Hindi Sahity Vimarsh Ke Vividh Aayam By Dr. Y. Kasturi Bai
हिंदी साहित्य विमर्श के विविध आयाम
द्वारा : Dr.Y.Kasturi
Bai
संपादन : चंदना कल्याण
: नंदना Y.R
प्रकाशन: CLASSIC ERA पब्लिकेशन
मानस की चौपाई “हरि अनंत
हरि कथा अनंता”, अर्थात हरी अनंत हैं एवं
उनकी कथाओं का विस्तार किसी भी सीमा से परे हैं एवं प्रभु चरित्र करोड़ों कल्पों
में भी नहीं गए जा सकते ठीक इसी प्रकार
हिंदी साहित्य की विशालता एवं उसके विमर्श
को सीमाओं में बंधना संभव नहीं है।
शीर्षक:-
लेखिका :-
उनके प्रशंशनीय कार्यों हेतु उन्हें विभिन्न स्तरों पर भिन्न भिन्न
साहित्यिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। उनकी साहित्य के क्षेत्र
में प्राप्त सम्मान एवं उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है ।
हिंदी साहित्य की प्राचीन समृद्ध एवं विशाल परंपरा रही है जिसे समय समय पर विभिन्न प्रतिभाशाली साहित्यकारों ने अपने योगदान से नवाजा एवं साहित्य को समृद्ध कर स्वयं गौरवान्वित हुए ।
प्रत्येक साहित्यकार स्वयं को एक दायरे में रख कर रचनाएँ सृजित करता है जिस दायरे में वह स्वयं को लेखन हेतु
सहज महसूस करता है फिर वे दायरे विधा के
हो , विमर्श
के अथवा शैली के । वर्तमान में स्त्री विमर्श, पर्यावरण विमर्श, दलित विमर्श, बाल
विमर्श, किन्नर विमर्श, इत्यादि पर प्रमुखता से लिखा जा रहा
है। विमर्श चयन मूलतः देश , काल , परिस्थिति से प्रभावित तो होता ही है किन्तु उस
पर भी रचनाकार की पसंद सर्वोपरी होती है। किसी रचनाकार ने सामान परिस्थितियों में भी ही स्त्री विमर्श को प्रमुखता देती है
तो अन्य ने ग्रामीण परिवेश को अथवा श्रमिक वर्ग को । तात्पर्य यही की विमर्श
पूर्णतः रचियता का निर्णय है एवं वह अपनी सुविधा एवं विचरण शैली इत्यादि के अनुसार सृजन करता है ।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका नें भिन्न भिन्न विमर्श पर विस्तृत
अवलोकन प्रस्तुत किया है ।
स्त्री विमर्श के स्वरुप एवं अवधारणा पर लिखते हुए जहाँ एक और उन्होंने स्त्री विमर्श की प्रमुखता पर प्रकाश डाला है वही विश्लेषण
करते हुए बहुत ही स्पष्ट शब्दों में उल्लिखित किया है कि बिना किसी संदेह के परिवार , मातृत्व शिशु पालन सहित समस्त सामाजिक
आर्थिक शोषण उत्पीडन के साथ ही यौन भेद पर आधारित स्त्री उत्पीडन स्त्री मुक्ति से
जुडी सभी जटिल समस्यों का साहित्य में चिंतन का विषय बनना ही स्त्री विमर्श है,
पितृ सत्ता के बंधनों से मुक्त होने के लिए संघर्ष करने तथा स्त्री पुरुष समानता
के लिए किये गए प्रयास का नाम है। आगे
उन्होंने स्त्री विमर्श के विविध आयाम पर भी गंभीरता से विचारण प्रस्तुत किया है।
दलित विमर्श :- भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था में जाति आधारित भिन्नता रखते हुए समग्र रूप से एक समूह का भाव केंद्र में रख
समाज की निर्मिती है। इसी जातीय वर्गीकरण
में दलित वर्ग जो की एक व्यापक अर्थ समेटे हुए है तथा शोषित, उत्पीडित
जन का प्रतिनिधित्व करता है उच्च व निम्न वर्ण विभाजित सामाजिक व्यवस्था द्वारा
समाज में उत्त्पन्न वृहद् भेद भाव के दृष्टिकोण से इसने स्वतः ही अधिकारों की लडाई
के दृष्टिगत एक आन्दोलन का रूप ले लिया तथा इस विमर्श पर साहित्य का भी निरंतर
सृजन किया गया हिंदी की दलित कविता मूलतः आंबेडकर जी की उर्जा एवं बौध्ह के
सिद्धांतों के इर्द गिर्द केन्द्रित रही है बड़ा भाग अत्याचारों शोषण की घटनाओं
उपेक्षित दलित वर्ग की स्थिति, शिक्षा साधन से वंचित रहने जैसे विभिन्न मुद्दों पर
रचा गया।
किन्नर विमर्श : यह एक अन्य प्रमुख विमर्श है जिसे लेखिका ने इस पुस्तक में अपने
विचारण हेतु चुना एवं किन्नर विमर्श के उद्भव को महाभारत के प्रमुख पात्र शिखंडी से सम्बद्ध कर उस के समकालीन माना है अथवा वहां से इसका प्रारंभ कहना अधिक
उचित होगा। वही अर्जुन का वृहन्नला रूप
एवं मुग़ल काल में भी समाज के इस विशिष्ट अभिन्न अंग पर साहित्य सृजन के प्रमाण मिलते है। वर्तमान साहित्य में भी नाटकों, उपन्यासों एवं कहानियों
में किन्नर संप्रदाय का उल्लेख होता है। एवं समकालीन साहित्यकारों द्वारा प्रमुखता से उन
पर केन्द्रित साहित्य सृजन कर किन्नर
साहित्य विमर्श को प्रमुखता से चिन्हित किया है ।
अल्प संख्यक विमर्श : उपलब्ध साहित्य के प्रत्येक काल में इस
विमर्श को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। अमूमन समस्त श्रेष्ट कृतियों में अल्पसंख्यक
समाज संदर्भित घटनाक्रम होना अथवा पात्रों की उपस्थिति अत्यंत सामान्य है। एवं इस विमर्श को हिंदी साहित्य की अभिन्न इकाई
मानने में कहीं कोई आपत्ति भी नज़र नहीं आती।
बाल विमर्श भी एक ऐसी ही इकाई है जो साहित्य में अपना अलग ही स्थान रखती है। पर्याप्त कथाकार एवं रचनाकारों द्वारा सुन्दर बाल
साहित्य की रचना कर संस्कार निर्माण में अपार योगदान दिया गया है जिस पर लेखिका के कार्य एवं
संपादन द्वारा विवेकशील प्रस्तुति से इस पुस्तक में भी विमर्श पर उचित विचरण हुआ
है ।
वही आदिवासी विमर्श , वृद्ध विमर्श , नैतिक विमर्श , मजदूर विमर्श पर भी पुस्तक में लेखिका नें विस्तृत विचार प्रस्तुत किये हैं।
समीक्षात्मक टिप्पणी :-
पुस्तक में हिंदी साहित्य के विभिन्न विमर्शों को समाहित किया गया
है तथा
21 वी सदी में मुख्यतः उभर कर
आये स्त्री विमर्श , अल्पसंख्यक
विमर्श दलित विमर्श तथा किन्नर विमर्श पर विशेष तौर पर प्रस्तुति है । जहां संबंधित विमर्श का परिचय ,उस
पर गहराई से विषय विश्लेषण , उस विमर्श के
प्रमुख रचनाकार्य , विमर्श के उपविमर्ष यदि है तो उनपर भी
प्रकाश डाला गया है। यूं तो साहित्य के बहुप्रचलित विमर्श पर लेखिका द्वारा विचार
प्रस्तुत किये गए हैं किन्तु हिंदी साहित्य एक विशाल सागर है अतः अन्य कई प्रमुख
विमर्श पर भी शोध एवं विचरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा वरिष्ठ लेखिका से अपेक्षित
है।
सविनय
अतुल्य



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