Tooti Pencil -- Pustak samiksha : Atulya Khare
· . Pustak
Samiksha : atulya khare
· . टूटी पेंसिल,
· . द्वारा: हंसा दीप,
· . विधा : कहानी,
· . शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
· . प्रथम प्रकाशन वर्ष : 2024
· . मूल्य :225:00
· . समीक्षा क्रमांक : 231
माँ सरस्वती के आशीर्वाद स्वरूप हिंदी साहित्य
जगत के अनमोल खजाने में मूर्धन्य साहित्यकारों के रूप में असंख्य बेशकीमती रत्न
मौजूद हैं उनमें से चंद रत्न ऐसे भी हैं जो सात समुद्र पार विदेशों में भी हिन्दी साहित्य
की मशाल को न सिर्फ प्रज्वलित किये हुए हैं अपितु बहुत ऊंचा उठाए हुए हैं, उन्हीं में से एक ख्यातिलब्ध नाम
वरिष्ठ साहित्यकार “हंसा दीप” है। हंसा जी ने अपने लेखन से जो ख्याति प्राप्त की
है एवं जिस मुकाम को हासिल किया है वह नितांत दुर्लभ है। आज हंसा दीप किसी परिचय
की मोहताज नहीं हैं। अभी तक उनके अनेकों प्रकाशित उपन्यास एवं कहानी संग्रहों को पाठकों
का श्रेष्ठ प्रतिसाद प्राप्त हुआ है, उनकी पुस्तकों की लोकप्रियता उनके लेखन की
श्रेष्टता का स्वप्रमाणीकरण है जिसे विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं एवं मंचों पर
सराहा एवं नवाज़ा गया है।
हंसा दीप जी का प्रस्तुत कहानी संग्रह “टूटी
पेंसिल” उनका 8 वां प्रकाशित कहानी संग्रह है जिसमें उनकी 18 बेमिसाल कहानियों को संग्रहीत
किया गया है। इन में आम जन-जीवन से जुड़ी हुई भावनात्मक, मर्मस्पर्शी एवं
संवेदनात्मक कहानियाँ है जो आम आदमी की वास्तविक जिंदगी से इतने करीब हैं की निश्चय
ही प्रबुद्द पाठक वर्ग के बीच अपनी सार्थकता एवं श्रेष्टता प्रमाणित करेंगी। उनकी
कहानियां मनोभावों की भावनात्मक अभिव्यक्ति के द्वारा प्रभावित करते हुए पाठक को स्वयं
में समेट लेती है, पाठक मानो कथानक का अविभाज्य अंग बन जाता है। भाषा शैली की
सहजता और पात्रों की सरलता पाठक को कथानक से सीधे संबद्द करती हैं। हंसा जी की कहानियां
वास्तविक जीवन का अक्स सामने रखने में सक्षम हैं एवं आम आदमी की ज़िंदगी के मूल में
होने के कारण कहानियाँ सहज ही पाठक को जोड़ लेती हैं। कम ही कहानीकार पाठक को
वास्तविकताओं से इस कदर रूबरू करवा पाते हैं जितना की हंसा जी। वे अपनी विशिष्ट
शैली एवं सुगठित संवादात्मक कथानक से रिश्तों और संवेदनाओं को खुलकर उकेरती हैं।
कहानी संग्रह की शीर्षक कथा "टूटी
पेंसिल" उस मानसिक अवस्था को इंगित करती हुई कहानी है जहां विभिन्न
परिस्थितियों के चलते (प्रस्तुत कथानक में बढ़ती उम्र के साथ आती विभिन्न रोगजन्य
अवस्थाएं) इंसान पूरी तरह से टूटा हुआ अनुभव करता है एवं हर ओर से मात्र ऋणात्मक
विचारों से घिरते हुए और भी व्यथित हो जाता है। टूटी पेंसिल कहीं न कहीं उसके अंदर
के बिखराव और टूटन का प्रतिबिंब ही हैं। कथानक में शार्पनर से पुनः पेंसिल की नोक
बनाने को दर्शाकर ज़िन्दगी के नए जोश एवं उल्लास का प्रारंभ दर्शाने का सफल प्रयास
किया गया है। कथानक में चिकित्सकों द्वारा शंका निवारण हेतु जो विभिन्न परीक्षण
करवाये जाते हैं उनका एक संभावित रोगी की मनोदशा पर एवं उसके परिवार पर कितना
ऋणात्मक प्रभाव पड़ता है अत्यंत विस्तार से दर्शाया है। हालातों का अत्यंत सटीक एवं
स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत किया गया है।
कहानी “उत्सर्जन”, एक भावनात्मक एवं मन के अंदर
लगातार चलते बहुत सारे ख्यालों के बीच की कश्मकश की वह अवस्था दर्शाती है जब मन
सिर्फ दृश्य अवस्थाओं पर धारणाएं निर्मित करता है वहीं 55 वर्ष
लम्बे दाम्पत्य जीवन के परस्पर वास्तविक प्रेम संबंधों का बेमिसाल विश्लेषण
प्रस्तुत किया है, जहां प्यार तो विद्यमान था किन्तु कभी दर्शाया
नहीं गया। पत्नी की मृत्यु पर पति का यह कहना कि,"खुश
हूं मैं, अपने हाथों से उसे जन्नत तक पहुंचाया।" यह वाक्य उस दर्द को बखूबी
बयां करता है जो मन में कहीं बहुत गहरे पैठा हुआ है सच्चे प्यार को सँजोये हुए। कहानी
का दूसरा भाग भी पुत्र के प्रति पिता के अव्यक्त प्रेम एवं स्नेह को रेखांकित करता
है, जहां लेखिका ने पिता पुत्र के संबंधों के बीच के तनाव एवं फिर जुड़ाव को बखूबी
चित्रित किया है। रिश्तों का सुंदर भावनात्मक चित्रण है कहानी, दो पीढ़ियों की सोच
में विद्यमान विरोधाभास की भावनात्मक अभिव्यक्ति है जिसमें माँ के देहांत के
पश्चात पुत्र और पिता के मध्य का तनाव, बेटे के दृष्टिकोण में परिवर्तन के
फलस्वरूप उचित दिशा पाता है। जहां पहले उनके बीच एक संवादहीनता की स्थिति थी वह
पिता के माँ के प्रति दृष्टिकोण को समझ कर समाप्त हो जाती है एवं रिश्ते सामान्य
हो उठते हैं।
“अमर्त्य”, एक ऐसी कहानी है जहां सपने हैं, उड़ान है, शक्ति भर प्रयास हैं जो सपनों की तुलना में शायद मात्र सपने ही
है अर्थात कुछ भी नहीं, ऐसे सपनों को संजोने वाली आँखें है
और सहेजने वाला मन है। अमर्त्य कहानी है एक जुझारू और कर्मठ स्त्री नोआ की, जो यूं
तो सफाई कर्मचारी है किन्तु उसकी आंखों में एक सपना बेसाख्ता पल रहा था कि काश वह उसी
शिक्षा संस्थान में प्रोफेसर बन छात्रों को पढ़ा पाती जहां वह सफाई कर्मचारी है।
सपनों की दुनिया में जीती हुई इस युवती के विषय में शुरू में ही हंसा जी कहती हैं
कि "बीज और दरख्त के फ़ासलों को रौंदने में कामयाब नोआ ", अंततः अपने सपने को साकार होते देखती है, अपनी पोती को
उसी शिक्षण संस्थान में प्रोफेसर के रूप में देख कर। कथानक के माध्यम से कठिन सवालों
के भावुक जवाब प्रस्तुत करती है लेखिका।
कहानी “स्वान” के मार्फत कई तंज़ करती हैं
लेखिका, चंद वाक्यांश देखें, “इंसानों द्वारा कुत्ते की तरह लड़ना सीख लेना”
तो कहीं “शरीफ घरो के कुत्ते”, “कुत्तों की तरह लड़ते हुए
कुत्ते” या फिर “उन कुत्तों किं किस्मत की तुलना उन इंसानी बच्चों से करना जो भूख
से व्याकुल अन्न के दानों के लिए तरस रहे हैं”। अंत अवश्य मानव जगत के लिए सराहनीय
है, उनकी जीवित संवेदनाओं और दया भाव के लिए, जहां वे लिखती है कि “स्वान को इंसान बनते देख मैं अवाक थी”। साथ ही कथानक
के माध्यम से लेखिका द्वारा जानवरों की भावनाओं को भी अत्यंत मार्मिकता से
प्रस्तुत किया गया है। हालिया विकास के युग में निरंतर घटती मानवीयता और संवेदनशीलता
अब इंसानों में कम हुई है किन्तु अन्य प्राणियों में संवेदना की भावनाएं आज भी
प्रबल हैं, कुछ ऐसे ही भाव के साथ अंतिम पंक्तियों में वे यह स्थापित करने में भी कामयाब
रहीं हैं की भाव, दर्द, प्रेम और संवेदनाएं तो इंसान हो अथवा
अन्य जीव सब बराबर ही समझते है हां अभिव्यक्ति भिन्न भिन्न हो सकती है।
कहानी “जिंदा इतिहास” में लेखिका द्वारा कथानक के
माध्यम से गंभीर जीवन दर्शन को लक्ष्य किया है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर पलटकर
देखने पर, जिंदगी एक इतिहास रूप में ही तो बाकी रह जाती है जहां न कुछ पाने को
बाकी हैं न खोने को जमा। इतिहास जो चेहरे की झुर्रियों में बहुत कुछ समेटे हुए होता है अच्छी बुरी
यादें, प्रेम और दर्द के किस्से, सपनों
की सच होने और बिखरने की यादें वगैरह वगैरह। बुजुर्ग बदन की असंख्य झुर्रियां मानो
जीता जागता चलता फिरता इतिहास बन जाती हैं जहां विगत को स्वयं में सँजोये संपूर्ण
इतिहास वही झुर्रिया रह जाती हैं और आज की जीवंतता समेटे
बुजुर्ग आँखें। लेखिका कहती हैं कि तमाम झुर्रियों में हंसी थी पर हंसीं में कोई
झुर्री नहीं थी।
“आसमान” प्रतीक है प्रगति का, अनंत उचाइयों को
पाने का और जीवन के विस्तार का। कहानी है सूने सफेद कैनवास पर दुनिया की विविधताओं
में रंग भरती बच्ची की जहां आढी तिरछी रेखाएं संभवतः जीवन की कठिन डगर और मुश्किलात
को दर्शा रहीं हैं, वहीं जीवन में रंग भरते हुए एवं नौनिहाल को जीवन दे मानवता का
पाठ पढ़ाती युवा डॉ. की। सांकेतिक रूप में कहानी है थक चुकी उदास कोरे कैनवास समान जिंदगी
की, जिसे सांकेतिक रूप में बुजुर्ग
के द्वारा दर्शाया गया है जो सहायकों की मदद से आगे बढ़ते हुए दर्शाती है मानो ठहरे
थक चुके जीवन को अपनत्व एवं सौहार्द रूपी दो सहारे मिल गए हों। वहीं बच्ची द्वारा
कैनवास पर सुंदर रंगों का संयोजन करना भी जीवन के प्रति सकरात्मकता का प्रतीक है।
कहानी “”दो अलहदा छोर एक खूबसूरत कल्पना एवं एक
अनोखा विचार लगती है जहां दो बुजुर्ग अपने बचपन की यादों को दोहराते हुए फिर से
जिंदगी में कुछ और पल खुशियों के जी लेने के जज्बे को दर्शाते हैं। कहानी कहीं
गहरे मन को बेहद करीब से छू जाती है। वृद्धावस्था में जबकि सब कुछ पा लेने के
एहसास के साथ सब कुछ छूटने की भावना भी प्रबल होती है तब उम्र के उस पड़ाव पर जीवन
के सबसे खूबसूरत समय, बचपन के पलों को फिर से जी लेने की तमन्ना को बलवती होते
दर्शाती है कहानी “दो अलहदा छोर”।
नारी विमर्श आधारित समलैंगिकता और निर्वासन विषय
को कथानाक के केंद्र में रखते हुए सृजित “विखंडित” इस महत्वपूर्ण विषय को उठाती एक
महत्वपूर्ण कहानी है। बेटे की इक्षा में पैदा हुई बेटी को ही बेटा मानकर पालने के
दुष्परिणाम स्वरूप उस लड़की में लड़कों की मानसिकता का विकास एवं लड़की होने के एहसास
का शनैः शनैः समाप्त होना एवं कालांतर में एक लड़की से ही प्रेम होना आगे चल कर
गंभीर परिस्थितियाँ उतपन्न करती हैं। कहानी अलगाव के संग स्वयं से जूझते हुए इंसान
की मनोदशा और टूट कर बिखरते हुए एक विखंडित जीवन जीने की मजबूरी को लेखिका ने बहुत
करीब से मानो मन को पढ़ लिया है तथा समझा है। मानसिक ऊहापोह, मनोवैज्ञानिक पहलुओं
के संग मानवीय संवेदनाओं, भाव एवं विषय के लिहाज से श्रेष्टतं इन कहानियों की भाषा
शैली सहज, सरल व सुगम है जिससे रचनाएं अधिक
प्रभावी एवं रोचक हैं।
कहानी " सिरहाने का जंगल" नारी विमर्श
आधारित भावप्रवण गंभीर कृति है जहां नारी स्वयं को सिक्कों के समान बस एक कीमती
वस्तु समझ लेती है किन्तु उसे खोटा सिक्का कहलाना नागवार था। मूलतः यह सांकेतिक
कहानी है जहां प्रतीकों के सहारे नारी जीवन के दर्द और जीवन की कड़वी सच्चाइयों को
उनकी सम्पूर्ण वास्तविकता के संग उकेरा गया है। "सिरहाने
का जंगल" में स्वयं की ताकत सिर्फ एक लड़की होना और एक कीमती सिक्का होना
दर्शा कर उसके पीछे छिपे दर्द को सामने लाने का प्रयास किया गया है। अपने पति को
किसी और के साथ देखने का दर्द, बेटे द्वरा तिरस्कृत होने का दर्द, बार बार बिखरते आत्मविश्वास
को जुटाने की कोशिश, नारी मन को पढ़ने का एक प्रयास है।
कहानी “कुहासा” मानसिक सोच का विश्लेषण एवं उस
मानसिक अवस्था का चित्रण है जब व्यक्ति आत्मकेंद्रित होना प्रारंभ कर देता है एवं
अपने इर्द गिर्द के कोलाहल से दूर स्वयं के मन की शांति पर केंद्रित करता है एवं
उस स्थिति में ऐसे भाव उत्पन्न होना बहुत स्वाभाविक हैं की जो करेगा वही भरेगा।
अर्थात कर्ता ही कर्म हेतु जिम्मेवार होगा। कहानी आम इंसान से थोड़े ऊपर की सोच को
दर्शाती है जहां एक घरेलू महिला घर के तमाम सदस्यों को टोकते सुधारते थक चुकती है
तब समझ पाती है की उसकी अपनी भी ज़िंदगी है एवं उसे बच्चों अथवा पति को उनकी ज़िंदगी
जीने देना है साथ ही यह मानसिकता विकसित करनी है की जिसने गलत किया है वही उसे ठीक
भी करे। उनके अनुसार, तब सारी परेशानियाँ यूं दूर होती प्रतीत होती हैं मानो उसकी नजरों
के सामने छाया "कुहासा" छटता जा रहा हो, किन्तु उसके यूं अचानक हुए
परिवर्तन परिवार के सदस्यों हेतु काफी चौंकाने वाले हैं।
अत्यंत भावुकता से परिपूर्ण कहानी है “पहिये”।
पति पत्नी के अद्भुत प्रेम और जीवनसाथी के प्रेम और समर्पण को दर्शाती मार्मिक
कहानी है जो मोहब्बत की मर्मस्पर्शी और बेमिसाल बानगी है जहां दुर्घटनवश पत्नी कुछ
समय के लिए अपने पैरों पर चलने से मोहताज हो जाती है तथा पति उसके लिए मानो पैर बन
जाता है। प्रेम में समर्पण की पराकाष्ठा को, विश्वास को और त्याग को भी आत्मिक संपर्क
के माध्यम से समर्पित होते संबंधित घटनाक्रम को अत्यंत संतुलित प्रवाह में रचा गया
है। एक अद्भुत प्रेम कथा।।
तनिक दार्शनिक तनिक नैतिक एवं कुछ भौतिकता को
मिला कर प्रस्तुत की है कहानी “घास”, जिसके द्वरा लेखिका ने मन की विसंगतियों को
घास से संबद्द करते हुए उसके बीच में ऊँग आए खरपतवार को जीवन में पनपती बुराइयों
से जोड़ कर देखा है। वहीं कहानी में लीटो का चरित्र प्रभावित करता है तथा उस की
असलियत जान कर उसके प्रति आदर भाव उत्पन्न करते हैं। कहानी की दार्शनिकता के संग
यह पात्र प्रभावित करता है।
पिता और एक विशालकाय वृक्ष की तुलना अथवा समानता दर्शाती
हुई कहानी “पेड़” वास्तविकता की कड़वी सच्चाई बयां करती है। जिस प्रकार एक पुराने
वृक्ष के आंधी में गिर जाने पर अर्थात अनुत्पादक हो जाने पर कोई उसकी जिम्मेवारी
नहीं लेना चाहता, हर वह शक्स जिसने उसका फायदा उठाया था अपने बचाव के रास्ते ढूंढ
लेता है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह पिता भी बुढ़ापे लाचार होने पर संतानों के लिए बोझ
बन जाता है। कथानक में पिता की कोरोना से मृत्यु, एक गंभीर तीक्ष्ण व्यंग्य के रूप
में आता है। तूफान से गिरे पेड़ और कोरोना से मृत पिता की स्थिति समान ही है जिसका
मार्मिक चित्रण किया है लेखिका हंसा दीप जी ने। परिस्थितियों के चलते दोनों ही
बेबस हैं और उस संतान पर निर्भर जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन आहूत कर दिया।
अन्य कहानियाँ "हाईवे 401", “आईना”,”अप्रत्याशित” एवं हलाहल भी अपने कथानक से प्रभावित करती हैं। एक
अवश्य पठनीय कहानी संग्रह।
अतुल्य खरे
pustak samiksha : atulya Khare






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