Ateet Ke Nirjhar -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

  • Pustak Samiksha : Atulya Khare
  • समीक्षित पुस्तक : अतीत के निर्झर
  • द्वारा: प्रकाश प्रियम
  • विधा: कथेतर 
  • वेरा प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित
  • प्रथम संस्करण : 2025
  • मूल्य : 250.00
  • समीक्षा क्रमांक : 225

                                                                                    

pustak ateet ke nirjhar ka cover

                        गद्य साहित्य की प्रमुख कथेतर विधाओं में एक है संस्मरण। इस प्रमुख विधा में अत्यंत महत्वपूर्ण सृजन हुआ है जो निश्चय ही भविष्य में मार्गदर्शक का कार्य करेगा। संस्मरण को बाज दफा आत्मकथा के समान मान लिया जाता है एवं कहीं कहीं गलत रूप में प्रयुक्त भी होता है किन्तु दोनों में भेद हैं, यथा जहां आत्मकथा के द्वारा पूरे जीवन का क्रमबद्ध इतिहास दर्शाया जाता है वहीं संस्मरण में जीवन की कुछ खास घटनाएँ अथवा विशिष्ट यादें ही लिपिबद्द होती हैं। आत्मकथा में “मैं” ही महत्वपूर्ण होता है एवं उसी के इर्द गिर्द सम्पूर्ण कथ्य होता है किन्तु संस्मरण में लेखक के साथ-साथ अन्य व्यक्ति अथवा घटना भी शामिल किये जा सकते हैं इस के अलावा जहां आत्मकथा सम्पूर्ण जीवन काल पर लिखी जाती है वहीं संस्मरण हेतु कोई विशेष समय सीमा नहीं है यह कोई एक विशिष्ठ काल खंड भी हो सकता है। आत्मकथा जीवन के अंतिम दौर में लिखी जाती है, जबकि संस्मरण के साथ ऐसा कोई बंधन अथवा समय सीमा नहीं है।

“अतीत के निर्झर” युवा साहित्यकार प्रकाश प्रियम के 22 संस्मरणों का संग्रह है जिनमें प्रकाश जी ने बचपन की यादों को खूबसूरती से संजोया है। उनका बचपन उनकी पुस्तक में बार बार दिखता है। पुस्तक को प्रकाशित करने में प्रकाशक वेरा प्रकाशन द्वारा किये गए विशिष्ट प्रयास सराहनीय हैं। युवा लेखक प्रकाश जी साहित्य की विभिन्न विधाओं में समान अधिकार से सृजन कर्म करते हैं। उनके प्रकाशित गजल संग्रह, काव्य संग्रह के अतिरिक्त विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनके लेखों का प्रकाशन एवं रेडियो प्रसारण युवा साहित्यकारों के बीच उनकी गरिमा मयी उपस्थिति एवं प्रमुखता सुनिश्चित करते हैं। त्रुटिहीन पुस्तक का कलेवर आकर्षक है। इस संस्मरण संग्रह में संस्मरण से इतर दो रेखाचित्र (साहित्य की महत्वपूर्ण कथेतर विधा) भी प्रस्तुत किये हैं।  

संस्मरणों की शुरुआत करते हुए प्रकाश प्रियम का पहला आलेख “फुटपाथों की ज़िदगी” उनकी दिल्ली की यात्रा से संबंधित है वह यात्रा जो जो उन्होंने एक साक्षात्कार देने हेतु करी थी किंतु तजुर्बे जो उस यात्रा से हासिल हुए वे उस साक्षात्कार से कहीं ज्यादा अमूल्य थे, यथा वह यात्रा यह बखूबी समझा गई कि पैसे और पेट की भूख क्या क्या नहीं करवा लेती इंसान से।

pustak ateet ke nirjhar ka back cover

वहीं इस पुस्तक में संग्रहीत संस्मरण “छुआछूत का भय ” न सिर्फ अपनी विषय वस्तु हेतु विशिष्ट है अपितु इसकी प्रस्तुति एवं लेखन की सरलता एवं सच्चाई इसे अविस्मरणीय बना देती है। यूं तो संस्मरण है किन्तु उस से कहीं बहुत अधिक, कोमल मन पर पड़ी एक कुप्रथा की छाया और बाल मन में उस के खिलाफ उठते प्रगतिशील विचार है। संस्मरण में लेखक द्वारा वह खंड जहां अछूत बालक के मन में चलते भावों को दर्शाया है उसकी भगवान से विनती कहीं गहरे प्रभाव छोड़ती है। वहीं एक अस्पृश्य महिला से धोखे से ही छू जाने पर बालक के द्वारा भगवान से की जाने वाली प्रार्थना और स्नानादि कर्मकांड बतलाते हैं कि एक समय था जब यह कुप्रथा कितनी गहराई से समाज में अपनी जड़ें जमाए हुए थी। दशकों पूर्व  जन जागृती का नितांत अभाव था व दर्शाई हुई घटनाएं अत्यंत सामान्य ही थी, समय के साथ आए परिवर्तन सकारात्मक हैं। सम्पूर्ण लेख में बालमन की सोच को व्यक्त करते हुए वाक्यांश प्रभावी हैं एवं कुप्रथा पर आघात करने के मंसूबों को पुख्ता करते हैं ।

अगले संस्मरण “वो एक दिन”, में उन्होंने एक ही दिन में तीन बार सांप के रूप में जो मृत्यु से साक्षात्कार किया उसके विषय में बतलाया है जिसे पढ़ते हुए निश्चय ही रोमांच हो आता है। प्रस्तुति बेहद सरल एवं सहज है, भाषाई क्लिष्टता तो कहीं भी है ही नही।

“टांट्यो का छत्ता” बचपन की उन यादों को दुलराता है जो अब बस यादें ही रह गई, बेशक उस वक्त और आज भी वे शरारतें कुछ ज़्यादा ही प्रतीत होती हैं किंतु उस बचपन को इन शरारतों से ही तो जिया था। उनका आनंद जीवन में सदा ही एक मिठास सी घोल जाता है। लेखक द्वारा इन संस्मरणों की प्रस्तुति इतनी रोचक एवं सजीव है की उन के जीवन से जुड़ी इन घटनाओं से गुजरते हुए हम भी कहीं न कहीं अपने बचपन की गलियों में विचरने लगते हैं। क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग संस्मरण को मौलिकता से संबद्द करता है।

“बनास में छलांग” भी एक ऐसा संस्मरण है जो अक्सर बचपन में की गई अनेकों शैतानियों में से एक अमूमन हर शैतान बच्चे का होता है, बस स्थान एवं गहराई घटते बढ़ते हैं हालांकि चेतावनी तो है ही और चिंता भी किन्तु गर यही सब सोच ले फिर वह बचपन कैसा।

"विवादित कविता और निर्णय”, संस्मरण के द्वारा लेखक, बी. एड. की प्रशिक्षण अवधि के दौरान हुए एक अनुभव को साझा करते हुए विनम्रता एवं बुद्धिमत्ता के जीवन में प्रभाव तथा अन्य को प्रभावित करने की क्षमता बखूबी दर्शाते हैं, वहीं महान व्यक्तियों द्वारा लिए गए निर्णय में कितनी सोच एवं गहराई होती है यह भी स्पष्ट लक्षित है।



“पद का अहंकार”, निश्चय ही एक ऐसा संस्मरण है जो बहुतों को सीख दे सकता है, हाल में समाज में पद के अहंकारियों की कमी नहीं है। भलाई उन से बच के निकल जाने में ही है। क्योंकि दर्प से भरा व्यक्ति किस सीमा तक गिर जायेगा यह अंदाजा लगा पाना कभी कभी संभव नहीं भी होता।

संस्मरण लिखा जाना आसान प्रतीत हो सकता है किन्तु स्मरण रहे की संस्मरण की शैली रोचक हो एवं प्रस्तुतीकरण ऐसा हो जो एक अंजान पाठकों को भी लेखक के संग घटित किन्हीं क्षणों अथवा घटनाओं के विषय में जानने हेतु उत्सुकता उत्पन्न कर दे। यह शैली या कहें कला प्रकाश प्रियम की लेखनी में है।

“घूंसा” संस्मरण उस वक्त का वाकया है जब शिक्षकों के पास छात्रों को दुरुस्त करने हेतु शारीरिक बल प्रयोग की पूरी छूट थी, वहीं छात्रों द्वारा भी उस वक्त में किए गए व्यवहार आज के बच्चे तो शायद सोच भी नहीं सकते क्योंकि आज के बच्चों का बचपन तो मानो खो ही गया है। पढ़ाई का दबाव और तकनीकी तथा आधुनिकता की दौड़ ने उनसे सब छीन लिया है। इस संस्मरण की रोचकता अन्य से भी कुछ अधिक ही है। वहीं संस्मरण “युक्ति” उस समय में गांवों में बच्चों द्वारा फेरी वालों को सताने की एक युक्ति से संबंधित है जो बचपन से संबंधित सामान्य है। 

“घुड़ला” के द्वारा एक प्राचीन अंधविश्वास से भारी परंपरा के विषय में बात की गई है, देश के अन्य हिस्सों में कहीं किसी व्यक्ति पर देवी या देवता आना, कहीं भाव आना आदि कहा जाता है। राजस्थानी ग्रामीण क्षेत्र में एक समय में घुड़ला काफी प्रचलित था एवं लोगों की आस्था भी बहुत थी वर्तमान हालात से अनभिज्ञ हूं, उसी घुड़ले के विषय में यह संस्मरण है कि किस तरह उसी घुड़ले के संग बार बार अनहोनी होती हैं जो लोगों को अनिष्ठ से बचने के उपाय बतलाने वाला था। एक अंधभक्ति का किस्सा है।

‘योगेश और वो तीन महीने”, अपने बच्चे के निरंतर तीन माह तक किसी न किसी शारीरिक समस्या से जूझने और इन पर विजय पाने से जुड़े हुए संस्मरण को शब्द दिए हैं। बच्चे से जुड़ी हुई यादों को बहुत तफसील से व्यवस्थित एवं रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। क्षेत्रीय बोली का प्रयोग भी लेख को और रुचिकर बनाता है।

संस्मरण “नुकसान की भरपाई” एक आम इंसान के दिल की बात है जिसे बिना लाग लपेट के लेखक ने लिख दिया है जो उनकी आपबीती थी। वे चाहते तो थोड़ी बहुत झूठ की मदद ले सकते थे क्योंकि यह कौन सा आत्मकथ्य था कि उनपर सत्य वचन की नैतिक जिम्मेवारी आ खड़ी होती किंतु उन्होंने ऐसा न करके सुदृढ़ चरित्र का परिचय दिया है ।

बी एड कर लेने के बाद अपनी पहली पोस्टिंग पर कन्याकुमारी पहुंचे लेखक के वाहन के संस्मरण उन्होंने “खयालों में कन्याकुमारी” शीर्षक के अंतर्गत संजोए हैं संस्मरण में दक्षिण भारत के नितांत अंतिम सिरे पर हिंदी भाषा के प्रति वहां के स्थानीय रहवासियों की लगन या झुकाव देख कर सुकून मिलता है।

“पहली रैंक”, पुस्तक के प्रारंभ में दिए गए संस्मरण लेख “फुटपाथों की दुनिया” का ही अंश है वह प्रारंभ था एवं यह अंत है।कुछ छोटी मोटी घटनाओं का आपस में मेल नहीं हो पाना चकित करता है ।

संस्मरणों में कुछेक स्थानों पर प्रयुक्त क्षेत्रीय भाषा, सुंदर होते हुए भी क्लिष्टता के चलते, कथन को समझने में हल्की मुश्किलें प्रस्तुत करती है किन्तु बढ़ती हुई रोचकता उस अड़चन पर हावी होती है। सुंदर सहज भाषा एवं भाव की सरलता युक्त संवाद दृश्य का रोमांच बढाते हैं, वहीं प्रस्तुति में सजीवता पुस्तक की विशिष्टता है।

पुस्तक में समाविष्ट किये गए चंद संस्मरणों को प्रबुद्द पाठक वर्ग की उत्सुकता बनाए रखने के विशिष्ट उद्देश्य से ही यहाँ उद्दरित नहीं किया गया है।   

इस संग्रह में प्रकाश जी ने दो रेखाचित्रों को भी प्रस्तुत किया है। तो पहले एक टिप्पणी रेखाचित्रों के विषय में

रेखाचित्र हिंदी गद्य साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है जिसमें किसी एक व्यक्ति के चरित्र, स्वभाव, आदतों का सजीव वर्णन होता है। यह व्यक्ति प्रसिद्ध भी हो सकता है और आम आदमी भी। आम तौर पर रेखाचित्र उपन्यास की तरह लंबा नहीं होता। जिस प्रकार एक चित्रकार अपने चित्र में कुछ रेखाओं से सम्पूर्ण दृश्य उकेर देता है, वैसे ही लेखक शब्दों की कुछ रेखाओं से किसी व्यक्ति, घटना या दृश्य का सजीव चित्र खींच देता है। कुछ पन्नों में पूरा चित्र बन जाता है। हाव-भाव, बोलचाल, पहनावा सब जीवंत हो उठता है। लेखक ने जिसे जैसा अपनी आँखों से देखा-परखा है, उसी का वैसा ही  वर्णन कर देता है। रेखाचित्र को अंग्रेज़ी की स्केच और पोट्रेट विधाओं के प्रभाव के रूप में भी देखा जाता है।

पुस्तक के अंत में उन्होंने दो रेखा चित्र दिए हैं और उन दो रेखा चित्रों में से, प्रथम रेखा चित्र कैलाश मनहर का है , तो दूसरा रेखाचित्र है कवि भगवान सहाय सेन का। अब जैसा की विधा की विशेषता है, इन रेखाचित्रों के माध्यम से प्रकाश प्रियम ने दोनों ही विभूतियों से रूबरू कर दिया।    

संक्षेप में कहें तो अतीत के निर्झर संस्मरण साहित्य सृजन की दिशा में एक बेहतरीन एवं सराहनीय सफल कदम है एक सुंदर पठनीय एवं संग्रहणीय कृति है।"

                       पुस्तक समीक्षक atulya khare                                                                                                                                    

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