Raag Kasoomal By Dr. Ramesh Chand Meena

 

राग कसूमल

द्वारा : डॉ.रमेश चंद मीणा 

वेरा प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित

प्रथम संस्करण : 2026

मूल्य – 250

समीक्षा क्रमांक : 216


प्रेम, एतिहासिकता एवं कला का सुंदर सुयोग प्रस्तुत करता, “राग कसूमल” युवा कलाकार, साहित्यकार डॉ. रमेश चंद मीणा का सद्य प्रकाशित उपन्यास है जिसे वेरा प्रकाशन जयपुर द्वारा अत्यंत सुरुचिपूर्ण कलेवर में प्रस्तुत किया गया है। पेशे से चित्रकला शिक्षण का दायित्व निबाहते हुए, डॉ .रमेश चंद मीणा, चित्रकला की दुनिया में एक स्थापित नाम एवं सुपरिचित चेहरा है जिन्हें हाल फिलहाल तक रवीन्द्र नाथ टैगोर कला सम्मान, अजन्ता एलोरा कला दीर्घा सम्मान के साथ साथ अनेक नामचीन स्थाओं द्वारा विभिन्न प्रतिष्ठित पुरुस्कारों द्वारा नवाज़ा जा चुका है। पुस्तक का आवरण पृष्ट राजस्थानी रजवाड़ों की झलक दर्शाता हुआ आकर्षक है वहीं विशिष्ठ उल्लेख यह भी की पुस्तक के प्रकाशन में प्रकाशक द्वारा किये गए प्रयास सार्थक हैं तथा पुस्तक पूर्णतः त्रुटि रहित है।   



यूं तो यह डॉ. रमेश की बतौर उपन्यासकार पहली प्रस्तुति है, किन्तु भक्ति, प्रेम, काव्यात्मकता तथा ऐतिहासिक पृष्टभूमि को जिस अंदाज में एक डोर में पिरो कर प्रस्तुत किया है वह अकल्पनीय होते हुए सराहनीय है। कथानक अपनी भाषाई सुंदरता एवं स्थानीय बोली में लिखे गए छंदों के प्रभाव से अद्वितीय रचना है। हालांकि, क्षेत्रीय भाषा की समझ न होने से उन छंदों का पूर्ण आनंद तो नहीं ले सका किन्तु जितना समझ सका वह भी अत्यंत प्रभावी तथा आनंददायी था। कथानक में यूं तो वीर रस, शृंगार एवं भक्ति रस प्रमुखता से हैं किन्तु रजवाड़ों की राजनीति, युद्ध, आंतरिक घात, आदि पर भक्ति एवं प्रेम अंततः हावी रहे। पुस्तक अपनी किंचित क्लिष्ट भाषा, तथा एतिहासिक पृष्टभूमि के चलते पढ़ने में एकाग्रता एवं समर्पण मांगती है। गंभीर पाठन ही पुस्तक का आनंद दे सकेगा। उपन्यास में काव्य, चित्रकला, शृंगार एवं आध्यात्मिकता का अनूठा संगम देखने में आता है जो आम उपन्यासों में दुर्लभ ही है। भारतीय इतिहास, कला एवं आध्यात्मिकता पर आधारित सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उपन्यास है जो, रोचकता के साथ इतिहास से गुजरते हुए प्रेम मार्ग से भक्ति रस में डुबा जाता है।


प्रस्तुत उपन्यास के शीर्षक “राग-कसूमल” से अभिप्राय कुसुंभ से प्राप्त राजस्थान की संस्कृति का गहरा उष्ण और पवित्र लाल रंग है। यही रंग मीरा की भक्ति में है तो महाराणा प्रताप के जोशो जुनून में भी और अरावली शृंखला पर भी बिखरा हुआ है। लेखक के शब्दों में यह एक संगीतात्मक अनुभूति, एक रस-यात्रा और एक सांस्कृतिक रूपक है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग केवल स्वरों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभूति की वह धारा है जो मनुष्य के भीतर नाद, लय और भाव के रूप में स्पंदित होती है। यही राग जब शब्दों में उतरता है तो कथा भी एक लय ग्रहण करती है -कहीं विलंबित, कहीं मध्य,कहीं द्रुत -और पाठक उसके साथ जीवन के प्रसंगों की संगीत यात्रा में बहता चला जाता है।



ऐतिहासिकता एवं कला के सुयोग के साथ प्रेम रस के सुंदर योग से इस उपन्यास का कथानक विस्तारित हुआ है। कथानक के पीछे लेखक डॉ. रमेश का असाध्य शोध स्पष्टतः दर्शनीय है। कथानक में ऐतिहासिक घटनाक्रम के संग आध्यात्मिकता का खूबसूरत संयोग प्रस्तुत किया गया है। कथानक मूलतः दो भावों पर केंद्रित है पहला तो कृष्णगढ़ का इतिहास एवंम दूसरा काव्य, चित्रकला एवं श्रंगार रस से ओतप्रोत प्रभु प्रेम, जिसमें एक अद्भुत एवं अनूठा संयोग प्रेम रस का भी सहज ही देखा जा सकता है।

'राग कसूमल' सम्पूर्ण गाथा उपन्यास के 22 अध्यायों में विभाजित है। कथानक में तत्कालीन राजस्थान की विशिष्ठ ऐतिहासिक घटनाओं के परिदृश्य में आत्मिक एवं आध्यात्मिक प्रेम का वर्णन है जहां साधक अपने प्रियतम में ही प्रभु के दर्शन पा लेता है एवं उसी भाव एवं रूप में उसका प्रेम अपनी भावना अभिव्यक्त करता है। कथानक में चित्रण मनभावन एवं स्वाभाविक है जहां शब्द इस प्रकार दृश्य चित्रण करते हैं की समूचा घटनाक्रम दृशयरूप में आँखों के सम्मुख चलचित्र के मानिंद उपस्थित हो जाता है। विषयवस्तु की गहनता एवं भावों की गंभीरता,के दृष्टिगत एवं कथानक के सम्पूर्ण भावों का आनंद प्राप्त करने हेतु भावों को स्वयं में उनके समग्र रूप में पूर्णतः जज़्ब करते हुए आगे बढ़ना आनंदायी होगा।

कथानक का प्रारंभ संवत 1600 से होता है यह वह दौर था जब छोटे छोटे रजवाड़े अस्तित्व एवं आधिपत्य की लड़ाई के साथ कभी मुगल तो कभी मराठों से युद्ध में व्यस्त रहते थे। संवत 1651 में जोधपुर के मेहरानगढ़ के राजा उदयसिंघ द्वारा अपने पुत्र कृष्ण सिंह को ग्राम आसोप की जागीरी सुपुर्द की गई। युवा कृष्ण सिंह राधा कृष्ण के भक्त थे एवं सूफी इश्क और वल्लभ संप्रदाय के माधुरी भक्ति मार्ग को एक ही मानते थे। पिता के आदेश पर कृष्ण सिंह ने वहाँ की बागडोर संभाली एवं इस जागीर को खुशहाल बनाने की कोशिश की किन्तु शूरसिंघ जो कृष्ण सिंह के बड़े भाई थे उनके द्वारा राजनैतिक द्वेष भावना वश अरावली की गोद मे बसे आसोप को छीन कर उन्हें दूघोड़ की जागीरी दी गई। इस निर्णय के विरुद्द कृष्ण सिंह दिल्ली दरबार में मुगल सम्राट अकबर के सम्मुख उपस्थित हुए, तब सम्राट ने उनकी विशिष्टताओं के दृष्टिगत उन्हें हिंडोन का जागीरदार नियुक्त कर दिया। प्रसन्न कृष्ण सिंह के शासन एवं प्रयासों से हिंडोन फल फूल उठा एवं कला तथा भक्ति का केंद्र बनने की ओर अग्रसर हो चला। आगे चलकर जहांगीर ने उन्हें वर्तमान किशनगढ़ के आसपास के गाँव की जागीर प्रदान की। उसी सेठोलाव रियासत (वर्तमान किशनगढ़) में 1668 में वर्तमान किशनगढ़ की नींव पड़ी।

कथानक राजस्थान के इसी कृष्णगढ़, जिसे वर्तमान में हम किशनगढ़ के नाम से बखूबी जानते हैं, की ऐतिहासिक पृष्टभूमि पर रचा गया है जो उस समय में एक सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न रियासत थी। वे लिखते हैं कि " कृष्ण गढ़ का दरबार जो कला, संगीत और भक्ति का केंद्र था, वह सावंत सिंह और बणी-ठणी की भक्ति काव्य सभाओं से जीवंत रहता था। यहां के कलाकार उनकी प्रेम भक्ति की कथाओं को चित्रों, संगीत और नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते थे। यूं तो यह एक ऐसे राज घराने के उत्थान और पतन की कहानी है जिसमें पीढ़ी दर पीढ़ी भक्ति, संगीत एवं चित्रकला जैसे कला के ज्ञाता रसिया और पारखी राजा हुए किन्तु मुख्यतः सम्पूर्ण कथानक राजा सावंतसिंह और उनकी अप्रतिम रूपसी प्रेमिका बणी ठणी पर केंद्रित है।




अपने मामा के सानिध्यवश कृष्णसिंह, वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी हो गए थे। जहां सेवा ही भक्ति थी और राधा कृष्ण का प्रेम ही परम तत्व। संवत् 1672 में कृष्ण सिंह के निधन के पश्चात उनके पुत्रों सहसमल, जगमल तथा हरीसिंघ ने क्रमशः गद्दी संभाली तत्पश्चात भागमल के पुत्र रूप सिंह ने इस रियासत को आगे बढ़ाया।

महाराज रूप सिंह एक कुशल शासक ही नहीं अपितु एक अनन्य भक्त एवं रसिक पुरुष थे। इसी वजह से उनके राज में सुशासन के संग भक्ति, कला, और रस का भाव विद्यमान था। उनकी भक्ति एवं प्रभु लगन का ही प्रभाव था, कि श्री नाथ जी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर उन्हें अपने को रूपांगढ़ में स्थापित करने का निर्देश दिया। फलस्वरूप रूपांगढ़ में प्रभु की प्राणप्रतिष्ठा हुई। रूप सिंह के पश्चात उनके पुत्र मानसिंह कृष्णगढ़ के राजा हुए।

 वह 1721 का समय था जब औरंजेब ने आक्रमण किया तथा मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ने की अपनी धर्मस्थल भंजक कुनीति के चलते यह दुष्कृत्य करने हेतु सेना को आदेशित किया फल स्वरूप सुरक्षा के दृष्टिगत श्रीनाथ जी का विग्रह मथुरा से राजपूताना ले जाया गया। मानसिंह ने औरंगजेब के इस आक्रमण को न सिर्फ मूर्ति एवं मंदिरों पर अपितु सम्पूर्ण संस्कृति पर संकट मानते हुए श्रीनाथ जी के अल्पवास हेतु प्रथम पीताम्बर की गार में तत्पश्चात नाथद्वारा में विधिवत मंदिर का निर्माण करवाया एवं वहाँ विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा हुई।

1762 में राजा मान सिंह का निधन हो गया। तथा उनके पुत्र राजसिंह राजा बने। राज सिंह का युग कृष्ण गढ़ के साहित्य एवं भक्ति का स्वर्णिम युग था। वे भी अपने पूर्वजों की ही भांति भक्तिरस से परिपूर्ण हृदय तथा कला के प्रति झुकाव रखते थे। उनकी पत्नी बाँकावती भी एक कवीयत्रि थी, तथा उनके काव्य में भक्ति एवं प्रकृति का अनूठा संगम था।



1804 में राज सिंह के देहावसान के पश्चात उनके पुत्र सावंत सिंह राजा बने एवं 1821 तक उन्होंने शासन किया। राजकुमार सावंत सिंह का उनकी विमाता बाँकावती बृज कुंवरी की परिचारिका विष्णु प्रिया से अद्वितीय प्रेम इतिहास के पन्नों में सुर्खियों में दर्ज है बृज कुंवरी को  इतिहास में नागर रमणी,बणी ठानी, उत्सव प्रिय लवलीज़ एवं रसिक बिहारी नामों से भी उद्बोधित किया गया है। अनन्य सुंदरी एवं व सर्व गुण सम्पन्न विष्णु प्रिया इस कथानक की नायिका हैं वहीं सावंत सिंह, जो मात्र तलवार के धनी ही नहीं थे अपितु संस्कृत और फारसी के प्रकांड पंडित भी थे साथ ही संगीत एवं चित्रकला में उनकी रुचि एवं निपुणता अद्वितीय थी एवं वे भक्ति एवं काव्य के साधक थे इस कथानक के प्रमुख एवं नायक हैं।

सावंत सिंह और बणी ठणी दोनों ही राधा कृष्ण के परम भक्त थे, बनी ठणी के रूप एवं गुणों से सावंत सिंह उन पर मोहित हुए पश्चात उनके एवं बणी ठणी के बीच प्रेम पल्लवित हुआ। दोनों की राधा कृष्ण के प्रति भक्ति के फलस्वरूप अपने प्रेम में ही उन्हें प्रभु के प्रेम के दर्शन होते थे। जहां एक ओर सावंत सिंह के लिए बणी ठणी भक्ति की देवी थी एवं उन्हीं में राधा रानी के दर्शन होते वहीं बणी ठणी सावंत सिंह के प्रेम में उन्हें ही कृष्ण मान पूजती। उन दोनों के गीत संसार में प्रेम और श्रद्धा के दो स्वर थे जो एक दिव्य भक्ति संगीत रचते थे।

किन्तु, सदा से ही प्रेम का मार्ग कठिन है, एक ओर दोनों प्रेम एवं भक्ति रस में डूब रहे थे वहीं दूसरी ओर इस प्रेम के विरोध में स्वर उसी तीव्रता से मुखरित होने लगे। राजकुमार एक परिचारिका के प्रेम में रत है, ज्यों ज्यों यह बात महल में फैली, रानी, राजपुरुष एवं राज गुरु सभी ने इस प्रेम का पुरजोर विरोध किया किन्तु सावंत सिंह अपने निर्णय पर अडिग रहे। हालांकि दरबार में तीव्र आलोचनाएं होने लगीं यहाँ तक की राज माता ने कहा की सावंत को राज काज चाहिए या रासलीला तब सावंत सिंह ने मात्र एक पंक्ति में अपना उत्तर यह कहते हुए दिया की जो राज्य राधा के बिना है वह मेरे लिए शुष्कवन है। कथानक जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, सावंत सिंह और विष्णु प्रिया का प्रेम भी विस्तार पाता है और अंततः भक्ति में परिणत होकर चित्रकारी में उतर आता है। सावंत सिंह की हरी भक्ति के कारण ही उनका नाम नागरीदास प्रचलित हुआ और विष्णु प्रिया उनकी “बणी-ठणी”।



1804 में सावंत सिंह का राजतिलक हुआ किन्तु उन्हें तो राज काज उनके व प्रभु के प्रेम के बीच एक कंटक समान नजर आता था , उन्हें यूं प्रतीत होता मानो वे प्रभु भक्ति से दूर हो रहे हों ऐसा ही बणी ठणी भी महसूस करती। उनके शासन का आरंभ किसी राजनैतिक युग का सूत्रपात नहीं अपितु सांस्कृतिक जागरण का उद्घोष था। वे तो सिंहासन को बोझ समझते थे।

सावंत सिंह के राजकीय कौशल एवं आम जन के प्रति राज के दायित्वों की पूर्ति हेतु उनके प्रयास के अनेकों प्रसंग हैं। संवत 1821 में सावंत सिंह के निधन का वर्णन हृदयविदारक एवं प्रभावी है। उनके निधन के पश्चात वृन्दावन के संत, ब्रजवासी,गोस्वामी और सामान्यजन उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए उमड़ पड़े .बणी ठणी उनकी समाधि पर मौन बैठी रही एवं कालांतर में वह भी नागरीदास की तरह कला एवं भक्ति को समर्पित हो प्रभु चरणों में लीन हो गई। नागरीदास और उनके बाद बणी-ठणी की अंतिम यात्रा के साथ जहां एक स्वर्णिम युग का अंत होता है उसी के साथ कथानक भी अपनी पूर्णता प्राप्त करता है।

 पुस्तक में भक्ति, राजपाट से विरक्ति एवं अनुरक्ति के रंग एकरस होकर कथानक को एक अद्भुत आभा प्रदान करते हैं। तत्कालीन राजवंशों में भक्ति एवं कला मानो एक परंपरा के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी अनवरत जारी रही, उसकी तथ्यपरक संगीतमय रोचक प्रस्तुति है साथ ही सावंत सिंह और बणी ठणी  के प्रेम की प्रस्तुति अलौकिक आनंद दायी है।

 

           अतुल्य



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