Ek Tukda Zindagi By Jiten Thakur
एक टुकड़ा
ज़िंदगी
विधा:
कहानी
द्वारा:
जितेन ठाकुर
काव्यांश
प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम
संस्करण :2026
मूल्य:
200.00
समीक्षा
क्रमांक : 211
हाल ही में उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2025
हेतु “उत्तराखंड साहित्य भूषण सम्मान” से नवाजे गए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जितेन
ठाकुर हिंदी साहित्य में सुस्थापित, अत्यंत प्रतिष्ठित कथाकार हैं। विगत पाँच
दशकों से साहित्य जगत में उनकी उपस्थिति एवं सतत सक्रियता तथा महत्वपूर्ण लेखन
क्रम द्वारा उनके अविस्मरणीय योगदान ने उन्हें उन ऊंचाइयों पर विराजित कर दिया है
जहां काम ही नाम बन जाता है।
उनकी
पहली कविता तत्कालीन प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग मे 1975 में प्रकाशित
हुई थी तत्पश्चात उस दौर की अमूमन प्रत्येक साहित्यिक पत्रिका यथा सारिका, रविवार,
साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बनी सहित अन्य सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने उनकी
रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित करीं। उनकी साहित्यिक कृतियों का देश की अमूमन
प्रत्येक भाषा में अनुवाद किया गया जो की उनके साहित्यिक सृजन की लोकप्रियता
दर्शाता है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में उनके प्रकाशित साहित्य की फेहरिस्त यूं
तो बहुत लंबी है किन्तु चंद का नाम अवश्य यहाँ उलखित करना चाहूँगा -
उनके
कुछ प्रमुख कहानी संग्रहों में, हालिया प्रकाशित नवीनतम कहानी संग्रह, “एक टुकड़ा
ज़िंदगी” जिसे काव्यांश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है, के अलावा ”दहशत गर्द”, “अजनबी शहर में”, “एक झूठ : एक सच”, “एक रात का तिलस्म”, “चोर दरवाजा”,“यादगारी कहानियाँ”, “ज़िंदगी गुलजार है”,
और गुमशुदा शामिल हैं।
बात
करें उनके प्रकाशित उपन्यासों की तो शेष-अवशेष, उड़ान, नीलधारा,
चौराह, और रहगुज़र के नाम प्रमुखता से लिए जा
सकते हैं। वहीं कविता संग्रह चन्द साँचे चाँदनी के और संस्मरण: चोर गली में
तितलियां प्रकाशित हुए हैं, जबकि जुगनू के मेले उनकी आत्मकथ्य पुस्तक है।
उनकी
कहानियाँ, मानवीय संवेदनाओं और मध्यमवर्गीय जीवन के यथार्थ को, पात्र के मानसिक
ऊहापोह एवं वैचारिक मंथन के संग बखूबी दर्शाती हैं।
आम आदमी की मामूली ज़िंदगी के यथार्थ के धरातल पर बुना गया प्रस्तुत कहानी संग्रह,”एक टुकड़ा ज़िंदगी” कथाकार जितेन ठाकुर की नवीनतम एवं उल्लेखनीय महत्वपूर्ण कृति है, जिसे काव्यांश प्रकाशन ने अत्यंत आकर्षक कलेवर में प्रकाशित किया है (विशेष उल्लेखनीय यह भी की सम्पूर्ण पुस्तक में रंच मात्र भी कहीं कोई त्रुटि नहीं है ) तथा उसमें जितेन जी की सात कहानियाँ (छह कहानिया एवं एक लघु उपन्यास कहना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है) संग्रहीत हैं। कहानी संग्रह अपनी सादगी, कहानियों के चयन एवं गहरी संवेदना के कारण संग्रहणीय है। इस संग्रह की कहानियाँ मुख्य रूप से आम इंसान की ज़िंदगी के मामूली से भी बेहद मामूली पलों, कुछ गैर जरूरी सी भटकी सी यादों, उलझते से मनोभावों, अतृप्त अधूरी इच्छाओं, स्मृतियों और जीवन के संघर्षों का लघु दस्तावेज़ है।
प्रस्तुत कहानी संग्रह की कहानी “खुशनुमा रात
की दस्तक” एक सामान्य माली हालात वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति विषयक है जो
मेहमानों के आने और ज्यादा दिन रुकने से उस पर आने वाले आर्थिक दबाव से चिंतित न
होते हुए अपनी शांत मस्तमौला जिंदगी में आसन्न हलचल एवं खलल से व्यथित है। कहानी पहाड़ की शांत जिंदगी, खूबसूरत वादियों के एक वाशिंदे
के मनोभावों की प्रस्तुति है जो अपनी शांत ज़िंदगी निर्बाध चाहता है। उसके घर मेहमानों
का आना और वे भी ऐसे मेहमान जिनको लेकर अंदेशा हो कि कहीं वे अधिक समय न रुक जाए
और उसकी शांत जिंदगी में खलल न आ जाए उसे न काबिले बर्दाश्त है । उस शक्स के लिए रात अचानक से खुशनुमा कैसे हो
गई यह भेद कथानक की रोचकता को बढ़ाता है।
भरपूर रोचकता के संग मेहमान को रुकने न देने के उस व्यक्ति के द्वारा कारित अप्रत्यक्ष हर संभव प्रयास कथानक को खूबसूरत मोड पर ले जाते हैं, सरल किन्तु सुंदर वाक्यांशों से सजी उनकी हर रचना की तरह इस कहानी में भी उन्होंने पूरा ज़मीनी खाका अपने शब्दों से कुछ इस खूबसूरती से उकेर दिया है की पाठक खुद ब खुद उन वादियों के करीब अनुभव करने लगता है, उस परिवेश में पहुँच कर मानो घटना क्रम का चश्मदीद बन जाता है। जितेन जी की कहानियां पढ़ते हुए, उनका वह अंदाज, जिसमें वह शब्दों से सुंदरता से खेलते हुए मानो उन्हें अपनी अंगुलियों पर नचाते हैं, फलस्वरूप ऐसी नजाकत और सुंदरता वाक्यांशों में आ जाती है जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है बयां करना मुश्किल लगता है, उनके सुंदर वाक्यांशों को यदि उद्धृत किया जावे तो निश्चय ही यहाँ आधे से अधिक पुस्तक लिखी जाएगी फिर भी चंद वाक्यांश प्रस्तुत हैं आप भी गौर करे --
वह जिस समय बस से उतरा, दोपहर अभी पूरी तपी
नही थी। सूरज की खुशनुमा आंच ठिठुरन से हरी हुई लग रही थी। / उस तरफ पांच सात
शर्माए और अलसाये हुए से कुछ ऐसे मकान थे जिन्हें देख कर लगता था कि इस साल सर्दी
ज्यादा पड़ने से सिकुड़ गए हैं / रूठे से इस पहाड़ी गांव के इस बेनाम बस अड्डे पर ..
.. /। ये तो महज़ एक बानगी प्रस्तुत की है,
पुस्तक में और भी तमाम ऐसे वाक्यांश हैं जिन्हें पढ़ कर पढ़ने का वह खास सुकून
अनुभव होता है जिसे शब्दों में बयां कर पाना संभव नहीं और ऐसे एवं और भी अधिक
खूबसूरत वाक्यांश इस पुस्तक में हर सफ़े पर सजे हुए मिलते हैं ।
उनके कहन
में वह लचक है, वाक्यांशों में वह कोमलता है, कि पढ़ने से ज्यादा कहीं किसी संगीत
लहरी द्वारा प्राप्य आनंद की अनुभूति होती है, पढ़ते हुए प्रतीत होता है मानो किसी
झरने के समीप हों और उसकी मधुर कल-कल शब्दों के जरिए दिल में उतर रही हो। एक ओर
जहां कहानी मनोभावों का खूबसूरत गहन चित्रण प्रस्तुत करती है वहीं जीवन के यथार्थ एवं परिस्थिति जन्य
असुविधाओं से मानस के अंतस में उठते आगत संबंधित विचारों का सुंदर वर्णन भी प्रस्तुत
करती है।
उनकी
कहानियों में मध्यम अथवा निम्न मध्यम वर्ग के संघर्ष और आम आदमी की दिन प्रतिदिन
की जुझारू और कशमकश से पूर्ण ऊहापोह में झूलती ज़िंदगी के द्वारा उस वर्ग के जीवन
की सच्ची झलक देखने मिलती है। वे अक्सर वास्तविक जीवन की बेहद छोटी छोटी भुला देने
हेतु समुचित घटनाओं और भुला दिए गए से अनुभवों में से अपने पात्र और कहानियाँ चुन
लेते हैं।
“बच्चे और बावर्ची”, जितेन ठाकुर के कहानी संग्रह “एक टुकड़ा ज़िंदगी” की एक बेहद मर्मस्पर्शी भावना प्रधान तथा बाल मनोविज्ञान को समझने एवं उन्हें समझाने का सुंदर कथानक है। कहानी में जितेन जी ने मानवीय संवेदनाओं और अमीर गरीब के बीच की खाई को, उस सामाजिक दूरी को बहुत ही बारीकी से अंकित किया है। बच्चे और बावर्ची, के द्वारा बच्चों को उन ख्वाबों से दूर ले जाने की खूबसूरत मनोवैज्ञानिक कवायद वे करते हैं जब वे उन्हें खूबसूरत बातों के द्वारा मानसिक रूप से इस बात पर राजी कर लेते हैं की स्वाद खाने में नहीं जुबान में होता है और उनके भूखे पेट और कुम्हलाते चेहरों को वे उस माहौल की आदत डालने में कामयाब हो जाते है और बच्चे उस रुखे सूखे खाने और शक्कर के चंद दानों में ही स्वाद ढूंढ लेते हैं कहानी कहीं न कहीं पेट की भूख से ज्यादा मन एवं मस्तिष्क की तृप्ति पर केंद्रित है तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण अहम है। जॉन साहब के रूप में हम एक ऐसे नरम दिल शख्सियत से रूबरू होते हैं जिसके दिल में मजलूमों के लिए नरमी है किन्तु दया से कुछ अलग भाव है जो बच्चों को जीने की नई राह दिखाने और कठोर दुनिया में निर्वाह की कला सिखा जाते हैं। कथानक मात्र भोजन पर केंद्रित नहीं है अपितु यहाँ बात है तृप्ति की, स्वाद को मस्तिष्क से समझने की जहां मानवीय संवेदना सर्वोपरि है। सड़क किनारे रहने वाले यतीम बच्चे तथा एक बेरोजगार बावर्ची के अनाम रिश्ते की दास्तां है। इस कहानी से फिर एक बार साबित हो जाता है की जितेन ठाकुर की कहानियाँ बेहद खामोशी से आपके दिल में उतर जाती हैं। “बच्चे और बावर्ची” भी ऐसी ही कहानी है जो खत्म होने के बाद भी देर तक पाठक के मन में बनी रहती है।
कहानी “घोड़ा, घास और चाबुक” अपनी
तीखी सामाजिक टिप्पणी, बंधुआ मजदूरी, सामंत प्रथा एवं साहूकारी व्यवस्था की आढ़ में
सामाजिक व्यवस्था पर तीक्ष्ण तंज़ एवं कठोर प्रहार करती है कहानी व्यवस्था, शोषण और मनुष्य की विवशता का एक ऐसा त्रिकोण पेश करती है जिसमें कमजोर
व्यक्ति जानते समझते हुए भी अपनी विवशताओं के वशीभूत उस लालच को स्वीकार कर लेता
है जिसके विषय में वह आशंकित नहीं अपितु आश्वस्त है की इसका परिणाम उसे भुगतना ही
होगा।
लेखक,कहानी में प्रतीक रूप मे शीर्षक के द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों और स्थितियों को दर्शाते हैं जहां घोड़ा आम आदमी का प्रतीक है जिसके भाग्य में मात्र श्रम करना एवं निर्देशों का पालन ही है वहीं घास के द्वारा उन्होंने आम आदमी की जरूरतों को उसी रूप में दर्शाने का प्रयास किया है जैसे की घोड़े के लिए घास जिसके लालच में घोड़े (इंसान) से काम लिया जाता है तो तीसरे प्रतीक चाबुक के द्वारा उन्होंने शोषण को दर्शाया है जहां शासक किसी भी रूप में हो सकता है। यह वह डर है जो सब जानते समझते हुए भी घोड़े को रुकने नहीं देता। कथानक के मध्यम से लेखक ने सामाजिक व्यवस्था, साहूकारी प्रथा और निम्नवर्गीय दबावों पर कटाक्ष किया है, जितेन ठाकुर की अन्य कहानियों की तरह इस कहानी की भाषा भी सरल है, लेकिन इसमें एक गहरा व्यंग्य छिपा है। कहानी का अंत पाठक को झकझोर देता है और व्यवस्था पर चिंतन हेतु विवश करता है।
जितेन ठाकुर के कहानी संग्रह “एक टुकड़ा ज़िंदगी” में शामिल कहानी “इमारत” अस्पष्ट मनोभावों, मानसिक उलझनों एवं काल के गर्भ में दफन घटनाओं के ताने-बाने से बुनी गई एक अत्यंत प्रभावशाली रचना है। यह कहानी केवल ईंट-पत्थरों के ढांचे के बारे में नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर बनने और ढहने वाली भावनाओं का एक कोलाज है। यह तो स्पष्ट है की जितेन जी की कहानियों में संवाद उतने नहीं हैं जितने मनोभावों को अभिव्यक्त करते सुंदर भावपूर्ण वाक्यांश। कहानी “इमारत” भी ऐसी ही अभिव्यक्ति है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो सम्पन्न तो है किन्तु अपने आलिशान मकान के निर्माण को लेकर कुछ भ्रमित है या स्वयं में ही स्पष्ट नहीं है कुछ मानसिक उलझनें उसके साथ हैं वह एक अनिर्णय की स्थिति में है, तभी वह एक ऐसी निर्जन इमारत (जिसे शायद भुतहा हवेली भी कहा जा सकता था) देखता है जिसे देख वह अपनी ऊहापोह से बाहर आ जाता है, एवं उसके जैसी इमारत बनवाना प्रारंभ कर देता है, निर्माण कार्य पूर्ण होने के करीब उसे अवसर मिलता है उस इमारत को अंदर से देखने का, तब अंदर का दृश्य देख वह यू व्यथित और परेशान हो जाता है कि उसका उस हवेली के समान हवेली बनाने का विचार ही अंदर से उसे गलत लगने लगता है। भाव अभिव्यक्ति और परिदृश्य वर्णन अद्भुत हैं किन्तु लेखक ने इमारत के प्रति बदलते एहसास के पीछे के राज राज ही रखे हैं एवं पाठक को अपने स्वयं के दृश्य सृजित करने हेतु स्वतंत्रता दी है। कहानी की गति धीमी है, जो उबाती नहीं अपितु पाठक को हर दृश्य को गहराई से महसूस करने का मौका देती है।
शीर्षक कहानी “एक टुकड़ा जिंदगी”, जितेन जी की सुंदर लयात्मक किन्तु सरल भाषा एवं सहज स्पष्ट बयानी की विशिष्ट शैली में, एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने लंबे प्रेम पूर्ण वैवाहिक जीवन के पश्चात हाल ही में अपनी पत्नी को खोया है। उसके मन के गहरे छुपे दर्द, उसकी मनोभावनाएं, मन के अंदर के घुमड़ते हुए जज्बातों के समंदर और अनंत यादों के कारवां के कुछ टुकड़ों की दास्तान सहज बयान करने का बखूबी सफल प्रयास किया है। कथन की सरलता ऐसी की आप भी उस शक्श के गमों में शामिल हो उसके दुख में व्यथित हो उठते हैं वहीं कभी स्वयं को उसकी मातम पुरसी में शामिल समझ कर उसे दिलासा देने लगते हैं। प्रारम्भिक कथन द्वारा जहां पीड़ित व्यक्ति अपने एहसास, अपना गम छिपाने का असफल प्रयास करता है वहीं शनैः शनैः उसका टूटना और टूट कर बिखरते हुए जीवन साथी संग बिताए दिनों की यादों की भीड़ में भटकना जैसे सभी दृश्य, अत्यंत वास्तविक रूप में बयां किये गए हैं। मानवीय संवेदनाओं, पारस्परिक प्रेम और जिंदगी के यथार्थ से रूबरू कराती, तथा भीतर से टूट चुके एक व्यक्ति के एहसासों को, खुद को बहलाने की, वास्तविकताओं को गलतफहमियों और बहलाने वाले ख्यालों से ढांपने के प्रयास दर्शाती मार्मिक कहानी है। जितेन जी की विशेषता है उनकी पात्रों के मन को पढ़ने और उसके मनोभावों को शब्द देने की। इस कहानी में भी उनके लेखन की यह खूबसूरती एवं मनोभावों को पढ़ने का उनका हुनर हर वाक्य में दर्शनीय है।
कहानी “राजभवन के
फूल”, व्यवस्था एवं प्रजा के बीच की खाई पर बेहद तीक्ष्ण व्यंग्य है और यह नश्तर व्यवस्था
की आम जन से दूरी, प्रजा को गुलाबी दुनिया के ख्वाबों में रखने की सुंदर हुकूमती
हिमाकत, इस ऊपरी खूबसूरती को उकेरती, समय
के चंद टुकड़ों के लिए सत्ताधीशों की नरमी और यह वास्तविक स्थितियाँ लेखक के
विभिन्न खूबसूरत वाक्यांश व्यक्त करने में कामयाब हुए हैं।
सत्ता एवं प्रजा के बीच की विषमता के चित्रण में एक विशिष्ट लय बरती गई है। कहानी सत्ता, सौंदर्य और साधारण मनुष्य के बीच के अंतर्विरोधों को बहुत ही संजीदगी से उकेरती है। राजभवन सत्ता शक्ति एवं अनुशासन का प्रतीक है, जबकि फूल में भावनाएं, कोमलता तथा प्राकृतिक सुंदरता है। राजभवन को भी प्रतीकात्मक लेते हुए सत्ता एवं शक्ति के सापेक्ष आम इंसान के दर्द को देखने का प्रयास है सत्ता, शासन एवं शक्ति में भावनाएं, कोमलता एवं अनौपचारिकता को कतई स्थान प्राप्त नहीं है जो यथार्थ है एवं कटु भी। आम व्यक्ति द्वारा इस से सामंजस्य न बैठा पाना सहज ही है चूंकि वह यथार्थ का भुक्तभोगी है एवं उसे सिस्टम की दीवारों के बीच एक अजीब सी “उदासी” एवं घुटन होती है जिसे जितेन जी ने फूलों के बीच एक व्यक्ति के असामान्य व्यवहार द्वारा बखूबी दर्शाया है। वहीं फूलों के द्वारा सत्ता एवं शासन का, प्रजा हितैषी एवं सब कुछ सुंदर एवं मनमोहक दर्शाने हेतु संकेत रूप में प्रयुक्त हुआ प्रयास सफल है। सामान्य व्यक्ति को कुछ समय के लिए राजभवन में सब कुछ बहुत व्यवस्थित और सुंदर दिखता है, लेकिन गहराई में जाने पर उसे एहसास होता है कि वहां आम जीवन की वह सरल स्वाभाविकता नहीं है जो बाहर की खुली दुनिया में है। यह सत्ता के गलियारों में खो जाने वाली मानवीय संवेदनाओं पर एक मौन किन्तु कटु तथा तीक्ष्ण टिप्पणी है।
कहानी 'अफलातून' के आकार के दृष्टिगत उसे कहानी कहना सर्वथा अनुपयुक्त प्रतीत होता है, जो कि इस संग्रह
की सबसे बड़ी कहानी है जो लगभग आधी पुस्तक में विस्तारित है। कहा जा सकता है एक लघु उपन्यास ही है, जिसे रोचकता
एवं गहरे सामाजिक कटाक्ष के लिए दीर्घ काल तक स्मरण किया जावेगा। यह कहानी संग्रह
की अन्य कहानियों की तुलना में थोड़ी अलग मिजाज की है, क्योंकि
इसमें “चरित्र चित्रण” पर विशेष ज़ोर दिया गया है। “अफलातून” शब्द का प्रयोग अमूमन
हम किसी ऐसे व्यक्ति के लिए करते हैं जो अपनी ही दुनिया में मस्त रहता है, खुद को
बहुत बुद्धिमान और निराला समझता है। कहानी का मुख्य पात्र भी कुछ ऐसा ही है,
वह लीक से हटकर चलने वाला और अपनी शर्तों पर जीने वाला इंसान है।
लेखक ने उसके माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिसे “अजीब” या “पागल” समझता है,
असल में उसकी अपनी एक गहरी सोच हो सकती है। कहानी में जतिन जी ने
मध्यमवर्गीय समाज की खोखली आस्थाओं, दबाव में ही सही किन्तु सत्ता भक्ति एवं शासन
व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया है। इस कहानी की भाषा में एक हल्का हास्य और गहरा
व्यंग्य घुला हुआ है, कहन पाठक को बांधे रखता है। लेखनी ऐसी
है कि “अफलातून” का किरदार पढ़ते समय पात्र आँखों के सामने जीवंत हो उठता है।
बेशक उसकी शारीरिक उपस्थिति फुटपाथ पर है, किन्तु मूलतः वह एक ठीकठाक मध्यमवर्गीय भले घर से है जिसका अपना एक घर परिवार था। उसके अस्तव्यस्त मैले कुचैले कपड़ों के बावजूद उसके बात करने के सलीके, शब्दों के चुनाव एवं तर्कों से उसका ज्ञान बखूबी झलकता है। उसकी दरिद्रता मजबूरी हो सकती है, या फिर नियति, किन्तु उसका वैचारिक स्तर उसकी स्वअर्जित संपत्ति है। वह प्रतीक है उस बहसंख्यक वर्ग का जिन्होंने दुनिया को करीब से देखा और समझ लिया है किन्तु परिस्थितियों की मार ने उन्हें उस पायदान पर ला खड़ा किया जहाँ से वे दुनिया की नग्न व्यस्तविकताए देख तो सकते हैं किन्तु उनकी सुनने वाला कोई नहीं है, यूं भी कह सकते हैं की उन्हें बयां करने का हक ही नहीं है उनका सामाजिक, नैतिक, एवं मौलिक दायित्व ही बर्दाश्त करने का है। सम्पूर्ण कहानी जितेन जी की विशिष्ट रोचक भाषा शैली में उसकी रोचक कहानियों एवं अकाट्य तर्कों से लबरेज है।
इसी प्रकार उस व्यक्ति की नास्तिकता भी महज़
वैचारिक जुनून नहीं है अपितु वह कठोर अकाट्य तर्कशीलता द्वारा समर्थित है। वह उस
अदृश्य सत्ता को नकारता है जिसकी भौतिक अनुभूति नहीं है। उसके लिए जो “अनुभव” में
नहीं,
वह “अस्तित्व” में नहीं। वह केवल प्रकृति को मानता है क्योंकि
प्रकृति की अनुभूति करी जा सकती है और वह सभी को बगैर किसी मजहबी भेदभाव के समान
रूप से अपने आशीष से नवाज़ती है।
उसकी बातें सिर्फ शोरशराबा नहीं हैं अपितु अकाट्य तर्कों द्वारा समर्थित गंभीर
कथन हैं, जब वह ईश्वर या धर्म पर अपने तर्क रखता है तो उसके तर्क
श्रोता को निरुत्तर कर देते हैं।
उसके तंज तीखे हैं तथा उसकी खामी, उसका कड़वा सच
बोलना है। वह व्यवस्था की उन कमियों को उजागर करता है जिन्हें हम देख कर भी अनदेखा
कर देते हैं। उसके पास खोने को कुछ नहीं है, इसलिए उसके पास
डरने का कोई कारण भी नहीं है और इसीलिए उसके तर्क बेबाक हैं। उसके तर्क किसी
धारदार नश्तर की तरह हैं, तथा शब्द चयन पूर्णतः विचारित एवं व्याकरणीय त्रुटि रहित,
उसके उन मारक शब्दों एवं तर्कों का प्रहार किसी अनुभवी शिकारी के तीर समान लक्ष्य
भेदी होता है। कहा जा सकता है की उसकी बातों में यथार्थ का कड़वा अर्क है तथा वह
नास्तिक नहीं, बस आँखों देखे सच का भक्त है क्यूंकि वह अदृश्य
दिव्य अलौकिक शक्तियों के स्थान पर भौतिक सत्यों यथा प्रकृति को सत्य मानता है।
कुल मिलाकर, जितेन ठाकुर का कहानी संग्रह “एक टुकड़ा ज़िंदगी” (काव्यांश प्रकाशन) समकालीन हिंदी साहित्य का एक ऐसा झरोखा है, जिसके पार झांक कर हमें अपने ही जीवन के बिखरे हुए हिस्से, कुछ साधारण से किस्से और कुछ बेहद मामूली इंसान नज़र आते हैं जो जितेन जी की कलम द्वारा विशिष्ट हो गए हैं।
यह
मात्र कहानी संग्रह नहीं है, अपितु मानवीय संवेदनाओं एवं
जीवन के चंद कटु यथार्थो यथा सामाजिक शोषण, असामानता और अंतर्विरोधों का एक ऐसा
दस्तावेज़ है जो हमें अपने अंदर झाँकने हेतु प्रेरित करता नजर आता है।
अतुल्य


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