Kanpur To Kalapani By Roopsingh Chandel

 

कानपुर टु कालापानी

द्वारा : रूपसिंह चन्देल  

अमन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

प्रथम संस्करण : 2019

मूल्य : 225.00

समीक्षा क्रमांक : 217 




         “कानपुर टू कालापानी”वरिष्ठ उपन्यासकार रूप सिंह चन्देल द्वारा लिखित एक विशिष्ट उपन्यास है, जिसे अमन प्रकाशन ने वर्ष 2019 में प्रकाशित किया था। रूप सिंह चंदेल जी द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के परिदृश्य में लिखित एक सामाजिक उपन्यास जो तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक एवम धार्मिक स्थितियों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

प्रस्तुत उपन्यास प्रथम विश्व युद्ध काल में, जुझारू, मेहनतकश एवं साहसी नवयुवक की जीवन गाथा है, जो युवाओं के दिलों में धड़कती स्वतंत्रता प्राप्ति की आग तथा स्वदेश के लिए मर मिटने की भावना दर्शाता है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र “सरजू” एक परिश्रमी, साहसी एवं जीवन में वास्तविक ज्ञानार्जन हेतु सदैव उत्सुक एवं उत्साहित रहने वाला नवयुवक है, जो उस समय आम भारतीय के जीवन के नित्य प्रति संघर्ष एवं जोश को दर्शाते हुए युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके माध्यम से हमें तत्कालीन ग्राम्य जीवन, विषम सामाजिक एवं पारिवारिक  स्थितियाँ, तथा आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन एवं जीवन निर्वहन हेतु उनके द्वारा किया जा रहा कठिन श्रम देखने मिलता है। दृश्य प्रस्तुतिकरण में सजीवता पाठक को यथार्थ के अत्यंत करीब ले पहुँचती है तथा कहानी चलचित्र समान प्रतीत होती है।

चंदेल जी की विशिष्टता है कि वे पात्र के मनोभावों को, उनके मन की कशमकश को पढ़ते हुए उनकी भावनाओं को प्रभावी रूप में अभिव्यक्त कर देते हैं। प्रस्तुत पुस्तक में, पात्रों के संवादों तथा सुंदर वाक्यांशों के माध्यम से विभिन्न पात्रों के दिलों में उठते विचार, उनके मनोभाव तथा आंतरिक ऊहापोह की शाब्दिक अभिव्यक्ति हृदयस्पर्शी है वहीं सारगर्भित वाक्यांश अत्यंत प्रभावी हैं एवं कथानक को रोचक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वरिष्ट लेखक अपनी प्रभावी एवं गहन शोधपरक लेखन शैली के लिए बखूबी पहचाने जाते हैं। पुस्तक की सरल भाषा एवं यथास्थान क्षेत्रीय भाषा का सुंदर प्रयोग कहन को प्रभावी एवं दृश्य को यथार्थपरक बनाता है तथा पाठक को कथानक से संबद्द करते हुए उस दौर में ले जाकर पात्र तथा दृश्य से सीधे जोड़ता है एवं प्रस्तुति को और अधिक सुंदर एवं संवाद को रोचक बना जाता है, वहीं लेखक द्वारा प्राकृतिक दृश्यों का सुंदर मनोरम चित्रण कथानक को अधिक रोचक एवं पठनीय बनाता है।


वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार रूपसिंह चन्देल जी ने अपनी साहित्य सेवा का सफ़र कविता लेखन से प्रारंभ किया था किन्तु शीघ्र ही वे पूर्णतः गद्य लेखन को समर्पित हो गए एवं गद्य की अमूमन हर विधा यथा उपन्यास, संस्मरण, बाल-साहित्य, समीक्षा आदि के द्वारा साहित्य को समृद्ध किया। हाल फिलहाल तक उनके 20 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं एवं शीघ्र ही 21 वां उपन्यास “खामोश कदम” भी पाठकों हेतु उपलब्ध होगा। यह उपलब्धि एवं गद्य की अन्य विधाओं में उनकी रचनाएं स्वयं ही उनकी अत्यंत सफल साहित्यिक यात्रा को बयां कर देती है।

यूं तो उनकी समस्त कृतियाँ पठनीय हैं किन्तु यदि चंद का उल्लेख करना हो तो गलियारे, गुलाम-बादशाह, रमला बहू, पाथरटीला, नटसार, दग़ैल और शहर गवाह है आदि के नाम ले सकते हैं जो अपनी विषयवस्तु एवं विशिष्ठ प्रस्तुतीकरण के चलते बेहद खास हैं वहीं उनके शहीदों पर लिखे गए उपन्यास यथा खुदीराम बोस और क्रांति नायक अज़ीमुल्लाह खां विशिष्ट हैं।

अपने शोधपरक लेखन के द्वारा वे समाज में व्याप्त कुरीतियों, नैतिक पतन, आर्थिक विषमताओं,  सामाजिक असमानताओं एवं जातिगत भेदभाव को प्रमुखता से दर्शाते हैं। उनकी पैनी दृष्टि एवं निर्भीक लेखन के संयोग से समस्याओं एवं परिस्थितियों का वास्तविकता की हद तक का करीबी चित्रण हमें देखने मिलता है। उनके लेखन में न सिर्फ व्यवस्था का विरोध दिखता है अपितु वे समस्याओं एवं व्यवस्था पर चोट करते हुए निर्बल की भावनाओं को निर्भीकता से शब्द देते हैं।

प्रस्तुत उपन्यास कानपुर टु कालापानी जो 2019 में प्रकाशित हुआ था, का आज 7 वर्षों पश्चात पढ़ा जाना पुस्तक की लोकप्रियता एवं उनके लेखन की विशिष्टता का प्रमाण प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत पुस्तक का पूर्वार्ध पाठक को पूर्णतः ग्रामीण परिवेश में ले जाता है। दृश्य प्रस्तुतिकरण की सरलता एवं उनकी शैली उस दौर के ग्राम्य जीवन एवं परिवेश को हूबहू वास्तविक रूप में आँखों के सम्मुख प्रस्तुत करने में सफल है, जहां हमें सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक स्थितियों के संग पारस्परिक संबंधों की हाल में लुप्तप्राय संरचनाएं यथा भाई बहन का स्नेह, पड़ोसियों का निःस्वार्थ सहयोग, आदि दृष्टिगत होते हैं। उपन्यास का उत्तरार्ध प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिकाओं, ब्रिटिश सरकार की असफल नीतियों तथा युवाओं के जोश को दर्शाता है। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिशों को साथ देने पर हिंदुस्तान की आजादी के आश्वासन ने लाखों युवाओं को सेना में भर्ती होने हेतु प्रेरित किया एवं कथा नायक के समान ही हजारों युवक ब्रिटिश सेना की ओर से लड़े। कहानी के तीसरे हिस्से में युद्ध के पश्चात युवाओं की मानसिकता एवं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्रांतिकारियों का सहयोग जैसे विषय को प्रमुखता दी गई है।

 कथा नायक को अक्षर ज्ञान न सही किन्तु उसके ज्ञान को देखते हुए उसे भले ही अनपढ़ कहा जा सकता है किन्तु अज्ञानी तो कदापि नहीं। उसकी व्यवहारकुशलता उसका ब्रम्हास्त्र हैI सांसारिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने तथा मातृ भूमि हेतु कुछ कर गुजरने का जज्बा उसके युवा दिल में हिलोरें लेता है। यूं तो कहानी में विश्वयुद्ध एक प्रमुख विषय है किन्तु ग्राम्य जीवन का सुंदर बखान, कथानायक के हौसले, उसकी दृढ संकल्प शक्ति, उसका जोश, लगन एवं कार्यकुशलता आदि इस मूल विषय पर हावी रहे हैं।

 लेखक द्वारा सरजू के पात्र के द्वारा उस दौर के आम आदमी का संघर्ष दर्शाया गया है। कथानायक के संकल्प, सद्व्यवहार, बड़ों के प्रति आदर एवं छोटों के प्रति स्नेह, मानवता एवं सज्जनता जैसे गुण उसे एक आम आदमी से खास बना देते है, जो जाति व्यवस्था और ऊंच-नीच के भेदभाव को नहीं मानता तथा समानता और भाईचारे में विश्वास रखता है।


उपन्यास में अनेक सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया गया हैI आर्थिक असमानता के साथ साथ छुआछूत, जाति प्रथा, नारी उत्पीड़न एवं अनाचार जैसे विषयों पर प्रमुखता से विचारण किया गया है। युवा कथानायक का एक दलित महिला से पीने के लिए पानी मांगने को लेकर हुआ संवाद इसे बखूबी प्रस्तुत करता है। वहीं विदेश में अपना भोजन युद्ध पीड़ित ग्रामीणों को दे देना या फिर बाढ़ में बहते हुए एक मूक प्राणी की जान बचाने हेतु अपनी जान दांव पर लगा देने जैसे भाव उसे विशिष्ट बनाते हैं। वहीं गरीबों और मजदूरों के लिए भी उसके दिल में समानता का भाव था I वह अमीरी गरीबी की खाई को भी उसी दौर में समझ चुका था तभी वह भविष्य के लिए चेतावनी देता हुआ लक्षित होता है कि “देश में अमीरों का एक बड़ा तबका अंग्रेज परस्त हो चुका है I वह अपने लिए आज़ादी चाहता है जिससे अंग्रेजों की जगह वह शासन कर सके I वह अंग्रेजों से अधिक खतरनाक तबका हैI यह आज हम सच होते हुए देख रहे हैं।

उपन्यास में तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए सरजू को अत्यंत ज्ञानवान दर्शाया गया है जो अपनी सहज बुद्धि एवं सामान्य ज्ञान से ही कठिनतम विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल कर लेने में सक्षम है, मसले घर परिवार, जमीन जायज़ाद से जुड़े हुए हों अथवा भावनात्मक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन उसकी विद्वता प्रत्येक अवसर पर उल्लेखनीय है। देश-विदेश में घूमकर दुनिया देखने ज्ञानार्जन करने और कुछ नया देखने व सीखने की लगन उसके ज्ञान का विस्तार करने में विशेष भूमिका अदा करते हैं। जालियांवाला बाग़ कांड की खबर से आत्मिक रूप से व्यथित इस सोच के साथ की, सेना में रहते हुए संभव है उसे किसी दिन अपने ही देश वासियों पर गोली चलाना पड़े, वह सेना से त्यागपत्र दे देता हैI यूं वह अशिक्षित है किन्तु शारीरिक सौष्टव एवं वाक्पटुता जैसे श्रेष्ट गुणों के कारण पहले पुलिस विभाग में तत्पश्चात निजि संस्थान में नौकरी करता है। देशभक्ति एवं देश सेवा हेतु कुछ कर गुजरने का जुनून उसे उसकी मंजिल तक ले जाता है। उसका कानपुर से कालापानी तक का सफ़र जहां रोचक है वहीं प्रेरणादायी भी।

उपन्यास में सरजू तो प्रमुख पात्र है ही, रानी, जसवंत, जयसिंह कछवाहा, शंकर सिंह, आदि के चरित्र भी प्रभावित करते हैं। जहां रानी को एक संस्कारी, मर्यादित महिला के रूप में देखते हैं जो कहीं न कहीं पति के दबाव में जीवन यापन हेतु विवश है। वहीं जयसिंह कछवाह एक सहृदय व्यक्ति हैं जो परमार्थ में यकीन करते हैं। जसवंत जो सरजू का बहनोई है, भोग विलास का आकांक्षी, स्वार्थी, आलस्य में डूब हुआ, निर्मोही व्यक्ति है एवं उसका शुष्क व्यवहार भी सरजू के घर छोड़ने के बड़े कारण के रूप में देखा जाना चाहिए।   

पुस्तक प्रमुखता से सरजू के व्यक्तित्व को उभारते हुए प्रस्तुत करती है, पुस्तक में तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और युद्ध जनित परिस्थितियों का रोचक चित्रण है जो पुस्तक को विशिष्ट बनाता है। एक पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक ।

     अतुल्य


 

 

 

 


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