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Pustak Samiksha : atulya khare
• समीक्षित पुस्तक : साईकिल ,
• द्वारा: संजीव कुमार गंगवार ,
• विधा : लघु-कथा ,
• बोधरस प्रकाशन द्वारा
प्रकाशित
• प्रथम प्रकाशन वर्ष : 2026
• मूल्य :225 :00
• समीक्षा क्रमांक : 232
संजीव
कुमार गंगवार, जिन्हें साहित्य के गलियारे में संजीव मनोहर साहिल के नाम से बखूबी पहचाना
जाता है बहुमुखी प्रतिभा के धनी है, एवं हिंदी साहित्य की अमूमन समस्त विधाओं में
सृजन कर्म करते हैं। यूं तो उनकी सभी प्रकाशित कृतियों को आम पाठक तथा वरिष्ठ
साहित्य मनीषियों का उत्तम प्रतिसाद प्राप्त हुआ है किन्तु उनकी कृति “कागज के
फूल” ने साहित्य जगत में एवं आम जन के बीच एक अमिट छाप छोड़ते हुए अत्यंत ख्याति
अर्जित की, फलस्वरूप संजीव जी को राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ठ पहचान मिली तथा साहित्य
जगत में महत्वपूर्ण मुकाम हासिल हुआ है।
बात
करें उनकी शैली एवं भाषाई सहजता की, तो घटनाक्रम के मुताबिक सहज बोल चाल का तरीका
ही उनकी शैली है, कथानक के संबद्द पात्र
हेतु परिस्थितिजन्य उपयुक्त भाषा उनके सृजन को आम पाठक में लोकप्रिय बनाती है।
उनके कथानक के सरल सहज वाक्यांश से उनके पाठक सहज ही जुड़ जाते हैं और पाठक स्वयं
को उस घटनाक्रम का ही भाग मान कर कथानक को दिल से अनुभव करता है।
लेखन
की उनकी यही विशिष्ट शैली उनके पात्रों को पाठकों से सीधे संबद्ध करवा देती है।
पाठक का कथानक के घटना क्रम से स्वयं को संबद्द रख कर उसे समग्रता में महसूस करते
हुए उस पल विशेष को जी लेना ही उसे उस कथानक के पाठन का वास्तविक आनंद प्रदान करता
है।
उनकी
प्रस्तुत पुस्तक “साईकिल”, बोधरस प्रकाशन द्वारा प्रकाशित लघु-कथा संग्रह है
जिसमें उनकी 40 से भी अधिक लघु कथाएं संग्रहीत हैं। यहाँ पुनः स्पष्ट करता चलूँ
कि, लघु-कथा, लघुकथा नहीं है जहां
लघुकथा हिंदी साहित्य की एक विशेष और स्वतंत्र विधा का नाम है वहीं लघु-कथा
सामान्यतः छोटी कहानी के लिए प्रयोग किया जाता है। लघु कथा उपन्यास या कहानी का
संक्षिप्त रूप हो सकती है, पर लघुकथा पूर्णतः स्वतंत्र होती
है साथ ही लघुकथा में बहुत अल्पतम शब्दों में एक गहरा भाव या व्यंग्य करने की
क्षमता होती है।
प्रस्तुत
पुस्तक में संग्रहीत विभिन्न कहानियों के आधार पर कहना समीचीन होगा की यह एक बहुत
ही विचारोत्तेजक एवं सारगर्भित कहानियों का संग्रह है। संजीव जी की कहानियां समकालीन
समाज का एक आईना है। ये कहानियाँ
काल्पनिक न होकर हमारे आस-पास घटित होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं और विचारों से उपजी
हैं। अधिकांश कहानियों का मुख्य पात्र हमारे बीच का एक आम आदमी ही है वहीं पुस्तक
के शीर्षक का चयन अत्यंत प्रतीकात्मक है। जिस तरह 'साइकिल'
वर्तमान समय में अत्यंत निम्नतम स्तर पर जीवन बसर करने वाले व्यक्ति
की सवारी हो गई एवं जिस प्रकार एक साईकिल को आज कोई महत्व प्राप्त नहीं होता वैसे
ही आम आदमी को भी अक्सर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। इसी संदर्भ को लेते
हुए आम आदमी की सवारी को आम आदमी से, उसके जीवन से जोड़ कर प्रस्तुत किया गया है तदर्थ
संग्रह की अमूमन सभी कहानियाँ उस अति सामान्य व्यक्ति की पीढ़ा व्यथा और वेदना को
व्यक्त करती हैं ।
प्रतीकों का सटीक प्रयोग करते हुए अपनी बात स्पष्टता से प्रस्तुत करना उनकी विशिष्टता है। पुस्तक की शीर्षक कथा साइकिल का शीर्षक जिसे आम आदमी की उपेक्षा एवं वर्तमान में उसकी अनुपयोगिता से जोड़ा गया है, जो पूर्णतः उपयुक्त एवं सार्थक है एवं शीर्षक के तर्कसंगत होने को प्रमाणित करता है।
संजीव
जी के प्रस्तुत लघु कथा संग्रह साइकिल में हर कहानी की विषय वस्तु एक अभिनव विचार
प्रस्तुत करती हुई कुछ अलग कहती
है। उनके द्वारा कथानक के माध्यम से प्रस्तुत विचार जहां एक ओर पाठकों को सोचने हेतु
विवश करते है वहीं सरल और सुंदर भाषा में गंभीर सामाजिक मुद्दों की रोचक एवं सहज
ग्राह्य शैली में प्रस्तुती पुस्तक पाठन का सम्पूर्ण आनंद प्रदान करती है। यूं तो
संग्रह की सभी कहानियाँ पठनीय हैं किन्तु यहाँ बात मात्र चंद कहानियों की -
तो
प्रस्तुत लघु-कथा संग्रह साईकिल की कहानी “मालती” एक असहाय एवं मजबूर
विधवा स्त्री के मानवता के गुणों को दर्शाती सुंदर कहानी है वहीं कहानी बाप
वर्तमान युग में, जब स्वार्थ ही सर्वोपरि है भाइयों के बीच के प्रेम को दर्शाती
एवं अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन की भावना की सुंदर मिसाल पेश करती है। साहित्य
जगत की आज की स्थिति को दर्शाती है कहानी पुरस्कार ,
तो वहीं पढ़ लिख कर काबिल बन जाने के पश्चात अपने माँ बाप के प्रति
अपने उत्तरदायित्वों को भुला बैठी आधुनिक संतानों पर तंज है कहानी बड़ा आदमी
।
संजीव
जी की कहानियों में समाज के उस शोषित और उपेक्षित वर्ग के लोगों के दुख-दर्द को
बखूबी उकेरा गया है, जिन्हें अक्सर
अनदेखा कर दिया जाता है। कहानी गलती अपनी सहज शैली एवं कथानक के द्वारा इस सोच
पर चोट करते हुए उन बड़े लोगों को आईना दिखलाती है जिनके लिए गरीब कीड़े मकोड़े से
अधिक शायद कुछ भी नहीं। कहानी शिक्षा अपनी संतानों की शिक्षा दीक्षा पर
अपना सर्वस्व लुटा कर बैठ जाने वाले माता पिता के लिए एक सीख है वहीं गर्भित भाव
प्रभावित करते हैं तथा कहीं न कहीं एक चेतावनी भी देते प्रतीत होते हैं। कहानी दयाभाव अपने विचार से प्रभावित
करती है । तो वहीं कहानी पिता का सम्मान, जिसका कथानक भावनात्मक
है किन्तु अपने अत्यंत सरल कथानक के बावजूद अपने भाव से अंतरात्मा को झिंझोड देती
है तो वहीं एक पारिवारिक कहानि मायका अपने विशिष्ट संदेश से अनुकरणीय है ।
राजनीति में नेताओं के दोचेहरे और दोहरे मापदंडों को दर्शाती है कहानी मोहभंग।
लेखक के मुताबिक साहित्य का काम केवल तारीफ करना नहीं, बल्कि आलोचनात्मक दृष्टि से समाज के कोहरे को हटाना है और उनकी यह पुस्तक उनके
विचारों का पूर्णतः समर्थन करते हुए हमें तमाम मुद्दों पर गंभीरता से सोचने हेतु
विवश करती है।
अपनी आइडेंटिटी को लेकर जागरूक आज की बेटी की सोच सामने रखती है कहानी समझौता
जिसके विचार सराहनीय है । वहीं कहानी भाग्य अपने अनूठे विचार हेतु स्मरणीय
बन जाती है । कहानी पिछली पीढ़ी के द्वारा
वर्तमान आधुनिक दौर की तुलना उस दौर से की गई है जहां व्यक्तिगत संबंध अधिक मानवीय
थे वर्तमान समय के आभासी रिश्तों और तकनीकी से जुड़े रिश्तों से। वहीं संग्रह की
अंतिम कहानी वेदना, एक कड़वे यथार्थ तथा स्वार्थ से
जुड़े रिश्तों को रोचकता से परिभाषित करती है एवं अपने शीर्षक को पूर्णतः चरितार्थ
करती है ।
संजीव
जी की कहानियाँ अपनी सादगी में ही अपनी विशिष्टता रखती हैं तथा पाठक के हृदय को छू
लेने की क्षमता रखती हैं।
प्रस्तुत लघु-कथा संग्रह अपनी सरल भाषा और गहरे अनुभवों की सुंदर भावपूर्ण
अभिव्यक्ति के कारण पाठकों के दिल के करीब है। उनकी कहानियाँ वही है जिनमें बड़ी-बड़ी
बातों का शोर नहीं है। अमूमन सभी कहानियाँ जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में छिपे हुए
बड़े एवं कडवे यथार्थ सामने रखती हैं।
संग्रह
में विभिन्न विचारोत्तेजक कहानियों का समावेश किया गया है जो आकर में छोटी होते
हुए भी अपना मंतव्य एवं संदेश स्पष्टतः अभिव्यक्त करती हैं । यह पुस्तक निस्संदेह
पाठकों की संवेदनाओं को जागृत करने में सक्षम है। साहित्य में मनोरंजन के साथ-साथ गंभीर
मुद्दों पर विमर्श एवं संवेदनशीलता के साथ साथ सामाजिक उत्तरदायित्व की तलाश करने
वाले सुधि पाठकों हेतु यह एक विशिष्ट एवं अवश्य पठनीय संग्रहणीय पुस्तक है।
अतुल्य खरे
Pustak Samiksha : atulya khare





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