Maa Andhera Dhoti Thee by Satish Sardana

माँ अंधेरा ढोती थी

द्वारा : सतीश सरदाना 

प्रकाशक : बोधि  प्रकाशन


निर्विवादित रूप से माँ परम सत्य है,  हम जिस पर व्यर्थ ही गर्व करते हैं हमारा यह नश्वर शरीर,  वह भी उसी  मां की श्रेष्ठ कृति है,  जिसका स्थान जगत के रचयिता से भी ऊंचा माना गया है  एवं आत्मा में सदा सर्वदा उसका वास है और इस एकाक्षर शब्द मात्र में ही महानता अंतर्निहित है,  वह समस्त दोषों से परे है एवं धरा पर वही मात्र सत्य है बाकी सब विश्वास, संभवतः यही कारण है  कि माँ शब्द सुनते ही हम ठिठकते ज़रूर है। पुस्तक “ मां अंधेरा ढोती थी “ को यूँ तो नाम से  आकर्षित हो पढ़ना शुरू किया किन्तु  पुस्तक पूरी कर ही छोड़ सका। सतीश सरदाना जी की अनुपम कृति है। विभिन्न काव्य संग्रह पूर्व में भी प्रकाशित हो चुके है तथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में भी समय समय पर उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती ही रहती हैं तात्पर्य यह कि स्थापित रचनाकार हैं एवं उनकी पुस्तक का पाठन   अविस्मरनीय अनुभव है ।  यूं  तो इस कविता संग्रह की हर कविता बेमिसाल कहना ही उसकी सर्व श्रेष्ठ समीक्षा करना है, किन्तु पाठकों के लाभार्थ चंद कविताओं पर अपने विचार रखने का प्रयास किया है।

सतीश सरदाना जी बेहद शांत भाव से बिना प्रचार प्रसार की कामना के  अपने भाव व्यक्त कर देते है, वर्तमान में जो भी घटित हो रहा है वे उसके मूक प्रेक्षक या दर्शक बन कर मौन बैठ जाने वालों में से नहीं है वे अपनी कविता के जरिये अपना विरोध अपनी प्रतिक्रिया या अपना  पक्ष प्रस्तुत कर देते है किन्तु उन्हें क्रांतिकारी कवि भी न समझा जाए वरन  बेहद संवेदनशील,  तथ्य परक  एवं तथ्य अन्वेषी,  जिज्ञासु, स्थितियों एवं सामाजिक परिवर्तनों पर पैनी नज़र रखने वाले, सशक्त एवं सुलझी हुयी मानसिकता के धनी तथा सत्ता या कहें कि व्यवस्था की सटीक आलोचना करने में न सकुचाने वाले कोमल हृदय व्यक्ति है, इसी सन्दर्भ में व्यवस्था पर चोट करती कविता “कैसे हो दोस्त” हेतु मेरा विशेष उल्लेख है जिसमें व्यवस्था पर  अत्यंत करार तंज़ है।

सतीश जी अपने अंतर्मन के भाव एवं जीवन के तजुर्बों और विभिन्न एहसासों को शब्द दे कर कवित्त रूप में ढाल देने में निपुण है। वे शांत नहीं बेचैन है उनके अन्दर का आवेग हमें उनकी कुछ कविताओं में देखने को मिलता है, किन्तु उनकी अभिव्यक्ति सौम्य है, उसमें आक्रोश नहीं है सरल बोधगम्य शब्दों में अपने विचार साझा करते हैं।  वे वर्तमान स्थिति  एवं सामाजिक परिवेश,  परिवर्तन इत्यादि पर भी अपनी राय खुलकर रखते हैं एवं उसमें उनकी सहमति यदि  कहीं है भी तो स्पष्ट है अन्यथा वे आम तौर  पर व्यवस्था,  कुप्रथा,  एवं और भी जो उनकी नज़रों में असामान्य, समाज में घट रहा है उस से आम तौर पर असंतुष्ठ ही नज़र आते हैं। सतीश जी कि कविताएं गंभीर  एवं  बेहद गहरी सोच का परिणाम है जिनमें  उथलापन या अपरिपक्व विचारों को कोई स्थान  नही है। उनके कृतित्व को उनकी शैली को साहित्य जगत ने भी अत्यंत आदर भाव से स्वीकार किया है।

 संग्रह की हर कविता में सतीश जी ने स्व-व्यक्तित्व के अनुरूप भाव व्यक्त किये  हैं। वे वह सोचते हैं जहां आम इंसान की सोच नहीं जाती या कहें वहा आकर समाप्त हो जाती है। अत्यंत सीमित शब्दों में अपने भाव समग्र रूप से व्यक्त करने की कला में  बेहद सक्षम हैं। उनकी कविताएं प्रेम रस से पगी हुयी  नहीं है और न ही उनमें  जीवन की रंगीन तस्वीर दिखाती झूठी उमंग है अपितु वे उन  ख्वाबों कि दुनिया से हट कर कटु यथार्थ देखती है। प्रख्यात शो मैन राजकपूर साहब ने एक बार कहा था कि मैं सपने बेचता हूँ इसके विपरीत सतीश जी मात्र कटु यथार्थ की बात करते है वे आपको यथार्थ के धरातल पर लाकर खड़ा कर देते है उनकी कविता रंगीन चश्मे को उतार कर दिखने वाली दुनिया की तस्वीर दिखलाती है। वे लोक लुभावन साहित्य का सृजन न कर लोक जागरण का कार्य अपनी कविता के माध्यम से, पूरी तन्मयता एवं निष्ठा से अपना कर्तव्य मान कर करते हैं। उनकी  भाषा में कहीं कहीं क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव झलकता है एवं उपयुक्त स्थानों पर कवित्त के भाव अनुसार स्थानीय संस्कृति एवं बोली का प्रयोग भी किया गया है। उनकी कविताओं में ग्राम्य जीवन का यथार्थ है, तो राजनैतिक व्यवस्था के प्रति असंतोष  जो बाज़ दफ़ा मौन रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देता है, जैसे कि कविता “क्या अबके बरस”  में  हालात से व्यथित हो,  व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाते गंभीर चिंतन हेतु बाध्य करते है,  उनके शब्द कि :

“हो सकता है अस्पताल की सीढ़ियों पर

मौत के इंतज़ार में आखरी बार

बसंत देखना नसीब हो “

वहीँ उनका एक और तीखा कटाक्ष देखिये कि दु:ख होता है जब कोई आपके दयावान चेहरे के पीछे छुपी निर्ममता पहचान लेता है।

इस पुरुष प्रधान समाज में नारी  की दुर्दशा उनसे छुपी हुयी नहीं है नारी  की गिरती हुई अस्मिता,  उसका घटता आत्मविश्वास, उसकी  दिन ब दिन गिरती  सामाजिक स्थिति, सरे बाज़ार उछलती मान मर्यादा, उनकी चिंता का विषय है। नारी  मन को बहुत संवेदनशीलता एवं व्यावहारिकता के साथ  सुलझे हुए तरीके से समझ कर बयान किया है। वे अनुभव करते है कि समाज ने नारी को महज भोग विलास हेतु एक वस्तु बना दिया गया है और तो और  उसका वस्तु के समान क्रय विक्रय भी हो जाता है। उनकी नारी  केंद्रित कविताओं में बहुत गहरी सोच है चाहे “तुम क्या जानो” हो या “सुनो” या फिर “लड़कियां” या फिर “एक लड़की मर गयी” जिसमें कटाक्ष देखिये की

“लड़की का मरना कोई घटना नही है 

उसका जीते रहना अचंभित करता है”

वही नारी दशा पर एक और कविता “औरतें काम पर जा रही है” गहरा तमाचा है  जिसकी निम्न पंक्तियां उधृत न  करना मेरे पक्ष पर अनुचित होगा:                

“आज के युग में मर्द इसी तरह है सोचते

क्यों नहीं रहती घर पर 

रसोई, खलिहान या बिस्तर 

जो है उसकी असली जगह 

क्यों जिद है कि जाना है काम पर”

परिस्थितिजन्य मार्मिकता पर  उनका संवेदन शील मन शब्दों में उस  दर्द को  बयां करता है एवं पाठक को उस दर्द  से शब्दों के माध्यम से ही परिचित करवा देने कि कला भी सतीश जी कि लेखनी में है।

 कविता “मां अंधेरा ढोती थी” जो कि  इस काव्य संग्रह की शीर्षक कविता है,  प्रतीकात्मक काव्य है जीवन को रात्री समान मान उसके अंधेरों को दूर करने जैसे गूढ़ भाव को प्रस्तुत किया है साथ ही इसके  जरिये उन्होंने एक भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया है,  उनके दृष्टिकोण में उजाला तो है ही नही एवं कम होते अंधेरे को हम ने उजाला समझ  लिया है कुछ पल के उजले समय को या खुशहाली पूर्ण जीवन को हम अँधेरे या कहें कि दुखों का अंत मान बैठे किन्तु यथार्थ तो भिन्न ही है। हमें तो  अंधेरे ने ढक रखा है उस से बाहर निकलें  तो उजाला हो। व्यवस्था बनाने वाले सत्ताधीश द्वारा प्रचारित उजाले के भ्रम पर तीखा कटाक्ष है।

संग्रह की पहली ही कविता “इतना बेवकूफ नहीं है गया प्रसाद पाण्डेय”   राजनैतिक व्यवस्था का कटु सत्य सामने रखते हुए तगड़ा व्यंग्य है।

“जीवन जीना ऐसे”  में अपना जीवन जीने का नज़रिया बताते हुए  बहुत ही कम अपेक्षाओं की आवश्यकता बताते हुए कहते है कि

“न सागर चाहिए न जाम प्यासे को

प्यासा  तो जीता रहा एक दिलासे को

कोई कह देता तेरे हिस्से का भी है सुख

जो मां ने मुखब्बे में सबसे नीचे लपेट रखा है”

रचना  “तुम सुबह का  चेहरा देखना कभी”,  महामारी का दंश जो सारी दुनिया ने झेला  उस के दर्द को व्यक्त करती है। तन्हा लोग,  दहशत में ज़िंदगी,  हर तरफ सन्नाटा और कुछ अनिष्ट हो जाने की हर पल बढ़ती आशंका जीवन और मृत्यु के बीच कि उहापोह और हर चेहरे की उदासी को बखूबी पढ़ कर अनुभव किया है उन्होंने ।

 समाज की बुराई को लक्षित कविता है “और दुनिया हँस पड़ी” कविता के अंत तक पहुचते पहुचते मस्तिष्क मानो शून्य सा हो जाता है,  अत्यंत  मार्मिक प्रसंग है, बेमेल विवाह, स्त्री का क्रय विक्रय जैसे  एक वस्तु को बस उपभोग के लिए ही रखना है,  उसकी स्वयं की भावनाएं,  इक्षाएँ,  अरमान,   सब बेमानी है। क्या दलित होना या कोई शारीरिक अक्षमता होना या महज़  सिर्फ नारी होना इतना बड़ा अभिशाप है सोचने को विवश कर देती है ।

वही कविता “अच्छा आदमी” के द्वारा वे  वर्तमान की वोट बैंक की राजनीति, आज के समाज में निरंतर डूबता,  रसातल को अग्रसित होता मानव चरित्र एवं सिर्फ पैसे की हो चुकी मानसिकता पर तंज  देखिये की

“जो न कानून तोड़ता था न झूठ बोलता था 

वह आदमी अच्छा न था 

उसको झेलना मज़बूरी था

इसलिए भी उसका कत्ल ज़रूरी था 

मौका मिलते ही काट दिया गया उसकी लाश को

नौ मन मिट्टी से पाट दिया गया 

बेटा उसका लायक और समझदार था 

पिता की मौत का मुआवजा लेने को तैयार था”

दिखावे एवं आडंबर पर करारी चोट करती है उनकी रचना “अंधकूप में गिरे रहना”

उनकी कविता “वहीं रहेंगी” भी  व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाती है जबकि घुमड़ते ज़ज़्बातों का बवंडर है “रुदन निकलता नहीं” वहीं एक वेतनभोगी के यथार्थ को बयां करती है “सब लोग” और “कितने दिन” भी जो कि एक क्षणिका है। अपनी जड़ों की ओर जाने की चाहत,  महानगरों की जीवन शैली से न जुड़ पाने का दर्द,  प्रकृति एवं गाँव की याद भी है तो  वहीँ अपनो के वगैर जीने का दर्द  परिभाषित करती हुयी कविता है “यह उदास दिन”

साम्प्रदायिकता, आयी टी सेक्टर में घुटता पिसता युवा वर्ग जीवन का संघर्ष और सत्ता की वोट बैंक की राजनीति वहीं बैंकर होने का दर्द दिखलाती कविता है “बड़े शहर में” एवं दंगे की आंच कैसे सब शून्य कर जाती है, यह सच बयान करती है कविता “अंधेरी गुफा में”। संग्रह में चंद कविताएं पारिवारिक रिश्तों पर भी है।

एक और कविता “कमरे में बंद शाम” में जहाँ गहरे विषाद के भाव प्रकट हो रहे है वहीं व्यवस्था पर रोज़मर्रा के जीवन पर तगड़ी चोट है “अत्र कुशलं तत्रास्तु” 

सतीश जी ने उर्दू के अल्फ़ाज़ यू तो कम  हीं इस्तेमाल किये है पर जहां भी है बहुत खूब सूरत हैं जैसे कि कविता “लहक”:

लब्बोलुआब ये की वरके पे इत्र था

और कहीं नहीं इसका ज़िक्र  था  

फिर अजाब ये कि जो सिफर था

उसी कि आँख में जरा फ़िक्र था।

शुभकामनाओं सहित,

सादर,
अतुल्य

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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