Mai Baba Ka Kanha -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

  • Pustak Samiksha : Atulya Khare
  • समीक्षित पुस्तक : मैं बाबा  का कान्हा
  • लेखिका : नीलिमा गुप्ता
  • विधा: पौराणिक 
  • प्रकाशक :  दृष्टि प्रकाशन जयपुर


नीलिमा गुप्ता , विशेषतौर पर पौराणिक लेखन से सम्बद्ध है व प्रस्तुत पुस्तक से इतर सीता पर लिखी उनकी कृति “मैं हूँ सीता” व  ‘मैं कृष्ण सखी’ भी प्रकाशित हुयी हैं  एवं पौराणिक विषयों को देखने के अपने एक भिन्न नज़रिए के चलते सुधि पाठक वर्ग द्वारा बेहद सराही गयी, एवं उनके विशिष्ठ कृतित्व को  विभिन्न मंचों पर प्रतिष्ठित पुरुस्कारों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। 

मैं बाबा  का कान्हा  पुस्तक का front cover

पुस्तक विभिन्न स्थानों पर प्रचलित कथाओं एवं मान्यताओं से भिन्न लेख देती है किन्तु किसी प्रमाणिकता का दावा प्रस्तुत नहीं किया गया है अतः उसे मात्र कथानक की रोचकता बनाये रखने हेतु किये गए संशोधन के रूप में ही लिया जाना चाहिये।

प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने वासुदेव, जो कि विष्णु के आठवें अवतार थे , कृष्ण और उनके भाई बलराम और सुभद्रा के पिता थे व एक गोप राजकुमार थे और  महान यादव राजा शूरसेन के पुत्र थे व उनके  सखा नंद जो कि वासुदेव के चचेरे भाई हैं वह भगवान कृष्ण के पालक पिता थे की मित्रता के परिप्रेक्ष्य में , बाबा नन्द का अनदेखा चरित्र चित्रण तो प्रस्तुत  किया ही है साथ ही कृष्ण की भिन्न सीख भी बहुत ही आसान शब्दों में प्रस्तुत कर दी हैं ।  

पुस्तक में नन्द के चरित्र के विभिन्न पहलुओं को  विस्तार से कहानी रूप में कृष्ण के ही श्रीमुख से प्रस्तुत करा है वह नन्द के प्रति बहुत से अनजाने पह्लुओं पर गौर करने को बाध्य तो करता ही है उन्हें अत्यंत प्रमुखता से स्थापित भी करता है ।  प्रारंभिक भाग में जहां कृष्ण जन्म , उनका गोकुल पहुंचना  व बाद में कंस के बुलावे पर उसकी राजसभा में जाकर भरी सभा में कंस वध आदि विषयों का रोचक वर्णन है वहीं  बाबा नंद से प्राप्त विभिन्न शिक्षण एवं सीखों का कैसे एवं कब कब उनके जीवन में श्री कृष्ण ने प्रयोग  किया यह कृष्ण के द्वारा बतलाया है ।

प्रस्तुति इतनी सरल एवं वास्तविक लगती है मानो कृष्ण श्रीमुख से ही सारा वृतांत उधृत हो रहा हो ।  पुस्तक के उत्तर भाग में वे उनसे सम्बद्ध कंस वध के पश्चातवर्ती घटनाक्रम विषय में कृष्ण की संलिप्तता , उनके द्वारा लिये गए निर्णय एवं उन निर्णयों की आवश्यकता  तार्किकता एवं सार्थकता , स्वयं कृष्ण के ही शब्दों में प्रस्तुत करती  है । जो की बेहद सरल , ज्ञानवर्धक होते हुए अवश्य पठनीय है ।


मैं बाबा  का कान्हा  पुस्तक का Back  cover

  

प्रस्तुत पुस्तक में नंद चरित्र का वर्णन बेहद सादगी पसंद , सम्पूर्ण गोकुल को अपना परिवार समझने वाले , वैभव विलासिता से पूर्णतः विमुख सबके सुख दुख में साथी ,कर्तव्य को प्रधानता देने वाले धीर गंभीर एवं रिश्तों को मान देने वाले व्यक्ति के रूप में किया गया है । कृष्ण को वसुदेव की अमानत समझ कर उनका पालन पोषण करना ,  एवं कंस वध के पश्चात उनसे एक निर्मोही सा वर्ताव उनकी  सुदृढ़ , परिपक्व  विचारधारा  व मित्र की अमानत उनके सुपुर्द कर अपने दायित्व पूर्ती के समापन पश्चात मोह त्याग उनके मानसिक सुदृढ़ता का  परिचय देता है ।  

उनके द्वारा जन हित एवं समाज कल्याण को प्रमुखता देते हुए  अपने कर्म को सदैव वरीयता देना , अपने सखा धर्म का पालन अपनी संतान का बलिदान देकर भी करना और अपने कर्तव्यों के सफल निर्वहन पश्चात बिना किसी प्रत्याशा के सारे मोह-पाश से एक बारगी ही स्वतः को आज़ाद कर वापस अपने सादगी पूर्ण जीवन को लौट जाना उन्हें एक अदभु विभूति के रूप में स्थापित करता है एवं संभवतः उन्हें इस दृष्टिकोण से देखने में लेखिका ने वरीयता प्राप्त  की है ।

ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। । कंस ने अपनी चचेरी बहन देवकी को मारने का इरादा किया था, इस भविष्यवाणी से डरकर कि उसकी आठवीं संतान उसे मारने के लिए नियत थी। वासुदेव,  कंस से यह वादा करके अपनी पत्नी की जान बचाने में कामयाब रहे कि वह उनके सभी बच्चों को कंस को सौंप देंगे।

जब कृष्ण का जन्म देवकी से हुआ, श्रीकृष्ण के प्रभाव से उसी क्षण बन्दीगृह के दरवाजे स्वयं खुल गए। द्वार पर पहरा देने वाले पहरेदार राक्षस सभी मूर्च्छित हो गए। देवता के निर्देशों का पालन करते हुए, वासुदेव शिशु को नंद और यशोदा के घर ले गए, और उनकी नवजात बेटी योगमाया के साथ उसकी अदला-बदली कर दी। वे तत्क्षण वहां से वापस आकर कंस के बंदी गृह में पहुँच गए।

मैं बाबा  का कान्हा  पुस्तक का front cover

प्रातःकाल कंस  स्वयं कारागार में गया और उसने देवकी की गोद से कन्या को झपट लिया और उसे एक पत्थर की चट्टान पर पटक दिया किन्तु वह कन्या विष्णु की माया से आकाश की ओर चली गई और अंतरिक्ष में जाकर विद्युत के रूप में परिणित हो गई।

उसने कंस से कहा कि हे दुष्ट! तुझे मारने वाला उत्पन्न हो चुका है और उसी से तेरी मृत्यु सुनिश्चित है। मेरा नाम तो वैष्णवी है, मैं संसार के कर्ता भगवान विष्णु की माया से उत्पन्न हुई हूँ, इतना कहकर वह स्वर्ग की ओर चली गई।

आकाशवाणी को सुनकर कंस क्रोधित हो उठा,  उधर नंद सारा राज़ छुपाते हैं व कृष्ण को कंस व उसके गुप्तचरों की निगाहों से बचा  कर रखते हुए पालनपोषण करते हैं किन्तु  कंस ने नंदजी के गृह में कृष्ण का वध करने के लिए पूतना , केशी अरिष्ठ ,काल्याख्य आदि अनेकानेक दैत्यों  को कृष्ण की हत्या करने हेतु भेजा किन्तु कृष्ण लीला के सम्मुख वे समस्त पराजित हो गए और अपने बलवान राक्षसों की कृष्ण के द्वारा मृत्यु के आघात से कंस अत्यधिक भयभीत हो गया। तब उसने कृष्ण को बुलवा भेजा किन्तु वहां  राज सभा में ही कृष्ण ने कंस को घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, जिससे वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

नन्द यह जानते हुए भी की कृष्ण ही भविष्य के राजा है, उन्हें कोई मोह अथवा लालच नही हुआ , वे पूर्णतः निस्पृह थे।  इसके उलट कृष्ण की शिक्षा , शस्त्र-शास्त्र के ज्ञान एवं राज्पुरोषिचित पालन  पोषण हेतु वापस गोकुल आने की कान्हा की ज़िद को भी ठुकरा दिया । कृष्ण की विभिन्न विशिष्टताओं से वे वाकिफ थे , अतः बुराइयों के नाश एवं धर्म की स्थापना हेतु  उन्हें अपने  मोहपाश से मुक्त कर एवं स्वयं भी अपना मन कठोर  कर वहां से चले गए ।

यदि पुस्तक को कृष्ण मुख से ही समझें तो यहाँ कृष्ण ने अपने समस्त गुणों का श्रेय  बाबा नन्द की शिक्षा एवं संस्कारों को ही दिया है ।  बाबा के गुण जो कृष्ण ने अपनाए व गीता में एवं उनके उपदेशों में नज़र आये।  पुस्तक कृष्ण के दर्शन को बेहद आसान शब्दों  में समझाने में सफल है। गीता के  ज्ञान कृष्ण के दर्शन एवं वृहद सोच के मूल पर लेखिका ने विस्तृत एवं गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया है ।

बाबा नन्द का निष्काम कर्म का भाव बिना किसी कामना आशा या लालच के , बिना किसी को अपने त्याग का बखान करे , बिना किसी पर अपना कोई हक अथवा अधिकार दिखाए निर्लिप्त एवं निष्काम भाव से अपने कर्म करने का भाव    किसी से मोह न रखना युद्ध से न भागना आदि वे गुण थे जो सभी कहीं न कहीं बाबा ने अपने कर्मों के द्वारा सहज जीवन शैली के द्वारा भी कृष्ण को संस्कार रूप में दिए जो बचपन से ही कृष्ण के संस्कारों में आ गये  थे एवं कान्हा का सारा जीवन ही उसकी आभा में गुजरा । इसी प्रकार स्वधर्म का  ज्ञान भी बाबा से ही कृष्ण ने  प्राप्त किया । जो युद्ध क्षेत्र में उन्होंने अर्जुन को दिया ।

नंद वासुदेव के बीच के रिश्ते को इतने भिन्न तरीके से देखा गया है जैसा संभवतः पहले कहीं नही लिखा  गया अथवा देखने में नहीं आता । कृष्ण के प्रति कंस की शत्रुता के चलते वासुदेव द्वारा उस नवजात  को नंद के सुपुर्द करने तक तो फिर भी सब सामान्य है किंतु अपनी सद्ध  जात पुत्री वासुदेव के सुपुर्द कर देना वह भी महज़ मित्रता से वशी भूत हो निश्चय ही अद्वितीय है एवं मित्रता में त्याग की एक अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करती है  

पुस्तक में स्वयं श्री कृष्ण भी कहते हैं कि , बाबा के समक्ष मैं तो कुछ भी नही, एवं सुदामा के प्रति किये गए अपने व्यवहार को वे इस मित्रता के सम्मुख अत्यंत नगण्य मानते हैं । लेखिका ने नंद एवं वासुदेव के प्रेम को उस नज़रिये से देखा एवं प्रस्तुत किया है जैसा कि कहीं देखने में नहीं आता। नंद का त्यागअपनी पुत्री का बलिदान , नंद के बहुत सारे विशिष्ट गुण ,उनकी दूरदर्शिता एवं विशिष्ट रणनीति जो अंततः कंस का वध करने में बहुत उपयोगी साबित हुई एवं अन्य वे समस्त गुण जो नंद के पात्र को गढ़ते हुए  लगभग हर ग्रंथ में हर स्तर पर गौढ़  रहे अथवा  जहाँ कहीं यदि उल्लिखित हुए भी तो वहां नन्द का पात्र या तो सम्मुख ही नहीं आया अथवा अत्यंत परिचयात्मक रूप  में विद्यमान रहा किन्तु प्रस्तुत पुस्तक में नन्द के पात्र को सम्पूर्ण विशेषताओं के साथ अत्यंत रोचक प्रस्तुति द्वारा दर्शाया गया है ।

पुस्तक के नज़रिए से देखने पर नंद का पात्र एक बेहद प्रमुख पात्र बन कर उभरता है । जो कि वासुदेव पर भी भारी पड़ता है एवं यदि एक स्वतंत्र नज़रिए से अवलोकन एवं मूल्यांकन किया जावे तो वास्तविक त्याग बाबा नन्द का एवं शायद उनसे भी बढ़ कर यशोदा का था वहीं समस्त ज्ञान जो कृष्ण ने अर्जुन को गीता के माध्यम से दिया अथवा अपने दैनिक आचरण द्वारा प्रस्तुत किया वह भी नन्द बाबा के ही संस्कारों का प्रतिरूप था .

वहीं वासुदेव द्वारा कंस के प्रभाव के समक्ष बिना किसी प्रतिरोध अथवा प्रयास के ही अपनी  समस्त संतानों को हत्या हेतु कंस को सौंप देने का वचन देना, जहाँ उनके भीरु व्यक्ति की छवि सामने रखता है व कृष्ण के पिता होने के अतिरिक्त एवं जन्म के समय तूफानी रात्री में कृष्ण को नन्द के घर तक पहुचाने के अतिरिक्त वासुदेव के पक्ष में कोई अन्य त्याग लक्षित नहीं होता न ही मित्र एवं मित्रता हेतु उनके द्वारा किये गए कोई भी प्रयास नज़र आते हैं , तथा नन्द के सम्मुख उनकी भूमिका मित्र की न प्रतीत होकर उस व्यक्ति की होती है जो  अपने  मुश्किल समय में उनसे लाभ प्राप्त कर उनके उपकारों से उपकृत हुए ।

 प्रस्तुत पुस्तक के द्वारा लेखिका ने एक प्रमुख पौराणिक पात्र के चरित्र के अनदेखे एवं अनछुए पहलुओं को सामने लाकर सोच की नयी दिशा दी है एवं उनका यह प्रयास अवश्य ही सराहनीय  है । 

      

मैं बाबा  का कान्हा  पुस्तक समीक्षक Atulya Khare                                                                                                                                             

    अतुल्य    खरे 

पौराणिक विषयों को देखने के भिन्न नज़रिए होना बहुत संभव है। नीलिमा जी के पौराणिक पात्रों पर केंद्रित समस्त रचनाएं निश्चय ही ज्ञान एवं जानकारी संवर्धित करती हैं एवं अवश्य पठनीय हैं 

  • मैं बाबा का कान्हा 
  • मैं हूँ सीता 
  • मैं कृष्ण सखी    




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