Chup Bhi Ek Bhasha Hai By Suresh Singh

चुप भी एक भाषा है 

विधा : काव्य 

द्वारा : सुरेश सिंह 

New World Publication द्वारा प्रकाशित 

मूल्य : 250

समीक्षा क्रमांक : 197



 वरिष्ठ कवि सुरेश सिंह अपने पूर्व प्रकाशित कविता संग्रहों भव्य: मकड़जालम, आज फिर धूप मैली है और पृथ्वी फैलाती है पंख के द्वारा अपनी विशिष्ट लेखन शैली से एवं बहुधा अपनी जमीनी जुड़ाव वाली कविताओं के द्वारा वे पाठक वर्ग के बीच अपना विशेष स्थान बना चुके हैं उनकी कविताएं विशेष तौर पर जीवन. प्रकृति, राजनैतिक व्यवस्था से असंतोष  एवं वैश्विक अशांति पर केंद्रित देखी गई हैं।   

प्रस्तुत कविता संग्रहों "चुप भी एक भाषा है" के द्वारा उन्होंने अपने तकरीबन १००विचारों को पाठकों  से काव्य रूप में साझा किया है,  एक बात विशेष तौर पर कहीं जा सकती है उनके बारे में कि,  कही भी, उनकी कविता किसी बंधन में नहीं है न भाव के न समाज अथवा राजव्यवस्था के, वे स्वतंत्र लेखन करते है उनके भाव पूर्णतः आजादी के साथ हमारे सामने आते हैं एवं उन्हें पढ़ कर यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने मात्र अपने भावों को शब्द दे दिए है बिना किसी अतिरिक्त प्रयास अथवा विषय चयन के  और बिना विशेषणात्मक खूबसूरती हेतु प्रयुक्त होने वाली भर भरकम शब्दों कि श्रृंखला के । 


 कहीं न कहीं कवि के अंतर्मन की हताशा को व्यक्त करती प्रतीत हुई संग्रह की पहली कविता “चुपचाप” वहीं कविता “आवारगी” भी एक हद तक कुछ विवशता जतलाती दिखी। गाज़ा के विनाशक युद्ध और उसके दिल दहला देने वाले दृश्यों ने कवि हृदय को अत्यधिक व्यथित किया है, जिसकी पीढ़ा उनकी कविताओं “धमाके”, “अंधेरा”में स्पष्ट लक्षित है। सुंदर लगी ये पंक्तियां 

धमाकों से केवल घर ही नहीं 

मानवता ढह रही है 

भरभराकर

पूर्व कविता संग्रहों में उनकी कविताओं में जो जिजीविषा और जीवन तथा प्रकृति के प्रति उमंग नजर आती थी वह इस संग्रह में नदारत है या उस जोश खरोश के साथ नज़र नहीं आती। यूं तो सदा की तरह उनकी कविताएं सरल भोले भाले किसान के हृदय के उद्गार ही, हैं किन्तु इस दफ़ा उनकी कविता कहीं कुछ असहाय  विवश सी अधिक नजर आईं। उनकी विवशता कविता “कैसे होगा पता” में भी है जहां आकाश को प्रतीक रूप में रख  उन प्रभावों के विषय में जतलाया है जिनके कुप्रभाव और बोझ तले  आज का आम  मानव दबा हुआ है, तो “नदी हो जाएगी आकाश गंगा” भी कुछ ऐसे ही नकारात्मक भाव दर्शाती है, जब वे कहते हैं कि,

नदी सूख जाएगी

एक दिन

हो जाएगी आकाश गंगा 

जिसका अंश हूं मैं 

समझो कि उसी का वंश हूं 

वैसे ही निराशा के अंधेरों में डूबती उतराती है कविता “तितली” जहां नाम से तो जीवन की रंगीनियों को दर्शाया गया है किन्तु वहीं स्मृति के माध्यम से कवि दर्द की बेजान गलियों में उतर जाता है। वहीं वसंत के स्वागत की आतुरता दर्शाती एवं उसके माध्यम से  जीवन में नवीन ऊर्जा एवं खुशियों का स्वागत करने को बेताब हृदय की आकुलता दर्शाती है "सुन रही हो क्या" और "ढलती जनवरी"। 

तो कविता “सूर्योदय” में वह कवि जो सदा सूर्योदय में नवजीवन के दर्शन करता था जिसे पक्षियों का कलरव और कोपलों का खुलना दिखलाई पड़ता था अब वहीं लिख रहा है कि 

मगर जिंदगी 

नए सूर्योदय के बाद भी 

पुरानी ही होती जाती है ।

वह नवजीवन का जोश. नवीनता के लिए उल्लास वह जीवंतता के रंग अदृश्य है ।

“इन  दिनों” भी एक नैराश्य दृष्टि हताश उछवास सी कविता है । हाँ किन्तु अपने जोश, ओज और अमन की चाहत रखने वाले खरी खरी कहने वाली शैली की ओर वापस लाती है “एक धुन है मुझमें”,  जहां सत्ता के षडयंत्र पर चोट है और स्वयं के लिए कितनी खूबसूरती से कह गए हैं कि

मैं तो घास दूब का सहोदर हूं 

थकान भी नहीं हरा  पाती  मुझे

“समय के हकलाते जल में” वे बात करते है उस  बिक चुकी या अंधी हो चुकी पत्रकारिता की जो चेहरे ढकने में व्यस्त हैं न कि उन चेहरों की सच्चाई बतलाने में।  वे स्मरण करते हैं माखनलाल चतुर्वेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, और माधवराव सप्रे को। सभी प्रख्यात पत्रकार जिन्होंने भारतीय  पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता, को नई दिशा दी और राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; ये सभी स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार भी थे जिन्होंने 'कर्मवीर', 'प्रभा', 'हिंदी केसरी', 'प्रताप' जैसे पत्रों से देश को जगाया। अब ये सब सिर्फ नाम बन गए जिनके आदर्श मृत हुए या मृतप्राय हैं। पत्रकारिता के गिरते स्तर, पीत  पत्रकारिता पर तीक्ष्ण आक्षेप. 

तो वहीं सत्ता धारियों पर दिखावे की राजनीति और तमाम देशी विदेशी मेहमानों के स्वागत अभिनंदन से क्या प्राप्त है इस पर तीखा तंज है “इतिहास होने के लिए”

भाव प्रधान कविता “तुम्हारे शब्द” सच ही कहीं अंदर तक  भिगो जाती है वहीं “स्मृतियां फूल हो रही थी” भी बेहद कोमल किन्तु भाव से परिपूर्ण कविता है जिसमें जीवन का संघर्ष  है तो विगत स्मृतियों की कुछ प्रेम रस भीगी फूल सी कोमल शांत लहरें भी। 

प्रेम भाव से ओतप्रोत है कविता “वनलता” जहां संपूर्ण प्रकृति को ही अजर अमर प्रेम का साक्षी मान लिया है एवं प्रतीकात्मक भाव भी अत्यंत  सहज एवं  मासूम हैं । साथ ही “तनिक” भी प्रेम रस से भीगी हुई नन्ही सी कविता है जो सिर्फ एक भाव का शाब्दिक रूपांतरण है.

समस्त बंधनों से मुक्ति की अभिलाषा को व्यक्त करती और सांकेतिक रूप से जीवन. आत्म के संग जुड़े अनेकानेक बंधनों को प्रस्तुत करती है कविता “गर्मी”। 

निराशा और अवसाद की काली परछाई बार बार आ जाती है चंद खुशनुमा  भावों के बाद पुनः कविता “काली रात” के माध्यम से जीवन के भयावह वर्तमान एवं आने वाले कल को लेकर अनंत अंतहीन चिंताएं. क्या नहीं होगा कुछ भी खुशनुमा जो जीवन को जीवन दे दे । 

भाव प्रधान कुछ कविताओं का उल्लेख जरूरी हो रहा है जैसे “सफर”. “दूब” और “थोड़ी सी जगह”। लंबी कविता “चू रहा है अंधेरा” विभिन्न भाव का समावेश जो दर्शाती है एक दीर्घ काल चक्र को समेटे हुए है वैश्विक व्यवस्थाओं की असफलता और सिसकती मानवता।

नारी जीवन की विवशताओं को अत्यंत मार्मिकता के संग उक्ति है "सीता कथा" ।

वर्तमान में कविताओं में इस कदर नकारात्मकता का स्वागत और बारम्बार आना निश्चय ही कवि की समाज देश एवं विश्व के प्रति तथा उनसे प्रभावित होती अनेकों चिंताओं का ही फल कही जा सकती हैं साथ ही वह उनका समाज कि वर्तमान दशा और दिशा को दर्शाने का एक माध्यम भी है ही । विश्व के अमूमन हर कोने में चलते युद्ध. सिसकती मानवता और करता बचपन फिर गाज़ा हो या सीरिया सभी कवि के भावों को निरंतर प्रभावित करते दिखते हैं.  पूर्व से कुछ भिन्न हैं इस संग्रह की सभी कविताएं.  अपने शब्द चयन एवं भाव अभिव्यक्ति के द्वारा निःसंदेह प्रभावित करती है। अधिकांश कविताओं में भाव गर्भित हैं एवं पाठक अपने निष्कर्ष लेने हेतु स्वतंत्र। एक बात जो पहले भी सुरेश जी की कविताओं में दिखाई वह अब भी बरकरार रही वह है उनका प्रकृति और जमीन से गहरा जुड़ाव। बहुत कुछ कहा है इस संग्रह में भी उन्होंने। वहीं विश्वव्यापी नकारात्मक स्थितियों का प्रभाव भी स्पष्ट  है। 

अतुल्य


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