जहां गुनई द्वारा मिल की नौकरी छोड़ कर गांव वापस आ कर पढ़ाई
करते हुए प्रगति करना एक गंभीर सकारात्मक संदेश है एवं शिक्षा के महत्व को उस काल
में भी आम जन द्वारा स्वीकारा जाना दर्शाता है, वहीं गुनई द्वारा अपने सहकर्मी नवयुवक
को चूल्हे पर खाना बनाना सिखाना और जीवन में आगे बढ़ने हेतु शिक्षा का महत्व समझाना
जैसे बिन्दु उनकी सज्जनता, सहयोगी स्वभाव एवं मित्रता के भाव को उनके द्वारा दिए
गए मान को प्रस्तुत करता है।
युवा अवस्था में नई
नौकरी फिर वह बड़ी हो या छोटी, मुश्किलें कमोवेश सभी की समान ही होती है, जो इंसान
को परिवेश एवं स्थितियों के अनुरूप ढलने हेतु विवश करती है तथा भविष्य निर्माण
हेतु दिशा प्रदान करती हैं, इन समस्त विषयों पर भी रोचक प्रसंग बने हैं।
पारिवारिक संबंधों के स्तर पर भाभी से इतर अन्य सभी रिश्ते सामान्य कहे जा
सकते हैं, विशेष तौर पर मामा का सहयोग। तेज़तर्रार ताई के सामने
विवश बुजुर्ग माता पिता जो प्रस्तुत कथानक में प्रथम पीढ़ी का नेतृत्व कर रहे हैं, का
दर्द बार बार उभर कर आता है, जो शहरी अथवा ग्रामीण सम्पन्न अथवा विपन्न हर घर की
कहानी बयान करता है।
एक ऐसा संपन्न परिवार, जहां आर्थिक तंगी जैसा कुछ नही , बल्कि इसके
उलट घर में मजदूर का म करते हों किन्तु परिवार के मुखिया द्वारा, संतानों (भाइयों)
के बीच प्रेम भाव बनाए रखने तथा बैर भाव को बढ़ने से रोकने हेतु एवं रोज रोज की गृह कलह से बचने
हेतु एक बेटे को घर से दूर कपड़ा मिल में मजदूरी पर लगा देना, परिवार में एका बनाए
रखने हेतु एक पिता के प्रयास, विवशता एवं दूरदर्शिता दर्शाता है।
बात मज़दूर एवं मजदूरी
की हो रही है तो बताते चले की उपन्यास में भी रूपसिंह जी ने दो अलग अलग श्रेणियों
के मजदूरों की बात रखी है, एक तो वे जो साधन सम्पन्न होते हुए भी परिस्थिति विशेष
के कारण मजबूरन श्रमिक हैं। दूसरे वे हैं जिनके पास आजीविका हेतु अन्य कोई साधन ही
नहीं है।
कथानक में उठाए गए अमूमन सभी विषय कहीं न कहीं या तो सामाजिक बुराई अथवा वैयक्तिक कमियों को दर्शाते हैं।
रूप सिंह जी की स्थल
चित्रण अथवा व्यक्ति परिचय की विशिष्ट शैली कथानक को रोचक बनाने में अहं भूमिका
याद करती है। दृश्य को इतने विस्तार एवं करीब से बयान किया जाता है कि कहीं भी वह
कल्पना प्रतीत नहीं होती फिर वह घर गांव की भौगोलिक स्थिति हो कोई घटना या फिर
किसी व्यक्ति से वार्तालाप आदि।
उनके प्रस्तुतीकरण की
शैली किसी विशेष घटना क्रम के बिना भी, पाठक को बांध कर रखती है तथा वर्तमान तेज रफ्तार
जिंदगी में भी बैलगाड़ी और साइकिल के किस्से, टीन के बक्से और दरी में लिपटे
बिस्तर की बाते उबाऊ नहीं लगती बल्कि इसके उलट कथानक से और अधिक जोड़ती हैं।
उपन्यास के दूसरे भाग
में कहानी तीसरी पीढ़ी और उनकी संतानों पर केंद्रित हो जाती है। वहीं अंतिम खंड
पूर्णतः तीसरी पीढ़ी से संबद्द है।
कथानक के दूसरे एवं तीसरे खंड में स्त्री
शिक्षा का महत्व एवं दहेज की समस्या को बहुत असरदार तरीके से उठाया गया है। एक मेधावी
युवती को समाज के ही एक घाघ व्यक्ति द्वारा अपने बेटे की नाकाबिलीयत से वाकिफ रहते
हुए भी ,अपनी बहू बनाने हेतु जिस प्रकार प्रयास किए गए, उसके पीछे युवक के पिता की
ताजीवन घर में निरंतर कमाई लाकर देने वाली बहु लाना उनकी ओछी मानसिकता एवं दहेज की
अव्यक्त लालसा को विस्तार से सामने रखता है।
विवाह पश्चात अपनी पत्नी के समकक्ष न बन पाने
की कुंठा से ग्रसित युवक की मनोदशा एवं कार्यकलाप सोचने हेतु विवश करते है। विवाह
में पति पत्नी के मानसिक स्तर एवं पद प्रतिष्ठा में असमानता के प्रभाव दिखलाने
हेतु सृजित घटनाक्रम अपना संदेश देने में पूर्णतः सक्षम रहा है। इस बेमेल विवाह का
अंत क्या हुआ, गुनई का प्रगति रथ कहां तक
पहुंचा और मन में उठ रहे कथानक से जुड़े बहुत से सवालों के जवाब पाने के लिए अनिशात
से गुज़र जाएं।
अतुल्य खरे
रूप सिंह चंदेल जी की लेखन शैली से प्रभावित हैं, तो आप इन पुस्तकों को अवश्य पढ़ें फिलहाल समीक्षा पढ़ने हेतु पुस्तक के नाम पर अवश्य क्लिक कर समीक्षा पढ़ें: 



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