InBox By Geeta Pandit
इन बॉक्स
विधा : उपन्यास
द्वारा :
गीत पण्डित
श्वेतवर्ण
प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
मूल्य: 299
समीक्षा
क्रमांक : 204
विकलांगता विमर्श पर संभवतः पहली बार इस तरह से किसी रचना का सृजन किया गया है कृति का केंद्र ही विकलांगता है। सम्पूर्ण कृति उस पीढ़ा को बयान करती है जो एक विकलांग बच्चा और उसका परिवार विशेष तौर पर माँ, मानसिक स्तर पर सहते हैं। यह इस उपन्यास की विशिष्टता कही जाएगी की अमूमन जिस विषय को कथानक के एक हिस्से में महज किसी पात्र विशेष के प्रति सहानुभूति एकत्र करने हेतु उपयोग किया जाता था लेखिका ने उसे ही अपने कृतित्व का केन्द्रबिन्दु बना दिया। विकलांगता जैसे विषय को इतनी प्रमुखता से प्रस्तुत करने का उनका यह प्रयास सराहनीय है।
किसी
ने कहा था की your presence and absence both should be
felt और संभवतः यह बात बच्चों के विषय में शतप्रतिशत सच है वे रहें
तब अपनी उपस्थिति का सुखद एहसास सभी को
करवाते हैं और यदि बदकिस्मती से न रहें तो तब तो उनकी कमी निःसंदेह चुभती है, एक पोलिओ ग्रस्त बच्चे
की माँ का यही दर्द लेखिका ने पत्रों के माध्यम से सामने रखा है। ये पत्र भी वे
हैं जो माँ अपने बेटे को उसके जाने के बाद लिख रही है किन्तु कहीं भेज तो नहीं
सकती अतः वह उसके सिस्टम के इनबॉक्स में ही हैं और यही शीर्षक की तार्किकता एवं
सार्थकता है। सम्पूर्ण कथानक अतीत से संबद्ध यादों {फ्लैश्बैक}से जुड़ा है।
प्रारंभ
में बच्चे की सामान्य ज़िंदगी फिर उसकी विकलांगता से विवश माँ एवं स्वयं उसकी मानसिक पीढ़ा को उकेरा गया है और विकलांग बच्चे के दुःखद पयान के पश्चात माँ के दिल में चल रहा हर भाव पत्र के माध्यम से
लेखिका ने उकेर दिया है शब्द रूप में,जहां
भावुकता, स्नेह, वात्सल्य जैसे भाव सहज ही दिख जाते हैं।
पुस्तक
के द्वारा लेखिका अपनी ही शैली में जीवन को विशेष तौर पर विकलांगता प्रभावित जीवन
को देखने समझने हेतु विशेष आयाम सामने रखती है।
यूं
तो माँ के जीवन का हर पल बच्चे के कुशल क्षेम के लिए ही समर्पित होता है किन्तु विशिष्ट
परिस्थितियों में अथवा विशिष्ठ बचहोन के प्रति यह भवन अधिक प्रबल हो उठती है जिसे विदुषी
लेखिका ने बखूबी अत्यंत सहज शैली व शब्दों में प्रस्तुत किया है। वे अपनी लेखनी द्वारा
माँ के दिल के हर भाव को अमूमन शतप्रतिशत उसी रूप में प्रस्तुत कर सकीं हैं एवं यह
लेखन की विशिष्टता ही कहना होगी की पाठक इतनी सहजता से उन भावों को स्वयं महसूस करता
है मानो वह स्वयं ही उस कथानक का भाग है साथ ही यह भी लेखिका की सरल बोधगम्य भाषा शैली का प्रभाव है
की कोई भी भाव व्यथा प्रविष्ट करवाया हुआ नहीं जान पड़ता।
लेखिका
अपनी विशिष्ट शैली एवं लेखन में इस कथानक
में भी चुनिंदा कवियों की कुछ विशिष्ट पंक्तियाँ यथोचित उपयुक्त स्थान पर का
समावेश करना नहीं भूली हैं जो की गद्द के भाव को और अधिक प्रभावी बना जाती हैं।
अतुल्य


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