Ek Zid Yah Bhi By Pragati Gupta
एक जिद यह
भी ( कहानी संग्रह)
विधा :
कहानी
द्वारा :
प्रगति गुप्ता
ग्रंथ
अकादमी नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित
मूल्य : 300
समीक्षा
क्रमांक : 199
“स्टेपल्ड पर्चियाँ”, “कुछ यूं हुआ उस रात” जैसे संग्रहणीय कहानी संग्रह एवं उपन्यास “पूर्ण विराम से पहले” के द्वारा अपनी लेखन प्रतिभा का सशक्त परिचय प्रस्तुत कर चुकी “प्रगति गुप्ता” आधुनिक साहित्य जगत में खासा नाम अर्जित कर चुकी हैं, उनकी कहानियाँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित होती हैं। पात्र की मनः स्थिति को समझते हुए पात्रों की मनोवैज्ञानिक अवस्था का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है वह उनके लेखन को विशिष्टता प्रदान करता है।
प्रगति
गुप्ता का लेखन मात्र किसी विषय पर एक कहानी न होकर सम्पूर्ण विचारों का नवीन आंदोलन प्रवाह होता
है। उनकी प्रत्येक कहानी कुछ नया कहा जाती है साथ ही एक नवीन विचार भी दे जाती है।
चिकित्सकीय जगत से उनकी गहन समीपता उनकी कहानियों में बहुधा लक्षित होती है, कभी
किसी गंभीर बीमारी पर केंद्रित अथवा कभी किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति पर केंद्रित
करते हुए वे विषय को रोचकता के संग संग सारोकार एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का भी बखूबी
निर्वहन करती हैं। विषयचयन, भाव प्रकट्य, शब्द चयन, वाक्य
विन्यास, एवं भाषा की सरलता में उनकी पूर्व की कहानियों में
एवं हाल फिलहाल के सृजन में परिवर्तन स्पष्ट झलकता है। प्रस्तुत कहानी संग्रह की
सभी 12 पूर्व में भी कहानियाँ कहीं न कहीं प्रकाशित हो चुकी हैं खूब पढ़ी व सराही
गई हैं अब उन्हें पुस्तक रूप में प्रस्तुत किया गया है अतः इस संग्रह में सभी रंग
की कहानियाँ एक साथ ही मिल रही हैं।
उनके
विशिष्ठ साहित्यिक योगदान हेतु विभिन्न संस्थानों द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया
है। उनके लेखन से उनकी सौम्यता एवं सरलता का परिचय मिलता है। वर्तमान स्थापित
कहानिकारों की फेहरिस्त उनके उल्लेख के बिना अधूरी ही है। प्रस्तुत कहानी संग्रह
में अलग अलग रंगों की कहानियों एवं उनमें प्रस्तुत पात्रों के द्वारा हमें आम
इंसान का संघर्ष, उन के जज़्बात उनकी पीढ़ा और उनका एक दूसरे के लिए अव्यक्त प्रेम तथा व्यवस्था,
रूढ़ियों एवं सामाजिक मान्यताओं से जुड़े
बहुत से अनुत्तरित प्रश्न एवं विचारों के घुमड़ते झंझावात के साथ उस पात्र विशेष की
सहनशीलता दिखलाई देती है। वहीं पात्र के माध्यम से आम जन के जीवन के अंतरद्वंद जैसे
बहुतेरे भाव भी देखने को मिलते हैं।
कहानी “बिछुड़े
सभी बारी बारी” मूल्यों, संस्कारों एवं
पुरखों की विरासत को आगे ले जाने वाले खयालात जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों को एक
संग लेकर आगे बढ़ती है। वृद्ध पिता की
पुत्र से अपेक्षाओं को पत्नी मोह में ठुकराते पुत्र के व्यवहार से पिता के टूटे
दिल के मनोभावों को अत्यंत भावनात्मक रूप से अल्प शब्दों में व्यक्त करती है, वहीं
वृद्ध अवस्था में भूलने जैसी बीमारी जो “अल्जाइमर” हो अथवा बढ़ती उम्र का सहज प्रभाव,
उसे भी लेखिका ने स्थान देकर ध्यान आकृष्ट
करने का प्रयास किया है।
तो कहानी
“एक जिद यह भी” के द्वारा पुरुष प्रधान समाज एवं पुत्र मोह ग्रसित परिवार में एक
प्रतिभाशाली युवती की उन मनोदशाओं का विस्तृत किन्तु सूक्ष्मता पूर्वक किया गया
विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जो उसे अपने आप को साबित करने की चाहत में आगे बढ़ने
हेतु प्रेरित करते हैं तथा अंततोगत्वा वह अपना वांक्षित लक्ष्य पा भी लेती है किन्तु
अपनी सफलता में अ पने दिल के कोमल भावों को भी अपनी जिद समान ही शामिल कर एक
अत्यंत सुलझे हुए व्यक्ति को पा लेने की लगन लगा बैठती है। इस स्थान पर लेखिका ने प्रमुख
पुरुष पात्र के माध्यम से जिस शालीनता,
चारित्रिक दृढ़ता एवं साफ़गोई से भाव प्रस्तुत किये हैं वह प्रभावी है एवं लेखिका के
लेखन कौशल को दर्शाती है। कहानी “राजनीति”, एक सर्वथा अनछुए
विषय पर ध्यान आकृष्ट करती रचना है। सास बहु के बीच के मसलों पर बहुत कुछ सुना कहा गया किन्तु प्रस्तुत कहानी इस से तनिक हटकर
है एवं एक पूर्णतः घरेलू महिला, जिसने
अपना सर्वस्व, घर, परिवार एवं बच्चों को
बनाने में होम कर दिया जिसकी कोई आय का स्त्रोत भी नहीं है और अब वह कुछ और देने
में सक्षम भी नहीं है तब उसे कैसे अलग थलग किया जा रहा है। बहु द्वारा परिवार में
भी जो समर्थ है जो की इस कथानक में श्वसुर हैं,
जिस से कुछ और मिलने की उम्मीद है उसे ही अधिक तवज्जो देना,
उसका अधिक ध्यान रखा जाना, और जब यह
व्यवहार उस सरल गृहणी को समझ में आते हैं तब वह कैसे अपने स्वाभिमान की रक्षा करते
हुए जो व्यवहार करती है, उस से वह सभी को आश्चर्य चकित कर देती है। यह कहानी जहां
घर परिवार में भी लोगों की राजनीति जगह जगह इस्तेमाल करने की आदत दर्शाती है वहीं
ऐसी सरल घरेलू महिलाओं के लिए एक उपयोगी सलाह भी हो सकती है।
कहानी “शह
और मात” ऐसी कहानी है जहां एक जन्मजात असुंदर पुरुष जिसकी कुरूपता ने उसकी आँखों पर प्रतिद्वंदिता और कुंठा की पट्टी चढ़ा
दी वह अपने अंतिम समय में अपराध बोध,
मानसिक पीढ़ा, कपट, अन्तरद्वंद और आत्मग्लानि से ग्रसित हो अपनी पत्नी के सम्मुख प्रायश्चित
करता है। पत्नी की शारीरिक सुंदरता से कुंठा का शिकार हुआ पति अपनी सुंदर पत्नी के प्रति प्रतिशोधात्मक व्यवहार
करता है जो उसे शायद खुशी या कहीं न कहीं आत्म
संतुष्टि देता है। लेखिका ने सुंदर शब्द कहे हैं कि “विकल्प खोजने की प्रवृति संतुष्टि
नहीं विचलन ही देती है। मैं तुम्हें मौका देती रही ताकि तुम्हारा विवेक कभी कुंठा
से बगावत कर दे”। यह कुंठा बचपन से उसके
रंग के कारण मन में बैठ गई थी, और बचपन में पड़ा कुंठा का बीज युवावस्था आते तक
विशाल रूप धारण कर चुका था। “श्रीधर को सुरेखा के चेहरे पर छाई हुई शांति बहुत
शोर करती हुई महसूस हुई / अपनी कमियों से
डरा हुआ इंसान बहुत कमजोर होता है। जैसे सुन्दर वाक्यांश लेखन को समृद्धता प्रदान
करते हैं किन्तु लेखिका का कथन कि ”मनुष्य का मौन रहकर प्रतिक्रियाहीन होना उसका मरना
ही है”, से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ चूंकि
मेरी दृष्टि में मौन भी अहिंसात्मक प्रतिकार का रूप होते हुए अपार आंतरिक शक्ति है
एवं उस के प्रभाव के द्वारा ही प्रस्तुत कथानक में सुरेखा, श्रीधर को विवश कर देती है कि वह अपनी कुंठा से
बाहर आकर माफी मांगे। वह प्रत्यक्ष लड़ाई में तो नहीं आई किन्तु मेरी नज़रों में वह फिर
भी वह जीत गई।
“है यह
कैसी डगर” एक ऐसी कहानी है जहां प्रेम में मिलन
नहीं, अपितु पात्रों का आध्यात्म के द्वारा स्वयं को भुलावे में रखना दर्शाया गया
है। विषय थोड़ा अलग है। विकल्प की उपलब्धता
मनुष्य को उद्दंड बना देती है। प्यार से मेल न हो पाने के पश्चात पति द्वारा अपमान
एवं निरंतर स्वाभिमान पर चोट कही विवश कर देते हैं। वैचारिकता, संवेदना, गांभीर्य
एवं आत्मिक प्रेम की अद्भुत गाथा। कहानी “उसका
आना” एक विशिष्ठ प्रकार के कथानक को
सँजोये हुए है। लेखिका के आसपास के मेडिकल
परिवेश का प्रभाव उनके लेखन में दिखता है। न्यूरॉलॉजिकल बीमारी Cerebral Palsy से पीड़ित बच्चों की सेवा सुश्रुषा को कथानक के केंद्र में रखते हुये बीमारी पर केंद्रित किया है, साथ ही लेखिका सामाजिक
उत्तरदायित्व निभाने हेतु सोच की नई दिशा भी देती हैं। यह भी दर्शाया गया है की व्यक्ति की परोपकार की सिर्फ
सोच होनी चाहिए वह कभी भी कही भी समाज में यह कार्य कर सकते हैं। नारी विमर्श
केंद्रित कहानी “च्यों”के द्वारा लेखिका ने नारी स्वाभिमान एवं सम्मान को समर्पित
यह दर्शाने का प्रयास किया है कि स्वाभिमान के लिए पद, प्रतिष्ठा अथवा रूप रंग मायने
अथवा पैमाने नहीं हैं। किन्तु स्वाभिमान की रक्षा करने और पात्र इमरती का आत्म
विश्वास बनाए रखने का दर्शित तरीका अधिक प्रभावी एवं सार्थक प्रतीत नहीं होता।
कहानी “पहिया”
वर्तमान में समाज में सहज व्याप्त दाम्पत्य संबंधों में अनकहे एवं अनदेखे तनाव को
दिखलाती है। पति द्वारा पत्नी के कार्यों को दोयम दर्जे का समझते हुए उपेक्षित रखना अधिकांश दंपतियों के बीच देखा जाता है जिसे
रेखांकित किया गया है, एवं भविष्य में
यही संस्कार बेटे में आ जाते हैं किन्तु बुजुर्गों की मृत्यु के पश्चात पुत्र
रिश्ते की नींव की बारीकियों को समझते हुए पत्नी के मनोभावों को समझ कर उसे एवं
उसकी भावनाओं को उचित सम्मान प्रदान करता
है जो कहीं न कहीं समय के बदलने के संग सुधार की रोशनी की किरण भी दिखलाती हैं।
“जो सोचा
कब हुआ” कहानी एक ऐसे विषय अथवा कहें समस्या को उठाती है जो वर्तमान माइक्रो फॅमिलीज़ में बहुधा देखने
में आती है वह है कामकाजी दम्पत्ति द्वारा अपने वर्क लाइफ बैलन्स का सामंजस्य न होने के चलते बच्चों को उनके हिस्से का पूरा समय न दे पाना
जिसका प्रतिकूल प्रभाव बच्चों पर स्पष्ट दिखता है उनके मस्तिष्क पर इस उम्र में
पड़े हुए प्रभाव उनके जीवन को भी प्रभावित कर देते हैं। जिसके लिए बहुत हद तक
पीढ़ियों के संग बदलती मानसिकता एवं सामाजिक बदलाव भी उत्तरदायी हैं किन्तु अंततः
दोष माँ बाप का ही कहा एवं माना जाता है एवं अंततः उनकी परवरिश को ही जिम्मेवार
बना दिया जाता है हालांकि प्रस्तुत कथानक के अनुसार जब बच्चों द्वारा मूल्यों एवं
संस्कारों से इतर व्यवहार किया जाता है तब पैरेंट्स द्वारा कठोर निर्णय लेने हेतु
विवश होना एक सशक्त उपाय दर्शाता है जो कहीं न कहीं स्वयं को भी सजा देने के
प्रतिरूप ही जान पड़ता है।
कहानी
“इसको क्या कहेंगे” वर्तमान तथाकथित प्रगतिशील समाज में आज भी लड़कियों के प्रति
बीमार मानसिकता समाज पर गहरे प्रश्न उठाती है, जहां आज भी समाज में ऐसी संकीर्ण
सोच से ग्रसित लोग हैं जो लड़की को परिवार पर बोझ समझते हैं और महज़ लड़की होने के
कारण उसे उचित इलाज भी मुहैया करवाने से गुरेज करते हैं उस पर भी विशेष रूप से यह
विषय रेखांकित किया गया है की इस नफरत की मशाल लेकर परिवार की महिलायें ही सबसे
आगे दिखलाई देती हैं।
कहानी
“क्या सही और क्या गलत” सर्वथा अनछुए विषय को सम्मुख रखती है। किन्नर विमर्श
केंद्रित कहानी, किन्नर डेरों में व्याप्त
अनाचार , किन्नरों के प्रति समाज के दुर्व्यवहार एवं एक ऐसी घ्रणित मानसिकता से
परिचय करवाती है जिसके लिए वे स्वयं कदापि उत्तरदायी नहीं हैं उनके साथ अनाचार,
ज़ुल्म, देह व्यापार एवं समाज की मुख्य धारा से अलग रखा जाना तथा उनसे संबंध रखने
वालों अथवा उनका भला सोचने वालों को भी अनेकानेक मुश्किलात् का सामान्य करना पड़ता है। किन्नर को भी समाज की
मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देती रचना ध्यान आकृष्ट करती है।
वहीं
कहानी “नित नए खेल”, समाज में व्यक्तिगत निजता की सीमाओं एवं चारित्रिक आचरण पर
केंद्रित कथानक है जो आज के उन्मुक्त होते समाज में अपनी तार्किकता खो चुका है। हाँ ,संभवतः 40 वर्ष पूर्व यह कथानक अधिक सामयिक
था। हालिया समाज में समय की कमी एवं आधुनिकता के संग हुए परिवर्तनों के चलते किसी
को भी न तो इस विषय में रुचि है की कोई
व्यक्ति अपने निजि जीवन में किस से संबंध रखता है और न ही वह उन बातों को आवश्यक समझता है जो ऐसे विषयों को उसके लिए अनावश्यक
ही बनाती है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अपने अधीनस्थ की दो पत्नी, अथवा विवाहेतर
संबंध को लेकर दर्शित प्रतिक्रिया अतिशय प्रतीत होती है।
उक्त
टिप्पणियों से स्पष्ट लक्षित है की प्रगति जी
की कहानियाँ समाज के हर वर्ग , विषय एवं अनछुए पहलुओं को समेटती हैं तथा
पाठक को सोच की एक नई दिशा देती हैं।
अतुल्य
.jpg)

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें