KORA KAGAZ BY GAJARA KOTHARI AND NIRMAL CHAWLA
“कोरा कागज”
विधा : उपन्यास
द्वारा : गजरा कोटारी एवं निर्मल चावला
प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण : वर्ष 2013
मूल्य : 175
समीक्षा / पाठकीय प्रतिक्रिया क्रमांक : 196
उपन्यास “कोरा कागज़” गजरा कोटारी एवं निर्मल चावला द्वारा लिखा गया जो 2013 में प्रकाशित हुआ
किन्तु एक लम्बे अरसे पश्चात इस पुस्तक का समीक्षार्थ चयन सिर्फ इस लिए किया गया चूंकि, गजरा कोटारी के नाम “बालिका वधू” जो की एक समय का मशहूर TV धारावाहिक था उसके 2175 एपिसोड्स लिखने का रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में दर्ज है, और बस यही कारण रहा कि एक अच्छे उपन्यास कि आस ही मुझे इसको खरीदने को बाध्य कर गयी ।
यूं तो आमतौर पर मैं किसी भी पुस्तक पर कम से कम ऋणात्मक टिप्पणी करने का प्रयास करता हूँ, एवं सामान्य गलतियों को नज़रंदाज़ ही करता हूँ किन्तु यह लिखते हुए मुझे कतई अफसोस नही हो रहा की पुस्तक ने अपनी अनेकोंनेक कमियों के चलते पूर्णतः निराश किया है तथा गलतियों का स्तर सामान्य से कहीं ऊपर हो जाने के कारण मैं उन्हें यहाँ लिखने हेतु बाध्य हूँ। हालांकि उनमें से कुछ कमियाँ अथवा गल्तियां प्रकाशक एवं मुद्रक के स्तर की भी हैं ।
बात शुरू से ही शुरू करें तो IBSN एवं प्रकाशक के विवरण वाले पृष्ट पर इस पुस्तक में सम्मिलित 9 कविताओं के विषय में बतलाया गया है ,कहा गया है की कोरा कागज पुस्तक में सम्मिलित 9 कविताओं में से 7 किसी अन्य के द्वारा लिखी गई हैं एवं अंतिम 2 गजरा कोटारी द्वारा किन्तु कविताओं कि बतलाई गयी पृष्ट संख्या सही नहीं है तथा भ्रमित करती है.
दुसरे प्रकाशक एवं मुद्रक ने अपनी सामान्य गल्तियाँ कि हैं जैसे वर्तनी सम्बंधित गलतियां , शब्दों के बीच अंतर न रखना एवं दो का एक शब्द बना देना यथा p 58 पर “असमंजसवाली” जो कई बार अर्थ का अनर्थ भी कर देता है वहीँ अधिकांश जगहों पर जहाँ आधा अक्षर ही प्रयोग होना था वहाँ पूर्णाक्षर प्रयोग किया है यथा दुल्हन को दुलहन (p 68 ) या फिर इन्सान को इनसान (p 69 ) लिखा जाना एवं इस प्रकार कि गल्ती बार बार दोहराई गयी है.
विभिन्न स्थानो पर सामान्य प्रवाह से हट कर हिंदी के ही कुछ शब्दों को प्रयोग किया गया है जो संभवतः कथानक कि प्रस्तुति को सुन्दर बनाने हेतु रहा हो ,किन्तु यह बात निश्चय ही अचंभित करती है कि वे शब्द उस स्थान के लिए या तो उपयुक्त ही नहीं थे एवं वैसे शब्द या तो हैं ही नहीं अथवा प्रचलन में ही नहीं हैं एवं संभवतः वे लेखिका द्वय के मनघडंत शब्दावली से लिए गए हैं. यथा “ज्ञानता “(p82 ) जिसे हिंदी में विदयुता अथवा ज्ञानवान कहा जा सकता था किन्तु उसे सिर्फ अज्ञानता से अ हटाकर ले लिया गया .
आगे भी कुछ और उदाहरण देने का उद्देश्य मात्र यही है की मैंने सदैव कि भांति पुस्तक को गहनता एवं सूक्ष्मता से पढ़ कर ही टिपण्णी की हैं एवं उन्हें कदापि सतही न समझा जाये . एक नज़र इन पृष्ठों पर भी डाल लें - p89 मुसकराते, p 90 मार्मिक (शब्द का गलत स्थान पर प्रयोग ), p92 आश्चर्यवश (नया शब्द ?), p 93चेहरे पर “सबलता भाव’ (नया शब्द एवं भाव ?) p95आत्मरत (नया शब्द , संभवतः आत्मकेंद्रित लिखना होगा) , p 97माता पिता के संबंधों का “आलेख’ जानकर(आलेख ?) ,p 98 दायक (उचित होता यदि दाता लिखा जाता ) , p 118 पर कद्रदान के स्थान पर शुक्रगुजार अथवा आभारी होना चाहिए था. , वहीँ p 104 ‘रचनाओं को क्रमबद्ध “संघठित” किया’ (संघठित शब्द का गलत स्थान पर प्रयोग ?), p 110 उनकी कलात्मक ‘सोचपरस्ती”(?) या फिर p 64 पर “अरक्षिता’ या फिर ‘बहसा बहसी” या ‘अन्तिमता” या फिर p 117 पर ‘पुरुषता’ का प्रयोग जिसके लिए उचित शब्द पौरुष, पुरुषार्थ, पुरुषोचित आदि हैं ही , या फिर एक और नया व् अनोखा शब्द “शोकित” जिसका तात्पर्य संभवतः शोकाकुल रहा हो .
गलत वाक्य अथवा वाक्यांशों का प्रयोग तथा मुहावरों का गलत प्रयोग भी देखने में आया उसकी भी कुछ बानगी देख लें प 56 पर ‘ताने बाने बुनना’ जिसका प्रयोग उस स्थान पर उपयुक्त नहीं है एवं सामान्यतौर पर इस का प्रयोग किसी नवीन कार्य कि रूप रेखा बनाने हेतु किया जाता है यथा वह अपने सुखद उज्जवल भविष्य हेतु ताने बाने बुन रहा है किन्तु इसका प्रयोग तो सर्वथा भिन्न अवस्था दर्शाने हेतु किया गया है .
पुस्तक के कथानक कि बात करें तो विषय पुरुष अहं के चलते दाम्पत्य संबंधों में विघटन के स्तर तक दरार एवं इस के दुष्प्रभाव पर केन्द्रित है जो कि वर्तमान कथानक में पुत्री को पिता के मां के संग किये गए व्यवहार के कारण सम्पूर्ण पुरुष जाती पर ही भरोसा खो देती है या कहें उनसे नफरत ही करने लगती है . तीन प्रेम कहानियाँ है अतः पुस्तक का अधिकाँश प्रेम कहानी को समर्पित है, अंततः प्रेम की विजय होते हुए दर्शाया गया है.
कथानक अच्छा था बशर्ते लेखन पर उचित ध्यान दिया जाता तो पाठक अधिक आनंद प्राप्त कर सकते थे .
अतुल्य


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