Head Ya Tale By Gita Pandit
हेड या
टेल
विधा :
उपन्यास
द्वारा :
गीता पंडित
बिंब
प्रतिबिंब प्रकाशन द्वारा
प्रकाशित
मूल्य : 300
समीक्षा क्रमांक :
198
विदुषी
लेखिका गीता पंडित रचित उपन्यास “हेड या टेल” नारी विमर्श, एवं मूल रूप से दाम्पत्य संबंधों
में तनाव तथा बिखरते रिश्तों पर केंद्रित है किन्तु उस
से भी अधिक महत्वपूर्ण वह विषय है जो इस तनाव के मूल में है जिस के विषय में आगे
विस्तार से चर्चा करेंगे।
लेखिका
गीता पण्डित लेखन, सम्पादन में जाना पहचान नाम हैं एवं किसी परिचय की मोहताज नहीं
हैं, फिर बात लेखन हो अथवा विविध साहित्यिक गतिविधियां।
प्रस्तुत
उपन्यास में कथानक से इतर भावनात्मक लेखन प्रभावित करता है। यथास्थान संदर्भ विशेष
में विभिन्न प्रख्यात कवि, मशहूर शायरों के प्रासंगिक
शेरो-शायरी, कवित्त के यथोचित अंश, कोट्स रूप में प्रस्तुत किये गए हैं उनका कथानक
के संग सुंदर तालमेल किया गया है जो पाठन में रोचकता एवं कहन को सौंदर्य प्रदान
करते हैं।
पात्र
संख्या अत्यंत सीमित है मात्र दो-तीन पात्रों को लेकर एक भावनात्मकता से परिपूर्ण
उपन्यास का सृजन लेखिका को विशिष्टता प्रदान करता है। एक दो पात्र अल्पकालीन प्रविष्टि
थे जिन्हें कथानक को गतिमान रखने हेतु लाया गया था वे भी कथा के प्रवाह के संग ही
विलुप्त हो गए।
कहानी एक
ऐसी नवयुवती की है जिसके द्वारा लेखिका इस कथानक के माध्यम से समलिंगी पुरुष के
संग विवाह से उत्पन्न नितांत अप्रत्याशित एवं विपरीत दुष्कर परिस्थितियों अथवा
यूं कहें कि पुरुष के विश्वासघात से टूटी शिक्षित समर्थ नवयुवती के मानसिक उद्वेलन एवं अंतर संघर्ष को बखूबी उजागर करती हैं , नायिका मन के भीतर चल रहे संघर्ष,
कशमकश और सही गलत जैसे बहुत सारे उद्वेलन कारक मनोभावों को
खुद पर हावी न होने देते हुए बुद्धिमत्तापूर्ण एवं शालीन व्यवहार
दर्शाती है जो उसकी मानसिक परिपक्वता एवं कठिनतम परिस्थितियों से जूझने एवं उन पर
विजय प्राप्त करने के नारी के या विशेष तौर पर कहें आज की नारी के रूप को दर्शाती
है।
सहज ही
कह सकते हैं कि यह एक बहुत ही जटिल और संवेदनशील स्थिति है,
जिसमें पत्नी को अपने पति की यौन रुचि के बारे में पता चलता है कि वह
पुरुषों की ओर आकर्षित हैं, न कि महिलाओं की ओर, इस स्थिति
में, पत्नी के मनोभाव और द्वंद्व को समझने का प्रयास करती
रचना है।
यदि उक्त
स्थिति में सहज स्वाभाविक एवं प्रारंभिक प्रतिक्रियाओं पर भी गौर करें तो बहुत
स्वाभाविक है की ऐसी परिस्थिति में नारी भले ही वह आधुनिक हो, पढ़ी लिखी एवं बाहर
की दुनियाँ से बखूबी परिचित भी हो, सहज ही आघात और अवसाद की अवस्था में चली जाती
है जहां उसे यह जानकर आघात लगता है और वह इस बात पर प्रमाण के बावजूद विश्वास नहीं
कर पाती तथा वह मानसिक विक्षोभ, अंतरद्वंद एवं अपने बिखरने की कगार पर खड़े दाम्पत्य जीवन
की अनिश्चितताओं को लेकर मन में उठ रहे सैकड़ों सवालों से जूझती रहती है। बाज दफा वह स्वयं को भी दोषी समझती है वहीं इस भावनात्मक
उथल-पुथल के चलते वह क्रोध, दर्द, हताशा तथा उदासी जैसी भावनाओं के झंझावात में घूमती रहती
है। इसमे सबसे प्रबल भाव रिश्ते और रिश्ते के भविष्य को लेकर होता है जिसके लिए वह
स्वयं दोषी न होते हुए भी चिंतित एवं व्यथित रहती है।
प्रस्तुत
उपन्यास का कथानक विषय की गंभीरता के मद्देनज़र भावनात्मकता प्रधान है एवं एक
अत्यंत गंभीर ऐसे विषय को उठाता है जिस पर अमूमन हमारे यहाँ कुछ कहा नहीं गया है
या कहें की हमारे तथाकथित प्रगतिशील लेखकगण ऐसे विषयों पर लिखना शायद आज भी वर्जित
समझते हैं । विदुषी लेखिका की कलम से अनेकानेक खूबसूरत विचार कथानक के बीच में
पिरोए गए हैं जो जहां एक ओर कथानक में नायिका की मनोदशा को स्पष्ट करते हैं वहीं
पाठक को सोचने पर विवश भी करते हैं एवं परिस्थितियों का पूर्ण आभास भी उनसे मिलता
है। ऐसे अनेकों वाक्यांश एवं कुछ संपूर्ण पैराग्राफ ही हैं जिन्हें उल्लिखित किया
जाना चाहिए किन्तु बेहतर होगा कि पाठक उसे कथानक के संग पढ़ते हुए भावों का समग्र
रूप में आनंद लें।
लेखिका
ने उपन्यास में पात्रों के माध्यम से दाम्पत्य संबंध को बनाए रखने हेतु समस्त
संभावनाओं पर भी विचार किया है यथा पत्नी और पति के बीच खुला और ईमानदार संवाद भी
करवाने का प्रयास किया गए किन्तु पुरुष द्वारा उसे कुछ विशेष अहमियत नहीं दी गई इन
हालात में नारी का ठगा जाना महसूस करना, पति द्वारा किसी भी तरह का क्षोभ अथवा अफसोस प्रकट न करना उसकी पीढ़ा
बढ़ाता है वहीं यह सोच अधिक परेशान एवं व्यथित करती है की यदि स्त्रियां उसे
आकर्षित नहीं करती तो यह बात उसे पहले क्यों नहीं बता दी गई। इसके पीछे पुरुष का
मर्दाना दंभ था अथवा स्वयं की कमी के लिए शर्म या ग्लानि जबकि उसकी ओर से आत्म-चिंतन
का भाव अत्यंत प्रबल रहा, पत्नी के द्वारा गहन चिंतन किया जाना एवं तब निर्णय लेना
उसके दाम्पत्य संबंध को बना कर रखने के प्रयासों को पुख्ता करते हैं जो स्वतः ही
यह प्रश्न भी उठाते हैं की क्या दाम्पत्य संबंध बना कर रखने का एक मात्र दायित्व
नारी का ही है।
यूं तो
किसी भी कथानक के विभिन्न अंत एवं मोड़ हो सकते हैं उसी तरह प्रस्तुत कथानक का अंत भी
लेखिका ने शालीनता पूर्वक नायिका को फ्रेम से हटा कर किया है जबकि यदि वास्तविकता
देखी जाए तो आम तौर पर यह निदान सब को उपलब्ध नहीं होता बेहतर होता अगर लेखिका
नायिका को फ्रेम में रखते हुए उसका जुझारूपन दर्शाती एवं पति को प्रायश्चित अनुभव
करवाते हुए कुछ ऐसा करती जो समान परिस्थितियों की महिला एवं ऐसे
छलिया पुरुष हेतु एक मिसाल बन पाती। फिलहाल में यह हार कर मैदान छोड़ने जैसा
प्रतीत हो रहा है। लेखन के द्वारा नारी मन के भावों का सूक्ष्म विश्लेषण देखने में
आता है।
कथानक कोगतिशील
बनाने एवं विस्तार देने तथा भाव एवं विषय को स्पष्ट करने हेतु कहानी के अंदर कहानी
का प्रयोग किया गया है जो यूं तो कथानक का ही भाग बन जाती है किन्तु बार बार कहानी
के पात्रों एवं घटनाओं के कारण मूल विषय और पात्र से ध्यान भटकता है। हालांकि जिन
कहानियों से एवं एक अन्य सह पात्र जिनके द्वारा कथानक को आगे विस्तार दिया गया है
वे भी कहीं न कहीं नारी उत्पीड़न एवं उस पर अत्याचार से जुड़े हुए विषयों पर ही
केंद्रित हैं। पुनः कहना होगा कि कथानक के संग नायिका के मनोभावों को जिन
भावनात्मक शब्दों में लिखा गया है वह निश्चय ही अत्यंत श्रेष्ठ कथन हैं जो एक ओर
तो अपने सुंदर शब्दों के चयन, सारगर्भित
वाक्यांशों का गठन एवं स्तरीय भाषा हेतु याद किए जाएंगे वहीं दूसरी ओर लेखिका का
यह भावनात्मक लेख नायिक की भावनाओं की उसके वास्तविक
रूप में अभिव्यक्ति करते
हुए कथानक एवं दृश्य के साथ पूरा पूरा न्याय करते है।
वहीं प्रमुख
नारी पात्र असीम को बार बार अभया संबोधित किया जाना अन्य पात्र के प्रवेश के भ्रम
पैदा करता है जो कि कुछ स्पष्टता नहीं दे
सका एवं भ्रमित कर जाता है, भाषा अत्यंत सुंदर है किन्तु क्लिष्ट कदापि नहीं है। हार्दिक
शुभकामनाएं.
अतुल्य


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