Mahayatra By Ramesh Khatri

 

“महायात्रा”

विधा : कहानी

द्वारा : रमेश खत्री

मोनिका प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित

संस्करण द्वितीय : 2023

मूल्य : 390.00

समीक्षा क्रमांक : 183




वरिष्ठ लेखक, संपादक रमेश खत्री जो अपने परिवेश एवं जमीन से जुड़े लेखन के लिए बखूबी जाने जाते हैं एवं सतत साहित्य सेवा में सृजन कार्य में व्यस्त हैं , उनके सृजन अपने प्रत्येक रूप फिर वह कहानियाँ हों अथवा उपन्यास , उनकी कथावस्तु मध्यमवर्गीय जीवन जी रहे आम जन की आर्थिक सामाजिक विषमताओं एवं मानसिक तथा कभी कभी उल्लेख से परे  अन्य व्यक्तिगत समस्याओं के इर्द गिर्द घूमते हुए उस पात्र को केंद्रित कर समस्या को बखूबी उठाती  हैं। बात करें उनके लेखन की विशिष्ठ शैली की तो अपनी बात को छोटे  छोटे प्रचलित मुहावरों के द्वारा और अधिक स्पष्ट करना तथा क्षेत्रीय भाषा का यथा स्थान प्रयोग उनकी प्रस्तुति को अधिक ग्राह्य बनाता है। इसी तारतम्य में अपनी नवीनतम प्रस्तुति के द्वारा उन्होंने अपनी श्रेष्ठ 9 कहानियों को फिर एक बार उसी निम्न माध्यम वर्ग के किरदारों पर केंद्रित किया है अपने कथा संग्रह “महायात्रा” में , एवं उस वर्ग हेतु नितांत अनिवार्य लेकिन किसी सुविधा सम्पन्न व्यक्ति के दृष्टि में शायद कुछ भी नहीं, ऐसी आवश्यकताओं और परेशनियों का उनके स्तर पर उस मानसिकता के साथ चित्रण प्रस्तुत किया है । बात पहली ही कहानी “जूता” की करें, उसके पूर्व स्पष्ट करता चलूँ की मैं कहानी के विषय में समीक्षात्मक दृष्टि से चंद बिंदुओं पर केंद्रित अपने विचार मात्र आपके सम्मुख रख रहा हूँ किन्तु कहानी का असली आनंद तो उसे उसके समग्र रूप में शब्द दर शब्द पढ़ने एवं अनुभव करने में ही है, तो अब बात पहली कहानी “जूता” की, जिसे पढ़ते ही सहज ही वरिष्ट लेखक राम नगीना मौर्य जी के कहानी संग्रह “आगे से फटा जूता” की याद ताज़ा हो जाती है, फिर भी  सहज ही सवाल कौंधता है की यह भी क्या विषय है कहानी के लिए, किन्तु इसे आप लेखक की एवं उस पात्र की दृष्टि से देखें जिसके लिए जूता कितना अनिवार्य हो उठता है जब वह उसे हासिल करने में असमर्थ है। यह सुस्थापित सत्य है की वस्तु अथवा व्यक्ति का मूल्य उसके न होने पर ही पता चलता है, अतः सम्पन्न वर्ग के लिए एक जोड़ी जूते भले ही कोई मायने न रखें किन्तु कहानी के पात्र रामू, एवं उसकी गरीब मजदूर किन्तु बेटे की  इक्षाओं की पूर्ति हेतु जी जान लगा देने वाली माँ के नजरिए से देखें तब उसकी महत्ता समझ आती है और उस नजरिए को ही खत्री जी ने अत्यंत  सूक्ष्मता एवं गंभीरता से अपने इस कथानक के माध्यम से इस कहानी में सहेजा  है। अंत तक प्रमुख पात्र की माँ का तमाम  मज़बूरीयों के बाद भी अपने बेटे की माँग पूरी करने का प्रयास एवं उसकी कोशिशों का ज़िक्र  अत्यंत संजीदगी से करते हुए जिस प्रकार उसके अंतिम प्रयास का वर्णन है एवं गरीबी तथा समस्त मजबूरियों के पश्चात भी ईमानदारी किस तरह पुत्र प्रेम से ऊपर जा विराजती है दर्शाया गया है जो प्रभावित करता है।



उनकी अगली कृति “रिटायरमेंट” के नायक बनवारी लाल भी एक संघर्षपूर्ण जीवन जी कर, तथा तमाम मुश्किलात भरा बचपन एवं यौवन बिता कर बैंक से बड़े पद  से रिटायर हुए किन्तु जीवन के इस सफ़र में वे अपनों के लिए जीते हुए अपनों को ही खोते  चले गए एवं सिर्फ अकेलापन ही उनका साथी बना । कहानी में फ्लैश्बैक के द्वारा उन्होंने बनवारीलाल के चरित्र के संघर्षपूर्ण पिछले जीवन की झलक पेश की है जो प्रभावित करती है, साथ ही जीवन की कुछ सच्चाईयों के विषय में सोचने को विवश करती हुई ऐसी  कहानी जो वर्तमान  में कमोबेश हर किसी की अपनी कहानी है, जहां पात्र तथा स्थितियों के मुताबिक हस्बेमामूल परिवर्तन हो सकते  है।

अपनी अगली प्रस्तुति “धंधे का समय” के द्वारा उन्होनें एक आम सरकारी बस, उसकी आम निम्न मध्यम वर्गीय सवारियों  का चित्रण प्रस्तुत किया है जो बहुत कुछ वास्तविकता से मिलता है किन्तु मुख्य बात है उनकी बस की सवारियों , बस , तथा  समाजवाद एवं प्रशासन से संबंधित तंज़, जो कुछ सोचने को विवश अवश्य कर देते हैं । प्राथमिक तौर पर इसे मात्र एक चलती बस की बातें ही कहा जाता किन्तु उनके तीक्ष्ण तंज़ ने इसे एक गंभीर विषय बना दिया ।

“बीच का रिश्ता” शीर्षक से प्रारंभ में कहानी के विषय में जो कल्पना की गई थी वह अंत तक जाते जाते पूर्णतः निर्मूल साबित हुई। कहानी यूं तो एक पार्क में रखी दो  बेंचों के मध्यम से कही गई है जो उन पर बैठे एक लड़का लड़की के बीच रिश्ते का कयास लगते रहती हैं किन्तु उनके जवाब उनके ही तर्कों पर खरे नहीं उतरते। खत्री जी की शैली को जानने वाले इतना तो कयास लगा ही लेंगे की इस के पीछे रमेश जी किसे  लक्ष्य कर के कहानी कह रहे हैं,  चूंकि उनके कहन में इतनी सरलता हो यह संभव तो नहीं लगता। आप भी अपने कयास लगाए यहाँ मैं भी आगे कहानी की मूल धारणा के विषय में कुछ ना कहते हुए अगली कहानी का रुख करता हूँ।                    

इस संग्रह की संभवतः सबसे लंबी कहानी है “लोकेश तुम कहाँ हो”, जो की एक ऐसे नवयुवक के जीवन पर केंद्रित है, जो समय रहते अपनी आर्थिक परिस्थिति को न समझते हुए महज़ पत्नी को खुश रखने के लिए, और उसकी उचित अनुचित मांगें पूरी करने के लिए, अपनी चादर से बाहर पैर फैलाता गया, अर्थात अपनी सीमित आय को भूल एवं पत्नी के समृद्ध दिखने के शौक के चलते, भौतिक्ताओं के जाल में उलझता चला गया एवं उसका अंत तो सहज ही ज्ञात है सभी को , साथ ही कहीं न कहीं कथानक के मूल में यह तथ्य भी गर्भित है की रिश्ते यदि बराबर के परिवारों में हों तो स्वतः ही एक समझ बन जाती है चूंकि दोनों ही पक्ष अर्थात पति पत्नी एक समान सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के चलते जीवन की आने वाली कठिनाइयों को बेहतर समझते हैं तथा कहीं कोई दिखावे की स्थिति नहीं रहती। चित्रण एवं प्रस्तुति घटनाक्रम को सजीव बनाए रखते हैं तथा पाठक को अपने साथ संबद्ध रखने में सफल है। कहानी मूलतः संदेशात्मक है एवं भाषा सरल तथा सहज ग्राह्य , साथ ही कथानक के दृष्टिगत घटनाक्रम में जोड़े गए दृश्य भी रोचकता ही प्रदान करते हैं तथा कथानक को उबाऊ होने से बचाए रखते हैं।

संग्रह की कहानी “इंतजार” एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसका सम्पूर्ण जीवन परिस्थिति से जूझते हुए एवं अभावों से लड़ते हुए ही बीतता है, वहीं परिस्थिति की मार देखें की उसके सभी करीबी  असमय ही उसे छोड़ते जाते हैं, एवं जब उसे पुत्र के रूप में प्रकाश  की एक हल्की सी किरण नजर आती है वह भी उस के सपनों पर कुठाराघात कर अपना जीवन सँवारने निकाल पड़ता है और वह नितांत अकेला सिर्फ इंतजार करता रह जाता है शायद किसी का जो उसका अकेलापन बाँट लेगा किन्तु नियति तो अपना खेल ही खेलेगी।

शीर्षक कहानी “महायात्रा” जीवन की एवं सामाजिक संबंधों की कड़वी सच्चाई प्रस्तुत करती है। जिस का शीर्षक अपने कथानक का थोड़ा सा आभास देता है। अब यह आवश्यक तो नहीं कि आप के दुख बांटने वाले का स्टेटस आपके बराबरी का हो अथवा खुद उसके जीवन में खुशियां ही खुशियां हों। 

निम्न माध्यम वर्गीय परिवेश में रहने वाले  एक भले इंसान की कहानी है जिस के प्रति कैसे भावनाएं परिवर्तित होती हैं एवं समय के साथ साथ जब आप किसी के व्यक्तित्व के उजले पक्ष को समझ पाते हैं तब ज्ञात होता है की शायद कुछ विलंब हुआ।  वहीं भौतिक्तावादी समाज में जब संबंध संपन्नता को देखकर बनते हों तब ऐसे किसी नेक पुरुष को जिसने समस्त जीवन दूसरों के हितार्थ खर्च कर दिया हो अंतिम विदाई के लिए कोई अपना उपस्थित न हो जहां अफसोसजनक होता है वहीं बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है । कहानी का मूल विषय तो यही है किन्तु कहानी को पूरा तल्लीनता से पढे बिना एवं उसका भाव अनुभव किए बिना उसका आनंद प्राप्त नहीं कर पाएंगे।  

वैसे भी इस सब का निर्धारण करने में नजरिया बेहद महत्वपूर्ण होता है। और फिर नजरिए को बदलते देर भी तो नहीं लगती। आज हम जिसे हेय समझते है या उस के प्रति नफरत का भाव रखते है हो सकता है आने वाले समय में वह हमारा घनिष्ठतम हो। निश्चय ही यह संभव तो  है किंतु इस के होने के लिए किसी न किसी प्रत्याशित अथवा अप्रत्याशित घटना का होना भी अपरिहार्य है। 

विभिन्न भाव अंतर्निहित किए यह कहानी भी एक ऐसे शख्स की है जिसके लिए सारा जहां अपना है पर जेब से खाली है फिर भी हर किसी की हर संभव मदद करने को हमेशा  तैयार है, लेकिन हृदय द्रवित करने वाला अंत है जब ऐसे भले एवं साफ दिल के इंसान की मौत पर उसके कोई अपने अंतिम संस्कार करने हेतु भी उपस्थित नहीं होते संभवतः वर्तमान में इंसान के प्रति भावनाएं भी उसकी अमीरी और ओहदे को देख कर प्रकट की जाती हैं। 

वह शख्स जिसके ऊपर आई आपदा को टालने में वे स्वयं चोटिल एवं अपंग  हो बैठे, भले ही उन्होंने कभी इस बात का एहसान न जतलाया हो, उनका अंतिम संस्कार करता है। आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी मार्मिक कहानी, जो अपने आप में कई पहलू जैसे मार्मिकता, मानवता, सहृदयता समेटे हुए है, अपने सुंदर प्रस्तुतिकरण, श्रेष्ठ शब्द संयोजन एवं सामान्य वाक्य विन्यास हेतु मानस पटल पर छाप छोड़ जाती है वहीं कुछेक दृश्यों में विचलित भी कर जाती है।      

एक अधेड़ प्रेम कथा”, शीर्षक आकर्षित करते हुए हल्का सा रोमांचित कर पढ़ने की उत्सुकता पैदा करता है

कहानी प्रेम कथा से कहीं कुछ ज्यादा है जिसमें अनेकों भाव अंतर्निहित हैं।  कहानी का प्रारब्ध जहां एक व्यक्ति के उन चेहरों की बात करता है जो वास्तविकता से बहुत दूर होते हैं, व्यक्ति की खोखली हंसी कहीं न कहीं उसके अंदर के एकाकाकीपन, खालीपन को दर्शाती है, वही दोहरी जिंदगी जीते हुए ऐसे किसी शख्स के वास्तविक जीवन के दर्द कोई शायद ही बांट पाए क्योंकि वह तो स्वयं ही ऐसे दर्द को अपने सीने में समेट कर बस उसे जीता  है तथा किसी से बांटकर उसे न तो कम ही करना चाहता है और न ही किसी को अपने दर्द में सहभागी बना कर उस से निजात पाने का कोई प्रयास ही करना चाहता है।  

वही यह भी शोचनीय है की क्या ऐसे शख्स भी प्रेम में पढ़ सकते हैं वह भी उम्र के उस  के दौर में जब कानो के ऊपर से हल्की हल्की सफेदी झांकना शुरू कर देती है। ऐसी ही एक संभावना को कथानक बनाया है खत्री जी ने अपनी पुस्तक की इस पहली ही कहानी में ।

सुंदर तरीके से कही गई साफ सुथरी कहानी है जहां वाक्यांश एवं शब्द सुंदर हैं सरल हैं, क्लिष्टता का कहीं कोई प्रभाव नहीं है तथा अपने भाव को सहज ही पाठक तक पहुंचाने में बखूबी कामयाब हुए हैं। 

कहानी में अंतर्निहित  अप्रत्याशित मोड़ हैं जो की अत्यंत सामान्य रूप में बिना किसी चौंकाने वाले भाव को समेटे हुए प्रस्तुत कर दिया गया है। पात्र सीमित तथा भाव स्पष्ट हैं।  

उम्र के ढलान के स्तर तक पहुंचे हुए इंसान से जब उसके साथी का साथ छूट जाए तब वह अंदर से कैसे टूटता  है और उसका वह बिखराव उसे किस ओर  ले जाए या क्या परिवर्तन उसमें ला दे कोई नही जानता। “काइयां” भी कुछ ऐसे ही बिखरे हुए इंसान की कहानी है ।

उक्त संग्रह की समीक्षा में कुछ कहानियाँ ऐसी भी दिखी  जिन्हें लेखक के अन्य कथा संग्रहों में भी पढ़ा जा सकता है जिसका सहज तात्पर्य है की ये कहानियाँ जनमानस द्वारा अधिक पसंद की गईं एवं लेखक के दिल के भी अत्यंत करीब हैं।

अतुल्य 

 

 

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