Main Abhi Jinda Hoon -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

 

        

·                 Pustak Samiksha : Atulya Khare

·                 समीक्षित पुस्तक : मैं अभी जिंदा हूँ

·                 विधा : उपन्यास

·                 द्वारा : शिखा मनमोहन शर्मा

·                 सृष्टि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

·                 प्रथम संस्करण : 2020

·                 मूल्य : 190.00

·                 समीक्षा क्रमांक : 239

उपन्यास मैं अभी जिंदा हूँ का मुख्य कवर पेज

शिखा मनमोहन शर्मा द्वारा रचित उपन्यास “मैं अभी जिंदा हूँ” 6 वर्ष पूर्व सृष्टि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था, किन्तु अपने विशिष्ट कथानक के कारण आज भी उतना ही प्रासंगिक है। पूर्व में मेरे द्वारा शिखा जी की पुस्तक “नीरा” की समीक्षा की गई थी एवं अब उनके द्वारा लिखित इस उपन्यास को पढ़ने के बाद यह और भी स्पष्ट हो जाता है की लेखिका पात्र के मन के भावों का विश्लेषण कर उन्हें अभिव्यक्ति देती हैं, उनकी मानसिक अवस्था उनके मस्तिष्क में विचारों के झंझावात को अनुभव करती है, उनका विस्तृत विश्लेषण करती हैं और तब वही भाव एवं पीढ़ा शब्द रूप में उनके कथानक में अभिव्यक्त होते है।

उनका प्रस्तुत उपन्यास “मैं अभी जिंदा हूँ” यूं तो एक पिता के शब्द हैं, किन्तु कथानक मध्यवर्गीय परिवारों की रोजाना की जद्दोजहद का कटु यथार्थ, स्त्री-विमर्श और पारिवारिक सामंजस्य का बहुत ही सशक्त और विस्तृत चित्र प्रस्तुत करता है। यह मात्र एक पिता और बेटियों के संघर्ष की, अथवा एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समाज के संक्रमण काल को दर्शाता हुआ चित्र है। जीवन के विभिन्न रंगों को उन्होनें विभिन्न पात्रों के माध्यम से कथानक में सँजोने के प्रशंसनीय कार्य को बखूबी अंजाम दिया है।

कहानी का सबसे खूबसूरत किन्तु विरोधाभासी पहलू माता-पिता का रिश्ता है। सामान्यतः कम आय और छह बच्चों का भारी आर्थिक और मानसिक दबाव परिवारों में विशेष तौर पर पति पत्नी के बीच कलह, कुंठा और बिखराव का कारण बनता है, परंतु, यहाँ पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम, परस्पर सम्मान और बिना किसी लड़ाई-झगड़े का जीवन एक अत्यंत सकारात्मक और सुकून देने वाली अनुकरणीय स्थिति है जो एक खूबसूरत संदेश बन कर उभरा है। यह इस बात को स्थापित करता है कि यदि जीवनसाथी के बीच समझ और प्रेम हो, तो भौतिक अभावों और सामाजिक दबावों से भी मुकाबला किया जा सकता है।

उपन्यास मैं अभी जिंदा हूँ की लेखिका शिखा

जहां ज्यादा संतान और आय कम हो वहां एक एक बच्चे की जिम्मेवारी भी बोझ समान लगती है फिर यहाँ तो किस्सा छह बेटियों के पिता का है। पिता कैसे अपनी जिम्मेवारियों से शीघ्र मुक्त होने हेतु प्रयासरत है, कुछ उस प्रसंग में चित्रित होता है जहां अच्छा घर वर मिलते ही पिता अपनी जिद में, अपनी एक बेटी की शादी पक्की कर देते हैं किन्तु बाद में जब लड़की अपने स्तर पर जांच परख करती है तब लड़के के परिवार का अत्यधिक रूढ़िवादी होना, पुरुष का पत्नी को मात्र घरेलू काम वाली मानना एवं नौकरी करवाने में भी अड़चन, जैसे विषय पता चलते है। इस प्रसंग के द्वारा लेखिका ने कई सामाजिक मुद्दों को विचारार्थ प्रस्तुत किया है यथा विवाह के बाद लडकी का स्वाभिमानमर्यादित आजादी, कम से कम अपनी पसंद से रहने की स्वतंत्रता आदि।

वहीं परित्यक्ता, और कालांतर में विधवा बेटी के विवाह के विषय को उठाकर लेखिका ने नारी कल्याण जन चेतना तथा सामाजिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु को विचारार्थ रखा है जिस पर अवश्य मंथन होना चाहिए हालांकि कथानक काफी समय पहले का है तब से अब तक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं फिर भी जहां गुंजाइश बाकि है वहां कार्य होना चाहिए। सीमित आय के घरों की चिरपरिचित समस्याओं से हटकर, अन्य विषयों पर कथानक को केंद्रित किया गया है।

कथानक में विमर्श के विषय मूलत: वहीं हैं जिन्हें हम रोजमर्रा के जीवन में देखते एवं अनुभव करते हैं यथा आर्थिक रूप से परेशान पिता पर लड़कियों की शादी का दबाव, उनसे संबंधित खर्चों की व्यवस्था, और सभी बहनों के बीच की सौहार्द पूर्ण बातें।

कथानक में यह एक सकारात्मक बिंदु अवश्य उल्लेखनीय है कि माता पिता लड़कियों को बोझ नहीं समझ रहे हैं, उन्हें सहर्ष स्वीकार कर उनके संग यथा संभव खुशी बाँट कर रहते हैं। वहीं परिवार की एक बेटी का शादी के बाद अपनी एक छोटी बच्ची सहित पिता के घर वापस आ जाना एवं बेटी को लेकर पति से कानूनी लड़ाई आदि वर्तमान में एक आम समस्या बन चुके मुद्दे को उठाते हैं वहीं उस छोटी बच्ची के शराबी पिता की मौत के बाद उस बच्ची को उसी परिवार में चाची द्वारा अपना लेना आम लीक से हटकर है एवं अमूमन समाज में इसके विपरीत ही देखने में आता है । महिला पात्रों की अत्यधिक संख्या अवश्य कई बार भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है।

उपन्यास मैं अभी जिंदा हूँ का back cover

कथानक के मध्य में घर परिवारों में होने वाली छोटी छोटी आम बातें, शादी व्याह के अवसर पर महिला चर्चा की भी स्थान दिया गया है । शिखा जी की शैली इस उपन्यास में अत्यंत सामान्य ही है कहीं किसी भी प्रकार से सज्जित करने का प्रयास लक्षित नहीं है जिस से कथानक सहज और सरल भाव दिखलाता है ।

वहीं मध्यमवर्गीय परिवार में संस्कारों एवं व्यवहारों इत्यादि के चित्रण पर बेहतर कार्य किया गया है जो कहीं भी न तो बनावटी प्रतीत होता है न ही उसकी कमी अनुभव होती है।

कथानक में पिता का अपनी बेटियों की शादी को लेकर सदा ही तनावग्रस्त रहना समाज में गहरे पैठे उस दबाव को दर्शाता है, जहाँ बेटियों का विवाह पिता के लिए जीवन-मरण का प्रश्न, या नितांत पारिवारिक उत्तरदायित्व होते हुए भी सबसे बड़ी सामाजिक ज़िम्मेदारी बन जाता है। पिता अपनी जगह गलत नहीं है, वह अपनी क्षमता से सर्वश्रेष्ठ करना चाहता है, लेकिन विवाह को लेकर सामाजिक मापदंडों के निर्वहन का दबाव भारी है।

कहानी में छह बेटियों के माध्यम से विवाह के अलग-अलग रूपों और स्त्रियों की मानसिक स्थितियों को बहुत ही सधे हुए ढंग से पेश किया गया है, पति के दुर्व्यसनी निकलने पर लड़की का घुट-घुट कर ससुराल में जीवन बर्बाद करने के बजाय मायके वापस आ जाना एक प्रगतिशील कदम को समर्थन देता है तथा डोली और अर्थी वाली दकियानूसी सोच को खारिज करता है।

वहीं पिता द्वारा सब अच्छा देखकर तय किए गए रिश्ते की सच्चाई सामने आने पर लड़की द्वारा रूढ़िवादि  और पिछड़ी सोच को समय रहते पहचान कर ऐसे रिश्ते के जुडने से पहले ही उस से किनारा कर लेना आज की सतर्क युवा पीढ़ी की जागरूकता दर्शाता है।

 एक बेटी का प्रेम विवाह कर लेना और खुश रहना इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में युवाओं द्वारा अपना जीवनसाथी स्वयं चुनने के मामलों में रिश्ते के सफल होने की संभावना, थोपे गए निर्णयों की अपेक्षा अधिक हो सकती है, या शायद नहीं भी ।



 छोटी लड़की का शादी न करने का निर्णय लेना प्रस्तुत कथानक का सबसे विद्रोही और नारी शक्ति दर्शाता स्वतंत्र स्वर है। यह नारी का अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने के अधिकार का पुरजोर समर्थन और पुष्टि करता है।

उपन्यास समग्रता में एक अत्यंत प्रासंगिक और प्रगतिशील कथानक है जो एक ओर माता-पिता के आपसी प्रेम की मिसाल पेश करता है, वहीं दूसरी ओर “विवाह” की विसंगतियों पर करारी चोट भी करता है।

कथानक दुःख , बेचारगी और निराशा पर केंद्रित न होकर सतत संघर्ष एवं विशेषकर युवतियों में वैचारिक जागरूकता तथा स्त्रियों की अपने हक़ के लिए खड़े होने की एक मिसाल है। कथानक निश्चय ही विभिन्न बिंदुओं पर सोचने हेतु विवश करता है ।

 अतुल्य खरे

उपन्यास मैं अभी जिंदा हूँ के समीक्षक atulya Khare                                                                                                                                             
 पात्रों की मनोदशा  एवं भावों को हूबहू  शाब्दिक रूप  देने वाली लेखिका  शिखा  जी का  उपन्यास  नीरा  यदि आपने नहीं पढा  है तो अवश्य पढ़ें , समीक्षा हेतु    क्लिक करे,  

 ·                 नीरा




Pustak Samiksha : Atulya Khare

 

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Gajshardool -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

पुस्तक अनुक्रमणिका खंड [1] गद्य

क se kahaniyan -- Pustak samiksha : Atulya Khare