Sahitya Ki Gumtee -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

 

  • Pustak Samiksha : Atulya Khare  
  • समीक्षित पुस्तक : साहित्य की गुमटी
  • द्वारा: धर्मपाल महेंद्र जैन
  • शिवना प्रकाशन सीहोर द्वारा प्रकाशित
  • प्रथम संस्करण : 2025
  • मूल्य : 275.00
  • समीक्षा क्रमांक : 227

vyangy sangrah sahitya ki  Gumti ka front cover

प्रभावी शैली के वरिष्ठ व्यंग्यकार, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान रखने वाले सम्मानीय लेखक, प्रवासी धर्मपाल महेंद्र जैन का नवीनतम व्यंग्य संग्रह 'साहित्य की गुमटी' समकालीन हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति है। 50 व्यंग्य रचनाओं का यह संग्रह समाज, राजनीति, प्रशासन की विसंगतियों का एक बेहतरीन कच्चा चिट्ठा है जिसे शिवना प्रकाशन सीहोर द्वारा आकर्षक आवरण पृष्ट के संग प्रकाशित किया गया है। इसमें शामिल समस्त रचनाएं रचनाएँ यूं आकार में तो छोटी हैं, किन्तु व्यवस्था की विसंगतियों पर चोट बड़ी ही करती है।

इसके पूर्व धर्मपाल जी के 8 व्यंग्य संग्रह एवं 4 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जबकि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे स्थायी स्तम्भ लेखन एवं सम्पादन कार्य की लंबी सूची है एवं साहित्य विभूषण तथा व्यंग्य भूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मान के साथ ही समय समय पर उनके साहित्य जगत में उल्लेखनीय योगदान हेतु विभिन्न संस्थाएं भी उन्हें सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं।

 धर्मपाल जी की शैली विशिष्ट है, जहां हास्य के पुट के साथ एक गहरी सच्चाई एवं व्यंग्य छिपा होता है। वे अलंकारिक भाषा के बजाय बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं। उनके व्यंग्य में “मालवी” परिवेश की सहजता के संग दीर्घ कालीन विदेश प्रवास से प्राप्त अनुभवों की परिपक्वता का मिश्रण देखने को मिलता है। उनके तंज़ तीखे होते हुए स्पष्टतः पाठक की ही प्रतिक्रिया समान प्रतीत होते हैं। उनके कथानक में वह सरलता होती है जो पाठक को उस से जोड़ दे एवं बहुधा पाठक स्वयं को उस विसंगति का हिस्सा मान कर ही कथानक से संबद्द होता है।

vyangy sangrah sahitya ki  Gumti ka back  cover

धर्मपाल जी की लेखन शैली अत्यंत सरल एवं भाषा चुटीली है। वे भाषाई क्लिष्टता से दूर प्रचलित लोक-मुहावरों और सामान्य शब्दों में अपनी बात कहते हैं। उनकी रचनाए समाज के ज्वलंत मुद्दे को निर्भीकता से उठाती हैं जिनमें वे सीधे सत्ता और व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।

​संग्रह का शीर्षक 'साहित्य की गुमटी' अपने आप में एक गहरा व्यंग्य है। पूर्व में जहां साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता था, जो हमारी संस्कृति का बटवृक्ष रूप था वही आज किस स्तर पर आ गया है।  हाल के दौर में पनपे हल्के स्तर के आचरण के द्वारा निम्नस्तरीय होते वैचारिक दायरों को एक गुमटी से संबोधित कर (गुमटी' शब्द एक छोटी, अस्थायी दुकान के लिए प्रयुक्त होता है जिसे कुछ जगहों पर खोखा भी कहा जाता है) उसकी असलियत को उजागर किया है।

vyangy sangrah sahitya ki gumti ke  lekhak Dharmpal Mahendra Jain

लेखक ने शीर्षक के माध्यम से स्पष्ट संकेत दिया है कि आज के दौर में साहित्य अपनी व्यापकता, गंभीरता खो कर अत्यंत संकीर्ण हो चुका है। वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य गुटबाजी, सिफारिशों, निहित स्वार्थों और पुरस्कारों की अंधी दौड़, के कारण एक “गुमटी” के समान संकुचित हो गया है।

 ​ उनकी दृष्टि पैनी, अवलोकन सूक्ष्म तथा वार घातक हैं।  वे राजनीति, धर्म, तकनीक और मानवीय स्वभाव को बखूबी पहचानते हैं। साथ ही उनके व्यंग्य लेखन के विषय में एक उल्लेखनीय तथ्य उनकी  विषयगत विविधता है। सदा की तरह ही विभिन्न विषयों को उन्होंने अपने व्यंग्य के दायरे में समेटा है। उन्होंने अपनी रचनाओं में मुख्यतःव्यवस्था और लालफीताशाही को व्यंग्य के दायरे में लेते हुए “तानाशाह का मकबरा”“बजट की ढपली और छुटभैया राग” जैसे व्यंग्य लिखे हैं जो सीधे तौर पर सत्ता और उसकी कार्यप्रणाली पर व्यंग्य हैं वहीं बजट की ढफली .. बहुत हद तक सत्यता उजागर करती है। भिन्न भिन्न रचनाओं में लेखक ने राजनीति में बढ़ते दिखावे और संस्थाओं के प्रयोग को अपनी पैनी दृष्टि से पकड़ा है। साथ ही उनकी रचनाओं में लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप, चुनावी वादों और सत्ता के गलियारों में होने वाली जोड़-तोड़ आदि पर गहरा कटाक्ष होता है।

vyangy sangrah sahitya ki gumti ke prakashak shivna

“प्रजातंत्र की अंगूठी”, “ई.डी. है तो प्रजातंत्र स्थिर है” और “हर जिले में विधानसभा बनाएंगे” जैसी रचनाए हैं जो गंभीरता से तंज कर रही हैं कहीं व्यवस्था पर तो कहीं हालिया राजनीति पर, और कहीं राजनीतिज्ञों पर।

वहीं इस संग्रह में उन्होंने इंटरनेट, सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति को अपने निशाने पर लिया है यहाँ लेखक यह दर्शाते हैं कि कैसे तकनीक ने मनुष्य के विवेक को कुंठित कर दिया है जैसे “वाट्सएप नहीं, भाट्सएप”, “लाइक बटोरो और कमाओ”के द्वारा वे समाज की आधुनिक युग में डिजिटल गुलामी पर गहरी चोट करते हैं।

अपने इस संग्रह में उन्होंने विभिन्न विषयों पर रचनाएं दी हैं, चंद रचनाओं में उन्होंने धर्म और संस्कृति के निजि स्वार्थ हेतु हो रहे उपयोग को केंद्रित किया है तो वर्तमान समाज में व्याप्त ढोंग और अंधभक्ति पर प्रहार करती हुई है उनकी रचना “धर्म रक्षक सदाचारी” जिसका प्रथम वाक्य ही बहुत कुछ कह जाता है कि – “एक नव सदाचारी भेड़िया था” जिसमें एक वृद्द भेड़िये के प्रतीक द्वारा उन्होंने समाज में ढोंगी बहुरूपियों तथा धर्म के नाम पर अपने अनाचार को फैलते भ्रष्ट कुकर्मियों पर निशाना साधा है। ​

वहीं कुछ कहानियाँ साहित्य के भाषाई पतन, जोड़ जुगाड़ और गुटबाजी, एवं हालिया साहित्यिक स्तर पर केंद्रित हैं, जिसमें वे साहित्य के क्षेत्र में पनप रही विसंगतियों को दर्शाते हैं जैसे की “भाषा के हाईवे पर गड्ढे ही गड्ढे” और “साहित्य अकादमी-सी पान की गुमटी”। यहाँ उनकी टिप्पणी साहित्य के गिरते स्तर पर है कि कैसे अब साहित्य चर्चा एक 'गुमटी' (छोटी दुकान) के स्तर तक सिमट चली है। इन रचनाओं के द्वारा वे साहित्य जगत के भीतर की राजनीति और साहित्य के दिन ब दिन गिरते स्तर को भी उजागर करते हैं। 'साहित्य अकादमी-सी पान की गुमटी' शीर्षक स्वयं में एक बहुत बड़ा तंज है, जो संस्थाओं के घटते महत्व को दर्शाता है जहां गुमटी को प्रतीक रूप में लेकर उन्होनें अपने कथ्य को प्रमुखता से स्पष्ट कर दिया है।

​​अपने व्यंग्य आलेखों में अथवा अन्य सामान्य लेखों में भी वे मूल रूप से समाज के “दोहरे मा पदंडों” पर तीखे तंज करते हैं। फिर वह धर्म के नाम पर पाखंड हो जैसे की कहानी “धर्म रक्षक सदाचारी” में अथवा प्रगति के नाम पर भ्रष्टाचार जो की कहानी “चिपको और जेब भरो” में दर्शाता है। 

बात करें यदि कुछ अन्य व्यंग्य लेखों की तो संग्रह की पहली कहानी “ज़हर के सौदागर”, जिस के द्वारा वे उन तमाम ताकतों की ओर इशारा करते हैं जो समाज में हर किस्म का जहर फैला रहे हैं फिर वह नफरत हो, सांप्रदायिकता हो अथवा जातिवाद या व्यभिचार। इस में शामिल फिर चाहे वह राजनीति हो अथवा मीडिया, अथवा अन्य, वे इन्हें जहर के सौदागर के नाम से पुकारते हैं उनके कोई मानवीय संवेदनाओं तो शेष रही नहीं हैं।

कहानी “किनारे का ताड़ वृक्ष” पुरानी कहावत बड़ा हुआ तो क्या हुआ को ही उद्वरित करती है एवं अपने भाव से मुहावरे को सार्थक करते हुए अपने वास्तविक रूप में उन व्यक्तित्वों या संस्थाओं पर कटाक्ष है जो यूं तो सामर्थ्यवान हैं, शक्तिशाली हैं, उच्चपदासीन महान व्यक्ति हैं, लेकिन समाज या आम आदमी के लिए किसी काम के नहीं हैं वे अपने सामर्थ्यवान, बलशाली होने के गुरूर में ही झूम रहे हैं। “किनारे” का होना उनका आम जन से दूरी तथा उनकी संवेदनहीनता तथा संवादहीनता का प्रतीक है।

संग्रह की रचना “तानाशाह का मकबरा” सत्ता की अमरता के भ्रम को खंडित करती है एवं इसके माध्यम से वे यह संदेश देते हैं कि इतिहास में कोई भी तानाशाह स्थायी नहीं रहा। “मकबरा” शब्द बखूबी यह संकेत है कि तानाशाह ही नहीं अपितु दमनकारी विचारधाराएं भी अंततः मिट्टी में मिल जाती हैं, मकबरा, शब्द प्रतीक है उस शक्ति का, दमन का और बीते समय का जिसका अब कोई नाम लेवा भी नहीं है।

एक और रचना “होरी खेले व्यंग्यवीरा अवध में” के द्वारा उन्होंने समकालीन साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की स्थिति का चित्रण बखूबी प्रस्तुत किया है। लेखक होली के संदर्भ में विभिन्न साहित्यकारों द्वारा संपादक को प्रसन्न करने के प्रयासों के द्वारा संकेत देते हैं की किस तरह समकालीन साहित्यकार, साहित्य सृजन पर कम किन्तु चाटुकारिता एवं जोड़तोड़ के प्रयासों से छपने और आगे निकलने पर अधिक केंद्रित है।

फिल्मी दृश्यों के संदर्भ का उपयोग करते हुए वर्तमान आधुनिक सामाजिक बुराइयों को रक्तबीज के रूप में व्याख्या करती है उनकी रचना “रक्तबीज का क्या मतलब”, जिस प्रकार रक्तबीज के रक्त की पृथ्वी पर गिरने वाली प्रत्येक बूंद से एक नया दानव अथवा बुराई या फिर शत्रु जन्म ले लेता था, उसी प्रकार इस युग में भी एक बुराई रूपी दानव के खत्म होते न होते दूसरी कोई बुरायी एक नए रूप (भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और अनैतिकता जैसी ) में खड़ी हो जाती है।

नौकरशाही और चाटुकारिता पर एक तीखा प्रहार करती है रचना “साहब को जुकाम है पर...,” जो किसी आम आदमी की बड़ी से बड़ी तकलीफ के विपरीत, बड़े अफसर अथवा राजनेता की छोटी सी तकलीफ के बाबत है जिस में सक्षम को आम जनता के दर्द तकलीफ से परे स्वयं के लिए सम्पूर्ण तंत्र की निर्विकार मर्यादा विहीन सेवा-भक्ति चाहिए। साथ ही सत्तानशीं का आम जन की तकलीफों से दूर स्वयं के श्री गुणगान की फिक्र को दर्शाती रचना है।

“कुर्सी एक, चांदीलाल अनेक”, यहाँ विचारधारा विहीन स्व-हिताय, स्वार्थी, वर्तमान राजनीति में चांदीलाल प्रतीक है उन छुटभैये नेताओं तथा उभरते कामचोर स्वार्थी तथाकथित नेताओं का जो पद पाने के लिए कोई भी कीमत देने को तैयार हैं और वह सब कुछ करने हेतु प्रवृत हैं जिससे उनकी स्वार्थ सिद्धि बिना किसी विशेष प्रयास अर्थात सेवा के हो जाए। उनके लिए कुर्सी ही अंतिम सत्य है। वहीं एक ही कुर्सी अथवा राजनीति का कोई प्रभावशाली पद जिसके लिए कई दावेदारों की खींचतान व उठापटक रहती है, को भी बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

जब संस्कृति के नाम पर मात्र स्वार्थगत आचरण का बोलबाला हो, हर किसी के लिए संस्कृति एवं संस्कारों के वही अर्थ हों जो स्वयं को रास आयें, उनके लिए लाभकारी हों, अंधभक्ति तथा अनैतिक आचरण प्रबलतम हो तब उसे संस्कृति कहना क्या उचित है। चौकने वाले शीर्षक “संस्कृति संक्रामक बीमारी है”, के द्वारा संस्कृति के उस रूप पर व्यंग्य है जिसे मात्र दिखावे के लिए प्रयोग किया जा रहा है, स्वार्थसिद्दी हेतु इस्तेमाल किया जाता है।

हवाई यात्रा के तजुर्बों और हिदायतों को रोचकता के संग प्रस्तुत करती रचना विशेष तौर पर उनके लिए है जो आधुनिकता की दौड़ में शामिल तो हैं किन्तु अक्सर नियमों से बेपरवाही दिखाना उनका खास शगल होता है एवं अनुशासनहीनता सबसे अहम गुण। गहरी बातें हल्के फुल्के अंदाज में हास्य के पुट के संग दर्शाती है रचना “हवाई जहाज जंजीर खींचने से नहीं रुकता”।

​​राजनीति के मौजूद परिदृश्य पर भाषण के मार्फत समकालीन राजनीति, उसमें घुसपैठ के तरीके, व जड़ें जमाने से लेकर ऊपर पहुँचने के प्रेक्टिकल नुस्खे बतलाती रचना है “ चिपको और जेब भरो” जो सत्ताधारी, विपक्षी, एवं चिल्लर पार्टियों के गठबंधन पर भी विस्तार से ज्ञान प्रदान करती है।

वहीं “नाम संस्कारी हो तो जूते खाओ” में अपने ही नाम में शामिल शब्द “धर्म” पर हल्के फुल्के अंदाज में गंभीर किन्तु तार्किक व्यंग्य दे जाते हैं।  नाम की आढ़ में, हालिया माहौल में नाम और ब्रांड की राजनीति पर प्रहार करती हुई रचना है, जहाँ काम से ज्यादा नाम के संस्कारी होने पर जोर दिया जाता है और नाम में राम का नाम लगा कर सब कुछ गलत करने का लाइसेंस लिए लोगों की फेहरिस्त लंबी होती जाती है दिन ब दिन।

कहानी “WhatsApp नहीं भाट्सApp” आज के डिजिटल युग में, सोशल मीडिया पर हल्के फुल्के तंज़ के संग, प्रयोग कर्ताओं द्वारा उसका सुंदर (?) दुरुपयोग पुनः भाट (अथवा भांड जिनका कार्य मात्र राजा की चाटुकारिता करते हुए उसकी तारीफ और शौर्य का बखान ही एक मात्र कार्य होता था तथा वे प्रत्येक राजा के दरबार में पाए जाते थे) संस्कृति को जीवित होने से रोकने के प्रति आगाह करती है।

“साहित्य की गुमटी” मात्र व्यंग्य रचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह इस दौर का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। संग्रह में शामिल प्रत्येक रचना अपने विषय विशेष पर तीखे किन्तु गंभीर तथा गर्भित तंज के कारण अवश्य पढ़ी जानी चाहिए हालांकि यहाँ सिर्फ कुछ ही रचनाओं का जिक्र किया है किन्तु जिनके विषय में नहीं लिखा गया है वे कहीं भी कमतर नहीं आँकी जानी चाहिए। धर्मपाल महेंद्र जैन जी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के आत्म-चिंतन का एक सशक्त माध्यम है। कुल मिलाकर, 'साहित्य की गुमटीवर्तमान समय की विसंगतियों को दर्शाते हुए खरी खरी कह जाने वाला एक ऐसा दस्तावेज़ बन गया है जो समाज का असली चेहरा दिखाता है जिसे हम जाने अनजाने अनदेखा कर देते हैं।​

vyangy sangrah sahitya ki gumti ke  samikshak atulya khare                                                                                                            

धर्मपाल जी अपने व्यंग्य लेखन हेतु जाने जाते हैं क्या आपने उनके अन्य व्यंग्य संग्रह                           एवं कविता संग्रह पढे हैं , यदि नहीं तो निम्न पुस्तकें तो अवश्य पढ़ें   



 अतुल्य खरे       

Pustak Samiksha : Atulya Khare

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Gajshardool -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

पुस्तक अनुक्रमणिका खंड [1] गद्य

क se kahaniyan -- Pustak samiksha : Atulya Khare