Doob -- Pustak samiksha : Atulya Khare
- Pustak samiksha By Atulya Khare
- समीक्षित पुस्तक : दूब
- विधा : उपन्यास
- द्वारा : हरियश राय
- सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
- मूल्य : 325.00
- समीक्षा क्रमांक : 208
वरिष्ठ साहित्यकार, जिन्हें ज्वलंत एवं विशिष्ठ विषयों पर गंभीर, तथ्यपरक, प्रभावी एवं सूक्ष्म विश्लेषण तथा गहन अध्ययनपरक लेखन हेतु जाना जाता है, प्रचार प्रसार से दूर एक ऐसी शख्सियत, जो शांत रहते हुए विनम्रता से निरंतर साहित्य सृजन कर्म में तल्लीन हैं, ऐसे कथाकार हरियश राय जी द्वारा सृजित यह उपन्यास “दूब” अपने नाम से ही आकृष्ट करता है (आवरण पृष्ट भी आकर्षक, किन्तु लीक से हटकर है जो विषय के संग बहुत सहज मेल करता है)।
शीर्षक “दूब” अपनी स्वाभाविक एवं प्राकृतिक नजाकत के साथ जहां पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता पर प्रमुखता से ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास करता है, वहीं यह संदेश भी देने में पूर्णतः सक्षम एवं प्रभावी सिद्द होता है कि वर्तमान विकास एक बड़ी हद तक पर्यावरण का व्यतक्रमानुपाती है। दूब, जहां एक ओर विनम्रता की मिसाल है वहीं यह संदेश भी, कि कठिन से कठिन तूफान भी दूब के अस्तित्व को नहीं मिटा सकते। दूब प्रतीक है पवित्रता का, दीर्घायु और जीवन का विनम्रता का, परिस्थितियों के संग ढलने का, तथा यही सारे गुण कथानायिका में भी दर्शाये गए हैं तभी तो जहां एक ओर वह प्रेम तथा समर्पण की प्रतिमूर्ति है एवं पर्यावरण की रक्षा हेतु संवेदनशील एवं समर्पित है वहीं दूसरी ओर वक्त आने पर सशक्त एवं कठिन निर्णय लेने से न हिचकते हुए अपनी मानसिक सुदृढ़ता का परिचय देती है जो स्वतः ही अपने नाम “दूर्वा” को सार्थक करती है।
कथानायिका
अपने नाम को चरितार्थ करते हुए व्यक्तिगत स्तर पर जीवन में कई तूफ़ानों से जूझती है,
वहीं बाह्य जीवन में सामाजिक दायित्वों को भी व्यक्तिगत मान उनका बखूबी निर्वहन करते हुए पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई भी लड़ती है। पुस्तक
प्रारंभ में ही यह संदेश बखूबी देने में सफल रहती है कि उसका उद्देश्य पर्यावरण, युवाओं
के सपने एवं संबद्ध विषय हैं।
पुस्तक
नारी विमर्श केंद्रित है एवं प्रकृति के संग हो रही बर्बरता को लेकर भी लेखक ने
पुरजोर आवाज बुलंद करी है। उनके नारी पात्र सजग हैं और निर्भीक भी, जो अन्याय,
अव्यवस्था एवं रूढ़िवादी प्रथा परंपराओं के खिलाफ मुखर हो कर अपनी आवाज उठाते हैं।
कथानयिका दूर्वा के माध्यम से लेखक का संदेश कथानक में बहुत स्पष्ट है कि स्त्री शोषण की शिकार समाज में हर कहीं है, चाहे वह मध्यवर्गीय गृहणी हो या फिर उच्च शिक्षित उच्च पदासीन अधिकारी अथवा कॉर्पोरेट जगत में कार्यरत आर्थिक रूप से अत्यंत सक्षम एवं समर्थ महिला, क्यूंकि समाज की सोच में वास्तविक परिवर्तन आज भी नहीं है। जैसा दर्शाया जा रहा है वास्तविकता उस से कोसों दूर है तथा यदि वास्तविकता पर गौर करें तो नौकरी करने वाली महिला आम घरेलू महिला की तुलना में कहीं अधिक शोषित है, वह दोहरे शोषण का शिकार हो रही है घर में एवं कार्य स्थल पर भी, किन्तु घर में पुरातन परंपराओं एवं सामाजिक दबाव तथा पारिवारिक प्रतिष्ठा के चलते तथा कार्यालय इत्यादि में पुरुष कर्मियों के दबाव के कारण आवाज नहीं उठाती, और यही मूल संदेश भी वे कथानक के माध्यम से देते है कि इस पुरुष प्रधान समाज में उन्हें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी होगी।
पर्यटन
को बढ़ावा देने एवं अन्य बुनियादी ढांचा विकास से संबंधित परियोजनाओं के कारण तथा जन
सुविधाओं में वृद्धि के नाम पर वन, पर्वत एवं प्राकृतिक जलस्रोतों से किस कदर छेड़छाड़ की जा रही है वह लेखक के
अंतर्मन को द्रवित करती है एवं उनकी यह चिंता उनके पात्रों के माध्यम से पाठक तक
पहुंचाने में वे कामयाब हुए हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर आज विभिन्न लेखक अपनी
आवाज उठा रहे हैं किन्तु वह तो नक्कारखाने में तूती ही साबित हो रही है ।
प्राकृतिक
संसाधनों के नष्ट होने से जहां जलवायु
का असंतुलन हुआ है वहीं प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर आम पहाड़ के निवासी और किसान व्यथित है दुखी एवं चिंतित
है, मसला मात्र आजीविका का न होकर अपनी
जन्म जन्मांतर की मातृभूमि को विकास के नाम पर सरकारी बिचौलियों एवं पूँजीपतियों
के सुपुर्द करने का है। हरियश जी अपने इस अत्यंत गंभीर विषय पर केंद्रित कृतित्व
के माध्यम से दूब में कथानायिका
दूर्वा के संघर्ष एवं कष्टों के संग एक बड़े नारी वर्ग
की समस्या को शब्द देते हैं।
कथानायिक दूर्वा को एक छोटे से गांव से बड़े शहर में आकर कॉर्पोरेट जगत में अच्छी
नौकरी करना वर्तमान युवतियों को लगन के साथ आगे बढ़ कर जूझने, तथा प्रतिस्पर्धा
में वांक्षित हासिल करने का संदेश देती है। सामान्य सामाजिक परिस्थितियों में रहते
हुए संकीर्ण सोच से डट कर मुकाबला करने का संदेश देने हेतु ही कथानायिका को मूलतः ग्राम्य परिवेश से दर्शाया गया है। ग्राम्य स्तर पर
शिक्षा एवं अन्य पारिवारिक समस्याओं से जूझती हुई, दूर्वा आगे
बढ़ कर बड़े शहर में अपना मुकाम हासिल करती है, किन्तु प्रकृति के संरक्षण का भाव
कभी भी उस के मन से नहीं जा पाता एवं इस दिशा में कार्य करने हेतु कथानक के
उत्तरार्ध में वह नवरचना संस्था से जुड़ जाती है।
प्रस्तुत
उपन्यास दो गंभीर विषयों को अत्यंत रोचकता के साथ उठाता है। पहला जो की शीर्षक से
ही स्पष्ट हो जाता है अर्थात पर्यावरण, शीर्षक चयन अत्यंत विशिष्ट है तथा कथा
नायिका दूर्वा के माध्यम से विनम्रता एवं सशक्त विद्रोह दोनों से ही दूर्वा के
लक्षण प्रदर्शित किये गए हैं तो वही दूसरा विषय दाम्पत्य संबंधों पर आधारित है।
कहा जा सकता है की स्त्री विमर्श केंद्रित
कहानी है जो दाम्पत्य संबंधों का निर्वहन और पर्यावरण दोनों विषयों को प्रमुखता से
उठाती है।
भाषा
शैली हरियश जी के अन्य कृतित्व की तरह ही सरल एवं सुगम है। क्लिष्टता एवं कठिन
विशेषण युक्त वाक्यांशों से उनका परहेज इस उपन्यास में भी दिखता है। सीधी बात, सरल
सहज वाक्यांश उनके कृतित्व को पाठक हेतु सुगम पठनीय बनाते हैं।
नए
नए युवा होते युवाओं की क्लासरूम से शुरू होती मासूम सी प्रेम कहानी, जहां छोटे छोटे कदम लेते हुए प्यार की सीढ़ियाँ
चढ़ी जा रही हैं, जिसमें जिंदगी के लिए सपने है जवानी का जोश है और है बड़े शहर और पहाड़ों की जीवन शैली
की बहुत सी छोटी छोटी झलकियां हैं, जो पाठक को थोड़े समय के लिए ही सही कभी सोलन
की खूबसूरत वादियों में ले जाती है तो कभी गुड़गांव के ट्रैफिक और प्रदूषण के बीच
घुटते लोगों के बीच।
हालांकि
प्रेम के लिए एक दूसरे के प्रति आदर भाव एवं परस्पर विश्वास बहुत अहम होते हैं
किन्तु प्रारंभ से ही कथानक के प्रेमी युगल के विचार भिन्न दिशाओं में जा रहे थे। जहां
कथानायिका को मानसिक एवं बौद्धिक स्तर पर संपन्न दर्शाया है वहीं कथानायक तरुण का
चरित्र एक तनिक कम गंभीर, किन्तु बड़े सपने देखने वाले, और धनलोलुप युवक का है
जिसके सपनों को हकीकत में बदलने के लिए प्रयास करने का जोश नजर नहीं आता। जहां कथानयिका दूर्वा सुकून चाहती है और शांत
जीवन को उसकी पूरी गहराइयों के साथ स्वस्थ पर्यावरण की गोद में जीना चाहती है, वही
तरुण का मात्र उद्देश्य है पैसा एवं असीमित धन और धन की लालसाएं।
कथानक
का दूसरा मुख्य विषय दाम्पत्य संबंधों पर केंद्रित है। प्रेम विवाह के पश्चात वह
क्या है जो विवाह पूर्व नहीं समझ आता एवं विवाह के पश्चात दूसरा ही चेहरा सामने
आता है इसे कई प्रसंगों के द्वारा सामने रखा गया है। जीवन यापन की शैली तथा रहन
सहन वातावरण का फर्क, दाम्पत्य को कैसे प्रभावित करना प्रारंभ करता है यह भी बखूबी
दर्शाया गया है।
दाम्पत्य
संबंध कैसे शनै:शनै: बिगड़ते है, अत्यंत संजीदगी एवं सहजता से दर्शाया है, इस क्रम में वे किसी भी किस्म की नाटकीयता से
भरपूर दृश्यों से बचे हैं, जो की अमूमन इस तरह के प्रसंगों में देखने में आते हैं वहीं तनाव की स्थितियों के
दौरान भी उन्होनें कथानयिका को जिस तरह से शांत चित्त दर्शाया है वह अनुकरणीय है। पत्नी
समझती है कि पति उस पर अधिकार दिखाना चाहता है अपनी कही हर बात मनवाना चाहता है
जबकि पति चाहता है की पत्नी भले आय एवं ज्ञान के मामले में पुरुष से श्रेष्ठ हो
व्यवहार मे पति की श्रेष्टता का ध्यान रखे एवं सम्मान करे। बात दोनों की जिद और
ईगो की ही है।
तरूण
की नजरों में दूर्वा एक दंभी, और खुदगर्ज
औरत थी किन्तु वह जो अपमान, मानसिक प्रताड़ना और अवमानना झेल रही थी वह उस
को तवज्जो नहीं देना चाहता जबकि दूर्वा जो आज की नारी है अपनी गरिमा की रक्षा करना जानती है, इसी संदर्भ में प्रतीत होता है मानो वैचारिक
स्तर पर अंतर एवं आर्थिक रूप से पत्नी का अधिक अर्जन करना ही पति की कुंठा का मूल
कारण है, जिस के चलते परस्पर संबंधों में दूरी आ जाती है। कथानयिका दूर्वा की बड़ी
तनख्वाह विदेशी कंपनी की नौकरी कहीं न कहीं युवक के प्रेम पर भी संदेह खड़ा करते
हैं जिसकी मानसिकता सिर्फ और सिर्फ पैसा ही थी उस पर पिता का घाटे के साथ बंद होता
व्यापार और पत्नी को पिता के व्यापार की देनदारियां चुकाने हेतु लोन लेने का दबाव,
पिता की संपत्ति में से पत्नी के हिस्से पर निगाहें, सब कहीं न कहीं आपस में जुड़े हुए प्रतीत होते
हैं ।
दाम्पत्य
संबंधों में आयी दरारें किस तरह संतान को प्रभावित करती हैं, और फिर बच्चे की
कस्टडी को लेकर कोर्ट कचहरी के प्रसंग भी कथानक को गतिमान रखते हैं,
अंततः जुझारू दूर्वा की जीत दर्शा कर लेखक अपना
संदेश देने में कामयाब रहे कि हक सम्मान और स्वाभिमान के लिए ईमानदारी से खड़े
होना जूझना और आवश्यक हो तो लड़ना आवश्यक है। बच्चे को लेकर हुई कानूनी जीत के
पश्चात पर्यावरण से जुड़े आंदोलन में कथानयिका का सक्रिय होना उनके मन्तव्य को
बखूबी प्रदर्शित करता है।
कथा
नायक तरुण के द्वारा अपनी तनख्वाह बचा कर पत्नी की कमाई से ही लोन चुकाना और सारे
खर्च भी चलवाना तथा पत्नी के पिता की संपत्ति को अर्जित करने हेतु हर संभव कुटिल चाल
चलना उसके चरित्र को स्पष्ट कर देता है। जो दाम्पत्य संबंधों एवं वैवाहिक जीवन पर आसन्न
खतरे का सूचक है।
धार्मिक
कार्यों में रुचि रखना एवं पूजा पाठ इत्यादि आम हिन्दू घरों में बचपन से ही
संस्कारस्वरूप सिखलाए जाते हैं वही कथानक में भी देखने में आता है, किन्तु पत्नी
द्वारा पूर्णतः बगावती तेवर का प्रदर्शन, वह भी विशेष मौकों पर, उचित प्रतीत नहीं
होता यथा कोर्ट मैरिज हेतु दबाव बनाना, किन्तु तब यह माना गया की संभवतः इसके पीछे उसका
उद्देश्य अनावश्यक खर्च से बचना हो या फिर
नायिका नवाचारों की पक्षधर है अतः अपने सहयोगियों एवं गाँव में अपनी सखियों
इत्यादि को कुछ अलग कर दिखाने के लिए अपनी शादी कोर्ट में करना चाहती है, किन्तु पति को पूजन करते देख व्यथित हो जाना
अथवा बेटे के जन्म के पश्चात घर में आयोजित हवन में न बैठना उसकी घोर नास्तिकता ही दर्शाती
है। यूं तो आम तौर पर हिंदुओं में थोड़ा बहुत पूजा पाठ घर में होना सामान्य है तथा
विशिष्ट मौकों पर भी थोड़ी पूजा पाठ का न मानना कथानायिका के पक्ष में ऋणात्मकता
जोड़ते हुए चरित्र की जटिलता दर्शाता है।
दाम्पत्य
संबंधों में दरार आने पर दोनों ही पक्षों को उपलब्ध कानूनी सहायता के विषय में
उपलब्ध कानूनी उपचारों एवं व्यवस्थाओं के विषय में कथानक के सरल प्रवाह में विस्तार
से जानकारी दी गई है। पुस्तक आधुनिक
युवतियों के लिए निःसंदेह एक मस्ट रीड बुक है। पुस्तक के कथानक
के प्रारंभ में आई मंथरता उत्तरार्ध के पूर्व ही समाप्त हो कर
रोमांचकता सृजित करती है।
एक
साथ दो गंभीर मुद्दों पर अत्यंत विचार शील भाव एवं सरल भाषा शैली से युक्त कथानक
प्रस्तुत कर हरियश राय जी ने निःसंदेह सराहनीय कार्य किया है क्योंकि पुस्तक एक उपन्यास
मात्र न होकर जहां इस तरह की समस्याओं से जूझती युवतियों हेतु एक पथ प्रदर्शक के रूप
में कार्य करेगी वहीं पर्यावरण की रक्षा हेतु जागरूकता फैलाने में भी अमूल्य योगदान
देगी।
इस
पुस्तक में समाहित विषयों एवं संबंधित चिंताओं तथा उनके समाज एवं आम जन जीवन पर
पड़ने वाले प्रभावों को अत्यंत
गम्भीरता से लिया जाना चाहिए।





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