Meri Fantasiyan By Suresh Uniyal
मेरी फंतासियाँ
द्वारा: सुरेश उनियाल
काव्यांश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण :2025
मूल्य : 275.00
समीक्षा क्रमांक : 219
सत्य घटनाओं पर आधारित किस्से
कहानियों से परे, अमूमन प्रत्येक कहानी अंततः लेखक की “कल्पना” ही होती है, फिर वह
कहानी सामाजिक हो अथवा कोई प्रेम कथा, लेखक पात्रों और परिस्थितियों का सृजन अपनी
कल्पना के आधार पर स्वयं करता है। “फैंटेसी” भी है तो लेखक की कल्पना ही, फिर सहज ही यह
प्रश्न कौंधता है कि सहज कल्पना और फेंटेसी में ऐसे क्या फरक हैं की इसे अलग विधा
के रूप में देखा जाता है।
साहित्य की दुनिया में 'कल्पना' और 'फैंटेसी' के बीच एक महीन किन्तु स्पष्ट विभाजन रेखा
है, जिसके कारण फैंटेसी को एक अलग विधा माना जाता है। यथार्थवादी कहानियाँ जहां दुनिया के भौतिक एवं सामाजिक नियमों का पालन
करती हैं, एवं लेखक द्वारा की गई कल्पना “संभावनाओं” के भीतर होती है अर्थात उसकी कल्पना सत्य में परिणित भी हो सकती है, वहीं फैंटेसी में लेखक अपनी दुनिया और उस फेंटसी दुनियां के नियम स्वयं रचता है
तथा कल्पना 'असंभव' को 'संभव' बनाने का काम करती है। फैंटेसी में तर्क का
कोई स्थान नहीं है अपितु फैंटेसी एक ऐसी मंजिल है जहाँ पहुँचने के लिए लेखक को वास्तविकता का साथ छोड़ मात्र कल्पनाओं का सहारा
लेना पड़ता है।
उक्त विवेचन के पश्चात, कल्पना एवं फेंटेसी के बीच का अंतर
स्पष्ट है एवं विधा के विषय में भी यह स्पष्ट हो गया कि फैंटेसी साहित्य की वह
विधा है जहाँ लेखक अपनी कल्पना के माध्यम से एक ऐसी दुनिया सृजित कर देता है जो
वास्तविकता के नियमों को नहीं मानती, उनका उल्लंघन करती है एवं उसमें अकल्पनीय
घटनाएँ, चमत्कार जैसे अविश्वसनीय तत्व प्रमुखता पाते हैं।
हिंदी कहानियों में
देवकीनंदन खत्री जी का उपन्यास 'चंद्रकांता' हिंदी फैंटेसी लेखन का आधार स्तंभ है। जिसमें जादुई तिलिस्म और ऐयारों के
माध्यम से एक अद्भुत संसार रचा गया था। वर्तमान में फैंटेसी का प्रयोग केवल
मनोरंजन के लिए नहीं, अपितु एनिमेटेड फिल्म, विभिन्न प्रकार
के वीडियो गेम्स इत्यादि में प्रचुरता में देखा जा रहा है। विज्ञान के प्रभावों को
भी फैंटेसी के जरिए बहुत प्रभावशाली ढंग से लिखा जा रहा है। कह सकते हैं कि “साइंस-फैंटेसी”
अपना अलग ही क्षेत्र निर्मित कर चुकी है एवं एक स्वतंत्र विधा बन चुकी है।
विगत पाँच दशकों से भी अधिक से निरंतर साहित्य सृजन कर, साहित्य को समृद्द कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश उनियाल जी की अभूतपूर्व कृति है, प्रस्तुत पुस्तक “मेरी फंतासियाँ” । चुनिंदा प्रतिष्ठित, वरिष्ठ साहित्यकारों में सुरेश उनियाल जी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे अपने दीर्घ कालीन साहित्य सेवार्थ कार्यों एवं उल्लेखनीय सृजन हेतु बखूबी जाने जाते हैं। सुरेश उनियाल जी द्वारा लिखित “मेरी फंतासियाँ” उनकी चुनिंदा विज्ञान कथाओं एवं अन्य फाँतसियों से संबंधित कहानियों का संग्रह है जिसे अत्यंत आकर्षक एवं कलात्मक कलेवर में काव्यांश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। प्रस्तुत संग्रह में सुरेश उनियाल जी द्वारा लिखित 20 रोचक फेंटेसी कहानियाँ हैं जो या तो किसी न किसी फेंटेसी के इर्द गिर्द लिखी गई हैं या फिर फेंटेसी उनका प्रमुख हिस्सा है। काव्यांश प्रकाशन ने इस पुस्तक में भी अपनी त्रुटि रहित प्रकाशन की परंपरा को कायम रखा है।
संग्रह की पहली कहानी “अगर उस दिन
“ एक रोचक प्रसंग है, जहां कथानक में वे एक ऐसे शख्स से मिलते है जो दूसरी दुनिया
से है, (कथानक के मध्यम से लेखक ने अपनी प्रतिबिंब विश्व की फेंटेसी को प्रस्तुत किया
है) तथा वह व्यक्ति प्रकाश वर्ष की गति को अपने आने का माध्यम बनाता है, किसी को
दिखे न, अतः वह घटनाओं को (टाइम मशीन की कल्पना-फेंटेसी) मिटाता जाता है। इसी
घटनाक्रम के माध्यम से लेखक का कहीं न कहीं वर्तमान प्रशासन व्यवस्था एवं समाज पर एक
तीक्ष्ण तंज भी है, जहां वे धार्मिक उन्माद या फिर राजनीति प्रेरित शक्ति
प्रदर्शनों, दंगों इत्यादि को होता हुआ देखते हैं किन्तु बाद में उसकी कोई खबर कोई
निशान नहीं दिखते, तात्पर्य सब कुछ रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता है या फिर खुलकर सामने न
आने की कायरता व्याप्त हो चुकी है अथवा प्रशासन के बिक चुके ईमान और तथाकथित
ईमानदार अधिकारी ही इस खेल के इर्द गिर्द होते हैं। अंतिम पंक्तियों में वे अपनी
चिंता यह लिखते हुए बखूबी जाहिर करते हैं कि .....अगर किसी दिन सचमुच कोई घटना घट जाती
है और उसे अनघटा करने के लिए प्रति (विंब) विश्व का कोई व्यक्ति नहीं आता तो.. ?
“अगर उस दिन” के बाद अगली फेंटेसी
कहानी “मानव स्पर्श” के माध्यम से लेखक द्वारा, पर्यावरण के प्रति चिंता दर्ज करते
हुए प्राकृतिक असंतुलन, ऑक्सीजन
की अनुपलब्धता, पेड़ों एवं प्राकृतिक संपदा का खात्मा तथा भोज्य
पदार्थों के रूप में, अनाज का स्थान ले चुके कैप्सूल्स के
द्वारा एक गंभीर चिंता को जाहिर किया गया है। फैंटेसी के माध्यम से लेखक ने कहानी
के रूप में एक भीषण डरावनी सच्चाई सामने रख दी है। कहानी में वर्तमान से तकरीबन 100 वर्षों बाद के समय में एक फुटबॉल मैच की कल्पना की गई है जो वास्तव में
इंसानों के स्थान पर रोबोट्स के द्वारा खेला गया। इस के मूल भाव एवं हृदयस्पर्शी,
भावप्रवण अंतिम दृश्य के द्वारा मानवीय संवेदनाओं एवं भावनाओं को खूबसूरती से
उकेरा गया है।
संग्रह की कहानी “भावुकता का
पुनर्जन्म” आज से करीब डेड़ सौ साल आगे की बात रखती है जब, विवाह जैसी संस्थाएं
समाप्त हो जाएंगी एवं शारीरिक सुख जैसी नितांत व्यक्तिगत क्रिया भी शासकीय
नियंत्रण में मशीनों द्वारा सम्पन्न होंगी। नैसर्गिक प्रक्रियाओं पर प्रतिबंध के
साथ उनके द्वारा बच्चा पैदा करना गुनाह होगा। उस दौर में कैसे भावनाएं पुनः जाग
उठती हैं दर्शाया गया है। आज के परिदृश्य में भले ही यह अतिशयोक्ति लगे, किन्तु वर्तमान
विकास की रफ्तार को देखते हुए यह फेंटेसी कुछ अधिक कल्पित भी नहीं लगती।
संग्रह की अगली प्रस्तुति “किताब”
एक अदभुत कल्पना है जहां पाठक द्वारा किताब को पढ़ने से आगे बढ़कर वीडियो ऑडियो और
वीडियोगेम के मेल से एक ऐसी किताब की प्रोग्रामिंग की जाती है जहां पाठक, पाठक न होकर
स्वयं उस कहानी का पात्र बन जाता है एवं किताब में अंदर जाकर उसे स्वयं जीता है। विचार
का आगे क्या हुआ प्रोजेक्ट कहां तक पहुंचा रोमांच से भरपूर कहानी है, जो निश्चय ही
लेखक की कल्पना शक्ति एवं विज्ञान की वृहद जानकारी दर्शाते हुए चमत्कृत करती है।
कहानी "भागे हुए नायक से एक
संवाद" यूं तो फेंटेसी है किन्तु निश्चय ही यह एक संदेश भी है, अपने मन में
झांकने का, समय के साथ मिलकर
चलने का, क्योंकि समय के बढ़ने के साथ विचार, व्यवस्था, एवं व्यवहार में परिवर्तन
स्वाभाविक एवं कुदरती है। कहानी के नायक द्वारा, उसी कहानी के लेखक को, कहानी
निर्देशित करना, यद्यपि उनके मन की ही आवाज है जिसे वे पूर्व में अनसुना करते रहे।
वहीं परिवर्तनों के संग उनकी रचना का बेहतर होना एवं सराहा जाना परिवर्तन की बयार
को दर्शाते हुए उसे स्वीकारने का संदेश देता है।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर, फैंटेसी पढ़ते समय हमारा अवचेतन मन कल्पनाओ के जरिए वास्तविक जीवन के डर, संघर्ष और इच्छाओं को समझ रहा होता है। हम इसे एक “काल्पनिक तल्लीनता” की अवस्था कह सकते हैं। यह कोई विकार नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की वह क्षमता है जहाँ वह वास्तविकता अर्थात “जो है” से हटकर मस्तिष्क एक कल्पना लोक में विचरने लगता है जहां “असंभाव्य प्रतीत होता है किन्तु हो सकता है” मूल विचार है।
कुछ ऐसे ही सपनों की बात करती है कहानी
“लड़की सपने देखती है”, युवाओं
द्वारा पुरानी मान्यताओं एवं रूढ़िवादि सोच को तोड़ कर ऊपर उठने और आगे बढ़ने के
जज्बे को दर्शाती है। यहाँ युवा पीढ़ी की सोच का अंतर महत्वपूर्ण है। कहानी रूमानी
दुनिया की कल्पनाओं को दर्शाती हुई वास्तविकताओं में लौटने का संदेश भी है। और
युवाओं से वास्तिवकता में जीवन जीने तथा उन्नति करने का आग्रह भी ।
कहानी “चेहरा बदलने के बाद” यूं
तो पुनः एक फैंटेसी है जिसमें अपने उदास से चेहरे से परेशान एक शख्स एक चेहरे बदलने
वाली दुकान से नया चेहरा लगवा लेता है किन्तु यह मात्र एक फैंटेसी न होकर, एक
तीक्ष्ण व्यंग्य प्रतीत होती है उन शख्सियतों पर जो अपना मूल व्यवहार, आचरण बदल कर
कुछ और दिखने की कोशिस करते हैं, विशेषकर राजनीति में जहां यह कला बहुतायत में
देखी या पाई जाती है। हालांकि अत्यंत खूबसूरती से यह स्थापित करने का प्रयास किया
गया है कि चेहरा बदलते ही आप का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, ना आप रहते हैं न
आपकी पहचान। जब चेहरा ही बदल जाए फिर व्यक्ति में कुछ भी शेष नहीं रह जाता वहीं उस
का अंत है।
फ़्रांज काफ्का की प्रसिद्ध कृति मेटमॉरफॉसिस
के मूल विषय से प्रेरित है कहानी “कीड़ा”, जहां एक व्यक्ति नौकरी से निकाले जाने के
बाद स्वयं को एक कीड़े के जैसा निरूपयोगी समझने लगता है, कुछ संबंधित घटनाक्रम हैं किन्तु अंत
संदेशात्मक है जहां उस कीड़े को वह व्यक्ति जूते तले मसल देने का प्रयास करता है। कीड़े
के रूप में अंतर्मन की हीन भावना और डर ही है, यह दर्शाने का प्रयास है, वहीं उस
कीड़े को जीवित छोड़ देने के पीछे संभवतः वे यह संदेश देना चाहते हैं कि हर शख्स
अपने अंदर एक डर पाले हुए है जो ताउम्र उस के साथ बना रहता है और मौका मिलते ही
सिर उठाता है।
(मेरे पाठकों को मेटमॉर्फसिस तो
याद ही होगी अभी कुछ समय पहले ही उसकी समीक्षा मैने पोस्ट की थी।)
कहानी “एक नए किस्से का जन्म” यूं
तो फैंटेसी नहीं है किन्तु हाँ सपनों को सच मानने जैसे विषय के इर्द गिर्द है। कुछ
पुराने किस्सों के आधार पर मस्तिष्क में बनते हुए चित्र जैसे शीर्षक को सार्थक
करते है यह दिखता है
“आदमी टीले पर”, एक सामान्य व्यक्ति के जरिए एक
महत्वपूर्ण सोच को सामने रखती है जिसके मुताबिक बड़ा दिखने से ज्यादा जरूरी बड़ा
बनना होता है। बड़ा बनने के प्रयास मे हम सिर्फ अपनों से दूर ही होते हैं और उस से
उन्हें कोई अंतर भी नहीं पड़ता। अंत प्रभावित करता है जहां व्यक्ति अर्थी पर लेटकर
कंधों पर जाते हुए भी अपने को औरों से ऊपर मान कर गर्वित है। अर्थात यह व्यथा घमंड
मर कर भी न छूटा।
“इलाही बख्श है... नहीं है”,
पुनः हमारे अर्ध सुप्त मस्तिष्क के विचारों के सपने में आने और उन
सपनों को वास्तविक मान कर व्यक्ति का उन पर यकीन करते हुए, उसी संदर्भ में कुछ किये
जाने से संबंधित है। इस किस्से में भिन्नता कहें अथवा खूबी है तो केवल गेहूं के
दाने। अब इन गेंहू के दानों का क्या माज़रा है आप स्वयं जान ही लेंगे जब इस आपबीती
को पढ़ेंगे।
कहानी “गवाह” के द्वारा फूट डालने,
विभाजित कर अपना मतलब हल करने की बंटवारे की राजनीति को केंद्र में रखा गया है। बहुत
कुछ स्पष्ट कहते हुए भी कई जगहों पर भाव सांकेतिक हैं। हालांकि इस सब को एक ऐसे
व्यक्ति के ख्वाब से जोड़ दिया गया है जो या तो ख्वाब देख कर उसे ही सोचता है उसे सच
मान लेता है अथवा इसके विपरीत जो सच में देखता सोचता है वही ख्वाब में देखता भी
है।
कहानी “टुकड़ों में बँटा आदमी”,
हालिया परिवेश में इंसान किस कदर भ्रष्टाचार के दानव से जूझ रहा है यह दर्शाता है
फिर वह भ्रष्ट आचरण राजनेता का हो, अधिकारी का अथवा व्यापारी का। आम आदमी की पीड़ा पूरी तरह से उभर कर आती है।
लेखक पात्रों के मनोभावों को व्यक्त करने की कला में अत्यंत दक्ष हैं एवं प्रत्येक
भाव अपनी समग्रता में यूं स्पष्ट उभर कर आता है कि पाठक सहज ही उसमें विलीन हो
जाता है एवं पात्र उस में ही व्याप्त हो जाता है।
कहानी “बुत” व्यवस्था पर एक सशक्त
तंज है। हालांकि इसे फैंटेसी के ढांचे में डालने के लिए कथानक में कुछ अंश विशेष
तौर पर सृजित किए गए हैं किन्तु मूल भाव में सत्ताधीश के मीठे बोल, एवं अपने शासन
को लोकहितकारी दिखा कर अपना हित साधते दर्शाया गया है। वहीं जनता सब कुछ जानते हुए
कैसे भ्रमित होती रहती है यह भी स्पष्टतः लक्षित है। सुरेश जी के लेखन में
विशिष्टता यह है की वे बात तो अत्यंत कड़वी और खरी खरी कह देते हैं किन्तु कहीं भी
किसी पर तंज सीधा नहीं है, अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि वे अमुक व्यक्ति देश
अथवा काल की घटना का उल्लेख कर रहे हैं।
कहानी “संवाद” में पुनः अपनी विशिष्ट संकेतात्मक शैली में बात उठाई गई है,
जुल्मों की, नरसंहार की, उन अत्याचारों की जो ऐसे लोगों के
द्वारा किए जाते हैं जो सक्षम है, शक्तिशाली हैं फिर सत्ता में हों अथवा सत्ता के
बाहर। वे एक रिपोर्टर की जुबान से उस ओर इशारा करते हैं जहां हम झूठी रिपोर्टिंग
और भ्रामक खबरें देखते पढ़ते व यकीन करते हैं, किन्तु इसके पीछे की विवशता एवं
वास्तविकता पर कितनों की दृष्टि होती है। किसी एक गांव में हुआ नर संहार एवं कुछ
तत्वों द्वारा फैलाई गई अराजकता में पत्रकार को अपने पिता और मित्र का दिखना पुनः
सांकेतिक है।
कहानी “जानवर” के माध्यम से पुनः
व्यवस्था द्वारा खिलाफत करने वालों पर बैठाए गए पहरों एवं उसे खिलाफत की सजा देने
हेतु विभिन्न लोग, जिन्हें जानवर के रूप में दर्शाया है, की प्रस्तुति तानाशाह के शासन
का वास्तविक चेहरा उजागर करती है। फैंटेसी के आवरण में वे अपनी बात को अधिक खोलकर
सामने रख सके हैं।
लेखक की कल्पनाशक्ति, विज्ञान की गहन
जानकारी संबंधित प्रस्तुतियां वह भी अत्यंत सहज सरल भाषा में, इस संग्रह को विशिष्ट बनयाती है। हर
कहानी में कुछ नए विचार पाठक को एक अलग दुनिया में ले जाने में पूर्णतः सफल हुए
हैं। फंतासी-पसंद करने वाले पाठकों को यह संग्रह एक यादगार अनुभव देगा। क्यूंकि यह
फेंटेसी कहानी-संग्रह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि कल्पना लोक
में पाठक को रोजमर्रा की जिंदगी से दूर ले जाता है। संग्रह फेंटेसी के मापदंडों पर
खरा उतरते हुए यथार्थ से परे एक अलग ही कल्पनालोक रचता है और पाठक को अपने तिलस्म
में बांध लेता है।
104-105 महेश विहार, समीपस्थ महामृत्युंजय द्वार, इंदौर
रोड, उज्जैन म.प्र. 456010 मोब: 9131948450


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