Prem Prakriya Hai By Bhubneshwar Upadhyay
प्रेम प्रक्रिया है
द्वारा : भुवनेश्वर उपाध्याय
विचार प्रकाशन, ग्वालियर, द्वारा
प्रकाशित
प्रथम संस्करण : 2024
मूल्य : 250.00
समीक्षा क्रमांक : 218
प्रेम, एक निस्वार्थ
भावना, जिसमें अन्य की खुशी एवं कल्याण “स्व” से ऊपर है। सम्मान, समर्पण एवं निजता
संग आजादी की उपस्थिति में ही सच्चा प्रेम अंकुरित होता है। प्रेम मात्र आकर्षण
नहीं, अपितु
गहरा जुड़ाव, सुरक्षा और विश्वास का अहसास है। इसके प्रति भिन्न
भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक तथा साहित्यिक
दृष्टिकोण व्यापक रूप में नज़र आते हैं, किन्तु सभी में अमूमन आत्मीयता, चाहत का जुनून एवं प्रिय के प्रति प्रतिबद्धता जैसे तत्व विद्यमान रहते
हैं वहीं विज्ञान इसे मस्तिष्क में होने वाली एक रासायनिक क्रिया मात्र मानता है
जहां कुछ ऐसे रसायन उतत्पन्न होते हैं जो खुशी का एहसास करवाते हैं।
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प्रेम के संबंध में उत्पन्न
होते अनेकों प्रश्नों के जवाब ढूँढने का एक प्रयास है, साहित्य जगत के प्रतिष्ठित युवा
साहित्यकार, भुवनेश्वर उपाध्याय जी द्वारा अपनी श्रमसाध्य, प्रेममयी कृति “प्रेम प्रक्रिया
है” के द्वारा। भुवनेश्वर उपाध्याय जी साहित्य की विभिन्न विशिष्ट विधाओं यथा दर्शन,
ऐतिहासिक, पौराणिक, मनोविज्ञान आदि में अपने लेखन हेतु विशेष पहचान रखते हैं। उनका
अमूल्य साहित्यिक योगदान यदि प्रकाशित कार्य के रूप में देखा जाए तो उनकी अनेकों प्रकाशित
कृतियों में से “एक कम सौ” , “हॉफ़ मेन”, “दांव पर दुनियाँ”, “फिर वहीं से” आदि का नाम
प्रमुखता से लिया जाता है साथ ही उनके द्वारा संपादित पुस्तकों, समीक्षाओं, लेखों इत्यादि
का देश विदेश की पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होना उनके लोकप्रिय लेखन का परिचायक
है इस से इतर भी उनकी प्रकाशित रचनाओं,साझा संकलनों इत्यादि की अंतहीन सूचि है। उनकी
रचनाएं विभिन्न स्तर पर पाठ्यक्रमों में शामिल की गई वहीं उन की कृतियों पर शोधार्थियों
द्वारा शोध कार्य किये गए एवं वर्तमान में भी जारी हैं, जिसे निश्चय ही उनके साहित्यिक
योगदान की विशिष्टता एवं सराहना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उनकी विशिष्ट साहित्यिक
सेवाओं एवं समर्पण को समय समय पर विभिन्न स्तरीय पुरुस्कारों द्वारा सराहा गया है तथा
संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर स्वयं गौरवान्वित हुई हैं।
अपनी प्रस्तुत पुस्तक
“प्रेम प्रक्रिया है” के द्वारा भुवनेश्वर जी ने, हर उस प्रश्न का जवाब देने का
प्रयास किया है जो अमूमन कभी सहजता से सामान्य वार्तालप के द्वारा तो कभी विवादित
रूप में सामने आते रहते हैं यथा, प्रेम क्या है, प्रेम दर्शन है अथवा मात्र विचार, प्रेम पर लोक
का क्या प्रभाव पड़ता है , क्या जहां प्रेम है वहाँ आशंकाएं भी हैं, क्या प्रेम
मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करता है क्या प्रेम प्रायोजित भी हो सकता है,
प्रेम की धार्मिक अवधारणाएं क्या हैं, प्रेम और व्यक्ति पूजन में क्या अंतर है, प्रेम
और रचनात्मकता के बीच क्या संबंध है, क्या प्रेम पर लोक प्रभाव देखा जाता है या
फिर वयस का प्रभाव और प्रेम की आवश्यकता क्या है , क्या प्रेम दुख का कारण है या
सुख का, आदि, आदि अनेकों प्रश्न।
प्रेम क्या है उसे उसके समग्र रूप में समझने हेतु मानवीय जीवन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करना अनिवार्य हो जाता है। क्यूंकि वर्तमान दौर समर्पण का नहीं अपितु चाहतों एवं अपेक्षाओं का अंतहीन सिलसिला है, जहां रिश्तों के अर्थ अपनी सुविधानुसार बदल जाते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में
लेखक जहां एक ओर वर्तमान आधुनिक परिवेश में, प्रेम की तार्किक व्याख्या अत्यंत सरल
एवं बोधगम्य शैली में प्रस्तुत करते हुए अपने विचार रखते हैं वहीं महान विचारकों
द्वारा प्रस्तुत प्रेम की व्याख्या का भी सूक्ष्मान्वेषण करते हैं किन्तु भाषायी सरलता
एवं वैचारिक प्रवाह सहज होने के कारण पुस्तक, विषय की गंभीरता के बावजूद रोचक है तथा
परत दर परत विषय के प्रति उत्सुकता बढ़ती है ।
प्रेम की अवधारणा
इतनी व्यापक है कि इसे किसी एक परिभाषा में बांधना कठिन है। दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और
सामाजिक दृष्टिकोण से इसके अलग-अलग मायने निकलते हैं। दर्शनशास्त्र में प्रेम को
अक्सर एक आध्यात्मिक वास्तविकता और मानसिक भ्रम के
द्वंद्व के रूप में देखा गया है। प्लेटो अनुसार, भौतिक प्रेम केवल एक छाया या भ्रम है। वास्तविक प्रेम तो आदर्श प्रेम है।
शारीरिक भौतिक्ताओं एवं आकर्षण से परे आत्मा और सत्य की सुंदरता को खोजने की
यात्रा है। वहीं शंकराचार्य के अनुसार प्रेम को 'माया' का हिस्सा माना जा सकता है यदि वह केवल
सांसारिक मोह तक सीमित है। लेकिन यदि प्रेम समस्त चराचर जगत के प्रति है, तो वह “ब्रह्म” की अनुभूति या सर्वोच्च वास्तविकता है, तो “सार्त्र” जैसे
विचारकों के लिए, प्रेम एक वास्तविकता है जिसे हम स्वयं
चुनते हैं, लेकिन यह दूसरे व्यक्ति को वस्तु बनाने का,
भौतिकता के नजरिए से देखने का एक असफल प्रयास भी हो सकता है।
“ओशो” के दृष्टिकोण
में, प्रेम कोई संकुचित भावना, अथवा रिश्ता मात्र न होकर अस्तित्व की एक अवस्था है।
उनके अनुसार, आमतौर पर प्रेम समझी जाने वाली भावना, आकर्षण
एवं वासना का एक परिष्कृत रूप होता है। ओशो के प्रेम में बंधन नहीं आजादी है ओशो
प्रेम में सबसे अहम समर्पण “मैं” का मानते हैं वे कहते हैं, प्रेम
में “मैं’ गिर जाता है। जब तक “मैं” मौजूद है, तब तक प्रेम
संभव नहीं है, क्योंकि प्रेम दो शरीरों के बीच नहीं, बल्कि दो शून्यों के बीच का मिलन है। ओशो के मतानुसार "प्रेम ध्यान
का बाहरी रूप है और ध्यान प्रेम का आंतरिक रूप है।"
तो “क्या प्रेम
बंधन भी है और स्वतंत्रता भी” के जवाब में भुवनेश्वर जी लिखते हैं की जब तक संदेह
है, असुरक्षा है, अधिकार है तब तक प्रेम बंधन है और जब सारी दुविधाएं मिट जाती हैं
तब प्रेम स्वतंत्र हो जाता है। सरलतम रूप में, जहां पाने की लालसा और खोने का भय
समाप्त हो जाए तो मानिए की प्रेम स्वतंत्र कर देने वाला है अन्यथा अधिकार और
आवश्यकता दोनों ही मनुष्य को प्रेम के नाम पर बंधन ही देती हैं। यदि आप किसी
व्यक्ति से प्रेम करते हैं, और उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं, तो वह “ध्यान” बन
जाता है। बिना ध्यान के प्रेम संघर्ष बन जाता है, और बिना
प्रेम के ध्यान शुष्क हो जाता है। प्रेम तब होता है जब आप देने के लिए पूरी तरह
तैयार हों, और इस बात की चिंता न करें कि आपको बदले में क्या
मिल रहा है। प्रेम तो एक उपहार है, कोई सौदा नहीं।
वहीं सद्गुरु जग्गी
वासुदेव के अनुसार, प्रेम कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप "करते" हैं या जो किसी
दूसरे व्यक्ति से मिलता है; बल्कि प्रेम आपके होने का एक
तरीका है। सद्गुरु कहते हैं कि जिसे हम प्रेम कहते हैं, वह
मूल रूप से आपकी अपनी भावनाओं की मिठास है। सद्गुरु का तर्क है कि यदि आप अपने
भीतर सुखद भाव पैदा करना सीख लें, तो आप प्रेमपूर्ण हो
जाएंगे। फिर प्रेम आपकी ज़रूरत नहीं, बल्कि आपका स्वभाव बन
जाएगा। जब आप प्रेमपूर्ण होते हैं, तो आपका जीवन संघर्ष
मुक्त हो जाता है, जिससे आप उच्च आध्यात्मिक संभावनाओं की ओर
बढ़ सकते हैं।
प्रेम एक अत्यंत
व्यापक, नितांत निजि अनुभव है, जिसे सरल रूप में परिभाषित करना सहज नहीं है। प्रेम को परिभाषा
के दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता।। हालांकि साहित्य और दर्शन में प्रेम को
आत्मा का मिलन माना गया है। यहाँ प्रेम का अर्थ अहंकार का त्याग और समर्पण है। तथा
प्रेम वह सूत्र है, वह भाव है जो रिश्तों को जोड़कर रखता है
एवं मात्र प्रिय तथा प्रियम तक सीमित नहीं है।
महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने प्रेम की व्याख्या भिन्न तरीके से की है वे यह दर्शाने के लिए की प्रेम क्या है प्रश्न करते हैं की प्रेम क्या नहीं है। जो की अत्यंत व्यापक एवं तार्किक व्याख्या है। वे मानवीय जीवन के ऐसे ही कई बिंदुओं के विश्लेषण के आधार पर प्रेम एवं उससे जुड़ी भ्रांतियों को परिभाषित करते हैं।
प्रेम में जहां एक
तीव्र आकर्षण के संग निस्वार्थ भाव से समर्पण एवं जुड़ाव का भाव विद्यमान है वहीं
दर्शन में प्रेम को आत्मा का मिलन माना गया है। एक ऐसी इबादत जिसमें पूर्ण समर्पण
है जहां इंसान खुद को खोकर ही कुछ पाता है उनके बीच अधिकार की जगह परस्पर सम्मान एवं
अपेक्षा के स्थान पर त्याग तथा समर्पण के भाव होते हैं की जगह त्याग होता है, जिसके बाद 'मैं' की भावना समाप्त होकर 'हम'
का भाव प्रकट होता है।
वहीं मनोविज्ञान
प्रेम को रसायनों के खेल और मानवीय आवश्यकताओं के संगम के रूप में देखता है। मनोवैज्ञानिक
रूप से, अक्सर
हम सामने वाले व्यक्ति से प्रेम नहीं करते, बल्कि अपनी
कल्पनाओं को उस पर थोप देते हैं। इसे एक प्रकार का “मनोवैज्ञानिक
भ्रम” कहा जा सकता है, जहाँ हम वह
देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं। साथ ही सामाजिक परिदृश्य मे देखें तो समाज
प्रेम को एक व्यवस्था और बंधन के रूप में देखता है। समाजशास्त्रियों का मानना है
कि प्रेम की आधुनिक अवधारणा काफी हद तक साहित्य और फिल्मों द्वारा निर्मित एक सामाजिक भ्रम है जबकि वास्तविकता
में प्रेम एक ठोस वास्तविकता है। यह केवल भावना नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व एवं सह-अस्तित्व
का आधार है।
यदि उपरोक्त
धारणाओं को विचार में लें तो सहज ही स्पष्ट होता है कि तब तो प्रेम को एक
प्रक्रिया के द्वारा पाया जा सकता है। प्रेम को एक मंज़िल अथवा “उपलब्धि” न मानते
हुए जीवंत प्रक्रिया मानना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है एवं भुवनेश्वर जी की
प्रस्तुत पुस्तक का मूल भी इसी के इर्द गिर्द है एवं इस प्रक्रिया के विभिन्न
चरणों को समझने का, प्रक्रिया को गहराई से जानने का एक प्रयास है। दार्शनिक और
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इसे एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में समझ जा
सकता है।
सद्गुरु और ओशो जैसे
विचारकों के अनुसार, प्रेम कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप एक बार हासिल कर लेते हैं और वह स्थिर
हो जाती है। यह हर पल आपके भीतर पैदा होने वाली भावनाओं की गुणवत्ता है। जैसे सांस
लेना एक प्रक्रिया है, वैसे ही प्रेमपूर्ण होना एक आंतरिक
अभ्यास है। वहीं प्रेम एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें “मैं” को विलीन होना ही होगा
ज्यों ज्यों आप, मैं से हम की ओर अग्रसर होते हैं आप प्रेम प्रक्रिया मे आगे बढ़ते
हैं अर्थात प्रेम के बढ़ने के साथ ही व्यक्तिगत सीमाएं धुंधली होने लगती हैं। प्रेम
में स्वयं का तो अस्तित्व ही नहीं रहता। “मैं” के साथ समर्पण की तो बात ही
हास्यास्पद लगती है।
“चार्ली चैपलिन” ने
एक बार कहा था की जैसे ही मैंने खुद से प्रेम करना शुरू किया मैं खुद को आजाद करता
चल गया। स्वयं को विस्तार देने एवं दूसरे को अपने भीतर समाहित करने की एक निरंतर
चलती रहने वाली विधि प्रेम है। वहीं प्रेम प्रारंभ में मात्र आकर्षण है, फिर जुड़ाव एवं अंत तक
आते आते यह समर्पण के भाव में होता है अर्थात मनोवैज्ञानिक रूप से भी प्रेम स्थिर
नहीं है वरन यह भी समय के साथ बदल रहा है आपके अंदर के भाव के प्रभाव से। प्रेम एक
ऊर्जा की तरह है, जिसे जीवित रखने के लिए उसमें लगातार ध्यान,
समय और स्व की आहुति देनी पड़ती है। किन्तु समर्पण में पूर्ण समर्पण
की भावना होना ही चाहिए, पाने की कामना से किया गया समर्पण तो व्यर्थ है। इसीलिए
इसे “क्रिया’ या “प्रक्रिया’ कहना सबसे उचित है।
प्रेम की चरम स्थिति
को भी अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है। जब प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तो वह केवल एक भावना
नहीं रह जाता, बल्कि एक रूपांतरण बन जाता है। प्रेम की सबसे
ऊँची स्थिति वह है जहाँ प्रेमी और प्रिय के बीच का अंतर समाप्त हो जाए अर्थात जब “दो”
का अस्तित्व समाप्त हो जावे तब ही “प्रेम” शेष होगा। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति
का अहंकार पूरी तरह गल जाता है और वह अपने प्रिय में ही स्वयं को देखने लगता है।
साथ ही प्रेम की चरम स्थिति में कोई “शर्त” नहीं होती। यह तो निःस्वार्थ समर्पण
है। चरम स्थिति में प्रेम निःस्वार्थ एवं "अकारण" हो जाता है। आप प्रेम
करते हैं क्योंकि प्रेम करना आपका स्वभाव बन गया है।
प्रेम सहज ही सुख का
कारण बन सकता है किन्तु यह तब ही संभव है जब वह आत्मिक और वासना रहित हो। मोह एवं
अधिकार से रहित हो। आत्मिक प्रेम में माध्यम की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। प्रेम
का तो अपना एक प्रवाह होता है जो सहज प्रस्फुटित भावनाओं को एक हृदय से दूसरे हृदय
तक पहुचा ही देता है। उसकी निरन्तरता अपनी मंजिल स्वतः ढूंढ लेती है। फिर प्रेम
दुख का कारण तो होता ही नहीं, लोग अपनों अपेक्षाओं महत्वाकांक्षाओं एवं वासनाओं की पूर्ति
में उपस्थित अवरोधों को दुख का नाम दे देते हैं और अपने भावनात्मक उपक्रमों को
प्रेम का। जबकि प्रेम तो चेतना के स्तर पर कहीं और ही घटता है।
लोग प्रेम को बंधन
समझते हैं, लेकिन
सच्चा प्रेम तो स्वतंत्र करता है यह किसी की बांधता नहीं। प्रेम की चरम अवस्था पर
पहुँचकर प्रेम दूसरे के पंखों को काटता नहीं, बल्कि उन्हें
और विस्तार देता है। प्रेम का चरम, मुक्ति है। तभी तो आध्यात्मिक धरातल पर प्रेम
की चरम स्थिति समाधि के समान है। सद्गुरु के शब्दों में, जब
भावनाएँ इतनी मधुर हो जाएँ कि पूरा अस्तित्व अपना ही हिस्सा लगने लगे, तो वही प्रेम की पराकाष्ठा है। हालांकि बुद्ध के दर्शन में प्रेम की चरम
स्थिति करुणा है।
जब आप किसी व्यक्ति, प्रकृति या परमात्मा के
प्रति इतने गहरे प्रेम में होते हैं कि आपको काया, काल एवं परिवेश का बोध नहीं रह
जाता, तो वही प्रेम “प्रार्थना” बन जाता है। भुवनेश्वर जी का
शोध भी यही कहता है की प्रेम प्रार्थना भी है और दवा भी, जिसका उन्होंने स्वयं
प्रत्यक्ष अनुभव किया। वहीं वे कहते हैं कि अंकुरण तो प्रेम का सहज स्वभाव है जो
परिस्थितियाँ अनुकूल होते ही कहीं भी ऊँग आता है फिर जहां प्रेम आ गया वहाँ असंतोष
या अतृप्ति तो रह ही नहीं सकती।
प्रेम एक ऊर्जा और
चेतना की अवस्था है, जिसे शारीरिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। क्यूंकि प्रेम में आकर्षण
का आधार शारीरिक न होकर भावनात्मक और आत्मिक होता है। वहीं आध्यात्मिक
दृष्टिकोण से प्रेम की सबसे बुनियादी एवं महत्वपूर्ण कड़ी स्वयं से प्रेम है।
क्या प्रेम के लिए
साधन अनिवार्य होगा, यदि इसे यूं देखें कि प्रेम का संबंध व्यक्ति से नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता से है। अब यदि आप संवेदनशील हैं, तो आप एक पेड़, एक चट्टान या एक जानवर से भी उतने ही
गहरे प्रेम में हो सकते हैं जितना किसी इंसान से। तो प्रेम भावनाओं की मिठास है।
यदि आपकी भावनाएँ मधुर हैं, तो आप बिना किसी व्यक्ति के भी
प्रेमपूर्ण अवस्था में रह सकते हैं। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम या सूफी संतों
का उस निराकार 'परमात्मा' के प्रति
प्रेम यह दर्शाता है कि प्रेम के लिए किसी भौतिक शरीर या विपरीत लिंग की आवश्यकता
नहीं है।
प्रेम को दो
श्रेणियों में बाँटकर देखा जा सकता है एक सापेक्ष प्रेम, अर्थात प्रेम जो
किन्हीं साधनों पर निर्भर है यथा व्यक्ति, वस्तु अथवा विचार एवं दूसरा निरपेक्ष
प्रेम जो स्वतंत्र है जहां चरम अवस्था किसी भी बाहरी कारक पर निर्भर नहीं होती।
ओशो और सद्गुरु
जैसे विचारकों के अनुसार, जब प्रेम “क्रिया” से इतर “स्वभाव” बन जाता है, तो
वह साधनों से मुक्त हो जाता है। आप प्रेमपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि आप भीतर से
आनंदित हैं।
वर्तमान युग में आज
इसमें कुछ मौलिक बदलाव आए हैं प्रेम की अवधारणा में कुछ बदलाव देखने में आते हैं
यथा ऐतिहासिक और पारंपरिक रूप से प्रेम को “त्याग” एवं “स्थायित्व” के नजरिए से देखा
जाता था किन्तु अब व्यक्तिगत खुशी और आत्म-संतुष्टि का
माध्यम बन गया है वहीं जहाँ पहले प्रेम का अर्थ प्रतीक्षा और धैर्य था, अब वह तत्काल प्रतिक्रिया की मांग करता है।
पारंपरिक प्रेम को
अक्सर 'निस्वार्थ'
कहा जाता था (चाहे वह वास्तविकता में हो या न हो), लेकिन आधुनिक प्रेम में “बाउंड्रीज़”,
“स्पेस”आदि को प्राथमिकता दी जा रही है। यह प्रेम का अधिक व्यावहारिक रूप है। तो क्या
वर्तमान समय में प्रेम में संवेदनशीलता समाप्त हो गई है, इस विषय में भुवनेश्वर जी
कहते हैं कि प्रेम संवेदनशील हृदय का सहज प्रस्फुटन है प्रेम यदि अनुग्रह का भाव
है तो प्रेम समर्पण भी है जो वगैर संवेदनशीलता संभव ही नहीं है।
एक अन्य प्रश्न जो
अक्सर किया जाता है की क्या व्यक्ति की कल्पनाशक्ति प्रेम को प्रभावित करती है,
भुवनेश्वर जी कहते हैं कि कल्पनाएं काम एवं स्वार्थ सिद्धि अधिक लगती हैं क्यूंकि यहाँ
बुद्धि अपने हितों के लिए वास्तविकता की अवहेलना करती दिखलाई देती है, जबकि प्रेम
का अस्तित्व केवल वास्तविकता एवं उस से उपजे विश्वास की भूमि पर खड़ा हो सकता है
जहां नकारात्मकता के लिए कोई जगह नहीं बल्कि कल्पनाएं केंद्रित और नियंत्रित होती
हैं।
प्रेम के विभिन्न स्वरूप
की गहराई और उसकी जटिलताओं को समझना किसी महासागर की थाह लेने जैसा है। जिसकी गहराई अनंत है।
भुवनेश्वर उपाध्याय
जी ने सार्थक प्रयास किया है। पुस्तक यह बखूबी स्थापित करती है की प्रेम मात्र एक
भावना नहीं, बल्कि एक साधना है। लेखक ने इसके भौतिक से लेकर आध्यात्मिक रूपों का, संबंधित
प्रश्नों का जो विवरण एवं चित्रण किया है, वह ज्ञानवर्धक है।
जहाँ इसमें अगाध शांति है, वहीं सांसारिक विद्वेषों यथा ईर्ष्या
एवं मोह का भय भी है। हालांकि प्रेम के बिना मनुष्य का अस्तित्व एक कोरे कागज की
भाँति है। यह मात्र एक अध्ययन नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर
उतरने की एक यात्रा है। अंत में, प्रेम ही वह एकमात्र सत्य
है जो हमें पूर्ण बनाता है।"
अतुल्य खरे
9131948450
104-105 महेश विहार, समीपस्थ महा मृत्युंजय द्वार, इंदौर रोड, उज्जैन, म.प्र. 456010








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