Aage se fata joota By Ram Nagina Maurya
आगे से फटा जूता
द्वारा : रामनगीना
मौर्य
प्रकाशन: रश्मि प्रकाशन
शीर्षक:-
" आगे से फटा जूता" क्या इस विषय पर भी कुछ लिखा जा सकता है, उत्तर संभवतः नकारात्मक ही होंगे किन्तु बात जब राम नगीना मौर्य जी की हो तो सब कुछ संभव है। यह उनकी लेखनी से निकली एक और खूबसूरत कृति है, जो की उनकी कुछ चुनिन्दा कहानियों का संग्रह है जिसमें एक कहानी इस नाम से भी है, जहाँ हम उनकी कल्पनाओं की उड़ान की व्यापकता एवं अथाह गहराई युक्त सोच से मिलते हैं।
क्यूँ पढ़ें :-
प्रस्तुत कहानी संग्रह में राम नगीना मौर्य जी
द्वारा रचित कुल 11 कहानियां संगृहीत की गयी हैं, जो उनकी उत्तम कृतियों में
से हैं, जिन्हें पढ़ कर स्वस्थ मनोरंजन एवं वैचारिक संतुष्ठी की प्राप्ति होती है। किसी विशिष्ठ विषय पर केन्द्रित न होकर
कहानियों के विषय आम जन के बीच की आम बातें ही हैं अतः पाठक उनसे शीघ्र ही सम्बद्ध
हो कथा का आनंद प्राप्त करेंगे।
रचनाकार :-
वरिष्ठ रचनाकार राम नगीना मौर्य जी अब उस मुकाम
पर हैं जहाँ उनका परिचय उनसे पूर्व ही पहुँच जाता
है अब उनका स्थान परिचय की
औपचारिकता से ऊपर उठ चुका है और
उनका परिचय देना मात्र मंच को या स्वयं को ही सम्मानित कर लेने के सामान है। साहित्य जगत में अत्यंत आदर से लिया जाने वाला
नाम है “राम नगीना मौर्य”। उनकी
प्रत्येक कहानी पसंद की जाती है।
अनेकों कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं व अनगिनत
मुक्त रचनाएँ सृजित कर चुके हैं जो
की आम तौर पर जानी जाने वाली हर प्रसिद्द
पुस्तक,
पत्रिका ने प्रकाशित करी एवं उनकी रचना को प्रकाशित कर स्वयं को कृतार्थ समझा। अनेकों सम्मान से नवाजे जा चुके हैं एवं अभी साहित्य को उनसे बहुत उम्मीदें हैं
ताकि साहित्य और समृद्ध हो।
भाषा शैली :-
भाषा एवं भाव उनकी
लेखन शैली में अतिरिक्त आग्रह नहीं अपितु सहज एवं सरल प्रवाह रूप में है, पात्र के अनुकूल वाक्य सृजित हो
जाते है जो बहुत सहज प्रतीत होते हैं। विधा
के अंतर्गत बेशक उनकी रचनाओं को कहानी कह दिया जाए लेकिन वे उनके तजुर्बे एवं
सूक्ष्म अवलोकन से उपजे कुछ ऐसे पल होते है जिन्हें विस्तार से वे शब्दों में पिरो
कर प्रस्तुत कर देते है। बेहद मामूली सी
बातों पर भी नगीना जी की पैनी दृष्टि एवं लेखकीय सोच पहुँच जाती है।
उनकी प्रस्तुति कहीं भी चौंकाती नहीं है अपितु सहज ही कथानक में पाठक को समाविष्ट कर लेती है।
नगीना जी कहानी के लिए किसी विषय विशेष का
इंतज़ार नहीं करते, वे किसी भी अनुभव को या
छोटी सी बात को भी कहानी में बदलने का हुनर रखते हैं।
मुहावरों, लोकोक्तियों, व कभी कभी फ़िल्मी गानों को भी अपने लेखन में प्रयोग
कर लेते हैं।
हिंदी के आलावा अंग्रेजी, उर्दू, अवधी, भोजपुरी आदि, विभिन्न भाषाओँ पर उनका अच्छी पकड़ है, व यह गहरा नियंत्रण उनकी
लेखन कला में ख़ूबसूरती, स्पष्टता, लचीलापन, एवं सरसता लाने में
अमूल्य योगदान देता हैं। क्लिष्ट शब्दों
का प्रयोग भी कभी कभी नज़र आता है। किन्तु
अधिक लाग लपेट उनकी शैली में द्रष्टव्य नहीं है सीधी, स्पष्ट व सरल बात है। आम जन जीवन से जुडी हुयी है ,सो उसे भी सहज ही ग्राह्य
है।
इसी पुस्तक से :-
“ग्राहक देवता” :-
आज के युग की की व्यस्तता भारी ज़िंदगी में
दुकान वाले चाचा जो कि उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं, समय
एवं स्थिति भांपते हुए कैसे परिस्थिति संभालते हैं, ना तो बेगम को नाराज़ होने देते
है, न ही ग्राहक को जाने देते हैं, हालाँकि कुछ नुकसान भी हो ही जाता है। पर जहां बुजुर्ग चाचा से सभी के साथ सामंजस्य बनाना दिखाया गया है बहीं युवाओं का रूख, बातचीत का तरीका नई पीढ़ी के संस्कार का परिचय स्वयं
देता है ।
“पंचराहे पर” :-
नगीना जी का लेखन न तो आदर्श वाद दिखलाता है न
ही मुफ्त का ज्ञान बाँटने के व्यर्थ प्रयासों की सहित्य्कीय साजिश। अब इसी कहानी
“पंचराहे पर” में ही देख लीजिए, सारी ट्रैफिक (अ )व्यवस्था की
खुलकर व चुन चुनकर बखिया उधेड़ते हुए कहीं
भी न तो नियम क़ानून को फॉलो करने का ज्ञान
बांटा है न ही व्यवस्था पर दोषारोपण।
सरल, सामान्य, आसान सी बातचीत है मित्रमंडली की, जो बातें हुई बस उनसे ही पूरे
माहौल का चित्र सामने रख दिया गया। जीवन
की आपाधापी भी देख ली, तो हलकी फुलकी बहस
भी, और सहृदयता भी। अंत में कहीं एक सोच
भी, की अभी आत्मा में कुछ कुछ ज़िंदा है, और वह भी कभी कभी कुछ कुछ कहती है।
“लिखने का सुख” :-
कहानी का नायक एक लेखक भी है, उसी के एक दिन का
पूरा लेख जोखा प्रस्तुत किया गया है, जिसमें
उसकी संवेदनशीलता, घर और बच्चों
के प्रति स्नेह, तो पत्नी के लिए प्रेम, वगैरह तमाम गुणों की चर्चा तो हो गयी
किन्तु कहानी कहीं कहीं पाठक से असंबद्ध होती प्रतीत हुई, बीच बीच में हल्की
सी बोझिलता संभवतः अत्यधिक विस्तार के कारण थी।
पत्नी के रवैये एवं बात-चीत का बहुत सटीक वर्णन किया है।
पत्नी संग संवाद में पत्नी के मुंह से क्षेत्रीय भाषा सुनना प्रासंगिक भी
है व उपयुक्त भी। लिखने का सुख हेतु दिया
गया स्पष्टीकरण भी युक्तियुक्त है। चंद
वाक्य सुंदर हैं, जैसे कि -
“कुछ सवाल न बड़े होते हैं न
गूढ, बल्कि उनके जबाब बड़े होते हैं।
और कभी कभी तो गूढ भी। कठिनाई तब
औरभी ज्यादा हो जाती है जब उन्हें अनुत्तरित छोड़ने का कोई विकल्प नहीं बचता। जबाब देना ही पड़ता है कभी वक्त तो कभी बेवक्त। कभी सामने वाले के मन मुताबिक अपनी अपेक्षाओं
के विपरीत तो कभी सामने वाले कि अपेक्षाओं के विपरीत पर अपने मन मुताबिक। संभावनाएं और भी हो सकती हैं “।
परिवार के आपसी सामंजस्य पर एवं घर की बातों पर
भी बहुत सुन्दर लिखा है। कार्यालय के तनाव
का विवरण,
पडौसियों से मिलाप आदि भी घटनाक्रम में सहजता से पिरोये गए हैं ।
“उठ ! मेरी जान ‘:-
नारी मन की दुविधा कौन समझेगा। अपने अपने अहं के बीच किस ने देखा नारी मन पर क्या बीती। पितृ गृह हो अथवा पति गृह नारी को नारी ही समझने
को राजी नही है। यही सब भाव है कथानक के,
दोनों पक्षों की बाते रखी गयी हैं किंतु पीड़ित का क्या।
मायके वाले और ससुराल वालों ने तो अपनी अपनी
इज्ज़त की और आत्म सम्मान की बाते कर लीं पर जिस दिल पर बीती उस से तो किसी ने नहीं
पूछा भाव प्रधान कथानक है एवं प्रस्तुति
सरल। अपनी चिंता से पाठक को सम्बद्ध करने
में सफल रहे हैं।
“ढाक के वही तीन पात’ :-
एक अड़ियल किस्म के
सहकर्मी को समझाने के असफल प्रयास दर्शाती है जहाँ एक कुंद मस्तिष्क या कहें की
तालाबंद दिमाग के व्यक्ति को कुछ भी समझा पाना व्यर्थ प्रयास ही होता है, एवं उसे,
जो वह करता है वही एक मात्र उचित प्रतीत होता है तथा किसी अन्य द्वारा बताई गयी
सही बातें भी उस को समझ नहीं आती।
वरिष्ठ सहकर्मी
द्वारा हर संभव तरीके से व उदाहरण दे देकर भी समझाया जाता है किन्तु वह व्यक्ति
अपना अड़ियल रवैया एवं काम करने का ढर्रा न तो बदलता है और न ही बदलने हेतु राज़ी है।
आगे से फटा जूता :-
कथा संग्रह की शीर्षक कहानी है, जिसमें
फिर एक बार नगीना जी ने यह स्थापित कर दिया की उन्हें कथानक ढूंढना नहीं पड़ते
कथानक स्वयं उनके सामने आ जाता है या यूं कह लें की जो सामने आ गया उनके द्वारा वही कथानक
बना दिया जाता है।
इस कहानी में भी बारिश में बहते हुए आये एक फटे हुए जूते के विषय में पहले तो उसकी हर संभाव्य
अवस्था एवं उपस्थिति पर, यहाँ तक पहुचने के
हर संभाव्य कारण पर, विस्तृत विमर्श हुआ पश्चात एक अनोखी ही
स्थिति निर्मित कर कल्पना लोक में कहाँ तक जा सके है उसकी ऊँचाई देखें, कि जूतियो
की आपस में चर्चा शुरू हो गयी। नगीना जी की लेखनी को, उनकी विधा में विलक्षणता
को, एक नया ही आयाम देती है यह कहानी। कल्पना
लोक की ऐसी उड़न संभतः नहीं देखी गयी।
“ग्राहक की सुविधा”:-
“छोटे
दुकानदारों की मानसिकता एवं ग्राहक संग उनके वर्ताव का अत्यंत सूक्ष्म अवलोकन है। साथ
ही ग्राहक की मानसिकता पर भी उनकी पैनी नज़र बनी हुयी है। प्रस्तुति रोचक है साथ ही
लेखक की अपनी विशिष्ठता अनुसार कोई विशेष कथानक लेकर नहीं चले हैं किन्तु सुन्दर
प्रस्तुति है।
ऑफ स्प्रिंग्स:-
कुछ घरेलु आवश्यकताओं एवं भौतिक संसाधनों की रोजमर्रा की जिंदगी में ज़रुरत एवं पूर्ती के बीच की स्थितियों को सहज हलके फुल्के रूप में प्रस्तुत करती है व पिता के प्रति कृतज्ञता भी दर्शाती है।
समीक्षात्मक टिप्पणी :-
·
जिंदगी की छोटी छोटी बातों या कहें कि घटनाओं को लेकर सृजित
कहानियां हैं।
·
सहज सरल भाषा में जीवन का सच, ईमानदारी से बखान कर दिया है।
·
रोजमर्रा की बातों पर केन्द्रित हैं व कथ्य एवं शिल्प सुन्दर है
·
उनकी कहानियों में प्रेम, दुःख, संवेदना, मित्रता, निष्ठा एवं
मानवीय स्वाभाव तथा मानवता एवं संस्कारों का सुन्दर मेल दिखता है।
सविनय,
अतुल्य




टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें