Gajshardool -- Pustak Samiksha : Atulya Khare

  • Pustak Samiksha : Atulya Khare
  • समीक्षित पुस्तक : गजशार्दूल
  • विधा : ऐतिहासिक गाथा, उपन्यास 
  • द्वारा : अनीश सिंह खरसन 
  • सम्पादन: M.I. राजस्वी
  • VETERAN Publishing House (VPH) द्वारा प्रकाशित
  • प्रकाशन वर्ष :  2025
  • मूल्य : 249
  • समीक्षा क्रमांक : 206



युवा लेखक एवं पेशी से इंजीनियर, अनीश सिंह खरसन द्वारा सृजित कृति “गजशार्दूल” वरिष्ठ साहित्यकार एम. आई. राजस्वी के सम्पादन में वेट्रन प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत की गई है,  के विषय में असमंजस में हूँ की आपसे इसका परिचय शोध ग्रंथ के रूप में करवाऊँ अथवा ऐतिहासिक पात्रों एवं भौगोलिकता को  पुनर्जीवित करते हुए एक अनूठे उपन्यास के रूप में जिसके लेखक, कठिन श्रमसाध्य शोध्यके द्वारा  तत्कालीन भारतवर्ष की शासन व्यवस्था, एवं अन्य सामाजिक पहलुओं पर अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण सहित विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं। 


   

गजशार्दूल, कल्चुरी नरेश महाराज जाजल्यदेव  एवं नागकुल के राजा  सोमेश्वरदेव की युद्ध विषयक रणनीतियों, कठोर एवं क्रूर दंड व्यवस्था, खुफिया अभियानों, सामाजिक सद्भावना, पारस्परिक विश्वास की कमी एवं संदेह (जिन्हें कूटनीति की दृष्टि से उचित ही माना जाएगा), तत्कालीन शासन व्यवस्था एवं प्रजा की प्रतिक्रियाओं को प्रमुखता से सामने रखती है।

कथानक तकरीबन 1000 वर्ष पूर्व वर्तमान राज्य छतीसगढ़ के तत्कालीन दक्षिण कोसल राज्य के इतिहास से संबद्द है, एवं भौगोलिक भारतवर्ष का केंद्र होने के कारण इसके मार्फत हमें तत्कालीन भारतवर्ष की राज व्यवस्था, इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति की झलक मिलती है।

 उस दौर में जबकि अनेकोंनेक छोटे छोटे रजवाड़े, सामंतशाही व्यवस्था के संग मौजूद थे, जिनके  राजा, सेनापति,  एवं राज्य की स्वयं की सेनाएं एवं सम्पूर्ण सुव्यवस्थित राज काज शासन प्रणाली थी, राज्य को सुव्यवस्था हेतु,  छोटे क्षेत्रों में विभाजित किया गया था जिन्हें गढ़ कहा गया, तथा इन्हें शासित करने वाले गढ़ाधिपति राजा के प्रति उत्तरदायी थे, यथा वर्तमान राज्य के नाम से भी स्पष्ट ही है कि उस दौर में उस क्षेत्र विशेष में कुल 36 गढ़ होने के कारण ही राज्य को उसका वर्तमान नाम प्राप्त  हुआ था। तत्कालीन व्यवस्था पर उपलब्ध जानकारी दर्शाती है कि राज्यों में व्यापार सीमित था किन्तु प्राकृतिक संसाधन एवं कृषि इत्यादि प्रचुरता में होने से प्रजा में संपन्नता विद्यमान थी अर्थात संक्षेप में यह जा सकता है कि राज्य में राजा एवं मंत्री परिषद तथा अन्य प्रशासकीय अधिकारियों का प्रमुख कार्य राज्य की सुरक्षा एवं कर संग्रहण ही था, राजा तथा अन्य मंत्रियों इत्यादि का महत्वपूर्ण समय एवं संसाधन (इन्हे वर्तमान राज्य व्यवस्था से तुलना  करने पर राज्य या रियासत कहना उपयुक्त तो प्रतीत नहीं होता) अपने राज्य (भू क्षेत्र) के भौगोलिक विस्तार एवं अन्य निकटवर्ती राज्यों को अपने आधीन कर धन धान्य से अपने राज्य को समृद्द करने तथा अपना वर्चस्व स्थापित करने में ही व्यतीत होता था। फलस्वरूप इन राज्यों के बीच समय समय पर स्वयं को शक्तिशाली करने हेतु युद्द होना अत्यंत सामान्य था।

लेखक के वर्णन के आधार पर स्पष्ट लक्षित है कि ज्ञानी पण्डित, पुरोहितों को राजकीय व्यवस्था में उच्च  सम्मान प्राप्त था, फलस्वरूप राज्य के दैनिक प्रशासनिक कार्य में मंत्रियों के अलावा आचार्यों एवं ज्ञानी पंडितों इत्यादि का महत्वपूर्ण दखल भी देखने में आता है। राज काज के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनके परामर्श एवं निर्णयों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था एवं राजा तथा प्रजा से उन्हें अत्यंत सम्मान प्राप्त था।     

कथानक अपनी विषयवस्तु तथा पुरानी अय्यारों एवं जहर बुझे तीरों वाले प्रसंगों के प्रभाव में पाठक को प्राचीन काल की महत्वपूर्ण प्रसिद्द कृति “चंद्रकांता” की यादों को ताज़ा करवाता है। लेखक अपनी शैली एवं कथानक के प्रवाह तथा रोमांचकता के संग विशिष्ट संवाद अदायगी के माध्यम से घटनाक्रम की प्रस्तुति के चलते पाठक को जोड़े रखने में सहज ही कामयाब रहे हैं। पुस्तक को रोचकता प्रदान  करने हेतु सामान्य घटनाक्रम प्रवाह के अतिरिक्त किसी विशिष्ट अतिरिक्त प्रयास का दखल लक्षित नहीं है।     

पुस्तक की विषयवस्तु के संबंध में कहना होगा की लेखक ने गहन शोध कर तथ्य जुटाए हैं, एवं कथानक को विस्तार देने तथा नियोजित करने में काफी श्रम किया है। भाषा के ऊपर बहुत काम किया गया है तथा पढ़ते वक्त कहीं भी ऐसा प्रतीत नहीं होता की भाषा स्तर उस दौर में विद्यमान आम भाषा से अलग होगी एवं प्रसंग अपनी प्रस्तुति के विशिष्ट भाषाई रुख के कारण पाठक को तत्कालीन आभास देने में पूर्णतः  सफल  हुए हैं ।


 

लेखक ने कथानक को जिस चरणबद्द तरीके से आगे बढ़ाया है वह निश्चय ही सराहनीय है। लेखक की लेखन कला से मेरा परिचय इसी कृति के माध्यम से हुआ है किन्तु कहना होगा की वे स्वयं में असीम संभावनाएं सँजोये हुए हैं।

कथानक, राजवंशों के बीच वर्चस्व की लड़ाई, राजनीति, कूटनीति, युद्ध कौशल एवं गुप्तचरी पर विस्तार से कथन है,  तथा पाठक, कथानक के संग संग उस ऐतिहासिक वातावरण में पहुँच जाते हैं जहां राजकीय समस्याएं हैं तो सीमाओं की रक्षा, रणनीति, भावनात्मक संघर्ष घात-प्रतिघात भी लक्षित है। इस में जहां एक ओर हमें जाजल्यदेव का दृढ़ निश्चय देखने को मिलता है वहीं अन्य पात्रों का व्यवहार एवं संवाद भी पूर्णतः  भूमिका के संग न्याय करते है। लेखक द्वारा शासन में कूटनीति के महत्व को दर्शाते हुए राजा जाजल्य देव  की आदिवासी कबीले के नेता धीरही से शत्रु राजा पर आक्रमण हेतु मदद प्राप्त करना,  पात्रों की मनोदशा दर्शाने में उनके हाव भाव एवं शारीरिक भाव भंगिमाओं को भी यथोचित स्थान पर प्रयुक्त करना  निःसंदेह कथानक में उनकी गहरी पैठ एवं उसके अत्यंत सूक्ष्म बिंदुओं पर भी उनकी समझ को दर्शाती है। 


    

कथानक मूलतः कलचुरी वंश के दक्षिण कोसल राज्य तथा चक्रकोट राज्य के संघर्ष की कहानी है। जहां कलचूरी वंश का राजा जाज़्ल्यदेव एक रीति नीति का जानकार प्रबल कूटनीतिज्ञ, धर्म में आस्था रखने वाला शासक है तो वहीं समीपवर्ती चक्रकोट राज्य  का नाग वंशी राजा सोमेश्वरदेव एक धूर्त, अभिमानी, क्रूर, कुटिल एवं किसी भी प्रकार से शासन व सत्ता पर अपना नियंत्रण रखने वाला विधर्मी राजा दर्शाया  गया है। समीपवर्ती अथवा (दोनों ही राज्यों का ) मध्यवर्ती कहना अधिक उचित प्रतीत होता है,  एक अत्यंत छोटे राज्य के राजा सिंहदेव की कुटिलता, विश्वासघात और जाज्वलयदेव के सेनापति जगपाल की स्वामिभक्ति, विग्रहराज का संदेह,वफादारी एवं कर्तव्यनिष्ठा, रुद्र शिव की निष्ठा प्रमाणित करने एवं आत्म गौरव व निज सम्मान की रक्षा हेतु श्रमसाध्य विजय अभियान तथा यहाँ शिल्पकार भीमा का वास्तु ज्ञान, इत्यादि के  व्यापक प्रसंग मिलते हैं जो प्रभावित करते हैं वहीं वन क्षेत्रों, पहाड़ी स्थलों तथा सुरंग आदि के वर्णन कथानक को  गतिशील, रोमांचक एवं रुचिकर बनाते हैं। 


  प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था में ऋषि मुनियों पर आस्था, वरिष्ठ जन का सम्मान, धर्म पर विश्वास,  आम जन जीवन तथा समाज की एक सहज स्वाभाविक जीवन शैली थे, उसी क्रम में  पुस्तक में  राजा को भी धार्मिक तथा ऋषि मुनियों पर श्रद्धा एवं आस्था  रखने वाला  दर्शाया गया है अतः कथानक में जहां वीर रस का भाव है वहीं भक्ति भाव भी दर्शनीय है साथ ही आध्यात्मिकता से संबद्द कई सुंदर वाक्यांश भी प्रयुक्त हुए हैं जिनसे कथानक की भव्यता में वृद्धि हुई एवं कथन समृद्द हुआ है। कथानक में दार्शनिकता युक्त मनन, उत्तम संस्कारों की व्याख्या, करुणा, एवं क्षमा आदि उच्च स्तरीय मानवीय गुणों का सुंदर प्रस्तुतीकरण दिखा है तथा ये समस्त कारक कथानक को विशिष्टता प्रदान करते है। कहानी का अंत यूं तो वीरता को समर्पित है किन्तु वहीं युद्द में विजय स्वयं को भिन्न रूप में परिभाषित करती है एवं यह विचार पुनः पुष्ट हो उठता है की रण जीतने से कहीं अधिक मूल्यवान जीत दिल जीतना है जिसका बेशकीमती उदाहरण राजा जाजल्य देव द्वारा अपने शत्रु राजा सोमेश्वरदेव पर विजय के पश्चात सोमेश्वरदेव की  माँ के प्रति सम्मान स्वरूप किये गए आचरण में दर्शनीय है। 

कथानक की रोमांचकता को बरकरार रखने हेतु मेरे पक्ष में यह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है की समीक्षा के द्वारा पाठक की रोमांचकता किसी भी प्रकार कम न हो तथा पुस्तक के प्रति उत्कंठा बनी रहे अतः  कथानक के विषय में यहाँ एक मूल भूत जानकारी ही प्रस्तुत करी है एवं हर संभव प्रयास किया है की किसी भी प्रकार से कथानक के विषय में वह जानकारी न प्रकट कर  दूँ जिस से पाठक की रोमांचकता तथा   उत्कंठा में किसी भी प्रकार की कमी आए।

पुस्तक में विभिन्न स्थानों पर पात्रों द्वारा विशिष्ट कथा का प्रयोग किया गया है जिनमें से  उद्वरणस्वरूप   उल्लिखित हैं:

मन के भाव मनुष्यों और पशुओं में एक समान होते हैं , मनुष्य का विवेक ही है, जो उसे पशुओं से श्रेष्ट बनाता है । मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग कुशलतापूर्वक कर सकता है अन्यथा वह पशु ही है।

मनुष्य को माय की वास्तविकता का ज्ञान होता है । उसे अपने विवेक और आत्म बाल का उपयोग करना चाहिए तकइ वह भ्रम से निकाल सके । समझिए की जिसने अपने विवेक का उपयोग किया वह माया में पड़कर भी उसके भ्रम से निकाल जाता है।  

ऐसे ही सुन्दर कोट्स पुस्तक में प्रयुक्त हुए हैं जो कथानक को विशिष्ट प्रभाव देते हैं ।

कलचुरी वंश के प्रमुख शासक, महान योद्धा, जाजल्य देव जिन्हें गजशार्दूल के नाम से भी जाना जाता है उन्हें प्रमुख पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हुए व अन्य एतिहासिक पात्रों के संग जहां अनीश जी ने सुंदर एतिहासिक कथा का सृजन किया जो विशेष तौर पर हमें तत्कालीन शासकों के दृढ़ निश्चयी , युद्ध कौशल में पारंगत , रण नीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ एवं धर्म तथा आस्था जैसे विषयों में उनकी पारंगतता  से अवगत करवाती है वहीं राजस्वी जी, जिन की अविस्मरणीय कृतियाँ अश्वत्थामा का अभिशाप, अश्वत्थामा की अमर मणि , और रामायण उन्हें संबंधित क्षेत्र के प्रकांड ज्ञानी के रूप में स्थापित कर चुकी हैं एवं ऐतिहासिक तथा  पौराणिक विषयों में उनकी श्रेष्टता निर्विवादित है, यही कारण है की जहां एक ओर राजस्वी जी के सम्पादन से पुस्तक अंश निखर उठा है वहीं प्रकाशक ने भी पुस्तक को उच्च कोटी के संग्रहणीय ग्रंथ बनाने में कोई कसर नहीं उठा रखी। वर्तमान में इस प्रकार के विषय को लेकर लेखन करना अवश्य ही चुनौति पूर्ण है। युवा रचनाकार अनीश जी, वरिष्ठ साहित्यकार राजस्वी जी इस प्रस्तुति हेतु निःसंदेह बधाई के पात्र हैं वहीं Veteran प्रकाशन का सहयोग भी अवश्य ही सराहनीय एवं अविस्मरणीय  है।

                                                                                                                                                                                  

Pustak Samiksha : Atulya Khare        

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