Mai Samay Hoon By Dilip Kumar Pandey

 

मैं समय हूँ

विधा: काव्य

द्वारा : दिलीप कुमार पाण्डेय

बिंब प्रतिबिंब पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित

समीक्षा क्रमांक : 203

अपनी प्रभावशाली शैली एवं सशक्त लेखनी के द्वारा साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट छवि बना चुके युवा साहित्यकार दिलीप जी का नवीन काव्य संग्रह “मैं समय हूँ” अपनी प्रभावी कविताओं के माध्यम से व्यापक  स्तर पर पढ़ा एवं सराहा जा रहा है साथ ही अपनी जबरदस्त छाप छोड़ रहा है तथा प्रकाशन के पश्चात मात्र कुछ ही समय में व्यापक पाठकों की प्रतिक्रियाएं हमें देखने को मिली हैं। काव्य विधा पर उनकी दक्षता का परिचय हमें उनके पूर्व प्रकाशित काव्य संग्रह 'उम्मीद की लौ ' और “अंधेरे में से”  के द्वारा प्राप्त हो ही चुका था वहीं उनके द्वारा लिखित समीक्षात्मक लेखों का संग्रह “रचनाशीलता का गणित” उनकी बतौर समीक्षक प्रतिभा से परिचय करवाता है।


काव्य संग्रह 'मैं समय हूँ' उनकी विशिष्ट रचनाओं का संग्रह है जिसमें आम आदमी के जीवन में  संघर्ष, प्रेम, संयम और इंसानी बेबसी जैसे भावों की अभिव्यक्ति लक्षित है। प्रस्तुत संग्रह का केंद्र बिन्दु ही समय है तथा उसके इर्द गिर्द ही आम आदमी के जीवन में पेश आते विभिन्न विषयों, दृश्यों पर स्वयं के अन्दर घुमड़ते विचारों की उथलपुथल, जीवन की कशमकश दर्शाती भावनात्मक रचनायें हैं जो पाठक को सोचने पर विवश करती हैं। वहीं समय और प्रेम जैसे विषयों पर भी इस संग्रह में बेशकीमती रचनाएं संग्रहीत की गई हैं।


वे अपनी कृतियों के द्वारा आम जन मानस को भावनाओं पर नियंत्रण एवं सांसारिक भटकन के प्रति सचेत करते हैं।  उनकी कविता में मेहनतकश,  मज़दूर, और आम जन के प्रति जहां एक सम्मान का भाव है वहीं सहानुभूति की भावना भी प्रत्यक्ष है साथ ही वे उन्हें अन्याय के विरुद्ध जूझने की प्रेरणा देते  हैं और कह सकते हैं की पुस्तक एक वैचारिक क्रांति को जन्म देती है। व्यवस्था के प्रति रोष के संग उनके काव्य में राजनीति,  संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट और सांप्रदायिक उन्माद के प्रति उनकी चिंता स्पष्ट लक्षित है। 

पुस्तक पर अमूमन प्रतिदिन नई नई पाठकीय प्रतिक्रियायेँ एवं सकारात्मक समीक्षाएं पड़ने में आ रही है अतः इस काव्य संग्रह की पठनीयता तो यूं ही निर्विवादित हो जाती है एवं संग्रह में प्रस्तुत प्रत्येक कविता का गहनता से पठन,  मनन करने के पश्चात  सहज ही कह सकता हूँ की हर कविता का भाव, विषय एवं निहित संदेश भिन्न है जिसे उस पर की गई कोई भी  समीक्षकीय टिप्पणी उसकी मूल अंतर्भावना के संग संभवतः व्यक्त न कर सके।

पुस्तक समीक्षा के विषय से हट कर एक विचार साझा कर रहा हूँ कृपया गौर करेंगे,  जो  कि हाल फिलहाल के दौर में देखने में आया है, कि विभिन्न प्रबुद्ध-जन स्व पांडित्य प्रदर्शन हेतु पुस्तकचर्चा में पुस्तक पर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया अथवा कथानक की मूल भावना से इतर अत्यंत क्लिष्ट भाषा में बहुत कुछ लिख जाते हैं जिसके लिए मेरे मतानुसार उन्हें अलग ही लेख प्रस्तुत करना तथा किसी अन्य माध्यम का प्रयोग सर्वथा उचित होगा न की किसी अन्य की रचना पर प्रतिक्रिया को उस में जोडना।

यूं भी स्वस्थ समीक्षा का उद्देश्य पुस्तक प्रस्तुति की संसमयिकता पर टिप्पण, उपयुक्तता,  गुण अवगुण इत्यादि से परिचय करवाना एवं कथानक , काव्य भाव भाषा , शैली इत्यादि का तार्किक गुणात्मक विश्लेषण ही है न की समीक्षक के ज्ञान का प्रदर्शन ।

 एक अन्य प्रयोग या  कहें कि प्रथा कविताओं को पुनः उद्धृत करने की भी बहुत है जिसका औचित्य चाहे जो हो पाठक को मूल पुस्तक तक जाने से कुछ दूर अवश्य ही कर देता है जबकि स्वस्थ समीक्षा का लक्ष्य ही पुस्तक की मूल भावना एवं शैली जैसे विषयों पर चर्चा एवं अपना मत प्रस्तुत करना है। अन्य प्रतिक्रियाओं के समान ही यहाँ पुस्तक में से कुछ कविताएं मैं उद्धृत कर भी दूँ तो भी मेरी दृष्टि में कवि हृदय के मूल भाव को समझने हेतु तथा काव्य के मूल विषय को जानने एवं आत्मसात करने  हेतु  प्रत्येक कविता अवश्य ही पढ़ी गुनी  जाना चाहिए अन्यथा यह संग्रह की अन्य बहुमूल्य रचनाओं के संग पक्षपात पूर्ण दुर्भाव ही होगा।

सुंदर सृजन हेतु दिलीप जी को बहुत बधाई

अतुल्य  

 

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