Adhjale Thudde By Hansa Deep

 

अधजले ठुड्डे

विधा : कहानी

द्वारा : हंसा दीप

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

मूल्य : 399.00

समीक्षा क्रमांक : 214 

 


हंसा दीप समकालीन हिंदी साहित्य का सुपरिचित, प्रखर, हस्ताक्षर जिन्होंने सात समंदर पार से भी हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी अविस्मरणीय कृतियों द्वारा समृद्द किया है। उनकी लेखनी का साहित्य के माध्यम से दो भिन्न राष्ट्रों की भिन्न संस्कृतियों के बीच एक सूत्र रूप में उल्लेखनीय एवं अविस्मरणीय योगदान है। उनकी कहानियों के माध्यम से वे भारतीय संस्कारों तथा विचारों को पाश्चात्य परिवेश के साथ अत्यंत गरिमा मर्यादा एवं संवेदनशीलता से संबद्द करती है। ​एक विदुषी के रूप में उनकी वैचारिक स्पष्टता एवं लेखिका के रूप में सहज एवं स्पष्ट अभिव्यक्ति को पाठकों से सदैव श्रेष्ट सकारात्मक प्रतिसाद प्राप्त हुआ है। उन के द्वारा सृजित कृतियों की फेहरिस्त लंबी है किन्तु चंद नाम उल्लेखनीय हैं यथा उपन्यासों में : “बंद मुट्ठी”,“कुबेर”, “केसरिया बालम”, “कांच के घर”, तो वहीं कहानी संग्रह, “चश्मे अपने अपने”, “प्रवास में आसपास”, “शत प्रतिशत” आदि वहीं उनकी रचनाएं विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो रहीं हैं तथा व्यापक क्षेत्र में लोकप्रिय हो रही हैं। उनके द्वारा विभिन्न पुस्तकों का सम्पादन भी किया गया है वहीं कई पत्रिकाओं के संपादक मण्डल ने भी उन्हें मण्डल में स्थान देकर स्वयं को सम्मानित किया है।

हंसा जी के कृतित्व में मात्र अपने देश की बाते अथवा पुरानी यादें ही नहीं होतीं अपितु वे कनाडा के वर्तमान जीवन की कठोर वास्तविकता, वहां की ज़िंदगी, वर्क-कल्चर, रंगभेद एवं सामाजिक ढाँचे का सजीव चित्रण कर पाठक को उस परिवेश से रूबरू करवाने में पूर्णतः कामयाब रहती हैं।

​​डॉ. हंसा दीप का कहानी संग्रह “अधजले ठुड्ढे” वाणी प्रकाशन द्वारा वर्ष 2025 में प्रकाशित 17 बेजोड़ कहानियों का संग्रह है। कहानी, “अधजले ठुड्ढे” इस पुस्तक की शीर्षक कहानी है। शीर्षक “अधजले ठुड्ढे” के द्वारा विदुषी लेखिका ने नस्लभेद के चलते, दमन, अपमान,एवं उत्पीड़न से उपजी, अश्वेतों के अंतर्मन की पीड़ा को आवाज दी है। कहीं न कहीं कहानी द्वारा लेखिका ने सिगरेट के अधजले ठुड्डे की तुलना मानव के दबे कुचले जा रहे किन्तु भीतर ही भीतर सुलहगते स्वाभिमान से भी की है। दोनों ही समान रूप से तिरस्कृत एवं उपेक्षित हैं ।



मुख्यतः यह कहानी नस्लभेद एवं उस पर पीड़ित की प्रतिक्रिया को लक्ष्य करती है किन्तु कार्य के प्रति समर्पण एवं दमित व्यक्ति द्वारा अथवा दमित के समर्थन में मूक, किन्तु पीड़ादायी गंभीर अभिव्यक्ति, को भी अत्यंत संवेदनशीलता के संग उकेरा गया है। ​यह कहानी 'नस्लभेद' जैसे गंभीर और वैश्विक मुद्दे को कथानक के मध्यम से सशक्त रूप में प्रस्तुत करती है एवं एक सामान्य दैनिक जीवन के घरेलू अनुभव के माध्यम से बड़ी बात रखती है। वहीं 'सिगरेट के ठुड्ढे' को जिस प्रकार से दमन के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है वह निश्चय ही सराहनीय है।

​​कहानी कनाडा के परिवेश में सृजित है जिसमें मुख्य पात्र एक अश्वेत है तथा अश्वेत लोगों के प्रति किये जा रहे दुर्व्यवहार, (विशेष तौर पर वह घटना जहां एक श्वेत पुलिस अधिकारी द्वारा एक अश्वेत की गर्दन को पैरों तले दबा दिया गया था जिसे मीडिया के माध्यम से सारी दुनियाँ द्वारा देखा एवं जिसकी भरपूर भर्त्सना की गई), के कारण उसके अंदर एक धधकता ज्वालामुखी है, एक नफरत है जो उसके सिगरेट के ठुड्डे को पैरों तले मसलने से ज़ाहिर होती है उसकी यह क्रिया महज़ सिगरेट बुझाने की एक आदत न होकर भीतर दबे आक्रोश, विवशता तथा मानसिक संघर्ष को दर्शाती है। वह बहुसंख्यक श्वेतों द्वारा किए जाने वाले नस्ली भेदभाव एवं अश्वेत युवक द्वारा उसका प्रतिकार न कर पाने की अपनी हताशा को उन ठुड्ढों की तरह मसलकर अपने भीतर की आग को शांत करने की नाकाफ़ी कोशिश करता है।

​कहानी में अन्य सहयोगी पात्र के अश्वेतों पर संदेह को कथानायक लिवी के व्यवहार, उसकी कार्यकुशलता एवं उसके व्यक्तित्व की गहराई के चलते अंत में लिवि का सिगरेट के ठुड्ढे को बिना मसले छोड़ना उसकी उन भावनाओं अथवा सोच में परिवर्तन को दर्शाता है, जो नस्लभेद पूर्ण व्यवहार देखने एवं अनुभव करने के पश्चात् इस घर में स्वयं के साथ हुए समानता के व्यवहार के कारण उत्पन्न हुए,जिन्होंने उसके अंतर्मन को छुआ है तथा एक सकारात्मक संदेश के संग कहानी का अंत होता है । उसके प्रति विश्वास में परिवर्तित होकर सम्मान तथा सौहार्द पूर्ण व्यवहार का दर्शाया जाना नस्लभेद के विपरीत एक सकारात्मक प्रतिक्रिया दर्शाती है।

​हंसा जी की अधिकांश कहानियों के शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह देते हैं यथा संग्रह की अन्य कहानी “एक बटे तीन”जो विदेश में रह रहे एक प्रवासी के प्रति उसके परिजनों के व्यवहार पर केंद्रित है। कथानक एक परिवार के चार पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र के विदेश चले जाने पर माँ की वसीयत एवं तदनुसार पुश्तैनी हवेली का बटवारा किये जाने से संबद्द है। मात्र भौतिक अनुपस्थितिवश उसको विस्मृत ही कर दिया गया है एवं उसके लिए यही अधिक पीढ़ा दायी है। प्रवासी भाई के यह वाक्यांश उसके दर्द एवं भावना को बखूबी दर्शाते है की “खून का रिश्ता दूरियों ने लील लिया था। लाल रंग का खून आसमानों की उड़ान के बाद इस कदर धुँधलाया की अपना रंग ही नहीं वजूद भी खो बैठा”। इसी प्रकार “उड़ते समय अपनी जड़ों को उखाड़कर साथ ले आया था, खुद तो जड़ों से जुड़ा रहा पर उस जमीन से कट गया जहां से ये जड़ें जुड़ी थीं जब वहाँ जड़ें ही नहीं रहीं तो कैसा बेटा, कैसा भाई, कैसी वसीयत”। इसी प्रकार के अनेकानेक अर्थपूर्ण वाक्यांशों से सृजित यह कथानक अपने वास्तविक स्वरूप में निश्चय ही अत्यंत कष्टदायी है। हंसा दीप जी के लेखन की विशेषता है की वे पात्र के दिल में उतर कर उसके नितांत निजि एवं महत्वपूर्ण गंभीर भाव भी सामने ले आती हैं। कथानक, नजरों से दूर होते ही दिल से भी दूर हो जाने और रिश्तों के बीच पसरती दूरियों को बखूबी दर्शाता है। वसीयत में दिख रहे भेदभाव से उत्पन्न मन की खटास का, कथानक के अंत तक आते आते सकारात्मक सोच में परिवर्तन मात्र हंसा जी समान भावनात्मक लेखन करने वाली कथाकार के द्वारा ही संभव है । 

वहीं कहानी “कॉफी विद क्रीम” के द्वारा सांस्कृतिक समन्वय एवं परस्पर सहयोग, आपसी विश्वास एवं समझ की एक सुंदर बानगी पेश की गई है। सांकेतिक रूप में शीर्षक को इस प्रकार दर्शाया गया है मानो दो परस्पर विपरीत संस्कृति अथवा विचार धाराओं (कॉफी एवं क्रीम) का मेल हुआ हो किन्तु यथार्थ में कहानी निश्च्छल, निष्पाप, मित्रता को परिभाषित करती है जिसे पात्रों के रूप रंग के अनुसार कॉफी और क्रीम कहा जाना भी उचित ही है, वहीं क्रीम का कॉफी में घुल मिल कर एकसार हो जाना, अथवा इस प्रकार का कोई भाव लक्षित नहीं होता, जैसा की सामान्यतः उनके मित्रों द्वारा अनुमान लगाया जा रहा था। कथानायिका की माँ के निधन पर मित्र का सहज संवेदनापूर्ण व्यवहार प्रभावित करता है एवं रिश्तों की परिभाषा देने वालों को नजरिए में बदलने का एक महत्वपूर्ण एवं अर्थपूर्ण इशारा भी।

​बात करें कहानी “अम्मी और मम्मी” की, तो यह कहानी मुल्कों के बीच के रिश्तों की कड़वाहट तथा मजहबी विचारधारा से दूर, अपनत्व एवं प्रेम की भाषा को बुलंद करती है। एक भारतीय एवं एक पाकिस्तानी परिवार के बच्चों की मित्रता के जरिए पारस्परिक भाईचारे एवं प्रेम तथा विश्वास की बात कही गई है, साथ ही परिवार की बुजुर्ग सदस्या जिसने अपने एक बेटे को भारत पाक जंग में खोया उसका दर्द एवं मन में उस मुल्क के हर व्यक्ति के प्रति जमी कड़वाहट को भी बखूबी दर्शाया है जो की एक आम आदमी के जीवन की सहज प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती है। इस कड़वाहट को अंततः पिघल कर सद्भाव में परिवर्तित होते देखना भी सुखद है। कहानी सांस्कृतिक भिन्नता से भी आगे बढ़कर दिलों में फैली नफरत को अंत तक आते आते पिघलते दर्शाती है। कहानी भारत पाकिस्तान के रिश्तों की, दिलों में जड़ें जमा चुकी नफरत को भी अक्स में उतारती है, वहीं “माँ के लिए सरहदें मायने नहीं रखती” का भाव भी अम्मी के आचरण द्वारा प्रमुखता से लक्षित होता है। यूं तो सम्पूर्ण कहानी संस्कृतियों में कोई भेद न दर्शाते हुए बहनापा ही दर्शाती है किन्तु पुराने ज़ख्म जो नासूर बने हुए हैं उन पर मां का प्यार भारी होता है। वहीं उस माँ का दर्द भी नफरत के रूप में बार बार सामने आता है जिसने बॉर्डर पर अपना बेटा खोया है, हालांकि अंत में उन के दिल में भी प्रेमभाव उतत्पन्न होना सुखद है।

कहानी “घुसपैठ”, किसी व्यक्ति के अनधिकृत प्रवेश से संबंधित न होकर मानसिक एवं भावनात्मक निजता में होने वाली 'घुसपैठ'पर केंद्रित है। कहानी का प्रारंभ ही विशिष्ट है जहां व्यक्ति की असीमित लाल साओं पर चोट करते हुए लेखिका कहती हैं कि “सुख के इन्हीं दो अक्षरों में बहुत कुछ और भी छिपा था । वह सब कुछ जो कभी किसी को संतुष्ट नहीं कर पाता। पति पत्नी के बीच, पत्नी की माँ की सतत उपस्थिति एवं निरंतर अपने दामाद के प्रति अपमानजनक दुर्व्यवहार, यथा बात बात पर तनकाशी ही वह दखल है एवं लेखिका द्वारा इस दखल को घुसपैठ कहा जाना उचित ही प्रतीत होता है।​

सुंदर किन्तु अर्थपूर्ण वाक्य कथानक की शोभा बढ़ा देते हैं यथा “इन सड़ी-सड़ी मगर बड़ी-चढ़ी बातों से रिश्तों पर ऐसे धब्बे लगते जो आगे चलकर छूटना भी कठिन था । परत दर परत जमते वे धब्बे अमिट बनते जाते । फिर उन धब्बों की वजह से रिश्तों का असली चेहरा इस कदर धूमिल होता जाता कि एक दिन अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता।“ या फिर “क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वे एक दूसरे में वह ढूंढे जो उन्हें दिखाई नहीं देता।“ कथानक के अंत में उदृत अर्थ पूर्ण वाक्यांश सम्पूर्ण कथानक का सार हैं जहां वह कहती हैं कि “किसके जीवन में किसने घुसपैठ की यह एक अनुत्तरित प्रश्न था ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर सबको पता था सिवाय घुसपैठिए के”।

कहानी “भर दोपहर”, सुखी समृद्ध परिवार पर पति के कुत्सित आचरण द्वारा लगने वाले लांक्षन और मुख्यतः उसके चलते पति पत्नी के रिश्तों पर प्रभाव को गहराई से स्थापित करती है साथ ही परस्पर प्रेम एवं विश्वास की दीवार में पड़ती हुई दरार को प्रमुखता से दर्शाती है। कहानी पत्नी की बदलती मानसिकता दर्शाती है जहां पत्नी, पति पर लगे इल्जाम से भी अधिक उस का अपने नाम के संग जुड़ने को लेकर व्यथित है, जो रिश्ते से कहीं अधिक स्व को चिन्हित करती वर्तमान मानसिकता को दर्शाती है। विलासितापूर्ण ज़िंदगी बिताते हुए यह न सोचना अथवा जानते हुए अनजान बनना की इन तमाम सुख सुविधाओं का स्त्रोत क्या है, इसी प्रकार की परेशानियों का सबब बनता है। कहानी का मूल एक प्रख्यात अभिनेत्री एवं उनके पति से जुड़े प्रसंग से प्रेरित प्रतीत होता है। कथानक का अंत अचंभित करता है।

कहानी “लाइलाज” एक बच्ची से अधिक उसके माँ, पिता के व्यवहार जिसे मानसिक अस्थिरता कहना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है को चिन्हित करती है। बेटी के स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते डॉक्टर को इलाज का न्यूनतम समुचित वक्त दिए बगैर ही तुरत फुरत परिणाम की तलाश में भटकते हैं एवं हद की पराकाष्ठा देखें की इसी सिलसिले में विदेश तक जा पहुंचते हैं। सुकून बस यही कि अंत सुखद रहा।

नारी विमर्श केंद्रित कहानी मैटरनिटी लीव में कॉर्पोरेट जगत की संस्कृति और प्रथम प्रसव के दौरान मैटर्निटि लीव का चित्रण प्रस्तुत किया गया है कहानी मैटर्निटि लीव, एक ओर तो प्रथम मातृत्व के सुख को अत्यंत कोमलता से बयान करती है वहीं एक उच्च पदासीन महिला का एक वर्ष का मैटरनिटी लीव लेना, नवजात के संग समय व्यतीत करते हुए पद से जुड़े रुतबे, इस लीअवकाश के कारण प्रभावित होने वाली उसकी पदोन्नति एवं वरिष्टता में गिरावट जैसे विषय परेशान करते रहते हैं और वह शीघ्र ही इस अवकाश के चलते बोरियत महसूस करने लगती है एवं शीघ्र ही अपनी कॉर्पोरेट ज़िंदगी में वापस पहुँच जाना चाहती है, जो की एक आधुनिक नारी की मानसिकता को दर्शाता है। कहानी में हम प्रगतिशील आधुनिक नारी को अपने कॉर्पोरेट जगत के ऊंचे रुतबे वाले पद के कार्य इत्यादि को मातृत्व पर हावी होते हुए देखते हैं वहीं कहानी का अंत नवजात के माध्यम से जीवन में अनुभवों से सीखते हुए गिर के संभलने का संदेश भी दे जाता है । संग ही एक अन्य घटना भी जोड़ी गई है जो निश्चय ही कार्य को बिना उसका परिणाम सोचे करने के पीछे के उतावलेपन के प्रति आगाह करता है।



हंसा दीप जी के प्रस्तुत कथा संग्रह 'अधजले ठुड्ढे' की कहानी “बैटरी” वर्तमान स्थितियों में मनुष्य की तकनीक पर निर्भरता एवं मानवीय संवेदनाओं तथा रिश्तों पर अविश्वास को रेखांकित करती है। इस कथानक की प्रमुख पात्र आज की युवा पीड़ी का प्रतिनिधित्व करती है। कहानी, एक बर्फीले तूफान भरी रात में अकेली लड़की के संग ऐसे सफर पर बढ़ती है जो जिस कार से निकलती है उसकी बैटरी तीव्र वरफबारी के चलते डाउन हो जाती है फोन की भी बैटरी डाउन है ऐसे में एक अंजान की मदद तो मिलती है किन्तु उस का अनजान के प्रति अविश्वास उसे सारे समय आसन्न संकटों के प्रति आगाह करता हुआ परेशान रखता है, किन्तु संकट दूर होते ही उसके दिल में उस अनजान भले व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता भरे भाव उभरते हैं , और शायद शुक्रिया भी अदा न कर पाने का एक पछतावा भी। तूफानी रात का विवरण हम हिन्दुस्तानियों के लिए कँपकँपा देने वाला है।

“भिड़ंत” तो हूबहू मेरी और मेरी बेटी की कहानी है। कहानी पढ़ते हुए अनुभव किया की निश्चय ही यही सब हालात मुझे हुए कैंसर के दौरान मेरी बेटी (जो स्वयं एक सर्जन हैं) ने भी झेले होंगे, किन्तु कभी मुझसे अथवा परिवार में किसी से साझा नहीं किए, और मजबूती से सभी मुश्किलात् का सामना करते हुए मुझे नई जिंदगी दी, कहानी उस संघर्ष को बखूबी हकीकतन् बयान करती है जो एक डॉक्टर को एक बेटी होने के साथ करना पड़ता है, वह भावना जब मरीज कोई अपना है तब कौन सा फ़र्ज़ न निभाए बेटी का या डॉक्टर का यह निर्णय कर पाना निःसंदेह कठिन है, उस पर तमाम दुनिया की सलाहों से निबटना सबके सामने बुरा बनना और सबसे मुश्किल वह मनोदशा जहां अनिष्ठ को प्रत्यक्ष देखते हुए भी सब कुछ जानते हुए भी, अन्य सब को , सब कुछ ठीक होने की दिलासा देना। संपूर्ण यथार्थ को प्रस्तुत करती कहानी। देखा जाए तो यह भिड़ंत बीमारी के साथ स्वयं के डर से, रिश्तों के बंधन से, और सबसे बड़ी अपने आप से है जहां हम कई स्तरों पर स्वयं से हर दिन कई कई लड़ाई जीतते हारते हैं।

स्ट्राइक” कहानी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह, एवं इस का बालमन पर प्रभाव, को रेखांकित करती है। कहानी स्ट्राइक के द्वारा आम जीवन की घटनाओं का शिक्षकों की स्ट्राइक का मासूम बच्चों के मन पर कैसा प्रभाव पड़ता है यह दर्शाने का सुंदर प्रयास है। टीचर्स की स्ट्राइक का बच्चों पर प्रभाव व उनकी प्रतिक्रिया यह भी दर्शाती है कि बालमन की संवेदनशीलता एवं उनकी बड़ों का अनुकरण करने की स्वाभाविक बालमनोवृत्ति पर विशेष ध्यान दिए जाने की भी आवश्यकता है। साथ ही बच्चों को भी उनकी सीमाएं समझाई जानी चाहिए। क्यूंकि सीमा रेखा पार करने के परिणाम अच्छे नहों होते।

कहानी “शून्य के भीतर” एक ऐसी कहानी है जो व्यक्ति के अंतर्मन में पसरे हुए अकेलेपन को इंगित करती है। शून्य जीवन का शून्य है जहां आप सिर्फ आप है और कोई भी नहीं अंदर बाहर सब ओर एक शून्यता , खालीपन। कहानी एक आत्मकेंद्रित एवं परिवार को समर्पित महिला की कहानी है जिसने सभी के लिए किया किन्तु उसे किसी ने कभी नहीं पूछा। लेखिका ने यह दर्शाने का सफल प्रयास किया है कि बाहरी शोर के बावजूद मनुष्य का असली संघर्ष उसके अपने भीतर के सन्नाटे से है कहानी शून्य के भीतर अहसानफरामोश रिश्तेदारों एवं वफादार मूक पशु पक्षी की मानो तुलना दिखला जाती है । जीवन की जमा पूंजी का सकारात्मक उद्देश्य हेतु समर्पण कर मरणोपरांत भी परोपकार का संदेश है। वर्तमान में शायद हर कोई अपने ही अंदर बन गए शून्य से जूझ रहा है ।

कहानी “दो पटरियाँ” संग्रह की ऐसी कहानी है जिसमें दो विपरीत विचारधारा वाले व्यक्ति साथ रहने हेतु विवश हैं। दो पटरियां, पीढ़ियों के अंतर के चलते विभिन्न विचार धाराओं वाली माँ और बेटी के विषय में है जो एक ही छत के नीचे रहते हुए कभी एकमत एवं एकसाथ नहीं हैं बेटी माँ को पुराने समय की मानती है वहीं बेटी की मान्यताएं उसके जीवन जीने के मापदंड भिन्न है वह जीवन में भौतिक तृप्ति पर केंद्रित करती है और वर्तमान को जी लेने पर यकीन करती है वहीं माँ, बेटी से शादी कर घर बसा लेने जैसे पारंपरिक जीवन निर्वाहन के सामाजिक नियमों को लड़की के लिए उपयुक्त मानती है तथा उन्हें मानने हेतु सलाह देती है किन्तु बेटी के भिन्न विचार उन्हें पटरियों के समान दूर हो रखते हैं एक नहीं होने देते। दोनों विचार धाराओं की परस्पर विसंगतियां भिन्न भिन्न मुद्दों पर उनके बीच की बहस के ज़रिये प्रमुखता से उकेरी गई हैं वहीं उनके दृष्टिकोण पर अपनी कोई राय न देते हुए उसे लेखिका ने पाठक के विवेक पर छोड़ दिया है ।

 कहानी “पुआल की आग”, शीर्षक एक मुहावरा है जिसका अर्थ ऐसी उत्तेजना से है जो अत्यंत तेज़ी से भड़कती है किन्तु शीघ्र ही शांत हो जाती है। शीर्षक के माध्यम से मानव स्वभाव की कमजोरियों और दाम्पत्य संबंधों की छोटी मोटी नोक-झोंक को ही उल्लिखित किया है। पुआल की आग, प्रौढ़ावस्था में दाम्पत्य जीवन की सामान्य से कुछ ज्यादा होने वाली नोंकझोंक की ऐसी दैनिक क्रिया की शाब्दिक प्रस्तुति है जो नित्य ही आरोप प्रत्यारोप से शुरू होकर समझौते तक पहुंचती है और फिर अगले दिन किसी नये मुद्दे पर शुरू होती है और फिर समझौते पर समाप्त। किन्तु कुछ है जो रिश्ते को जोड़े हुए है उनके बीच के रिश्तों की आंच को समेटे हुए है। यहां क्रोध रूपी आग भड़कती तो ज़रूर है किन्तु वह मात्र अपनी गर्मी देती है जलाती नहीं रिश्ते को, उसके उलट रिश्तों की गर्मी बरकरार रखती है। ।

पुनः एक और मुहावरे पर आधारित कहानी, शीर्षक “काठ की हांडी”, विदुषी लेखिका ने इस कहानी के द्वारा मुहावरे का नितांत नया अर्थ प्रस्तुत किया है। कोरोना बीमारी के दौर का हृदयविदारक एवं मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है, वहीं कोरोना महामारी की सारी मुश्किलात एवं मार्मिकताओं को समेटे मृत्यु के द्वार पर आ खडी एक गंभीर बुजुर्ग मरीज के द्वारा प्रस्तुत मानवीयता का अद्भुत उदाहरण बयान करती है कहानी काठ की हांडी जहां आमतौर पर गलत साधन प्रयोग कर मतलब साध लेने के मायने में प्रयुक्त होता है वहीं लेखिका द्वारा उस मुहावते का इतना सकारात्मक प्रयोग निःसंदेह उल्लेखनीय है।

कहानी कूच देश छोड़ के परदेश जा बसे एवं सब कुछ होते हुए भी अकेलापन अनुभव करते बुजुर्ग की सात दिनों में सारा जीवन फिर से जी लेने की कहानी है जो महज़ सात दिनों में जीवन के सभी रंग समेटे हुए है जहां प्यार है वात्सल्य है पहले प्यार के पहले छुअन के एहसास भी हैं एवं सब कुछ छोड़ विदेश जाने जैसे कठोर निर्णय भी, करुणा है और संवेदना भी बस यदि कुछ नहीं है तो मन की शांति जिसे तलाशते हुए सारे जीवन को यादों के सहारे दोबारा जी लेने के बाद भी न चैन पा रहे हैं न ही मन की शांति से जुड़ी नींद। विस्थापन से संबद्द मर्मस्पर्शी कथानक है जो न केवल भौगोलिक अपितु मानसिक कूच (प्रस्थान) की भी चर्चा करती है। कहानी में लेखिका द्वारा पुरानी यादों, अपनी जड़ों और स्थान व्यक्ति एवं वस्तु से लगाव तथा मोह को छोड़कर आगे बढ़ने की पीड़ा बखूबी दर्शाई है। अंत अप्रत्याशित है एवं विस्मित करता है।

कहानी उल्कापिंड, आम भारतीयों की विशेष तौर पर हिंदीभाषियों की विदेशों में अंग्रेजीभाषा के प्रयोग से जुड़ी समस्याओं अथवा यूं कहे कि हिंदी भाषियों की हीनभावना को प्रमुखता से अंकित करती है जो बहुत हद तक वास्तविकता के करीब करीब ही प्रतीत होता है। अंग्रेजी का उसके विशेष अंदाज में उच्चारण न कर पाना, अथवा उस विशिष्ट लहजे में उच्चारित कथन को समझ न पाना जिस हीनता में डुबोता है उस भाव को अत्यंत सरलता से बयां किया है। कहानी का अंग्रेजी भाषी पात्र जिसका उच्चारण प्रभावित करता है उसे उल्कापिंड निरूपित करना एक अलग ही किस्से द्वारा समर्थित है। साथ ही कहानी कतिपय युवा शिक्षकों द्वारा अमर्यादित व्यवहार पर भी ध्यानकृष्ट करती है ।

हंसा दीप जी की कहानियों की खासियत यह है कि वे बहुत ही सरल भाषा में बड़े संदेश दे जाती हैं, साथ ही मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक असमानताओं  एवं अंतर्मन की कशमकश को बेहद निपुणता से प्रस्तुत करती हैं। एक संग्रहणीय पुस्तक ।  

अतुल्य                                                                                                                                                  


104-105, Mahesh Vihar , Indore Road, Nr, Mahamrityunjay Dwar ,  Ujjain M.P  456010 

9131948450

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