Utre Pairahan Khamoshi Ke By Kishwar Anjum
“उतरे
पैरहन खामोशी के”
विधा :
कविता
द्वारा: किश्वर
अंजुम
पाखी
प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
मूल्य :240.00
समीक्षा
क्रमांक : 207
“उतरे पैरहन खामोशी के”, “किश्वर अंजुम”, द्वारा रचित भावपूर्ण कविताओं का सुंदर संग्रह है , “किश्वर अंजुम” वह नाम है जो आज साहित्य से ताल्लुक रखने वालों के बीच खूब पहचाना जाता है और किसी परिचय का मोहताज तो कतई नहीं है उनकी कृति स्वयं उनका परिचय हैं ।
पूर्व
में जहां उन्होंने हिन्दी साहित्य को अपनी बेहतरीन कृतियों यथा “परछाइयाँ अँधेरों की” ,” त्रिवेणी”, “प्रतीक्षा
में प्रेम”, आदि के द्वारा समृद्द किया है
उसी शृंखला में अब उनका नवीनतम काव्य संग्रह
“उतरे पैरहन खामोशी के” कुछ ऐसी भाव प्रधान नज़्म लेकर आया है जो पाठक को
अपने मन के अंदर उस ढंकें हुए कोने में झाँकने
को विवश करता है जिस से वह या तो बचता रहा है या फिर कभी उस पर गौर ही नहीं किया
है और इस प्रक्रिया में जीवन के उन अनछुए पहलुओं से साक्षात्कार करवाता है जिन्हें
आम इंसान थोड़ा बच कर निकलने में ही अपनी बेहतरी समझता है।
उनकी
कवितायेँ भाव प्रधान हैं, और उस पर विशिष्टता यह की उनकी कविताओं में भावों की
अभिव्यक्ति बेहद स्पष्ट है, वहीं उर्दू
भाषा में उनका महारथ उनकी रचनाओं में बहुत खुल कर दिखलाई पड़ता है जहां वे हिन्दी
के साथ में उर्दू के अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल भरपूर और बेहद बखूबी
के साथ करती हैं और उनकी यह विशिष्टता ही उन्हें अन्य समकालीन रचनाकारों से अलग खड़ा
करती है।
यूं तो भाव अभिव्यक्ति हेतु भाषाई सीमाएं कदापि मायने नहीं रखती, फिर भाव की अभिव्यक्ति हिन्दी में हो अथवा उर्दू या फिर किसी अन्य भाषा में, मुख्य बात है भाव का सम्प्रेषण जो की अंजुम जी की कविताओं में बेहद स्पष्ट है, यूं भी भाव सम्प्रेषण की विभिन्न विधाओं के बीच कविता की महत्ता को नकारा जा सकना असंभव ही है। भाव सुंदर हैं एवं मुक्त छंद के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्हें किसी दायरे में समेटा नहीं गया है। कह सकते हैं भाव अपनी सम्पूर्ण कलाओं में पूर्ण स्वच्छंदता से अभिव्यक्त हुए है एवं भावों की गहराई सम्प्रेषण में अपनी वांकक्षित ऊचाइयाँ प्राप्त करती है। कविता के मूल भाव को व्यक्त करने में उन शेरों का भी महत्वपूर्ण योगदान है जो बीच बीच में कवियात्री ने प्रयुक्त किये हैं ये शेर पुस्तक की शोभा द्विगुणित करते हैं .
तीन
तलाक,
महिला सशक्तिकरण, बेवफाई, और प्रेम जैसे विषयों पर खूबसूरत अशयार कहे हैं । नाज़ुकी को बयां करने में उर्दू भाषा का
कहीं कोई सानी नहीं है , कवियात्री ने सुंदर भावों के नाजुकता से बयां करने में कई
स्थानों पर उर्दू के सुंदर लफ्जों का इस्तेमाल किया है जो अपने आप में अभिव्यक्ति
की मिसाल बन गए हैं ।
खूबसूरत
शीर्षक से इत्तेफाक रखती कविताएं हैं, जैसा की खुद शीर्षक बयां करता है खामोशी बोल उठी है , हर कविता का भाव वही है
मानो खामोशी ने आज अपने अंदर का सारा प्यार, सारा क्रोध, डर, घुटन, नफरत अर्थात हर वह भाव जो भीतर कहीं दबा
हुआ था, सब बाहर आ गया है। खामोशी ने
चुप्पी तोड़ दी । शब्द एक एक भाव को बयां करता है, खूबसूरत भावों से निकले हर एक
लम्हे की नाजुक नाजुक कहानी भी हर्फ़ दर हर्फ़ बयां हुई है। हर भाव को समझने की
कोशिश करना इन भावों को और भी खूबसूरत बना देता है जो उन लम्हों को जीने का एहसास
देता जान पड़ता है। खामोशी जो अनकही है उसे समझने का प्रयास अंजुम जी के बेहद गहरे
भावों के साथ इस संग्रह को और बेहतरीन बना देता है ।
उर्दू
और हिंदी भाषा के बेमिसाल सम्मिश्रण के संग साहित्य में विदुषी कवियत्री ने अपनी श्रेष्ठ कविताओं के माध्यम से भाषायी सौंदर्य की बेहतरीन मिसाल पेश की है। अंजुम जी की कविताओं में एक
सरल सहज रवानगी है, खूबसूरत मौलिक प्रस्तुति, सरस भाव युक्त कविताएं, भाषाई सौन्दर्य की बिना पर
अंतर्मन में गहरी पैठती हैं।
उनकी
कुछ कविताएं संवाद की शैली में हैं तो कुछ अभिव्यक्ति की। कुछ में उनकी महिला
शक्ति , आत्मनिर्णय करने की क्षमता, आत्मनिर्भरता दिखती है वहीं कहीं कहीं पर स्व
अस्तित्व के लिए जीवन में जीवन के लिए जूझते हुए सुदृढ़ और सजग रहने के भाव भी
लक्षित हैं भले ही राहें पथरीली हैं और
डगर मुश्किल।
मेरी
समीक्षाएं पढ़ने वाले तो इस बात से वाकिफ ही हैं की कविताओं अथवा काव्यान्श का अपनी
समीक्षा में पुनरुद्दरण मेरी शैली नहीं है एवं बड़ी हद तक मैं उसे निरर्थक एवं पाठक
तथा पुस्तक के मध्य का रोढा मानता हूँ, अतः यहाँ किसी कविता के किसी विशिष्ट छंद अथवा
शेर के विषय में उसे उद्वऋत कर उसके विषय में
बात करना निश्चय ही अन्य सुंदर कविताओं के संग नाइंसाफी होगी इसी लिए किसी
भी एक अथवा चंद चुनिंदा कविताओं का उल्लेख करना मैं महत्वपूर्ण नहीं समझता। मात्र यह कहूँगा की किश्वर अंजुम जी का यह काव्य
संग्रह अपने आप में हर भाव को समेटे हुए एक अनूठी
कृति है जो अपने मुखपृष्ट की ही तरह खूबसूरत है जिसे अवश्य पढा एवं सराहा जाना चाहिए।
अतुल्य

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