Iman Ka Bojha -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

 

·                 Pustak Samiksha : Atulya Khare

·                 समीक्षित पुस्तक : ईमान का बोझा

·                 विधा: व्यंग्य कथा

·                 द्वारा: डॉ . अनुराग वाजपेयी

·                 मोनिका प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित

·                 प्रथम संस्करण : 2026

·                 मूल्य : 250 .00

·                 समीक्षा क्रमांक : 238

iman ka bojha by anurag bajpayee front cover
ईमान का बोझा” डॉ. अनुराग बाजपेयी द्वारा रचित 30+ व्यंग्य कथाओं का संग्रह है। अनुराग जी हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा में अपने पैने लेखन के कारण अपनी अलग पहचान रखते हैं। उनकी रचनाएं मूलतः समसामयिक विसंगतियों एवं व्यवस्था पर तीखे व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं, वहीं दैनिक जीवन, प्रशासनिक कार्यप्रणाली एवं राजनीति के पाखंड को निशाना बनाती हुए भी ढेरों रचनाएं हैं। उनकी प्रत्येक रचना अपने विशिष्ट कथानक एवं व्यंग्यात्मक भाव के कारण पठनीय एवं विशेष है किन्तु, विभिन्न प्रकाशित रचनाओं के बीच, “रेगिस्तान में बाढ़ उत्सव”, “खादी के रूमाल” और “रैली में खोए हुए जूते” उनमें भी विशिष्ट हैं।

वे अपनी सहज, सरल एवं बोलचाल की भाषा के प्रयोग हेतु पहचाने जाते हैं। भाषा बेशक सहज सरल होती है किन्तु जहां उनकी कहानियों के शीर्षक आकर्षित करते हैं वहीं उनका कटाक्ष गहरा होता है। यथा “रैली में खोए हुए जूते” में राजनीतिक रैलियों, नेताओं के झूठे वादों, दावों और आम जनता की बेबसी को अत्यंत गंभीरता के संग किन्तु करारे व्यंग्यात्मक भाव में उकेरा गया है। वहीं “रेगिस्तान में बाढ़” प्रशासनिक तंत्र की कमियों, खोखले कागजी दावों और वास्तविकताओं अर्थात जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को दर्शाता हुआ व्यवस्था पर करार प्रहार है।

वे हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते रहते हैं। प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह “ईमान का बोझा” उनका छठा प्रकाशित संग्रह है। “

 लाई हयात आए। कज़ा ले चली चले

अपनी खुशी से आए। न अपनी खुशी चले

इस तरह की मर्यादित शैली में व्यंग्य लेखन जहां हो तो गफिर उस लेखन शैली पर कहने के लिए अधिक कुछ शेष नहीं रह जाता। उनकी शैली में मर्यादा' और तेज “धार” का सामंजस्य है जो इसी पुस्तक की एक व्यंग्य कथा से लिए गए उस शेर से ही झलक जाती है जो मैंने शुरू में ही उद्धृत किया। ​उनकी भाषा की शालीनता ही उनकी धार को और तेज कर देती है। वैसे वे अत्यंत सहजता से व्यंग्य की पैनी एवं तीखी चोट करते है।

इस बात में कोई दो राय नहीं है की व्यंग्य करना आसान है, किसी पर ऊँगली उठा देना भी सरल है किन्तु केवल एक स्थिति का वर्णन करके, किसी विशेष को इंगित किए बगैर ही पाठक को यह महसूस करा देना कि वह उस स्थिति का हिस्सा है, यह अनुराग बाजपेयी जैसे सिद्धहस्त लेखक ही कर सकते हैं।

अनुराग जी का लेखन गंभीर है , उनकी लेखनी वैसा शोर नहीं करती जैसा अक्सर सतही व्यंग्य में देखने मे आता है। उनकी कलम की खामोशियाँ भी बोलती हैं। कम शब्दों में वे बहुत कुछ कह जाते हैं, यही कारण है की उनकी रचनाएं बहुत विस्तार लिए हुए नहीं हैं, वे किसी पर वार नहीं करते, न ही उनके लेखन में व्यक्तिगत आक्षेपण दिखता है बल्कि वे तो मात्र उन विसंगतियों को हमारे सामने लाकर रख देते हैं, जिन्हें हम अपनी दिनचर्या में सामान्य मान कर स्वीकार कर चुके हैं।

​प्रस्तुत पुस्तक के अधिकतर व्यंग्य उन लोगों के लिए है जो हँसते-हँसते खुद के गिरेबां में झांकने का माद्दा रखते हैं। अनुराग जी के व्यंग्य समाज में व्याप्त ढोंग और सफेद झूठ बोलने वालों को आईना दिखलाते हैं। कहानी के मध्य में कहीं वे समाज की विद्रूपता पर गंभीर तंज कर देते हैं जो वास्तविकता तो उजागर करती ही है, सोचने पर विवश करते हुए बाज़ दफे शर्मिंदा भी करती है। वे समाज की उन स्थितियों के लिए, जो तर्कहीन हैं, पर हम उन्हें सहर्ष या मजबूरी में जिए जा रहे हैं, उन पर भी बखूबी टिप्पणी करते हैं ।

 आज के दौर में जब हर कोई चीखकर अपनी बात कहना चाहता है, तब अनुराग जी का सहज शांत भाव में अपने विचार को पूरे देश का शोर बना देना, एक कला है। कहानियों से स्पष्ट है की लेखक का उद्देश्य किसी व्यक्ति को नीचा दिखाना कतई नहीं है, बल्कि वे तो मात्र उस प्रवृत्ति को उजागर करना चाहते हैं जो हम सभी के भीतर थोड़ी-बहुत मौजूद है।

संग्रह की शीर्षक व्यंग्य कथा “ईमान का बोझा”, वर्तमान सामाजिक परिवेश में, जहां ईमानदारी जैसे गुण मात्र शाब्दिक परिभाषा हेतु ही रह गए हैं, तथा बेईमानी धोखाधड़ी जैसे दुर्गुणों ने इंसानी फितरत पूर्णतः बदल दी है उस ईमानदारी को लेखक, इंसानी समझ पर बहुत बड़ा बोझ दिखलाते हैं, ईमानदारी अब कोई सद्गुण नहीं अपितु बोझ समान है जिसे व्यक्ति ढो रहा है।

iman ka bojha by anurag bajpayee Back cover

वह परेशान है, न तरक्की है न आर्थिक उन्नति, वहीं लेखक ईमानदारी को व्यक्ति की उन्नति का सबसे बड़ा रोड़ा निरूपित करते हुए उसकी एवं बाकी सद्गुणों की तुलना रॉकेट और रॉकेट के लॉन्चिंग पैड से करते है जिस प्रकार रॉकेट ऊपर जाने के लिए एक एक कर कई खंड में अपने लॉन्चर के टुकड़े गिराता जाता है वैसे ही व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए अपने सभी सद्गुण छोड़ने होगे और सब छूट जाने के बाद वह स्वयं हल्का फुल्का होकर उन्नती के स्पेस में शिखर पर पहुँच जाएगा।

“नरेगा और नारद” के द्वारा लेखक की विशिष्ट शैली उभर कर आती है जहां नारद मुनि का नरेगा जैसी विकासवादी योजनाओं से परिचय हुआ है। अत्यंत गंभीर तंज के संग हास्यास्पद होते हुए चिंतनीय कथन, जहां नारद मुनि का नाम भी नरेगा के मजदूरों की लिस्ट में लिखा हुआ है और उनके नाम का वेतन भी निकल रहा है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिस से मात्र सक्षम अधिकारियों के, हर कोई वाकिफ है।

 “विकास का वाहन जीप” एक ऐसी व्यंग्य रचना जिसकी प्रत्येक पंक्ति पर, आप सहमत उद्वेलित एवं लेखक की सोच पर चमत्कृत हुए बग़ैर नहीं रह पाएंगे। व्यंग्य सरकारी अधिकारियों के विकास के ढोल पीटने की कवायदों पर तीखा प्रहार है एवं रचना भ्रष्टाचार के कड़वे सच को पूर्ण यथार्थ में बयान करती है। "हमारा डाटा सुरक्षित हैं" के द्वारा उन्होंने हमारी गर्त को जाती संस्कृति एवं कलुषित भावनाओं संग पवित्रता के ढोंग दिखलाने वाले आदर्शवादी समाज पर तीक्ष्ण कटाक्ष किए हैं।

कुछ कहानियाँ कोरोना की याद दिलाती हैं एवं कोरोना की पृष्टभूमि में सृजित हुई हैं जैसे “लॉक डाउन के साइड इफेक्ट”, “ लॉक डाउन में नाई की तलाश”, “ऑनलाइन एजुकेशन” या फिर “भगवान लॉक भक्त डाउन”। सभी कहानियाँ जहां कोरोना में इंसानी विवशताओं को सामने रखती हैं वहीं व्यवस्था पर तंज़ भी है।

iman ka bojha ke lekhak anurag bajpayee
कहानी “नयीं जीवात्माएं” पुनः मानवता में मूल्यों के ह्रास को एक अलग ही नजरिए देखते और उसकी पैरवी करते हुए उसे सीधे सीधे भगवान के यहां का मैन्यफैक्चरिंग डिफेक्ट बता देते हैं। अनुराग जी की प्रत्येक कहानी अपने आप में गहन तीक्ष्ण संदेश एवं कुछ अलग ही कलेवर में होती है। उनकी सभी बेहतरीन व्यंग्य रचनाओं में से कौन सी अधिक बेहतर है कह पाना नितांत असंभव है। प्रत्येक रचना सोचने पर विवश करते हुए उनके व्यंग्य कों सराहती है ।

उनकी कहानियां बहुत लंबी तो नहीं है किंतु घाव करें गंभीर वाली उक्ति अवश्य चरितार्थ करती हैं । वहीं यह भी देखने में आता है उनकी रचनाएं किसी विशिष्ट विषय से इतर हर उस विषय पर है जो कहीं न कहीं आम आदमी को प्रभावित एवं उद्वेलित करती हैं ।

काम का आदमी, में वे वर्तमान व्यवस्था में वे दो तरह के जीव बतलाते हैं एक जो काम करते हैं दूसरे वे जों काम करवाते हैं अब यह किस्सा सारा काम करवाने वालों का है जिन्हें कहीं जुगाड़ू कही सेटिंगबाज और भी जाने क्या क्या नामों से सम्मान सहित याद किया जाता है। इस व्यंग्य में एक बात बहुत अच्छी कही गई है कि जहां काम करने वाले का काम खत्म होता है वहीं से काम करवाने वाले का काम शुरू होता है।

जहां कहानी “बढ़ती हुई दाढ़ी” व्यंग्यात्मकता के संग रोचकता का पुट लिए हुए है वहीं “नेता का फिल्मी इंटरव्यू” राजनीतिज्ञों पर चोट है एवं अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

एक अत्यंत अर्थपूर्ण व्यंग्य है “इतिहास बदल रहा है”, वाकई जहां महापुरुषों का भी पार्टी वार बंटवारा हो गया हो, हर आने वाली सरकार अपने फायदे के हिसाब से इतिहास को संशोधित करवा देती हो, वहां यह प्रसंग बेहद समीचीन है एवं गंभीर विचारण आमंत्रित करता है ।

कहानी “शोक समाचार, व्यावसायिकता के वर्तमान दौर में, जब कि हमने दुनिया के बाजारोन्मुख किस्से खूब सुने एवं देखे हैं, जहां हर चीज़ बिकने लगी है तो फिर मौत पर छूट की उम्मीद कैसे, मौत की सूचना छपवाना भी किस तरह व्यापार के दायरे में है, जबरदस्त पंच है कि क्या मरने के बाद भी GST लगेगा। कुछ ऐसा ही तीक्ष्ण व्यंग्य करती कृति है “पचासवां साल”, अनुराग जी के लेखन में एक चीज देखी है कि उनकी कहानी बीच में कहीं बहुत शांति से ऐसा तंज कर देती है जो कहानि का भाग भी बना रहता है एवं कहीं से भी अलग नहीं प्रतीत होता अर्थात उनका व्यंग्य कथन के सहज प्रवाह में ही है न कि अलग से पिरोया हुआ । उनकी लेखन शैली उनके द्वारा सृजित अन्य पुस्तकें पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं। अपने लेखन के द्वारा वे अत्यंत सहज हास्य रच देते हैं यथा “देशी GPS”। वहीं कहानी “फालतू बैठने की कला” को पढ़ने के बाद कुछ कर्मठ लोगों को यह भ्रम हो सकता है, या शायद पछतावा भी कि हाय हम इतने महान गुण से वंचित कैसे रह गए ।

गंभीर चिंतन के संग यदि मनोरंजक किन्तु तीक्ष्ण धारदार व्यंग्य का आनंद लेना है तो अनुराग बाजपेयी जी का यह कहानी संग्रह अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए।

                       अतुल्य खरे

 

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