Gandharnandini By Nilima Gupta
गांधारनन्दिनी
विधा : पौराणिक
कथा
द्वारा :
नीलिमा गुप्ता
दृष्टि
प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
मूल्य : 400.00
समीक्षा
क्रमांक : 201
अपने
पूर्व प्रकाशित तीन पौराणिक उपन्यासों “मैं हूँ सीता”, “मैं कृष्ण सखी” और “मैं बाबा का कान्हा”, के समान ही एक बार
पुनः नीलिमा जी ने महाभारत की एक प्रमुख स्त्री पात्र, “गांधारी” को अपनी पारखी
नज़रों एवं अपने तार्किक विश्लेषण की कसौटी पर परखा है और पौराणिकता के स्थापित माप-दंडों
की तराजू पर तौला है। लेखिका द्वारा इन पौराणिक
कथाओं के प्रमुख पात्रों को अपनी तार्किक दृष्टि से एक अलग ही नजरिए से देखा गया है।
उनके द्वारा इन पौराणिक पात्रों के संग घटित घटनाओं एवं तत्कालीन परिवेश में अन्य
समायोजनों को भी उन्होंने एक अलग ही नजरिए से देखा परखा है जो पूर्णतः तार्किक होते हुए उन मान्यताओं
से अलहदा विमर्श हेतु बाध्य करता है जो अनंत काल से विद्यमान रही है।
प्रस्तुत
विश्लेषणात्मक उपन्यास में गांधारी के द्वारा ताजीवन आँखों पर पट्टी बांध कर रहने
के संकल्प को उन्होंने जिस नजर से देखा है वह सर्वथा नई सोच तो है ही, निश्चय ही
अन्य तथ्यों के प्रकाश में अपनी तार्किकता भी प्रमाणित करते हुए उनकी सोच को
पुख्ता करती है।
एक
ओर जहां उन्होंने गांधारी के अंतरद्वंद,
दृढ़ निश्चय, उस की कठोर प्रतिज्ञा, मंझी हुई कूटनीतिज्ञ होना एवं शासन कला में
निपुणता को दर्शाया है वहीं उसके पश्चाताप एवं आत्म ग्लानि को भी स्थान दिया है। गांधारी
द्वारा अपने एवं अपने पिता तथा भाई के अपमान का बदला लेने की प्रतिशोध की नित बलवति
होती मनोवृति और उस से संबद्ध घटनाक्रम को भी यथोचित तार्किकता संग प्रस्तुत किया
गया है। नीलिमा जी द्वारा नारी पात्रों के
माध्यम से स्त्री के सम्मान एवं उसकी आंतरिक मजबूती, सहनशक्ति जैसे महान गुणों को
भी सामने रखा गया है। नीलिमा जी ने इस प्रमुख पात्र को अपने ही नजरिए से देखा है एवं
लेखकीय विशिष्टताओं, पौराणिक विषयों की विषद जानकारी तथा भाषाई सरलता एवं दक्षता
के संग, उनकी विहंगम दृष्टि के द्वारा, निश्चय ही वे हमें पात्र
के विषय में, साथ ही महाभारत के अन्य पात्रों के विषय में भी सोचने हेतु नए आयाम
देती हैं।
गांधारी, जो की गांधार नरेश महाराज सुबल की
अत्यंत सुन्दर गुणवान पुत्री एवं शकुनि की बहन थी , कुरु वंश के ज्येष्ठ, एवं जन्मांध, प्रज्ञाहीन धृतराष्ट्र तथा पांडु के दादा भीष्म की जबरदस्ती के चलते कुरु वंश की बहू और
धृतराष्ट्र की पत्नी बनने को विवश हुई ,उस
का व्याह जन्मांध धृतराष्ट्र से किया गया जबकि संभावित था पांडु का उसका पति होना ।
वहीं कुंती पांडु को व्याही गई जो सामंत शूर सैन की पुत्री थी तथा शूर सैन के
बहनोई कुंतीराज द्वारा उसे गोद लिए जाने के कारण उसका नाम कुंती पड़ा था उस से रूप,गुण ज्ञान एवं राज काज संबंधित समस्त विद्याओं एवं विधाओं में
निपुणता में गांधारी श्रेष्ठ थी। वह स्वयं
कुशल राजनीतिज्ञ एवं परम बुद्धिमान एवं
कूटनीतिज्ञ थी।
विवेचनाओं
के आधार पर एव उपलब्ध व्याख्याओं के आधार पर यही समझा और माना गया कि गांधारी ने अपनी पति के प्रति
प्रेम, पतिव्रत धर्म एवं श्रद्धावश
धृतराष्ट्र के अंधेपन के समर्थन में स्वयं भी सारे जीवन आँखों पर पट्टी बांध ली।
किन्तु इस विषय में नीलिमा जी की तार्किक विवेचना के अनुसार भीष्म के गर्व को
तोड़ना और उनसे बदला लेना गांधारी का एक
मात्र उद्देश्य था जिसकी शुरुआत उसने आँखों पर पट्टी बांध कर भीष्म की उस सोच को
पंगु कर दिया जहां वे उसे धृतराष्ट्र की आँखें
बना कर रखना चाहते थे। उसके गुणवंती,रूपवान
और शासन कार्यों में निपुण होने के विषय में उन्हें भली भांति जानकारी तो थी ही इस
के चलते ही तो वे उसे युद्ध में गांधार नरेश को परास्त कर अपने जन्मांध पौत्र हेतु
ले आए थे जिसके द्वारा संभवतः वे एक तीर से कई निशाने साधना चाहते होंगे यथा, धृतराष्ट्र
को शासन सत्ता, स्वयं की निष्पक्ष छवि, कर्तव्यों का सर्वश्रेष्ठ निवारण वगैरह।
गांधारी
को अपनी मुहिम में पहली सफलता तब मिलती दिखलाई दी जब उसने धृतराष्ट्र के हृदय में राज
सिंहासन का मोह जागृत कर दिया एवं यह भाव उत्पन्नतथा बलवती कर दिया की राजा उन्हें ही बनाना चाहिए,पांडु को राजा बनाकर न सिर्फ उनका बल्कि उनकी संतान के साथ भी बड़ा अन्याय
होगा। तब उनके मस्तिष्क में यह विचार उठने लगे की किस तरह पांडु को सिंहासन छोड़ने
के लिए विवश किया जाए एवं क्रोधवश वे अपने स्नेही भाई के प्रति निर्मम हो उठे।
जबकि पांडु ने अत्यंत विवशता में राजभार संभाला और ही
ज्यों ही उन्हें बड़े भाई धृतराष्ट्र की इक्षा का पता चला, वे पहले तो राज्य विस्तार के नाम पर युद्ध करने एवं पश्चात अपनी दोनों रानियों के संग विश्राम
करने की अनुमति लेकर धृतराष्ट्र को प्रतिनिधि राजा बना कर वहाँ से वन में चले गए ।
धृतराष्ट्र को गांधारी ही अब अपनी सबसे बड़ी
हितैषी लगने लगी और शकुनि श्रेष्ठ सलाहकार, अब गांधारी का एक ही सपना रह गया था की किस तरह इस अस्थायी राज की व्यवस्था को
स्थायी बना सम्पूर्ण राज पर नियंत्रण प्राप्त किया जाए तभी उसका प्रतिशोध पूरा होता। इधर कुंती और
गांधारी में से भी कुंती के पहले माँ बन जाने ने भी गांधारी के सपनों को थोड़ा भंग
अवश्य किया किन्तु पूरी तरह न तोड़ सकी व वह अपनी चलबाज़ियों के दाव-पेंच बुनती रही।
पांडु की वन में ही अचानक दुर्घटना में मृत्यु क्या उसकी कुटिल नीतियों का ही
हिस्सा नहीं थी। कुंती और उसके पुत्रों को हस्तिनापुर लाकर युधिष्ठिर का
युवराज्याभिषेक भी गांधारी की चिंता को बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ। तब भीम को लड्डू
खिला कर मारने का षड्यन्त्र रचा गया जो भाग्यवश विफल हुआ, फिर वर्णावत का आग लगाने का षड्यन्त्र हो अथवा राज्य का बंटवारा और द्यूत
क्रीडा में युधिष्ठिर द्वरा सब कुछ हारना, सभी आखिर कर
गांधारी की प्रतिशोध भारी चालों के ही परिणाम तो थे मात्र द्रोपदी के चीर हरण वाली
घटना ने गांधारी को भी व्यथित किया किन्तु जिस विश वृक्ष के बीज उसने बोए थे उस
में ऐसे ही फलों के आने की उम्मीद की जा सकती थी। जिन्हे उसके पुत्रों एवं भाई
शकुनि ने बेहतरीन तरीके से अंजाम तक पहुचाया एवं अंत अंत तक भीष्म द्वारा काल गणना द्वारा युधिष्ठिर
के बनवास का समय पूर्ण बतलाये जाने पर भी दुर्योधन उन्हें पुनः वनवास हेतु भेजना
चाहता था हाँ यह जरूर याद रखना चाहिये की
युद्ध में पांडवों की ओर से भी किसी नियम का पालन नहीं किया गया कर्ण, भीष्म,
धृष्टध्रुमन, शल्य, को तब मार दिया गया जब वे निःशस्त्र थे वहीं दुर्योधन का वध भी
मल्ल युद्ध के नियमों के विरुद्ध उसकी
जांघ पर गदा के प्रहार द्वारा किया गया। वहीं
जब वन में अग्नि की चपेट में आ जाने व
कुंती के प्रयास के बावजूद धृतराष्ट्र एवं गांधारी घायल हुए एवं उनकी रक्षा करते
हुए कुंती तो प्राण ही गंवा बैठी। उस घायल हालत में गांधारी के मन को जैसे लेखिका
ने खोल कर रख दिया है। अपने पुत्रों की मृत्यु को विधाता की इक्षा और युद्ध में
हार जीत का परिणाम समझ कर स्वीकार कर लेते तो यह दुर्गति न होती। विधाता ने कर्मों
का दंड दिया है। ये विचार उसके पश्चाताप को भलीभांति दर्शाते हैं ।
पांडवों
को द्यूत क्रीडा में हारने के कारण जब 13 वर्ष का वनवास मिला उस दौरान भी कुंती ने धृतराष्ट्र गांधारी के महल में रहना
स्वीकार नहीं किया क्यूंकि वहाँ उनकी पुत्र वधु का घोर अपमान हुआ था और वह समय उन्होंने विदुर की
कुटिया में बिताया। कुंती ने सदा ही अपने जेठ एवं जेठानी का भरपूर ध्यान रखा
किन्तु सदा के स्वार्थी बड़े भाई भाभी का
मन कुंती के लिए कभी भी न पसीजा न ही वे कभी उसके लिए शोकाकुल हुए ।
युद्ध
में अपने पुत्रों को खो देने के पश्चात, धृतराष्ट्र और गांधारी किसी वैराग्य के
वशीभूत हो तप करने तो वन में नहीं आए थे अपितु पांडु पुत्रों के साथ धृतराष्ट्र,
अपने क्रोध और कुंठावश राजमहल को त्याग वन में आ गए। पांडवों के सभी प्रयासों के
बावजूद धृतराष्ट्र संतुष्ट नहीं थे और राजमहल छोड़ वानप्रस्थ स्वीकार किया ।
पांडु की पत्नी कुंती भी अपने जेठ और जेठानी की
सेवा हेतु वन में आ गई किन्तु
वे दोनों कुंती के प्रति कृतग नहीं
हैं। जबकि विदुर (जो धृतराष्ट्र के पिता महर्षि वेद
व्यास से ही उतत्पन्न एक दासी
पुत्र थे) भी उनके साथ सेवा हेतु वन में आ
गए विदुर भी केवल पितामह के स्नेह के वशीभूत हो अपना राज्य के प्रति कर्तव्य
निबाहते रहे। सम्राट युधिष्ठिर ने तो उन्हें अपने राज्य का प्रमुख सलाहकार बनाया
था।
धृतराष्ट्र और गांधारी को आग से बचाने में जल
जाने से कुंती की मृत्यु हो जाने के बाद
गांधारी अपने पूर्व के कृत्यों के विषय में विचार करते हुए स्वयं को सभी
गंभीर कुकृत्यों के पीछे लिप्त पाती है क्यूंकि आवाज भले धृतराष्ट्र की रही हो उस
पर बुद्धि तो गांधारी की ही होती थी। गांधारी ने प्रारंभ से ही वैमनस्य के बीज बोए थे
वे अब इतनी गहरी जड़ें जमा चुके थे की लाख प्रयत्न करने के बाद भी धृतराष्ट्र के मन से
पांडवों के प्रति घृणा निकाल ही न सकी। वे स्वयं ही इस कटुता के मूल में रहीं वे
ही सूत्रधार हैं, वे ही सारे अनर्थ की जड़ हैं।
गांधारी
के विषय में एक नई सोच एवं दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती हुई पठनीय कृति।
अतुल्य


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