KayaKalp By M.I.Rajsve

 

कायाकल्प

द्वारा: एम. आई. राजस्वी

विधा: उपन्यास

Veteran  पब्लिशिंग हाउस    द्वारा प्रकाशित

मूल्य : 299

समीक्षा क्रमांक : 209


                                           गुणात्मक एवं स्तरीय साहित्य की अभिलाषा रखने वाले सुधि पाठक, वरिष्ठ लेखक एवं  संपादक, राजस्वी जी के नाम से बखूबी परिचित हैं, बात करें यदि उनकी साहित्य जगत में उपस्थिति और साहित्य सेवा की तो कहना अतिशयोक्ति न होगी की उनका कार्य स्वमेव उनकी पहचान है। उनके प्रकाशित एवं संपादित हिन्दी साहित्य की फेहरिस्त लंबी है फिर भी “अश्वत्थामा का अभिशाप,” “रामायण,” “जय  हनुमान केसरीनंदन” इत्यादि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। उनके लेखन से सहज लक्षित होता है की वे अपने गहन अध्ययन, गहरी पौराणिक एवं ऐतिहासिक समझ एवं रचनाशीलता का प्रयोग ऐतिहासिक एवं पौराणिक विषयों पर उच्च कोटि के सारगर्भित साहित्य सृजन हेतु करते हैं। सामान्य भाषा का प्रयोग, विचारों में स्पष्टता और व्यर्थ के विषय को बीच में अनावश्यक   तौर पर डालकर कथानक को व्यर्थ ही विस्तार देना उनकी शैली नहीं है,  जहां एक ओर उनकी यह विशेषता पाठक को कथानक से जोड़ कर रखती  है वही विषय के प्रति लेखक की निष्ठा एवं समर्पण को भी दर्शाती  है। अपनी कृतियों में, व्यर्थ ही अलंकृत शब्दों के जाल बुनना अथवा क्लिष्ट मुहावरे इत्यादि डाल कर विशिष्टता का आडंबर निर्मित करना भी उनकी कार्य शैली नहीं है। राजस्वी जी एक वरिष्ठ सुस्थापित साहित्यकार है उनकी रचनाये महान क्रांतिवीरों,  कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान एवं पौराणिक पात्र अश्वत्थामा, वीर हनुमान आदि पर केंद्रित हैं। लेखन में पाठक के मस्तिष्क को अपने नियंत्रण में करने की कला से बखूबी वाकिफ़ हैं। पौराणिक पात्रों पर उन्होंने स्तरीय लेखन कार्य कर साहित्य जगत को समृद्द किया है एवं उनकी कृतियाँ विषय विशेष हेतु मील का पत्थर साबित हुई हैं। कथानक पौराणिक विषय पर आधारित हो अथवा एतिहासिक, उनके द्वारा  लेखन पूर्व, विषय पर किया गया शोध कार्य निश्चय ही उनके कार्य को अद्वितीय बनाता है तथा यह कठिन प्रयास उनके लेखन से स्पष्टतः झलकते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक की समीक्षा, प्रारंभ से ही अपने विषय को लेकर रोमांचित करती रही, इस अकल्पनीय  कथानक के द्वारा लेखक ने एक अविश्वसनीय विषय को वर्तमान के घटनाक्रम से जोड़कर आधुनिक विज्ञान के समृद्ध युग में सत्ता एवं शक्ति के अहंकार में डूबे राजनीतिज्ञों के बीच एक ऐसे महान पुरुष की मिसाल पेश की है, जिसकी मौजूदगी वास्तविकता में तो दुर्लभ ही प्रतीत होती है। समाज के दीमक रूपी राजनेताओं एवं ढोंगी बाबाओं तथा भ्रष्ट अधिकारियों को दिए गए सबक के द्वारा सामाजिक जीवन में शुचिता का सुंदर उद्वरण प्रस्तुत किया गया है।

                    

          पूर्ण रूप से काल्पनिक घटनाओं का अद्भुत चित्रण करने नें बखूबी सफल हुए हैं एवं प्रस्तुतिकरण के सहज प्रवाह एवं रोमांचक वर्णन ने उन घटनाओं को वास्तविकता के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है।   

कथानक की मूल भावना के दृष्टिगत दर्शन एवं आध्यात्म को व्यापक स्थान प्राप्त हुआ है दर्शन के भाव, कहीं पारस्परिक संवाद के द्वारा तो कहीं बतौर पूरक या फिर उद्दरण स्वरूप उल्लिखित किये गए हैं किन्तु विषय की गंभीरता के बावजूद सहज ग्राह्य शब्दावली ही  है।

पुस्तक चर्चा एवं समीक्षा से पूर्व   के संदर्भ में मूलभूत विषयों पर संक्षेप में विचारण अनिवार्य प्रतीत होता है, यथा विभिन्न ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में “कायाकल्प,” आयुर्वेद एवं अन्य सिद्ध परंपराओं की एक अत्यंत रहस्यमय चिकित्सा पद्धति थी, जो की शरीर को पुनः युवा, स्मृति को तीक्ष्ण और रोगों को समूल नष्ट करने का दावा करती थी। ऋग्वेद एवं महाभारत में “च्यवन” ऋषि का वर्णन है जिन्हें अश्विनी कुमारों ने एक विशेष औषधि एवं स्नान (जिसका उल्लेख “रस शास्त्र” में किया गया  है जहां विशेष रूप से शुद्ध किये गए पारे एवं औषधियों के लेप से स्नान करवाया जाता था)  के द्वारा युवा कर दिया था।

 इस हेतु विभिन्न उपचार उपलब्ध थे यथा, योग, हठयोग (घेरण्ड संहिता में वर्णित) और प्राणायाम, मंत्र शक्ति (ध्वनि ऊर्जा), जैसे उपचारों का उद्देश्य शरीर की कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर बुढ़ापे को रोकना, युवावस्था बनाए रखना और शारीरिक-मानसिक क्षमता को चरम पर पहुंचाना था। यह शारीरिक रूप से पुनर्जन्म के समान काया का रूपांतरण था, एवं इसका प्रमुख उद्देश्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा या उलटना, दीर्घायु प्राप्त करना, और इंद्रियों की पूर्ण शक्ति बहाल करना था जिसके लिए कठोर आहार नियंत्रण, जड़ी-बूटियों,और रसायनों के प्रयोग के संग विभिन्न विधियाँ जैसे की “कुटीप्रावेशिक” जिसका वर्णन आयुर्वेद में चरक संहिता में मिलता है , “वातातपिक” आदि अपनाई जाती थीं।  

वहीं प्राचीन तांत्रिक ग्रंथों में शरीर को दिव्य बनाने हेतु आयुर्वेद से इतर, तंत्र साधना को व्यावहारिक और आध्यात्मिक विज्ञान बतलाया गया है। कायाकल्प केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि की प्रक्रिया है, जो तंत्र के माध्यम से संभव है, लेकिन इसके लिए एक गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। तंत्र साधना में कायाकल्प पारंपरिक रूप से एक वास्तविकता माना जाता है, जो कठोर साधना, योग, प्राणायाम, आहार – व्यवहार एवं  ऊर्जा नियंत्रण के माध्यम से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च स्तर पर ले जाने की प्रक्रिया है।  तंत्र साधना मुख्यतः शारीरिक और मानसिक शक्ति के माध्यम से कुंडलिनी ऊर्जा को जागृत करने पर केंद्रित है, जिससे शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाया जा सके। हालांकि यह एक अत्यंत कठिन, अनुशासित और समय लेने वाली प्रक्रिया है एवं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसे एक रहस्यमयी अवधारणा माना जा सकता है, लेकिन तांत्रिक परंपराओं में यह एक सिद्ध मार्ग है।

कुण्डलिनी जागृत करना निश्चित रूप से कायाकल्प जैसी प्रक्रिया का ही एक अत्यंत उन्नत हिस्सा है। यह केवल ऊर्जा का प्रवाह नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूपांतरण है, तथा जाग्रत कुण्डलिनी शरीर के ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को शुद्ध करती है, जिससे शारीरिक क्षमता में व्यापक बदलाव आता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया पुराने ऊर्जा पैटर्न को तोड़कर शरीर को पुनर्जीवित करती है, जिससे व्यक्ति के चेहरे और शरीर में एक नया तेज एवं युवावस्था जैसी स्फूर्ति दिखलाई पड़ने लगती है।

हिमालय की दुर्गम कंदराओं में कायाकल्प साधना के जानकार सिद्ध महात्माओं के अस्तित्व की मान्यता भारतीय पौराणिक कथाओं में दृढ़ता से उल्लिखित है। ऐसा कहा जाता है कि ये योगी विशिष्ट जड़ी-बूटियों और योग विद्या के माध्यम से वृद्धावस्था को रोककर शरीर को फिर से युवा बना सकते हैं तथा वे शरीर के पुनरुद्धार में सक्षम हैं।

प्रस्तुत पुस्तक में कायाकल्प के कठिन उपचार को सद्कार्य में उपयोग किये जाने हेतु,  एक वरिष्ठ राजनेता द्वारा जनता की सेवा के उद्देश्य से ताजीवन युवा रह कर सेवा करने के भाव से अपनी वृद्धावस्था को युवावस्था में परिणित कर उसे समाज सेवा हेतु समर्पित करने का रोमांचक विवरण है। जिसमें अनेकोननेक अत्यंत छोटे छोटे बिंदुओं को भी लेखन के दायरे में रखा गया है। यथा वापसी पर अपने कायाकल्प को प्रमाणित करने हेतु साक्ष्य निर्मित करना अथवा पुलिस की सक्रियता एवं भ्रष्ट नेता पर कार्यवाही इत्यादि।  वहीं दिव्य दृष्टि का अनुपम प्रयोग भी।

अत्यंत सीमित शब्दों में कहें तो यह एक ऐसे विचारवान भद्रपुरुष की  दोहरी जीवन यात्रा है जो अपने जर्जर शरीर को त्याग कर मात्र जनसेवा के भाव से साधक रूप में कठिन तपस्या कर जनसेवा के अपने संकल्प को पूर्ण करने हेतु तमाम मुश्किलात के बावजूद अभीष्ट को प्राप्त करता है। चूंकि कथानक में बुजुर्ग अवस्था प्राप्त होने के बाद कायाकल्प की कठिन प्रक्रिया द्वारा पुनः युवा अवस्था प्राप्त कर जनसेवा हेतु एक नया जीवन प्रारंभ करना दर्शाया गया है अतः इसे दोहरी जीवन यात्रा निरूपित करना उचित प्रतीत होता है।  

लेखन में आध्यात्मिक संदेशों का सहज वार्तालाप में प्रयोग, एवं सुंदर दृश्य प्रस्तुति कथानक को अत्यंत सहज रूप में पाठक से जोड़ कर रखती है। पुस्तक में गंभीर विषय के संग वर्तमान सामाजिक माहौल को समायोजित कर रोचक बना दिया गया है तथा दृश्यों की प्रस्तुति उन्हें उनके मूल रूप में दर्शाने में सक्षम है। राजनीतिक व्यक्ति का राजनीति के चरम पर पहुचने की अवस्था से ठीक पहले सन्यास ले लेना तथा आम जनता हेतु निस्वार्थ समर्पण की भावना मिसाल प्रस्तुत करती है वहीं नेताओं द्वारा हर संभव विधि एवं प्रक्रिया द्वारा भ्रष्टाचार को भी प्रमुखता से दर्शाया है।

कायाकल्प हेतु कठिन प्रक्रियाओं एवं परिस्थितियों का पालन, सदविचार के संग समर्पित गैर तामसिक जीवन का निर्वहन, सेक्रेटरी द्वारा एक सामान्य व्यक्ति का अधोपतन कहें अथवा विनाश के चरम तक पहुँचने की कहानी एवं ढोंगी तांत्रिक की वास्तविकता को दर्शाने में भी अत्यंत रोमांचक प्रसंगों को सुंदरता से बखान किया गया है जो रोमांच को बढ़ावा देते हुए शीघ्र और जानने की उत्कंठा उतत्पन्न करता है।

सीमित पात्रों संग अत्यंत गंभीर एवं बहुत हद तक अज्ञात विषय पर प्रस्तुत रोमांचक कृति जिसे एक बार में पढ़ना अनिवार्य प्रतीत होता है एवं इसे यदि अद्भुत कहूँ तो कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अतुल्य

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अतुल्य खरे, प्लॉट नं.:104-105,महेश विहार, इंदौर रोड, उज्जैन, मध्य प्रदेश 456010            मो. 9131948450

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

    

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