Neera By Shikha Manmohan Sharma
नीरा
द्वारा:
शिखा मनमोहन शर्मा
बोधि प्रकाशन
द्वारा प्रकाशित
प्रथम
संस्करण : 2023
मूल्य
: 150.00
समीक्षा
क्रमांक : 220
नीरा”, कोरोना काल की भयावह त्रासदी
और रूह कंपा देनी वाली यादों को ताज़ा करते दृश्यों से प्रारंभ होती है युवा
लेखिका शिखा जी ने, नीरा की कहानी को, शब्दों के जरिए
वास्तविकता के इतना करीब ला दिया है मानो सब सामने ही घटित हो रहा हो एवं इसका
संपूर्ण श्रेय लेखिका को है, जिन्होंने अपने उपन्यास “नीरा”
में घटनाक्रम को उसके संपूर्ण यथार्थ के संग चित्रित करते हुए पेश हर भाव को
शब्दरूप में हूबहू अभिव्यक्त कर दिया।
बात करे शिखा जी के साहित्य सृजन की तो “नीरा” उनका दूसरा
उपन्यास है हाल ही प्राप्त जानकारी के मुताबिक उनका तीसरा उपन्यास “दमयंति” भी साहित्य
अकादमी द्वारा स्वीकृत हुआ है तथा शीघ्र पाठकों के समक्ष होगा। इसके पूर्व उपन्यास “ मैं अभी जिंदा हूं” प्रकाशित हो चुका है वहीं विभिन्न एकल काव्य एवं कहानी
संग्रह तथा साझा संग्रह भी प्रकाशित हो चुके है। विभिन्न समाचार पत्रों में उनकी
रचनाएं अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं, एवं समाचार पत्रों इत्यादि में प्रकाशित
होती रचनाओं, लेखन की सरल शैली एवं आमजन के बीच के विषय उन्हें पाठक वर्ग के बीच लोकप्रिय
बनाते हैं।
लेखिका द्वारा सहज बोलचाल की सुंदर भाषा व क्षेत्रीय बोली के
उत्तम योग युक्त संवाद शैली एवं वाक्यांश, के द्वारा पाठक को कथानक से संबद्ध रखने
में पूर्णतः कामयाबी हासिल की गई है ।
कथानक के मूल में सहज घटनाक्रम के माध्यम से उस मां के मनोभावों को व्यक्त किया गया है जो एक नहीं अपितु दो बार मिसकैरिज होने के बाद सदा के लिए मातृत्व सुख से वंचित हो जाती है।
मुख्य पात्र एक युवती नीरा है जो अपने कॉलेज के सहपाठी अनिकेत
से अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह करती है। कहानी नीरा की मानसिक
अवस्था एवं उपचार पर केंद्रित है। कहानी में वर्तमान समाज में दुर्लभ ही देखने में
आए, ऐसा दो भाइयों का परस्पर प्रेम चित्रित हुआ है। एक ओर अनिकेत पर उसके पित्रतुल्य
बड़े भाई का अगाध प्रेम अनुकरणीय है वहीं भाभी दुलारी का अनिकेत के प्रेम विवाह से
दुखी मन,इन विषयों पर समाज के एक बड़े वर्ग की प्रतिक्रिया को दर्शाता है। संक्षेप
में कहें तो वे देवरानी के घर से दहेज न मिलने एवं उसके शहर में बस जाने के कारण अनिकेत
एवं नीरा से नाखुश हैं। कहानी का एक और प्रमुख पात्र अंजलि है, जो अनिकेत की चाहत
दिल से नहीं निकाल पाती और अपनी एक तरफा मोहब्बत में अनिकेत के नीरा से विवाह से
टूट कर अवसादग्रस्त है एवं प्रतिशोध में नीरा और अनिकेत के जीवन में मुशकिलात् उतत्पन्न
करती है।
पुस्तक में नीरा की लगातार दो गर्भपात के बाद की मानसिक
अवस्था का अत्यंत विस्तृत सहज एवं भावुक वर्णन किया है, वे उसे उस रूप में चित्रित
करने में सफल रहीं हैं जहां कहानी के माध्यम से यह स्थापित कर सकीं हैं की यह
मात्र एक शारीरिक पीड़ा नहीं अपितु ऐसा गहरा मनोवैज्ञानिक भंवर है जिसमें एक
स्त्री तब फँस जाती है जब उसके अस्तित्व का एक हिस्सा बार-बार जुड़कर टूट जाता है।
दो बार मिसकैरेज (गर्भपात) का दर्द केवल एक मेडिकल घटना नहीं, बल्कि उन सुनहरे सपनों की हत्या है जो उसने उस लंबे समय में अपनी आँखों
में सजाए और दिल में बसाये थे।
चित्रण वास्तविकता के अत्यंत समीप है एवं वास्तविक ही
प्रतीत होता है। हालांकि इस बात पर भी मतवैभिन्न हो सकता है की इस अवस्था को
मानसिक बीमारी कहा जाए अथवा मात्र एक मानसिक अवस्था।
कथानक के माध्यम से लेखिका ने इस तरह के हालात में अंध
विश्वास ग्रसित समाज का चित्र प्रस्तुत करते हुए समाज में व्याप्त इस प्रकार के
अंधविश्वासों की ओर ध्यानाकृष्ट किया है। इस मानसिक अवस्था में जहां काउंसलिंग एक
बेहतर उपचार हो सकती है वहीं व्यक्ति को रोगी घोषित कर संभवतः उसे रोगी बनने की ओर
धकेलना उचित नहीं है, इसके दुष्परिणाम लेखिका ने स्वयं अंजलि के पात्र के द्वारा
सामने रखे हैं।
लेखिका ने नीरा को गर्भपात के पश्चात,
स्वनिर्मित कल्पनालोक में विचरते दर्शाया है जहां वह है और उसका अजन्मा बच्चा। विज्ञान
के अनुसार यह मस्तिष्क की एक जटिल एवं भावनात्मक प्रक्रिया है। जहां मस्तिष्क में
कुछ बाते इतने गहरे पैठ जाती हैं की मस्तिष्क उनकी वास्तविकता को लेकर भ्रमित हो
सकता है एवं उन्हें भूलता नहीं और सच मन लेता है। इसे सपनों के उद्वरण से बेहतर समझा
जा सकता है। उसी प्रकार नींद में ही कुछ शारीरिक क्रियाओं का करना एवं बाद में
उन्हें याद ही न आना भी एक मानसिक अवस्था के शारीरिक प्रभाव हैं जहां व्यक्ति अपने
सपनों को सुप्तावस्था में ही शारीरिक रूप से दोहराने लगता है।
कथानक कहीं न कहीं यह भी दर्शाता है कि, दो बार मातृत्व के
करीब आकर उससे वंचित हो जाने के चलते एक अपराधबोध उस माँ के मन को हीन भावना से
ग्रसित कर देता है फलस्वरूप एक अपूर्णता का अहसास उसमें आने लगता है जिसे वह जीवन
की विफलता मन में बैठती है तथा भावनात्मक शून्यता की स्थिति में जा पहुँचती है।
हालांकि पति का भावनात्मक रूप से उसके साथ खड़ा होना दर्शाया गया है जो सराहनीय है, किन्तु नीरा के मन में उठते हुए भावों को उसकी बातों को न सुन कर उसके
दिल को ठेस पहुचना भी कहीं न कहीं उसकी मानसिक हालत के लिए अनिकेत को उत्तरदायी
निरूपित करते हैं। यूं सामान्य तौर पर उसकी उपस्थिति के प्रति वह कृतज्ञ होती है
किन्तु पति अनिकेत उस खालीपन को भर नहीं पाता। बाज दफा दूसरे बच्चों को देखकर भी
आंतरिक शून्यता या तो वात्सल्य अथवा क्रोध संग उभरती है जहां वह या तो दूसरे
बच्चों पर अपनी सारी ममता उड़ेलने की कोशिश करती है, अथवा
उन्हें चोट पहुचा सकती है।
नीरा की बिगड़ती मानसिक स्थिति, अनिकेत का कभी कभी आप खो
बैठना, वहीं अनिकेत के मनोचिकित्सक मित्र द्वारा नीरा की इस अवस्था को सिजोफ्रेनिया
बीमारी के रूप में पहचाना जाना तथा उनकी
कॉलेज की मित्र एंजेलि के विषय में पाठक को जानकारी मिलती है जो अपने एक तरफा प्यार
को कालेज के समय में हासिल न कर पाने और अब महज अपने प्रतिशोध के लिए और अपने
प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाती है। डॉक्टर विभिन्न
तरीकों से पहले मूल कारण का पता लगा कर फिर उसके निदान की प्रक्रिया करते हैं। कथानक
में भरपूर रोचकता एवं गति बनाये रखी गई है।
ज्यों ज्यों कथानक के संग आगे बढ़ते हैं लेखिका द्वारा
कथानक को इस स्तर का बनाने में किए गए प्रयास एवं शोध सामने आते हैं। हालांकि कथानक
में अंजलि के कुत्सित प्रयासों को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से से नही देखा समझा गया
है तथा उसके कृत्यों को प्रतिशोधात्मक मानते हुए कथानक
में उसे मात्र एक बदला लेने हेतु उतावली महिला के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
नारी विमर्श पर एक अनूठे विषय {मनोवैज्ञानिक कथानक} को
गंभीरता से गहन शोध के पश्चात शाब्दिक अभिव्यक्ति देने का लेखिका का सार्थक प्रयास
है जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत से एवं सहजता से पूर्ण किया है। पुस्तक अपनी सरल
भाषा एवं गंभीर भावनाओं के सहज सम्प्रेषण हेतु याद रखी जाएगी।
104-105,महेश विहार, समीपस्थ महामृत्युंजय
द्वार, इंदौर रोड, उज्जैन,म. प्र. 456010 मोब: 9131948450

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