Maykhana -- Pustak samiksha By Atulya Khare

  • समीक्षा 
  • द्वारा: अतुल्य खरे 
  • समीक्षित पुस्तक : मयखाना
  • विधा : गजल
  • द्वारा : राजेश चौहान
  • सम्पादन: एम.. समीर
  • VETERAN PUBLISHING HOUSE द्वारा प्रकाशित
  • प्रथम संस्करण : 2025
  • मूल्य : 199
  • समीक्षा क्रमांक : 215




 अरबी में सामान्य बोलचाल में शराब को खमर कहते हैं जो सूफी संदर्भ में मरीफ़त (ज्ञान) के साथ मिलकर रूहानी मस्ती को दर्शाता है,और साधक ईश्वर के प्रेम में लीन हो दुनिया से बेखबर हो जाता है। अर्थात दुनिया के मोह-माया से मुक्ति और ईश्वर में विलीन होना यह संदेश मुखतः इन गज़लों का उद्देश्य होता है। सूफी शायरी में शराब कोई भौतिक द्रव्य नहीं अपितु ईश्वर के प्रेम और ज्ञान का नशा है वहां साकी खुद ईश्वर है, और मयखाना वह स्थान है जहाँ आध्यात्मिक ज्ञान मिलता है।

प्रस्तुत गजल संग्रह ”मयखाना” वरिष्ठ गजलकार राजेश चौहान की चुनिंदा गज़लों का संग्रह है जिसे एम.. समीर जी के सम्पादन में VETERAN पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित किया गया है। यथा नाम से ही स्पष्ट है संग्रहीत गजलें शराब और मयखाने के परिवेश में ही रची गई हैं।



वहीं सूफी शायरी से जुदा आम शायरी में, इश्क में मिली नाकामी, बेवफाई, तन्हाई और जमाने के गम को भुलाने के लिए शराब को एक 'मरहम' के तौर पर भी पेश किया गया है। शराब और शराबघर से जुड़े शब्दों का शायरी में इस्तेमाल बहुतायत में होता है यथा ​साकी, पैमाना, रिंद, मयखाना, हाला वगैरह। उर्दू और हिंदी साहित्य में शराब एक पेय पदार्थ न होकर एक ऐसे प्रतीक रूप में है जो इंसान को हकीकत की कड़वाहट से दूर ले जाए और गमों को बेशक कुछ ही समय के लिए लेकिन भुला दे। अधिकांश ​शायरों ने अक्सर शराब का इस्तेमाल धार्मिक कट्टरता और पाखंड् की आलोचना करने में और उस पर तंज कसने के लिए किया है।

प्रस्तुत पुस्तक “मयखाना” महज़ चंद शायरियों का संग्रह नहीं है अपितु उन टूटे हुए दिलों की आवाज़ है जो अक्सर महफिलों में खामोश रहते हैं। इस पुस्तक में लेखक ने बड़ी ही संजीदगी से यह दिखाया है कि कैसे इंसान बेवफाई के ज़हर को मय (शराब) के प्याले में घोलकर पीने की कोशिश करता है। पुस्तक का मूल किन्तु गर्भित स्वर उदासी है, परंतु यह उदासी पाठक को बेचैन नहीं करती, बल्कि उसे आत्मिक सुकून देती प्रतीत होती है।



अच्छी गजल के लिए यह कतई ज़रूरी नहीं कि भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग हो, वरन अच्छी शायरी में तो बस सादगी और कारीगरी का संगम होना चाहिए। कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा भावनाएं व्यक्त करने का हुनर हो और शब्दों से चित्र बने, ऐसे शब्द हों। इस गजल संग्रह की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादा-बयानी है,लेखक ने सरल हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग किया है, जिससे शायरी सीधे दिल पर असर करती है। भाषा में बोझिल शब्द नहीं हैं, जहां कहीं उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल हुआ भी है तो वे भी सहज आम बोलचाल के शब्द हैं जो सरलतम रूप में एक आम आदमी की भावनाओं को व्यक्त करते हैं। लेखक ने फारसी या कठिन उर्दू का सहारा नहीं लिया। गज़लों का प्रवाह एक ऐसी नदी की तरह है जो शांत नहीं है, बल्कि जिसमें पत्थर और उफान हैं और पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह किसी शायर की किताब नहीं पढ़ रहा, बल्कि अपने किसी दोस्त की दास्तान सुन रहा है। ​यह किताब मनोवैज्ञानिक रूप से उस दौर की व्याख्या करती है जिसे हम ब्रेकअप और डिप्रेशन कहते हैं। लेखक ने दिखाया है कि कैसे एक इंसान अपनी तन्हाई से डरकर भीड़ और नशे का सहारा लेता है।

शायरी के तमाम शौकीन बखूबी वाकिफ ही हैं की ​शायरी केवल तुकबंदी नहीं है, बल्कि यह शब्दों का एक अनुशासित ढांचा है और ​एक अच्छी शायरी लिखने के लिए ख्यालों की मौलिकता बहुत जरूरी है जो इस पुस्तक में विशेष तौर पर देखने को मिलती है। साथ ही ​एक साधारण बात को असाधारण तरीके से कहना भी एक शायर का हुनर है जो इस गजल संग्रह में नज़र आता है। प्रस्तुत पुस्तक के लेखक गजलकार राजेश चौहान अपने मौलिक विचारों एवं सरल अभिव्यक्ति के लिए बखूबी जाने जाते हैं हालांकि यह उनका पहला गजल संग्रह है किन्तु उनके विचारों की परिपक्वता तथा अभिव्यक्ति में स्पष्टता सहज दर्शनीय है वहीं पुस्तक के संपादन का दायित्व समीर जी ने उठाया है तथा अपने गुरुतर दायित्व को बेहतरीन अंजाम दिया है।



​लेखक की नजर में मयखाना, सुकून की आखिरी मंज़िल है ​लेखक ने “मयखाने” को एक ऐसी जगह के रूप में चित्रित किया है जहाँ सभी सामाजिक भेदभाव खत्म हो जाते हैं। पुस्तक की सबसे मर्मस्पर्शी गजलें बेवफाई पर आधारित है। लेखक ने महबूब की बेरुखी को शराब के साथ इस तरह जोड़ा है कि पाठक उस टीस को महसूस कर सकता है। यहाँ शराब नशे के लिए नहीं, बल्कि गमों को भुलाने और यादों को धुंधला करने के लिए पी जा रही है। बेवफाई यहाँ एक विभीषिका नहीं, अपितु जीवन की एक कड़वी सच्चाई के रूप में स्वीकार की गई है। लेखक यह बखूबी स्थापित कर सके हैं कि गम ही वह चीज़ है जो इंसान को शायरी की गहराई तक ले जाती है।

​शुद्धतावादी संभवतः इसे महान साहित्य न मानें, क्योंकि इसमें वह नजाकत नहीं है जो दाग या मोमिन की शायरी में होती है। इसमें शब्दावली की पुनरावृत्ति है। लेकिन यही इसकी खूबी भी है; जब इंसान सदमे में होता है, तो उसका दिमाग एक ही जगह घूमता है, और लेखक ने इस तथ्य को बखूबी समझ है। वे लोग जिन्हे अपनी आवारगी का जश्न मनाना हैं या ​जिन्हें बहुत ज्यादा भारी दर्शन नहीं, अपितु अपनी कड़वी सच्चाई सुननी है और ​जो दिल टूटने का गम भूलना चाहते हैं वे इस संग्रह की गज़लों में अवश्य ही आनंद पाएंगे। किन्तु ​वे पाठक जो गज़ल में ईश्वरीय प्रेम ढूंढते हैं, सूफियाना गजलें पसंद करते हैं, उन्हें यह संग्रह थोड़ा अलग लग सकता है। इसमें शब्दों की नक्काशी के बजाय सीधे सरल जज्बातों का उफान ज्यादा है। क्यूंकि यह पुस्तक सूफी की दरगाह के बजाय, सीधे ज़िंदगी के कड़वे मोड़ पर ले जाकर खड़ी कर देती है। यह गजलें 'दिमाग' से अधिक दिल से जुड़ी हुई हैं।

​ पुस्तक ज़िंदगी की जमीनी हकीकत बयां करती है प्यार में जिनके दिल टूटे हैं उनकी बात करती है। शेर सीधे सीधे पाठक के उस जख्म पर चोट करते हैं जिसे दुनिया बेवफाई कहती है। लेखक बेवफाई को नसीब का खेल मानकर चुप नहीं होता बल्कि इस संग्रह में एक विद्रोह दिखता है। यहाँ महबूब को 'बेवफा' कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। लेखक ने उन लम्हों को पकड़ा है जब इंसान को पता चलता है कि उसका इस्तेमाल किया गया है। यही वजह है की यहाँ दुःख से ज़्यादा गुस्सा है।

 यहाँ महबूब कोई हूर नहीं, बल्कि एक ऐसा इंसान है जिसने अपना वादा तोड़ा। साथ ही शराब को भी कहीं महिमा मंडित नहीं किया है और इसे एक कड़वी दवा का दर्ज दिया है। लेखक के नजरिए से मयखाना कोई खूबसूरत जगह नहीं, बल्कि वह शरणस्थली है जहाँ इंसान समाज के ताने सुनने के बजाय खुद को भूलना चाहता है। यहाँ जाम इसलिए नहीं उठाया गया कि महफिल सजानी है, बल्कि इसलिए उठाया गया है क्योंकि टूटे दिल का दर्द और बेवफाई की यादें सोने नहीं दे रहीं।

“मयखाना” जीवन की कड़वी सच्चाईयों को समझने के इक्षुक, सरल शायरी के शौकीनों, ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव, बेवफाई की चुभन और मयखाने की खामोशी व रंगीनी के विरोधाभास को को शब्दों के आईने में देखने समझने के इक्षुकों हेतु संग्रहणीय पुस्तक है।

                                                                                                                                     

            अतुल्य खरे 

 

 

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