Ki Tum Mere Kya Ho By Parul Agrwal Mittal
कि
तुम मेरे क्या हो
द्वारा
: पारुल अग्रवाल मित्तल
विधा
: उपन्यास
VLMS Publications Pvt Ltd द्वारा
प्रकाशित
प्रथम
संस्करण वर्ष : 2026
मूल्य
: 300.00
समीक्षा
क्रमांक : 228
हिन्दी
साहित्य की दुनिया में तेजी से उभरती हुई प्रतिभाशाली लेखिका है पारुल अग्रवाल
मित्तल, जो हिन्दी साहित्य के मंच पर अपनी पुख्ता जगह बना चुकी हैं – “पारुल”, एक
ऐसी लेखिका, जिसकी कलम में जीवन की कड़वी सच्चाईयों
के संग प्रेम की कोमलता है, जो प्रेम को भावनात्मकता से आगे ले जा कर हालिया
सामाजिक स्थिति और वास्तविकताओं के धरातल पर रखती है। उनके कथानक में प्रेम के संग
जीवन के कड़वे-मीठे सच रूमानियत से परे अपनी वास्तविकताओं के संग बराबर चलते हैं।
पारुल
अग्रवाल मित्तल के प्रस्तुत उपन्यास “कि
तुम मेरे क्या हो” को VLMS Publications Pvt Ltd ने प्रकाशित किया है, एवं इस के अतिरिक्त अब तक उनके
दो उपन्यास पाठकों के बीच अपनी सुंदर छवि छोड़ चुके हैं , पहला “उड़ान” और दूसरा “तुम्हारे इश्क में”, उनकी दोनों ही कृतियों ने
पाठकों के दिलों में जगह बनाते हुए अच्छी लोकप्रियता हासिल की एवं पाठकों ने बेहद
सराहा। दोनों ही उपन्यास अपने कथानक के द्वारा प्रभावित करते हैं वहीं उनकी सरल
भाषा एवं काव्यात्मक लययुक्त शैली कथानक को सुंदरता प्रदान करती है तथा रिश्तों की
समझ उनके कथानकों को आम प्रेम कहानियों से अलग बनाती है।
उपन्यासों के साथ-साथ उनके कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कहानियों में भी वही भावनात्मक गहराई मिलती है जो उनके उपन्यासों की पहचान है। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ और लेख नियमित रूप से छपते रहते हैं, जहाँ पाठकों द्वारा उनके सहज, संवाद-प्रधान लेखन को खूब सराहा एवं पसंद किया जाता है।
उनके
लेखन की खासियत है कि वो प्रेम को किन्हीं विशेष अवसरों अथवा सृजित घटनाओं मे नहीं
अपितु रोज़मर्रा की छोटी-छोटी, कही अनकही, पूरी
अधूरी बातों और अनकहे अबूझ एहसासों में तलाशती हैं। यही वजह है कि उनका पाठक वर्ग
पात्रों में कहीं न कहीं स्वयं को महसूस करता है तथा उससे स्वयं को संबद्द कर लेता
है ।
प्रस्तुत
उपन्यास को मात्र नारी विमर्श केंद्रित लिखना संभवतः कथानक का पूर्ण परिचय नहीं
होगा। कथानक एक ओर जहां विवाहेतर संबंध और स्वस्थ दाम्पत्य जीवन का चित्र प्रस्तुत
करता है वहीं पत्नी का शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न तथा पति का कंपल्सिव सेक्सुअल
विहेवियर डिसार्डर से पीड़ित होना एवं पत्नी के संग अमानवीय व्यवहार जैसे
महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यानाकृष्ट करता है। कथानक बच्चों के मानसिक संताप एवं
निरंतर दहशत में जीना, पति पत्नी के संबंधों का संतान पर प्रभाव जैसी गंभीर समस्या
की ओर भी इंगित करता है। नायिका का सात साल लंबा नर्क समान वैवाहिक जीवन दर्शाया
गया है जो पति की कुंठा एवं ईर्ष्या भाव के चलते प्रताड़ित हुई वहीं लेखिका बखूबी
दर्शाती हैं की बच्चों के दिलों में भी उस पुरुष के प्रति नफरत के भाव से, उन्हें पिता
के वजूद से ही नफरत हो गई।
उपन्यास
अपनी विषय-वस्तु में सामान्य प्रेम कहानियों से हटकर है जहां प्रेम परिपक्व है,
किन्तु अनेकों ऐसे अनसुलझे प्रश्नों के संग, जो गहरे हैं, गंभीर हैं तथा पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर भी विचारणीय हैं। समाज में जहाँ
आम तौर पर विवाहेतर संबंधों को मात्र शारीरिक आकर्षण के नजरिए से देखा जाता है,
वहीं प्रस्तुत कथानक में मर्यादित एवं आत्मिक प्रेम को केंद्र में रखा
गया है।
कथानक में प्रारंभ में ही अधिकतम पात्रों से परिचय हो जाता है,
लेखिका द्वारा बीच बीच में आसान शब्दों में गहरे भाव संजोए हुए, शायरी
की चंद पंक्तियां रख दी गई हैं जिनसे कथानक की अतिरिक्त खूबसूरती उभरती हैं।
कथानक का प्रारंभ उम्र के उस दौर में है जब जीवन में ठहराव आने लगता है, अर्थात प्रौढ़ता की अवस्था में एक शादीशुदा व्यक्ति का एक दूसरी औरत, एक लेखिका के प्रति, बिना देखे अथवा उस से मिले, मात्र उसकी लिखी पुस्तक पढ़ कर विचारों और शब्दों के माध्यम से आकर्षित होना, उनके प्रेम का शारीरिक आकर्षण से परे मानसिक एवं आत्मिक लगाव को दर्शाता है। कथानक में नायिका का अतीत संघर्षपूर्ण दर्शाया गया है वहीं नायक सम्पन्न, स्थापित एवं सामान्य सुलझी मानसिकता वाला व्यक्ति है जो किन्ही पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं है। उसके विचारों में स्पष्टता है कहीं कोई मानसिक द्वंद्व लक्षित नहीं होते। विवाहेतर संबंध होने के बावजूद वह अपनी पत्नी एवं परिवार के प्रति भी समर्पित है, उन से अत्यंत प्रेम करता है, तथा अपने दायित्वों का सुचारु रूप से निर्वहन करता है। वहीं उसकी विवाहिता पत्नी के पात्र का व्यवहार सामान्य है यह इस लिए भी हो सकता है क्यूंकि वह उस परिदृश्य अर्थात पति के अन्यत्र संबंधों से अनिभिज्ञ है। जबकि कथा की नायिका एकाकी महिला, अपंने संघर्षपूर्ण जीवन के बावजूद मर्यादा एवं गरिमा के संग विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संबंधों में शुचिता एवं मर्यादा को बना कर रखती है।
विदुषी उपन्यासकार ने अत्यंत
कुशलता से यह चित्रित किया है कि प्रेम के लिए आत्मिक मिलाप, दिलों का सौन्दर्य
तथा मानसिक शुचिता, शारीरिक मिलाप से कहीं ऊपर है। कथा नायक एवं नायिका के बीच का
संबंध समाज के बनाए पैमाने के अनुरूप न होते हुए भी अनुचित प्रतीत नहीं होता तथा
संबंधों में नैतिकता के ऊंचे प्रतिमानों के संग आगे बढ़ना एवं शारीरिक संबंधों से परे
सम्पूर्ण शुचिता के संग एक-दूसरे का संबल बने रहना कथानक का मूल है।
कथानायक
के द्वारा नायिका की बेटी को अपने घर की बहू बनाना, कथानक का सबसे बेहतरीन भाग कहा
जा सकता है जहां नायक के बेटे और नायिका की बेटी का विवाह होता है। बेटी का अपनी
माँ एवं अपने पति के पिता (अर्थात अपने श्वसुर) की प्रेम कहानी से अवगत होते हुए उसे
स्वीकार करना एवं नायक को पूर्ण सम्मान देना एक स्वस्थ सोच को दर्शाता है। वहीं यह
विवाह संभवतः नायक नायिका के अधूरे रहे मर्यादित प्रेम को भी पूर्णता प्रदान करता
है।
लेखिका
का एक्सीडेंट के बाद कोमा में रहना कहानी को अंत की ओर ले जाता है। वहीं नायक का कोमा
की अवस्था में पहुंची हुई नायिका से एकतरफा भावुकतापूर्ण संवाद कथानक में करुणा
लाता है। नायक नायिका की यह स्थिति उनके अधूरे प्रेम की पराकाष्ठा है, उस स्थिति
में जहाँ संवाद खत्म हो चुके हैं, लेकिन नायिका
की उपस्थिति मात्र ही नायक के लिए पर्याप्त है एव जहां शब्द खामोश है मात्र स्पर्श
है, भाव एवं एहसास हैं। भावुकतापूर्ण यह दृश्य एवं उस से निर्मित स्थिति पाठक को
एक भारीपन के संग छोड़ जाती है।
इस
उपन्यास की भाषा प्रेममयी भावुकतापूर्ण है, एवं
पाठकों के दिल में उतरती है तथा पात्रों के मध्य का वार्तालाप इस कथानक का मूल है।
अपनी विशिष्ट विषय-वस्तु के कारण यह समकालीन हिंदी साहित्य की एक विचारोत्तेजक एवं
आधुनिक सोच युक्त कृति कही जाएगी।
नायिका
का संयमित, मर्यादित व्यवहार न केवल उसका संस्कारित स्वभाव दर्शाता है अपितु
उसका दोनों ही परिवारों एवं समाज के प्रति भी अपने दायित्व निर्वहन को दर्शाता है।
नायिका के लिए संयम और मर्यादा केवल शब्द नहीं, बल्कि मानो
वे तो उसके अस्तित्व का हिस्सा हैं। वे उसके जीवन मूल्य हैं उसकी शक्ति है। उसकी दृष्टि में प्रेम दो
शरीरों का न होकर दो आत्माओं का, दो दिलों का मेल है लेखिका ने नायिका को नैतिक
रूप से अत्यंत परिपक्व दर्शाया है जो अपने प्रेम के लिए नायक के परिवार में कलह
नहीं चाहती, जहां यह उसके निःस्वार्थ प्रेम को भी दर्शाता
है। तो नायक भी अपने प्रेम के प्रति सच्चा एवं स्पष्ट है तथा अपने दायित्वों के
प्रति समर्पित भी।
संक्षेप
में कह सकते हैं की प्रस्तुत उपन्यास का कथानक आम प्रेम कहानियों से भिन्न है,
जहां खुशहाल शादी शुदा जिंदगी के बावजूद पुरुष पात्र एक अन्य महिला
से आत्मिक प्रेम कर बैठता है, किन्तु उनके प्रेम में मर्यादा है, प्रेम दैहिक नहीं
आत्मिक है, बस दिल में ही, कोई कामना अथवा भौतिक अभिलाषा नहीं। दोनों ही प्रौढ़ हैं
और परिपक्व भी, एक दूसरे के दायित्वों को बखूबी समझते हैं, प्रेमिका पत्नी के
अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे रही वहीं प्रेमी भी प्रेमिका की भावनाओं का सम्मान
करता है। प्रेमिका की बेटी को अपने परिवार में बहु बना कर ले आना और उसे विदेश पढ़ने
भेजना क्योंकि यही उसकी माँ का यानि कथानक में प्रेमिका का सपना था, प्रेमी की
प्यार के प्रति सच्चाई एवं समर्पण दर्शाता है। प्रेमिका का स्वभाव अत्यंत गंभीर एवं
हर बात को सोचने समझने वाली दर्शाया गया है जबकि नायक आम हंसमुख संपन्न पुरुष के
समान ही व्यवहार करता है।
लेखिका
के कथानक में जीवन की वह सच्चाई नज़र आती है जो समकालीन अद्भुत प्रेम की सामान्य से
हटकर कुछ अलग कहानी सँजोये हुए है। जहां प्रेम है किन्तु प्रदर्शन नहीं, वासना
नहीं,
आसक्ति है किंतु पूजा नहीं, प्रेम बेहद है
किन्तु अमर्यादित नहीं, प्रेम में जीवन समर्पण हैं किन्तु
आदर्श अपने स्थान पर हैं, लेखिका ने सुंदर भाषा शैली के संग
संग कथानक की गति शीलता एवं घटनाक्रम की रोचकता बरकरार रखी है।
104-105, महेश विहार, समीपस्थ महा मृत्युंजय
द्वार, इंदौर रोड, उज्जैन, म. प्र. 456010 मोब: 9131948450





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